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Magazine - Year 1964 - Version 2

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ईश्वर प्राप्ति की साधना

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पूजा अर्चा का तात्पर्य ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं वरन् अपनी भक्ति भावना, प्रेम-प्रकृति को विकसित करना है। एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक व्यायाम की तरह ही पूजा-अर्चा की प्रक्रिया को माना जा सकता है, जिसके आधार पर पूजा-काल में किया हुआ अभ्यास हमारे स्वभाव का एक अंग बन जाय। विचारों और कार्यों में प्रेम की दिव्य पुण्य प्रकृति झिलमिलाने लगे यही पूजा की सार्थकता है। हम जो कुछ भी सोचें उसमें प्राणिमात्र के हित साधन की आकांक्षा ओत-प्रोत रहे और जो कुछ करें उसका प्रत्येक अंश विश्व मानव की सुख शान्ति अभिवृद्धि करने वाला सिद्ध हो, यही तो प्रेममय जीवन की गतिविधि हो सकती है। भक्ति -मार्ग का यही लक्ष्य हैं। ईश्वर-भक्त के लिये अपने जीवन को इसी दिशा में अग्रसर करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। भक्त उसे ही कहा जा सकता है जो प्राणिमात्र में ईश्वर को समाया हुआ देखता है और उसे पाप-पंक की गन्दगी से स्वच्छ करके सब प्रकार स्वच्छ एवं उत्कृष्ट बनाने के लिये प्रयत्न करता रहता है। हर किसी को उसकी इच्छानुसार सन्तुष्ट कर सकना न तो उचित है और न आवश्यक। क्योंकि बहुत से लोग ऐसे हैं जो दुष्टतापूर्ण आकाँक्षायें रखते हैं, दूसरों का शोषण करना चाहते हैं। यदि उन दुष्प्रवृत्तियों को भी पूर्ण करने के लिए कोई भोला भावुक व्यक्ति प्रयत्न करने लगे तब तो उसमें अनीति ही पनपेगी, असुरता का पोषण होगा। प्रेमी को विवेकशील भी रहना पड़ता है ताकि दूसरों के हित साधन का सच्चा उपाय समझ सके और जरूरत हो तो कड़ुई कुनैन खिलाने या फोड़े का आपरेशन करने वाले डॉक्टरों की तरह बाहर से निष्ठुर एवं कठोर दीखने वाला दूरदर्शितापूर्ण व्यवहार भी कर सके। कठोरता के पीछे भी अनन्त करुणा छिपी हो सकती है।

समयानुसार व्यवहार की कोमलता या कठोरता का अन्तर रहना स्वाभाविक है और आवश्यक भी। पर उसके मूल में अपना स्वार्थ साधन नहीं, दूसरों की हित साधना—दूरवर्ती स्थिर फल देने वाली श्रेय-योजना ही सन्निहित होनी चाहिए। जीवन की यही सर्वोत्कृष्ट नीति हो सकती है। इसी में मानव जीवन की सफलता और सार्थकता मानी जा सकती है। प्रेमी स्वभाव बनाने की साधना को ही ईश्वरभक्ति या पूजा अर्चा कहते हैं। इस उद्देश्य में हम जितने ही सफल होते जाते हैं ईश्वर उतना ही हमारे निकट खिंचता चला आता है। वस्तुतः ईश्वर हमारे नितान्त निकट है। रोम रोम में समाया हुआ है। प्रत्येक श्वाँस प्रश्वाँस में उसी की बंशी बजती है। अन्तरात्मा में बैठा हुआ वह क्षण-क्षण में हमारे साथ विचार विनिमय करता है और बिना पूछे ही श्रेय साधन के आवश्यक परामर्श देता रहता है। हमीं है जो उसकी उपेक्षा करते हैं, भुलाये रहते हैं और अवज्ञा की अशिष्टता बरतते हैं। ईश्वरभक्ति इतने से ही पूर्ण हो सकती है कि उसे हम अपने कण-कण में समाया हुआ, अपने चारों ओर फैला हुआ। हर घड़ी साथ रहता, खेलता और मैत्री निबाहता हुआ देखें। इतनी अनुभूति अन्तरात्मा में जागृत हो सके तो समझना चाहिए कि ईश्वर मिल गया।

ईश्वर को अपनी मनमर्जी के अनुसार चलाने की, उसे नौकर जैसे हुक्म देने की धृष्टता छोड़कर यदि उसकी मर्जी से अपनी मर्जी मिलाने की शिष्टता सीख लें तो ईश्वर की उपलब्धि का जो लाभ मिल सकता है वह निश्चित रूप से मिल जायगा। ईश्वर प्राप्ति कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसके लिए जगह-जगह भटकना पड़े। परमात्मा कहीं खोया हुआ नहीं है जिसे ढूंढ़ना पड़े। वह नाराज नहीं है जिसे प्रसन्न करना पड़े। करना केवल इतना ही है कि उसे जानते हुए भी अनजान जैसी गति-विधियों को अपना रखा है उन्हें बदल दिया जाय। पूजा अर्चा के समय तक ही ईश्वर का जप ध्यान करने को सीमित न रख कर, उस अनुभूति को यदि पूरे समय, पूरे जीवन-क्रम में, पूरी स्नेह-सम्वेदना के साथ देखा, समझा और अनुभव किया जा सके तो ईश्वर प्राप्ति का यह लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो सकता है। अंगार पर भस्म की परत चढ़ जाने से उसका स्वरूप अग्नि जैसा न रहकर कुछ और ही प्रकार का बन जाता है। जलता हुआ अंगार गरम होता है। रंग लाल रहता है, प्रकाश भी उसमें से निकलता है, किन्तु जब वह कुछ समय ऐसे ही निष्क्रिय पड़ा रहता है, और नया ईंधन नहीं मिलता तो धीरे-धीरे बुझने लगता है। ऊपर की परत पर भस्म की एक तह छा जाती है। तब देखने में वह काला, प्रकाश रहित और छूने से उष्णता से रहित बन जाता है। यही बात आत्मा की भी है। ईश्वर का अंश होने से वह अग्नि जैसे दिव्य गुणों से परिपूर्ण है, पर जब दिव्य विचारों और दिव्य कर्मों का ईंधन नहीं मिलता तो वह मुरझाने और बुझने लगता है। मल, आवरण और विक्षोभ की राख जैसी पर्त उस पर छा जाती है। तब वह निष्कृष्ट कोटि का जीव मात्र रह जाता है। अगणित मनुष्य इसी स्थिति में पड़े हुए हैं। उनके गुण,कर्म, स्वभाव ऐसे घटिया होते हैं कि पशु से, कीट पतंगों से भी निम्न श्रेणी में ही उन्हें गिना जा सकता है। ऐसी दशा में यह सन्देह होने लगता है कि इन घृणित व्यक्तियों को ईश्वर का पुत्र व आत्मा कैसे कहा जाए? जलते हुए अंगार और राख के ढके हुए अंगार में जो अन्तर होता है वही प्रबुद्ध आत्माओं और पतित नर-पामरों के बीच भी पाया जाता है।

राख की परत हटा देने पर अंगार का भीतरी भाग पुनः गरम, प्रकाशवान और लाल ही दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार कुविचारों और कुसंस्कारों का आवरण हटा देने पर साधारण स्तर का प्रतीक होने वाला मनुष्य भी महात्मा, महापुरुष एवं देवता की श्रेणी में पहुँच जाता है। अन्तस्तल में महानता मौजूद रहने से आवरण को हटा देने मात्र की प्रक्रिया उसे पूर्व स्थिति में ले आती है। उपासना और आराधना आत्मा पर चढ़े हुए मल-आवरण और विक्षोभों के हटाने के निमित्त ही की जाती है। बर्तन माँजने से वे पुनः चमकने लगते हैं, धो डालने से कपड़े पुनः स्वच्छ हो जाते हैं, स्नान करने से शरीर में पुनः ताजगी आ जाती है। उपासना के द्वारा आत्मा पर उच्च संस्कार डालने की विधि-व्यवस्था यदि ठीक प्रकार बनी रहे तो उसकी पवित्रता, महानता, एवं उत्कृष्टता भी निरन्तर बढ़ती चली जाती है। यह प्रगति धीरे-धीरे उन्नति के उच्च शिखर तक ले पहुँचती है और आत्मा की स्थिति भी परमात्मा के समान बन जाती है। उसमें वे सब विशेषताएँ और शक्तियाँ अवतरित होती हैं जो उसके उद्गम केन्द्र परमात्मा में मौजूद हैं।

इसमें कठिनाई अवश्य है। पूजा में थोड़े कर्मकाण्ड की विधि-व्यवस्था पूरी कर लेने से काम चल सकता है, पर ईश्वर प्राप्ति तो तभी निभेगी जब पूरा जीवनक्रम ही दिव्यता के साँचे में ढाला जाय। आत्मिक पवित्रता ही ईश्वर प्राप्ति की निशानी है। जो आत्मा पवित्र है उसे अपने भीतर परमात्मा की झाँकी प्रतिक्षण होती रहेगी।

तपस्वी, साधकों में अनेकों आध्यात्मिक विशेषतायें पाई जाती हैं। इनका व्यक्तित्व अनेकों ऋद्धि-सिद्धियों से भरा होता है। अपने निज के लिए उज्ज्वल भविष्य की रचना करने के साथ-साथ वे दूसरों का भी बहुत भारी हित साधन कर सकने की शक्ति से सम्पन्न होते हैं। माया, स्वार्थ, अज्ञान, वासना, तृष्णा के—काम, क्रोध, लोभ,मोह, मद, मत्सर के—बन्धनों में बँधा हुआ जीव तुच्छ है। उसकी शक्ति सामर्थ्य, स्थिति सब कुछ तुच्छ है। छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए उसे दीनता प्रकट करते और अभाव कठिनाइयों का रोना रोते देखा जा सकता है। पर जब वह इन तुच्छताओं का परित्याग करके आत्मस्वरूप को पहचान लेता है और जो सोचना चाहिए वही सोचता है, जो करना चाहिए वही करता है तो वह प्रबुद्ध आत्मा ईश्वर के बिलकुल समीप जा पहुँचता है और वे सब विशेषताएं उसमें प्रकट होती हैं जो ईश्वर में मौजूद हैं। सिद्ध पुरुषों की संकल्प-शक्ति के बल पर सारा संसार दहल उठता है, लोक-लोकान्तरों तक इसकी आकाँक्षा हलचल मचा देती है। अपने तप और आशीर्वाद का एक कण दूसरों को देकर वह उन्हें निहाल बना सकता है। अष्टसिद्धियों और नव-निधियों का वर्णन झूठा नहीं है। मानव प्राणी अनन्त शक्तियों से ओत-प्रोत हैं। ब्रह्माँड का सारा नक्शा पिण्ड में मौजूद है। इस शरीर के अन्दर समस्त दिव्य शक्तियाँ बीज रूप में मौजूद हैं। साधना के द्वारा उन्हें विकसित करने के पश्चात् मनुष्य महान् ऐश्वर्यवान् बन सकता है।

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