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Magazine - Year 1964 - Version 2

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अपने स्वामी आप बनिए?

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क्या आप अपनी सफलता के लिए, अपने अभ्युत्थान के लिए जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए किसी की मदद, किसी के सहारे की प्रतीक्षा में खड़े हैं? क्या आप इस आशा में ही बैठे हैं कि दूसरे आकर आप को तुर्त-फुर्त सफलता की मंजिल पर पहुँचा देंगे? यदि ऐसा ही है तो यह निश्चित है कि इस धोखे में आपको निराशा के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। स्वयं आपके सिवा संसार में कोई शक्ति नहीं जो आपको सफलता की मंजिल पर पहुँचा सके, विजय की सिद्धि प्रदान कर सके। आप को अपने ही पैरों पर चलना होगा, स्वयं ही पुरुषार्थ करना होगा और विश्वास करना होगा अपने आप पर जीवन की सिद्धि के लिए-सफलता के लिए। यह जीवन का ध्रुव सत्य है।

क्या आपने एक विचारक और जीवन की भूल-भुलैयाओं में पड़े हुए उस नागरिक की कहानी पढ़ी है। वह नागरिक अपनी समस्याओं में, जीवन की उलझनों में काफी उलझा हुआ था, कोई राह नहीं सूझ रही थी उसे। सोच रहा था कोई मदद करे। एक दिन उसे बड़ी ही प्रेरणाप्रद पुस्तक मिली जिसे पढ़ कर उसमें आशा का संचार हुआ। उसने सोचा शायद इसका लेखक समस्याओं के समाधान करने में मेरी मदद करेगा। वह नाम पता ढूंढ़ता हुआ उस विद्वान के पास पहुँचा और उसकी पुस्तक का परिचय देते हुए बोला-”आपने बहुत अच्छा लिखा लेकिन क्या आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं।” विद्वान ने बड़ी गम्भीरता से सोच विचार किया और कहा- “आप कल आना।” दूसरे दिन ठीक समय पर वह नागरिक उक्त विद्वान के यहाँ पुनः गया। उन्होंने उसे अपने कमरे में बैठाया और बोले-”भाई मैं तो तुम्हारी मदद नहीं कर सकता लेकिन एक अन्य व्यक्ति आयेगा वह तुम्हारी मदद कर सकेगा” और यह कह कर उसे वह विद्वान एक दूसरे कमरे में अन्दर ले गया बोला—”यहाँ बैठिए अभी वह आता होगा।” काफी समय हो गया कोई नहीं आया तो नागरिक ने व्यस्त होकर कहा—”वे सज्जन अभी तक नहीं आये जिनके लिए आपने कहा है।” विद्वान बोला-”अभी आता है।” फिर प्रतीक्षा में काफी समय बीत गया। अधीर होते हुए नागरिक ने फिर वही प्रश्न किया। अब की बार विद्वान उठा और सामने से एक बड़े पर्दे को हटाया तो उसके पीछे बड़ा शीशा था जिसमें ठीक उस नागरिक का पूरा चेहरा, शरीर दिखाई देने लगा। शीशे में उस नागरिक की छाया की ओर इशारा करते हुए विद्वान बोला-”भोले आदमी! यह सामने दिखाई देने वाला मनुष्य ही तुम्हारी सहायता कर सकता है दूसरा कोई नहीं।”

सचमुच उस दिन उस नागरिक ने जीवन का बहुत बड़ा पाठ सीखा। उसे अपने ऊपर विश्वास हुआ “मैंने कितने ही दिवस दूसरों की मदद की आशा में गुजार दिए, लेकिन अब मैं स्वयं ही अपनी मदद कर सकता हूँ, दूसरा कोई भी मुझे मंजिल तक नहीं पहुँचा सकता। इन पाँवों से चल कर स्वयं ही वहाँ पहुँचूँगा।”

हम बार-बार यह दुहराते हैं कि जीवन की सफलता का उत्कर्ष केन्द्र बिन्दु स्वयं अपने आप में ही निहित है कहीं बाहर नहीं। वही एक ऐसा आधार है जिसके सहारे आप जीवन-पथ की कड़ी से कड़ी मंजिल भी तय कर सकते हैं। यदि आप संसार में, पदार्थों में, साधनों में इस आधार को अपने से बाहर ढूँढ़ेंगे तो अन्त में आपको निराशा ही मिलेगी। क्षणभंगुर, नाशवान, परिवर्तनशील संसार, इसके पदार्थ, साधन आपका कितनी दूर तक साथ दे सकेंगे? वे कहीं भी साथ छोड़ सकते हैं अन्ततः आप अकेले ही बच रहेंगे जीवन-पथ पर-आगे बढ़ने के लिए। अस्तु बिना किसी आशा प्रतीक्षा के ही निज बल पर आगे बढ़िए। इस तरह की प्रतिक्षा में जीवन धन नष्ट न कीजिए।

अपने पैरों पर खड़े होइये। किसी से मदद, दया की भीख न माँगिए। न किसी से कुछ इच्छा करें न कोई शिकवा-शिकायत ही। एकमात्र अपनी आन्तरिक शक्ति पर भरोसा रखिए। यदि आपमें अपने पैरों पर ही चलने की ताकत होगी तो निश्चित समझिए हजारों पग आपकी मदद को चल पड़ेंगे। आपको अपने हाथों पर विश्वास होगा तो हजारों हाथ आपकी मदद को दौड़ पड़ेंगे। यह कोई कल्पना नहीं जीवन का सत्य है। सहयोग सहायता से उन्हें वंचित रहना पड़ता है जो इसकी प्रतीक्षा में दूसरों की आशा लगाये बैठे रहते हैं।

दूसरे लोग आपको मार्ग बता सकते हैं, गिर पड़ने पर उठा भी सकते हैं लेकिन इतना निश्चित है कि जीवन का वास्तविक पथ प्रदर्शन आपके अन्दर से ही होगा। मार्ग पर आपको ही चलना पड़ेगा। दूसरों से मार्ग पूछें, बाहर से अनुभव संग्रह करें, लेकिन फिर भी उसका अभियान आप स्वयं ही पूरा कर सकते हैं। अन्य कोई नहीं। बालक को अभिभावक गिर पड़ने पर उठा सकते हैं, लेकिन अपने ही पैरों पर वह खड़ा होना सीख सकता है दूसरों पर नहीं। यदि कोई उसे गिर जाने पर भी न उठावे तो भी उसके अन्तर में उठने की, अपने आप खड़े होने की, अपने पैरों पर चलने की प्रवृत्ति एक दिन उसे खड़ा कर देगी और चलना सिखा देगी।

अपने पैरों पर चलने वालों, अपने अन्तर केन्द्र पर हाथ रख कर उससे मार्ग-दर्शन प्राप्त करने वालों को, आत्मनिर्भर होने वालों को दूसरों की मदद की आवश्यकता नहीं है। फिर दूसरे लोग आपकी कब तक मदद कर सकते हैं? बहुत थोड़े समय तक। यदि आप में दूसरों पर निर्भर रह कर जीवन गुजारने की आदत पड़ जाये, आप स्वयं कुछ भी न करें, या आप से दूसरों को कुछ भी करने की आशा न रहे तो निश्चित समझिए कोई भी आपका साथ नहीं देगा। आपका अत्यन्त प्रिय, साथी, अपार साधन सम्पत्ति, बहुत सहायक भी आपका साथ छोड़ देंगे। आपकी उपेक्षा करेंगे। जिसे आप अपना आधार मानते हैं उसे खिसकते कुछ भी समय नहीं लगेगा। पति-पत्नी को बुरा लगने लग जाता है। पुत्र माँ-बाप को और माँ बाप असमर्थ हो जाने पर पुत्र को। तब न कोई मित्र सहारा देता न बन्धु। इस बात को सत्य समझें और जीवन का अंग बना लें। आपको अपने ही पैरों पर अन्त तक जीवन यात्रा तय करनी होगी। यह ठीक है कि जो सहयोग मिलता है उसे अभिमान वश ठुकरायें नहीं और जिसको आपकी मदद की आवश्यकता है उसे सर्वथा व्यक्ति वादी ही बन कर उपेक्षित न करें।

शान्ति का, विश्राम का, आनन्द का स्थान भी आपके अन्दर ही है। जिस व्यक्ति अपने अन्दर ही शान्ति नहीं मिलती तो निश्चित है उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकती। मित्र, सखा, बन्धु-बान्धवों या संसार की अन्य बातों में हम शान्ति ढूँढ़ने का व्यर्थ प्रयत्न करते हैं, यत्र-तत्र भटकते हैं। बुद्ध बहुत वर्षों तक इधर-उधर भटके। लेकिन अन्त में अपने अन्तर में ही उन्हें शान्ति का आधार मिला। अपने अन्तर में जो व्यक्ति शांत है उसके लिए सब जगह शान्ति मिल जाती है। जो अन्दर से अशान्त है उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकती।

जो व्यक्ति यह सोचता है कि संसार के लोग उसके दुख दर्द को बंटा कर उसे आनन्द प्रदान करेंगे वह भूल में हैं। सुख, आनन्द एवं विश्राम का स्रोत तो मनुष्य के अपने अन्दर ही है, उसकी आत्मा। साँसारिक पदार्थों और वस्तुओं पर अपनी सुख, शान्ति, विश्राम को छोड़ने वाला व्यक्ति जीवन भर उनके परिवर्तन के साथ सदैव हिलता-डुलता भागता-दौड़ता रहेगा तब यह प्रयास उसके लिए मृग-मरीचिका ही सिद्ध होगा।

अपने हृदय के सिंहासन पर बैठ कर आप संसार के स्वामी और शासक हैं लेकिन संसार में अपना स्थान

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