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Magazine - Year 1964 - Version 2

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आनंदमय कोश का आनंद

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आनंद का प्रत्यक्ष स्वरूप इस संसार में देखना हो तो वह ‘प्रेम’ में ही परिलक्षित हो सकता है। पंचकोशी साधना के अभ्यासियों को प्रथम वर्ष में गायत्री को अपनी माता मानकर उसकी गोदी में एक वर्ष के छोटे बालक की तरह क्रीड़ा करते, अपने मातृ प्रेम का और माता के वात्सल्य के भाव स्मरण करते हुए आनंद में आह्लादित होने का अभ्यास कराया गया है।

द्वितीय वर्ष में सूर्य प्रकाश के मध्य गायत्री माता के मुख मंडल मात्र का ध्यान करने और उनके दाहिने नेत्र की पुतली पर चित्त को एकाग्र करने की साधना कराई गई थी। पुतली की ज्योति का सुविस्तृत होकर साधक के चारों ओर आभा के स्वरूप में आच्छादित होना, और उसके अन्तःकरण में प्रविष्ट होना यह उस साधना का विस्तृत स्वरूप था।

तीसरे वर्ष दीपक जलाकर उसके माध्यम में प्रकाश-ज्योति का ध्यान, अभ्यास करना, फिर उस प्रकाश में अपने आपको तल्लीन एवं समर्पण करके एकात्म भाव का अनुभव करना, यह अद्वैत-साधन आनंदमय कोश की साधना के लिए कराया गया था। ज्योतिर्मय माता को अपने में और अपने को माता में ओत-प्रोत अनुभव करते हुए द्विधा को मिटा देना और एकात्म भाव को प्रत्यक्ष देखना, यही उस साधना क्रम का स्वरूप था।

अब इस चौथे वर्ष में विश्वात्म-दर्शन का अभ्यास हमें आनंदमय कोश के अनावरण के लिए करना चाहिए। अर्जुन को कृष्ण ने गीता सुनाते समय अपना विराट स्वरूप दिखाया था। यशोदा द्वारा माटी खाते हुए धमकाये जाने पर भी भगवान ने अपना वही

रूप उन्हें दर्शाया, कौशल्या ने राम को पालने में खिलाते हुए भी वही रूप देखा था और काकभुशुण्डिजी ने भगवान राम के मुख में प्रवेश करके भी उसी स्वरूप की झाँकी की थी। यह विश्व ब्रह्माण्ड ही परमात्मा का स्वरूप है। संसार के कण-कण में, प्रत्येक जीव में भगवान की झाँकी करना और तदनुरूप प्रत्येक के साथ सद्-व्यवहार करना विश्वात्मा की सच्ची आराधना है। अपने में सबको और सबमें अपने को समाया हुआ दीखने का अभ्यास करना चाहिए।

प्राथमिक अवस्था में प्रतिमाओं के आधार पर भगवान की स्थापना की जाती है और चंदन, अक्षत, धूप-दीप से उसका पूजन होता है। पीछे ऊँची स्थिति में पहुँचने पर इस विराट विश्व को ही परमात्मा का साक्षात् स्वरूप मानना पड़ता है और उसके चरणों पर अपने शरीर, मन, वचन, कर्म और धन को समर्पित करना पड़ता है। भगवान पत्र-पुष्पों के बदले नहीं, भावनाओं के बदले प्राप्त किये जाते हैं। और वे भावनाएं आवेश, उन्माद या कल्पना जैसी नहीं वरन् सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिएं। उनकी सच्चाई की परीक्षा मनुष्य के त्याग, बलिदान, संयम, सदाचार एवं व्यवहार से होती है। भक्ति भावना को इसी कसौटी पर परखा जाता है और यदि वह खरी होती है तो उसके बदले में आनन्दमय परमात्मा अवश्य मिलता है। सच्चिदानन्द की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।

आनन्दमय कोश के अनावरण की इस वर्ष की साधना विश्वात्मा का भाव दर्शन और उसकी सत्कर्मों द्वारा पूजा करने की है। उसे जो जितनी सच्चाई एवं श्रद्धा के साथ करेगा, उसे उसी अनुपात से आत्म-संतोष आत्मानन्द की प्राप्ति होगी।

गायत्री उपासना का भावनात्मक महत्व भी है और वैज्ञानिक भी। इस महाशक्ति को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष और कामधेनु के नाम से पुकारा जाता है। जो इसका आश्रय लेता है तर जाता है। उसके लिए यह धरती ही स्वर्ग बनती है और अपना अन्तःकरण ही आनन्द का निर्झर प्रतीत होता है। आरंभ में जब तक यह उपासना जप, ध्यान और पूजन तक सीमित रहती है, तब तक उसे बाल स्थिति कहते हैं पर जब अन्तःकरण के स्तरों को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की कठिन साधना भी चल पड़ती है तब उसमें प्रौढ़ता आती है और तदनुरूप वह आत्म-बल भी प्राप्त होता है जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। पंचकोशी साधना इसी स्तर की विभूति है, जो इसे अपनाता है, वह धन्य हो जाता है।

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