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Magazine - Year 1974 - Version 2

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रोग के साथ रोगी को भी मार डालना उचित न होगा

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यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि सज्जनों के साथ प्रेम और दुष्टों के साथ घृणा बरतनी चाहिए। घृणा एक मारक विष है उससे दूसरों का अहित हो सकता है यह सही है, पर यह और भी अधिक सही है कि घृणा जहाँ कहीं भी रहती है उस अन्तःकरण को अनेकानेक दुष्ट चिन्तनों की दुर्गन्ध से भर देती है। घृणा का अभ्यासी इतना शंकाशील और विग्रही हो जाता है कि फिर उसके लिए सज्जनों के प्रति भी श्रद्धा और विश्वास रख सकना सम्भव नहीं रहता। दुष्टता का गहरा चिन्तन करने पर ही घृणा उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति या स्थिति का निकृष्ट स्तर ही उभरता है और मस्तिष्क पर छाया रहता है। इस विषाक्त घुटन से अपना चिन्तन तन्त्र ही सड़−गल जाता है फिर उसके लिए कोई ऊँची बात सोच सकना तक कठिन हो जाता है।

घृणा से संघर्ष की वृत्ति उपजती है और अवाँछनीयता से अधिक तत्परतापूर्वक लड़ सकना सम्भव हो जाता है यह सही है। तीव्र घृणा मन में भरी रहे तो शत्रु पर तीखे प्रहार कर सकना बन पड़ता है यह भी सही है। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि आक्रमण की अभ्यस्त मनोभूमि फिर केवल उसी प्रयोजन के उपयुक्त बनकर रह जाती है। उसे सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाया जा सकना कठिन होता है। ऐसे लोगों के सामने जब शत्रु पक्ष नहीं रहता तो वे अपनों का ही विनाश करने में लग जाते हैं। आक्रमण की आदत को अपनी तृप्ति के लिए आखिर कुछ तो चाहिए। शत्रु न सही−मित्र ही सही। क्रूर कर्मों में निरत व्यक्ति जितने भयंकर बाहर वालों के लिए होते हैं उतने ही निर्मम स्वजनों के लिए भी होते हैं। तनिक सी बात पर वे अपने ही स्त्री, बच्चों तक की हत्या करने पर उतर आते हैं। क्रूर−कर्म और क्रूर चिन्तन उनकी ममता को−कोमल भावना को एक प्रकार से समाप्त ही करके रख देता है। यह हानि इतनी बड़ी है जिसकी तुलना में घृणास्पद का विनाश करना भी कम महत्व का रह जाता है।

प्रेम हमारे जीवन की प्रमुख नीति होनी चाहिए। मल−मूत्र और हाड़−माँस की गठरी इस कष्टों में रहने के लिए आत्मा इसलिए तैयार हुआ कि उसे मानव शरीर में रहते हुए प्रेम का अमृत चखने के लिए मिलेगा। वस्तुतः प्रेम से मधुर इस जीवन में और कुछ है ही नहीं। दूसरों के साथ सद्भाव भरी आत्मीयता जोड़ने से वह प्रिय लगते हैं और सुन्दर भी।

छिद्रान्वेषण की दृष्टि बदल जाने पर जब उनके साथ गुणग्राही संपर्क बनाया जाता है तब प्रतीत होता है कि पहले जितनी बुराइयाँ सोची गई थीं वस्तुतः उनमें उतनी थी नहीं। जो थीं वे बिना विद्वेष के शस्त्र का प्रहार किये अपेक्षाकृत अधिक सौम्य उपायों से अधिक अच्छी तरह हल की जा सकती थीं। प्रेम की धार—घृणा की अपेक्षा कहीं अधिक पैनी है। दण्ड देने में जितनी शक्ति खर्च होती है और सुधार का जितना परिणाम सामने आता है उसकी अपेक्षा प्रेम का प्रहार करने पर अधिक सरलता से अधिक सुधार हो सकना सम्भव है।

घृणा से प्रेरित आक्रमण की नीति से अपने द्वेष प्रतिशोध की आँशिक तृप्ति हो सकती है, पर उससे आक्रमण प्रत्याक्रमण का—विद्वेष प्रतिशोध का ऐसा कुचक्र चल पड़ता है जो मूलकारण अथवा मूल हानि की तुलना में अत्यधिक भयानक सिद्ध होता है। कई बार तो यह कुचक्र इतना विघातक होता है कि जो हानि आरम्भ में हो रही थी उसकी तुलना में भी अधिक कष्ट−साध्य समस्याएँ उलझकर सामने आ खड़ी हों।

इसका यह अर्थ किसी भी प्रकार नहीं कि अन्याय को सहन किया जाय और अनीति को प्रथम दिया जाय अथवा जो अवांछनियताएं चल रही हैं उन्हें चलने ही दिया जाए। ऐसी सहन शीलता तो दुर्बलता और कायरता ही मानी जायगी और आतंकवादियों का अधिक खेल खेलने का डडडड डडडड डडडड डडडड तो करना हो चाहिए अवाँछनीयता को रोकने के लिए साहसिक कदम तो बढ़ाना ही चाहिए; किन्तु यह आवश्यक नहीं कि वह प्रतिशोध घृणा युक्त ही हो।

रोग को मारने के लिए रोगी को भी मार डालना आवश्यक नहीं। दुष्प्रवृत्तियों को दूर करना और उनमें निरत व्यक्ति को दुष्कर्मों से छुड़ा देना कठिन तो अवश्य है पर असम्भव नहीं। हमें कठिन कार्य को हाथ में लेना चाहिए और पापी से प्रेम और पाप से घृणा के परिष्कृत शस्त्र का प्रयोग करना चाहिए। डाक्टर यही करता है वह बीमारी को मारने में अपने सभी शस्त्रों प्रयोग करता है, पर साथ ही वह भी ध्यान रखता है कि कहीं रोगी ही उस प्रहार से दम न तोड़ दे। रोगी को बचाने और रोग को मारने में जिस कुशलता का प्रयोग डाक्टर करता है उसी नीति को हम भी कार्यान्वित कर सकते हैं।

मनुष्य की आत्मा मूलतः पवित्र है। उसका सृजन जिन तत्वों से हुआ है वे उत्कृष्ट स्तर के हैं। इसलिए हर मनुष्य की मूलसत्ता के प्रति हमें आस्थावान होना चाहिए। परिस्थितियों के वशीभूत होकर ही लोग बुरे बनते हैं और बुरे आचरण करते हैं। यदि उन कारणों को हटाया जा सके तो कोई भी मनुष्य जो आज घृणित दिखाई पड़ता है कल सज्जन के रूप में सामने आ सकता है।

दर्पण के सामने जिस रंग का पर्दा टँगा होगा सारा दर्पण उसी रंग का दिखाई देगा। इस पर्दे को हटा दिया जाय तो कोई रंग दर्पण में न रहेगा। इसके बाद यदि दूसरे रंग का पर्दा टाँग दिया जाय तो फिर वह उसी बदले हुए रंग का दिखाई पड़ने लगेगा। मनुष्य दर्पण की तरह है। संपर्क और परिस्थितियों के रंग उस पर चमकते हैं तो वह उसी स्तर का दिखाई पड़ने लगता है। यदि कोई रंग अरुचिकर दीख रहा है तो दर्पण तोड़ने की अपेक्षा यही अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है कि अनुपयुक्त रंग का पर्दा हटाकर उसके स्थान पर दूसरे उपयुक्त रंग का वहाँ टाँगा जाय।

आज का बुरा मनुष्य कल भला बन सकता है इसके अगणित उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर भरे पड़े हैं। अशोक बगुलमाल, अम्बपाला, वाल्मीकि, विल्वमगल, अजामिल जैसे अनेक उदाहरण सदा ही प्रस्तुत होते रहे हैं जिनके आधार पर एक समय बुरे समझे जाने वाले व्यक्तियों का आश्चर्यजनक सुधार हुआ है और वे पूर्व भूमिका में जितने भयंकर थे उत्तर भूमिका में वे उतने ही अभिनन्दनीय सिद्ध हुए। व्यक्ति को नष्ट करके उसके दोषों को नष्ट करना घटिया स्तर का आवेशपूर्ण कृत्य है। ऐसे घटनाक्रम म अपवाद रूप में ही उपयुक्त हो सकते हैं। जब सुधार के सभी प्रयत्न निरर्थक सिद्ध हों और व्यक्ति पूर्णतया सड़−गल गया हो तभी उसके पूर्ण विनाश की बात सोचनी चाहिए। उससे पूर्व शक्ति भर प्रयत्न यही करना चाहिए कि व्यक्ति को बुराई से विरत करके उसे भलाई के आश्रय तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की जा सके।

विवेक हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि घृणा की अपेक्षा अधिक कारगर शस्त्र प्रेम का प्रयोग करे और ध्वंस की अपेक्षा सुधार कार्य में निरत हों।

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