मानवी विद्युत शक्ति की गरिमा और उपयोगिता
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मोड़ने के रेडियो लॉजिकल स्कूल के तीन शोधकर्ता निष्कर्ष निकालने में सफल हुए कि व्यक्तित्व के विकास −अंगों का सामर्थ्य तथा चिकित्सा उपचार में मानवी चेतना में विद्यमान विद्युत शक्ति का गहरा योगदान रहता है प्रगति अथवा अवगति के विविध घटना क्रमों में इस मानवी विद्युत शक्ति की घट−बढ़ को ही प्रधान भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है। क्षत विक्षत अवयवों की पूर्ति में जो आन्तरिक शक्ति काम करती है उसे नियोप्लासिया विद्युत व्यवस्था के रूप में जाना जा सकता है।
निद्रा के सम्बन्ध में बहुत पहले इतना ही जाना गया था कि मात्र थकान मिटाने की सामान्य नित्य प्रक्रिया है। अब पता चला है कि मस्तिष्क का सचेतन भाग अचेतन स्थिति में इसलिए चला जाता है कि अचेतन मस्तिष्क को अन्तरिक्ष में प्रवाहित विद्युत धाराओं में से अपने उपयोग का अंश संग्रह सम्पादित करने का अवसर मिल जाय। ‘एरियल’ रेडियो तरंगों को पकड़ता है। निद्रावस्था में हमारा अचेतन मस्तिष्क उसी स्थिति का बन जाता है और आकाश से इतनी विद्युतीय खुराक प्राप्त कर लेता है जिसमें शारीरिक और मानसिक क्रिया−कलापों का सञ्चालन ठीक प्रकार सम्भव हो सके। निद्रा की पूर्ति न होने पर शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो गड़बड़ी उत्पन्न होती है उसे अभीष्ट मात्रा में विद्युतीय खुराक न मिलने की ‘विभुक्षा’ कहा जा सकता है।
हिन्दू धर्म के आचार सूत्रों में सिर उत्तर की ओर करके सोने का निर्देश है। हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रन्थ क्षुलचन आरुख में भी ऐसा ही उल्लेख है। जापानी तत्वदर्शी एवं डुचटिल भी यही बात करते रहे। ऐलोपैथी के जन्मदाता हिप्पोक्रेट्स ने भी ऐसा ही प्रतिपादन किया है। यह दिशा और निद्रा का सम्बन्ध स्थापन सम्भवतः इसी आधार पर है कि पृथ्वी का चुम्बकीय प्रवाह जिधर प्रवाहित होता है उसके साथ हम टकराव उत्पन्न न करे और उस लाभ से सञ्चित न रहे जो अनुकूलता की स्थिति में रहने सहज ही उपलब्ध होता रहता है।
जिस प्रकार शरीर में रक्त शुद्धि, पाचक ऊष्मा, स्नायु परिपुष्टता आदि से सुदृढ़ता एवं निरोगता अक्षुण्ण रहती है, ठीक उसी प्रकार मानवी विद्युत शक्ति की प्रचुरता से मानसिक सन्तुलन स्थिर रहता है। विवेक तथ्य चिन्तन, कला−कौशल शौर्य, साहस जैसे सद्गुणों का बाहुल्य रहता है। ओजस्विता एवं मनस्विता उसी का नाम है। दूसरे शब्दों में इसे प्रचण्ड संकल्प शक्ति भी कह सकते हैं उसी से आन्तरिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है और उसी के आधार पर उस पुरुषार्थ की उपलब्धि होती है जो कठिन परिस्थितियों को चीरते हुए सुदूर लक्ष्य तक ले पहुँचने में समर्थ होता है। योग और तप की साधना इसी मानवी विद्युत शक्ति को बढ़ाने के लिए की जाती है।
भौतिक लौह−चुम्बक से ही लोग परिचित होते हैं यह तथ्य कम ही लोगों को मालूम है कि उससे भी कहीं अधिक ऊँचे स्तर का एक और जैव चुम्बक होता है जिसे वैज्ञानिकों की भाषा में एनिमल मैगनेट कहते हैं।
भूतकाल में भी इस शक्ति का लोगों को पता था। उसका उपयोग शारीरिक और मानसिक रोगों की निवृत्ति के लिए किया जाता रहा है। सिर पर हाथ फेरना कंधे सहलाना, पीठ थपथपाना प्रकारान्तर इसी जैव चुम्बक का दुर्बलों एवं रोगियों को समर्थ व्यक्तियों द्वारा लाभ पहुँचाने का एक विधान है। गुरु−शिष्यों को, अभिभावक—बच्चों को स्नेह सिक्त आशीर्वाद देते समय प्रायः ऐसी ही अभिव्यक्तियाँ करते हैं। स्नेहीजनों के प्रति, परिपक्व व्यक्तित्व के प्रति वात्सल्य पूर्वक न केवल मुख से, मन से शुभ कामनाएँ व्यक्त करते हैं वरन् अपने हाथ से स्पर्श भी करते हैं, इससे शक्ति शाली पक्ष की विद्युत धारा हल्के पड़ने वाले छोटों के शरीर एवं मनःक्षेत्र में प्रवेश करके उन्हें शक्ति प्रदान करती है। हाथ न फेरने पर भी पैर छूकर यह अनुदान छोटे लोग बड़ों से अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। भारत में गुरुजनों के चरण स्पर्श करके प्रणाम करने की प्रथा में यह महत्वपूर्ण तथ्य सन्निहित है।
यूनानी चिकित्सा के परिष्कर्त्ता पैपिरस ने सिर पर हाथ फिरा कर रोग चिकित्सा करने की पद्धति को शास्त्रीय रूप दिया है। बादशाह पाइरस और वैस पैसियन को कठिन रोगों से मुक्ति ऐसे ही प्रयोगों से मिली थी। फ्राँस के सम्राटों में फ्राँसिस प्रथम से लेकर चार्ल्स दशम तक की चिकित्सा में जैव चुम्बक का प्रयोग−शक्ति शाली प्रयोक्ताओं द्वारा होता रहा है। इन प्रयोगों में हाथ का उपयोग अनिवार्य नहीं। विशिष्ट दृष्टिपात से भी यह सब हो सकता है।
सन् 1600 में स्काचमेन मैक्सवेल ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि ब्रह्माण्ड व्यापी एक जीवनी शक्ति का अस्तित्व मौजूद है। प्रयत्न करके उसकी न्यूनाधिक मात्रा अपने में भी भरी जा सकती है और उसे स्व−पर उत्कर्ष में मन चाहे ढंग से प्रयोग किया जा सकता है। यह दुधारी तलवार, भले ही नहीं, बुरे उद्देश्य के लिए भी काम में लाई जा सकती है। मैक्सवेल से पहले, विद्वान गोक्लेनियस अनेक तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध करता रहा था कि मनुष्य की अन्त शक्ति का प्रमुख आधार उसकी वह जीवन्त शक्ति है जिसे चुम्बकत्व के स्तर की समझा जा सकता है। वान हेलमान्ट ने मानवी चुम्बक शक्ति का शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगियों पर सफल प्रयोग करने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी उसे पीड़ितों का मसीहा यह सिद्ध पुरुष कहा जाने लगा था।
इटली का विज्ञानी सेटानेली अठारहवीं सदी के प्रारंभ में दृढ़ता पूर्वक मानवी कलेवर में भरे हुए विद्युतीय विकिरण का अस्तित्व सिद्ध कर चुका था। मैस्मरेज्म के आविष्कर्ता डाक्टर मेस्मर ने अपने जीवनकाल सन् 1734 से 1815 तक इसी दिशा में शोधें की और उस विद्या को क्रमबद्ध विज्ञान का रूप दिया। इससे पूर्व जो प्रतिपादन एवं प्रयोग हो चुके थे उन्हें जानने के बाद ही डाक्टर मैस्मर ने इस दिशा में कुछ अधिक कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त की थी। आगे चलकर उसके शिष्य काँस्टेट युसिगर ने इस विज्ञान में सम्मोहन विद्या की एक नई कड़ी जोड़ी और कृत्रिम निद्रा लाने एवं उस स्थिति में विशिष्ट मन स्थिति उत्पन्न करने की चमत्कारी विधि खोज निकाली। उसे हिप्नोटिज्म नाम दिया गया।
फ्राँस के मनीषीं ‘ला फान्टेन’ और डा. ब्रेड़ ने हिप्नोटिज्म को और भी परिष्कृत रूप दिया। सारे योरोप में उसकी चर्चा हुई। रोगियों को कृत्रिम निद्रा में पहुँचा कर ऐसे कितने ही आपरेशन किये गये जिनमें रोगियों को किसी प्रकार की कष्ट अनुभूति नहीं हुई। अमेरिका में न्यू आरलीन् तो इन प्रयोगों का केन्द्र ही बन गया। मानवीय विद्युत की सिद्धि और उसके उपयोग की विधि को ‘इलेक्ट्रो वायोलाजिकल्स’ नाम दिया गया। सन् 1850 में अमेरिकी डा. ‘डार्लिंग‘ और फ्राँसीसी डा. ‘द्रुरान्ड डे ग्रास’ ने जैव चुम्बकत्व के सफल प्रयोगों से आपने संसार भर के विज्ञान वेत्ताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। ली वाल्ट ने जीव विद्युत के आधार पर चिकित्सा करने की प्रामाणिक विध बताने वाली अपनी पुस्तक 1866 में प्रकाशित की। उसके प्रयोगों का परीक्षण करने जिन तीन बड़े शोध संस्थानों ने भाग लिया। उनके नाम हैं (1) दि स्कूल आफ चारकोट (2) दि स्कूल आफ नेन्सी (3) दि स्कूल आफ मेस्मेरिस्ट। इन संस्थानों के प्रयोगों ने तथ्य की प्रामाणिकता में चार चाँद लगा दिये।
क्या लौह चुम्बक का भी मनुष्य शरीर पर कुछ प्रभाव हो सकता है इस संदर्भ में आँशिक सफलता ही मिली। मनुष्य चुम्बकत्व की अपनी अलग ही जाति और किस्म है। वह सजातीय स्तर पर ही अधिक प्रभावित होता है और उपयुक्त प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यो कुछ तो प्रभाव लौह−चुम्बक का भी पड़ता है।
मैस्मरेज्म और हिप्नोटिज्म यों पर्यायवाची शब्द मान जाते हैं पर वस्तुतः उनमें भारी अन्तर है। हिप्नोटिज्म किसी को सम्मोहन निद्रा में ले जाने और उससे अंतर्मन की संवेदनाएँ उगलवाने अथवा दिये हुए निर्देशों के अनुरूप अनुभव करने के लिए किया जाता है। यह अनुभव वास्तविक भी हो सकते हैं और अवास्तविक भी। जैसे संमोहन ग्रस्त व्यक्ति को लकड़ी दिखाकर उसे भयंकर सर्प जैसा अनुभव कराया जा सकता है। साधारण मिट्टी खाकर वह चीनी जैसा मिठास अनुभव कर सकता है।
मैस्मरेज्म मानवी विद्युत शक्ति का रोग निवारण तथा दूसरे प्रयोजनों के लिए उपयोग करने कि विधि का नाम है। इसे वियना (आस्ट्रिया) के डा. मेस्मर फ्रेडरिक ने आविष्कृत किया था। उनका प्रतिपादन है कि मनुष्य के शरीर में चुम्बकत्व भरा पड़ा है। जो आंखों से एवं उँगलियों के पोरुओं से बाहर निकलता रहता है। इस प्रवाह से अपने निज के लिए तथा दूसरों के लिए उपयोगी लाभ उठाया जा सकता है। मोडात्र्यूज् तथा काउण्ट पुलीगर ने इस संदर्भ में गहरी खोजें कीं और सिद्ध किया कि यह सामान्य समझी जाने वाली उपेक्षित मानवी विद्युत शक्ति बड़े काम की है आर इसके प्रयोग स महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। जर्मन विद्युत विज्ञानी रींकन वेक ने इसे एक विशेष अग्नि के रूप में सिद्ध किया और उसे “औरा” नाम दिया। मुख मण्डल के इर्द गिर्द तथा प्रजनन अंग में उसकी विशेष उपस्थिति सिद्ध की। नाड़ी संस्थान एवं स्नायु मण्डल को उसका उत्पादन कर्त्ता माना। अगले शोध कर्त्ताओं ने इसकी उत्पत्ति का केन्द्र मस्तिष्क क्षेत्र में बताया।
सम्मोहन विद्या किसी जमाने में जादू मन्त्र में गिनी जाती थी। हिप्नोटिज्म यों मैस्मरेजम से भिन्न प्रकार का विज्ञान है तो भी मिलती जुलती प्रक्रिया के कारण दोनों को एक ही स्तर पर गिना जाने लगा है।
हाँगकाँग में अमेरिकी चिकित्सक आर्नोल्ड फर्स्ट ने अपने एक प्रदर्शन में कई रोगियों को सम्मोहन विधि के अनुसार इतनी गहरी निद्रा में पहुंचाया कि छोटे आपरेशन बिना कष्ट की अनुभूति के सरलता पूर्वक किये जा सके। वह विधि सिखाई जिसके सहारे वे जबड़े को औषधि से सुन्न किये बिना ही बिना कष्ट के दाँत उखाड़ सकें।
जोहान्सवर्ग—दक्षिण अफ्रीका के टारा अस्पताल में डा. बर्नार्ड लेविन्सन के कितने ही रोगियों को हिप्नोटिज्म द्वारा निद्रित करके बड़े आपरेशन किये। रोगी क्लोरोफार्म सुँघाने की तरह ही बेहोश पड़े रहे और बिना हिले जुले आपरेशन कराते रहे। इस बेहोशी के बीच भी एक विलक्षण बात यह देखी गई कि रोगी डाक्टरों के वार्तालाप को सुनता रहा और होश में आने पर उनने वे बातें दुहरा दीं। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि सम्मोहन निद्रा से मस्तिष्क के कुछ भाग ही निद्रा ग्रस्त होते हैं और शेष भाग अपना काम करते रहते हैं।
अठारहवीं सदी के अँग्रेज शरीर विज्ञानी जम्स ब्राइड ने सम्मोहन स्थिति को ‘नर्वस स्लीप’ माना है और कहा है नाड़ी संस्थान में उथल−पुथल करने के लिए इस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
रहस्यमय व्यक्ति को सम्मोहित करके उसके पेट के सारे भेद उगलवाये जा सकते थे। इन प्रयोगों से द्वितीय महायुद्ध के समय ‘हिप्नोटाईज्ड इण्टेलीजेन्स’ को एक विशेष युद्ध कौशल की तरह प्रयोग किया जाने लगा। दूसरे पक्ष पर इसका प्रयोग करने किन्तु अपनों को बचाने के सम्बन्ध में उन दिनों बहुत−बहुत चेष्टाएं की गई।
भौतिक बिजली द्वारा तरह−तरह के उपयोगी यंत्र चलाने की विधि से परिचित होकर हमने बहुत लाभ उठाया है। मनुष्य शरीर की बिजली की क्षमता से भी यदि हम परिचित हो सके और उसका उपयोग जान सके तो इससे व्यक्तित्वों के विकास में असाधारण योगदान मिल सकता है। इतना ही नहीं उसके द्वारा बढ़ी हुई शक्ति वाले लोग कम शक्ति वालों की विविध विधि सहायताएँ भी कर सकते हैं।

