जिसने अकेले ही नाव खेकर समुद्र पार किया
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दुनिया का कोई काम ऐसा नहीं जो मानवी दुस्साहस के रहने पूरा न हो सके। मनुष्य की देश में न तो शक्ति की कमी है और न उसकी मानसिक सम्भावनाएँ सीमित हैं। उनके रहते वह जो कुछ भी कर गुजरे कम हैं। उत्साह, साहस और विवेक का समन्वय यदि एक केन्द्र पर इकट्ठे किये जा सकें तो उनकी समन्वित क्षमता निस्सन्देह असम्भव को सम्भव बना सकती है।
एलेन गेरबा नामक एक फ्राँसीसी नवयुवक ने निश्चय किया कि वह एक छोटी-सी नाव लेकर जिव्राल्टर से न्यूयार्क तक की 4200 मील लम्बी यात्रा अकेले ही पूरी करेगा। यह निश्चय उसने किसी सनक में नहीं किया, वह यह दिखाना चाहता था कि एकाकी मनुष्य भी अपने आप में कितना समर्थ है और कोई भी अकेला व्यक्ति अपने बलबूते पर दुस्साहस जैसे दीखने वाले कठिन कार्य अपने साहस, धैर्य और विवेक के सहारे किस प्रकार पूरे कर सकता हैं।
यों जिव्राल्टर से न्यूयार्क का रास्ता बड़े जलयानों के लिए 3000 मील का है, पर अटलांटिक महासागर में तो तूफानी हवाएँ चलती हैं उनसे बचने के लिए छोटी नावों को 1200 मील का चक्कर काटकर जाना पड़ता है। इसलिए वह 4200 मील हो जाता है। यों नावे इतना रास्ता लगातार चलती रहने पर तीन महीने में पार कर सकती हैं, पर गेरबा ने चार महीने लायक खाद्यपदार्थों तथा आवश्यक उपकरणों का संग्रह किया और एकाकी यात्रा का सारा साधन जुटाया उसके दोस्त इस खतरनाक दुस्साहस में न पड़ने के लिए बहुत समझाते रहे पर उसने किसी की एक न सुनी।
सन् 1844 में स्लोकम एक नाविक ने अपने हाथी एक छोटी नाव बनाकर उस पर विश्वयात्रा की थी। इसीसे गेरबा ने प्रेरणा ग्रहण की। वह कहता था उससे पहले जब एकाकी विश्वयात्रा की जा चुकी है तो वह उससे कहीं मजबूत नाव के सहारे और कहीं छोटी यात्रा अकेले ही क्यों नहीं कर सकता। गेरबा एक सिविल इंजीनियर था, पर उसने इस साहसिक यात्रा के लिए अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़ दी और अपने प्रयास में जुट गया और अंततः वह 6 जन 1922 को अपनी यात्रा पर निकल ही पड़ा।
कुछ ही आगे यात्रा बढ़ी होगी कि तूफानों में नाव के तिकोने पाल के चिवड़ उड़ा दिये। हिलोरे इतनी तेज होती कि स्टोव जलाना कठिन हो गया एक दिन तो उसके हाथ ही जल गये। एकबार तो वर्षा का पानी सुरक्षित खाद्य भण्डार तक घुस गया और सारी भोजन सामग्री भिगो दी। सोने-जागने की—आहार सफाई की व्यवस्थाएँ जुटाते हुए आँधी-तूफान भरे समुद्र में एकाकी यात्रा की कठिनाइयों ने सभी व्यवस्था नष्ट कर दी।
एक दिन तूफान में जब नाव डगमगाने लगी और डूबने का खतरा सामने आया तो उसने एक बल्ली पर चढ़कर जान बचाई। कई बार ऐसे अवसर आये जब नाव के उलटने में देर नहीं रही और कई दिन ऐसे बीते जिनमें जिन्दगी और मौत के बीच घमासान लड़ाई होती रही, पर जीत जिन्दगी की ही हुई। रास्ते भर नाव की टूट-फूट की मरम्मत भी उसी को करनी पड़ती थी। समुद्री रोग का आक्रमण हुआ। इन सब कठिनाइयों के बीच उसने कभी भी हिम्मत नहीं हारी और साहस के साथ कठिनाइयों से जूझता हुआ अपने लक्ष्य की ओर अनवरत डडडड ति से आगे बढ़ता ही चलता रहा।
दुदेव से संघर्ष करती हुई गेरवा की नाव 101 दिन की अनवरत यात्रा पूरी करके जिव्राल्टर से न्यूयार्क के लागआयलेण्ड बन्दरगाह पर पहुँची, उपस्थित भारी भीड़ ने उसके दुस्साहस के प्रति हर्षोन्मत्त होकर स्वागत किया और यह प्रेरणा ग्रहण की कि यदि साहस सजीव हो तो एकाकी व्यक्ति भी दुदेव से जू्रझ सकता है—दुस्साहसों में सफल हो सकता है और असम्भव जैसी लगने वाली बात को सम्भव बना सकता है।

