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Magazine - Year 1974 - Version 2

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संकल्प और पुरुषार्थ का समन्वय असम्भव को सम्भव बनाता है

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मनुष्य की संकल्प शक्ति और कर्मठता का यदि समन्वय हो सके तो वह सम्मिलित चेतना शक्ति इतनी समर्थ होती है कि कुछ भी कर सके असम्भव को सम्भव बना सके।

ध्रुव प्रदेशों को अगम्य माना जाता रहा है। अत्यधिक शीत से भरा हुआ यह हिमाच्छादित क्षेत्र अन्न, जल, निवास सभी दृष्टि से भारी जटिल है। ऋतुओं की विलक्षणता—आकाश में चमकने वाले प्रकाश की अद्भुतता चुम्बकीय प्रवाहों के कारण दिया भूल होने की सम्भावना आदि जटिलताओं को सुलझाते हुए वहाँ पैर जमा सकना लगभग इतना ही कठिन है जिसे लगभग असंभव के इर्द−गिर्द समझा जा सके।

इतने पर भी दुस्साहसी लोग वहाँ जा ही पहुँचे और वहाँ रहकर इस धरती की गतिविधियों सम्बन्धी अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ ढूंढ़कर ला सकने में सफल हो गये।

ध्रुव अभियान कितने कठिन हैं इसकी कल्पना करने मात्र से रोमाँच हो उठता है पर मानवी दुस्साहस तो अजेय शक्ति है वह असम्भव को सम्भव बनाती रही है। उसने ध्रुवीय क्षेत्र में पहुँचने, रहने और काम करने की कठिनाइयों को भी सरल बना दिया है और वैज्ञानिक लोग वहाँ डेरा कर रहे हैं।

उतरी ध्रुव पर इटली का शोधकर्ता गाइडों मोंजीनो विशेष तैयारी के साथ पहुँचा था और उसने कितनी ही नई−नई जानकारियाँ उस क्षेत्र में प्रथम पदार्पण कर चुका था।

ग्रीनलैण्ड की खाड़ी पार करके एक अमेरिका जलयान मैन हट्टन उस क्षेत्र की विशद खोज करने के लिए सन् 69 में गया था। उस पर 95 नाविक, वैज्ञानिक और पत्रकार सवार थे। दो बर्फ तोड़ने वाले छोटे जहाज और मार्ग दर्शन के लिए कई हैलिकाप्टर साथ थे। उसने 16000 किलोमीटर क्षेत्र का पर्यवेक्षण करके कितनी ही उपयोगी जानकारियाँ इकट्ठी की।

दक्षिणी ध्रुव के विशेष शोधकर्ता एमण्डसन और स्काट के नाम पर उस क्षेत्र में दो मंजिली तीन इमारतें बनाई जा रही हैं वे एक विशिष्ट एल्युमीनियम की चादरों से इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि शून्य से 43 अंश नीचे की विकट सर्दी और तूफानी अंधड़ों के बीच भी वहाँ रह सकना सम्भव हो सके। ऊपर एक सुरक्षात्मक गुम्बद होगा, नीचे प्रयोगशालायें तथा निवास सुविधा के कमरे तथा आवश्यक उपकरण रहेंगे। सर्दी में 16 और गर्मी में 50 शोधकर्ता वहाँ रह सकेंगे।

दक्षिणी ध्रुव पर उस क्षेत्र की शोध करने के लिए मैकमुकडो शिविर बहुत समय तक लगातार काम करता रहा हैं। वैज्ञानिक का एक दल वहाँ इसी कार्य के लिए बनाई गई प्रयोगशाला में विविध प्रकार के अनुसंधान करता रहा है।

इस क्षेत्र में सबसे पहला शोधकर्ता नार्वे का नागरिक रोआल्ड एंडरसन अपने चार साथियों सहित सन् 1917 में पहुँचा था। इसके बाद एक अंग्रेज रोवर स्काट ने भी वहाँ पहुँचने की हिम्मत दिखाई। 8160000 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में फैली, दस हजार फुट मोटी बर्फ की चादर से ढका, यह सुविस्तृत प्रदेश कितना ठण्डा—कितना नीरव, कितना स्तब्ध है यह देखकर पहुँचने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बर्फ की जा सकती है और शोधकर्ता ऐसे ही आश्रय सथल में अपना गुजारा कर सकता है।

इस क्षेत्र में किये गये प्रयोगों में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जीव−जन्तुओं में समय को पहचानने की जो अतीन्द्रिय चेतना है उस पर देश काल क कोई प्रभाव नहीं पड़ता। दक्षिणी ध्रुव की प्रयोगशाला में हैमर्स्टस चूहे तथा कुछ किस्म के पौधे पहुँचाये गये और देखा गया कि उनकी समय संबंधी आदतों पर वहाँ की परिस्थिति भिन्नता का कुछ असर पड़ता है या नहीं। पाया गया कि वे प्राणी और पौधे अपनी आदतों के अनुसार ही काम करते रहे। पौधें ठीक उतने ही समय में फूले−फले जितने में कि पहले फूलते−फलते थे। चूहे, छछूँदर, तिलचट्टे जो सामान्यता रात्रि में सक्रिय रहते हैं और दिन में सोते हैं। ध्रुवीय क्षेत्र की विचित्र परिस्थितियों में—धुप्प अंधेरे में रखे गये पर वे यह भली प्रकार जानत रहे कि कब दिन है और कब रात। उन्होंने अपनी पुरानी आदतें रात्रि के बिलकुल सही समय पर ही आरम्भ कीं।

घुमक्कड़ पक्षी लम्बी उड़ाने हर साल अपने नियत दिन, समय तथा मुहूर्त में आरम्भ करते पाये जाते हैं। सोचा जाता था कि यह पंचांग बोध सम्भवतः उन्हें सूर्य की गर्मी एवं मौसम की स्थिति के आधार पर होगा। पृथ्वी चक्र की परिक्रमा के साथ जो चुम्बकीय उतार−चढ़ाव आते हैं वे उन्हें समय ज्ञान कराते होंगे। इसकी यथार्थता ध्रुवीय क्षेत्र में ही परखी जा सकती है जहाँ की परिस्थिति सामान्य भू भागों से सर्वथा भिन्न होती है। वहाँ पृथ्वी की भ्रमणशीलता का प्रभाव नगण्य रह जाता है अस्तु वहाँ जीवधारी सहज ही भ्रम में पड़ सकते हैं। पर देखा गया है कि वैसा कुछ नहीं हुआ। प्राणियों की अपनी समय सम्बन्धी पहचान करने वाली चेतना में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं पड़ा। ड्रोसोफिला फल मक्खी तथा न्यूरोसपोरा फुर्द समय सम्बन्धी ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है। उनने दक्षिणी ध्रुव में पहुँचकर अपनी समय सम्बन्धी आदतों में तनिक भी अन्तर नहीं आने दिया।

जीवों की चेतना भौतिक प्रकृति पर निर्भर समझी जाती है पर ध्रुवीय पर्यवेक्षण ने सिद्ध कर दिया है कि प्राणियों की अपनी चेतन प्रकृति है और वह बाह्य जगत के परिवर्तनों से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होती जैसा कि दक्षिण ध्रुव पर भेजे गये प्राणी वहाँ की भिन्न परिस्थितियों में भी अपनी अन्तः चेतना के आधार पर पूर्व निर्धारित स्वभाव एवं क्रिया−कलाप अपनाये रहे।

यह तो नमूने की एक वैज्ञानिक उपलब्धि है ऐसी−ऐसी अनेक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं जिनके सम्बन्ध में पिछले दिनों तक हम पूर्णतया अँधेरे में थे उदाहरण के लिए ध्रुव क्षेत्र का निरन्तर गरम होते जाना और वहाँ की बर्फ का पिघलते जाना। यह एक ऐसा संकट है जिसके कारण समुद्र को जल सतह बहुत ऊपर जायगी और तटवर्ती विशाल भू−भाग को जलाशय के रूप में बदल देगी। समय रहते हम ऊँची जगहों पर अपनी महत्वपूर्ण गति−विधियाँ उठा लेजा सकते हैं।

अब से पचास करोड़ वर्ष दक्षिणी ध्रुव सहारा की ठीक मध्य में उस क्षेत्र में अवतरित था जहाँ आज−कल नाइजीरिया और लुभाया की सरहदें मिलती हैं। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन कोलम्बिया विश्व विद्यालय के प्राध्यापक समित के समक्ष अपनी नई खोजों के आधार पर प्रस्तुत किया है, ध्रुवीय क्षेत्रों में जिन प्रमाणों को पाया जाना चाहिए उनमें से अधिकाँश उस क्षेत्र में मिलते हैं। ध्रुवों के स्थान परिवर्तन से यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी समय−समय पर करवटें बदलती रही है, अमेरिका वैज्ञानिकों ने अलास्का में एक तैरती प्रयोगशाला स्थापित की थी। उन्होंने दो मील लम्बा—डेढ़ मील चौड़ा 70 फुट मोटा एक हिम खण्ड उस क्षेत्र में देखा जो अलास्का से 130 मील उत्तर में था और ग्रीनलैण्ड की ओर तैरता जा रहा था। उस पर वैज्ञानिकों ने अड्डा जमाया। उसका नाम ‘आकलिस’ रखा। उस पर ऐसी झोपड़ियां खड़ी की जो 70 मील की गति से चलने वाले अंधड़ों का दबाव बर्दाश्त कर सकें। एक जनरेटर बिठाया गया और सारे द्वीप में बिजली की व्यवस्था की गई। शोध संचालक थे मैक्स सी.ब्रीवर। हिमि द्वीप पर सवारी गाँठ कर चार वर्ष तक पर्यवेक्षण करने का यह अद्भुत प्रयोग था। इस अवधि में दीप ने तैरते−तैरते 7500 मील की यात्रा की। ग्रीनलैण्ड और आइसलैण्ड के बीच डेनमार्क की खाड़ी में वह पर से अपना डेरा उठाने के लिए विवश होना पड़ा।

अमेरिका की मुख्य भूमि में वायुयान द्वारा वहाँ खाद्य सामग्री तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाई जाती थीं। इसके लिए एक हवाई पट्टी भी वहाँ बना ली गई थी। इस शोधा संस्थान में काम करने वाले अन्य लोग तो अपने घर आते−जाते रहे पर 35 वर्षीय जान्स्टन को वह द्वीप इतना सुहावना लगा कि उसने उसे तभी छोड़ा जब वह स्वयं अपने आपको छोड़ रहा था।

ध्रुव अभियान में हस्तगत हुई उपलब्धियों का अपना महत्व है। उसका सबसे बड़ा प्रतिपादन यह है कि मनुष्य की शक्ति के सामने कोई भी कठिनाई ठहर नहीं सकती। यदि वह अपने संकल्प और पुरुषार्थ का समन्वय कर सके तो वह कर दिखा सकता है जिसे पिछले दिनों असंभव समझा जाता रहा है।

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