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Magazine - Year 1974 - Version 2

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व्यक्तित्व की जड़ सींचने के लिए योग एवं तप की आवश्यकता

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मनुष्य यो देखने में हाड़ माँस का पिण्ड दिखाई पड़ता है पर वस्तुतः वह चेतना का पुञ्ज है। इस चेतना में ही उसका व्यक्तित्व घुला रहता है। इसी को उसका अस्तित्व अथवा वास्तविक मूल्य कहा जा सकता है। चेतना ही जीवन है। प्राण के निकल जाने पर शरीर सड़ने लगता है और उसकी जल्दी ही अंत्येष्टि करनी पड़ती है।

इस चेतना के बारे में हमें अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और सीखना चाहिए कि किस प्रकार उस विकृति स्थिति से उबारा और परिष्कृत दिशा में अग्रसर किया जा सकता है।

मानवी चेतना को मनोविज्ञान वेत्ताओं ने तीन भागों में बाटा है (1) सचेतन कान्सस−(2) अर्द्धचेतन−सबकान्सस (3) अचेतन—अनकान्सस। सचेतन—वह जो हमारी विवेक बुद्धि के रूप में काम करता है अर्द्धचेतन वह जो रक्त संचार—श्वास−प्रश्वास—आकुञ्चन−प्रकुञ्चन आदि शरीर की सञ्चालन प्रक्रियाओं का नियन्त्रण करता है। अचेतन वह जिसकी गहन पर्तों में हमारे भूत कालीन संस्कार सुमुप्त अवस्था से जमे पड़े रहते हैं और अवसर पाकर सजग होते रहते हैं।

सचेतन का तीन भागों में विभक्त किया गया है (1) ज्ञान डडडड नालिज—(2) भावात्मक फीलिंग—(3) कार्या−डडडड विलिग।

विद्वान जुंग ने चेतन स्तर को पाँच भागों में बाँटा है (1) सम्वेदना (2) उनने उनमें से प्रत्येक के कई उपभेद भी गिनाय है।

किसी वस्तु की पहले हमें जानकारी प्राप्त होती है फिर उसके सम्बन्ध में प्रिय या अप्रिय इच्छा उत्पन्न होती है इसके उपरान्त उसे पाने, हटाने या उपेक्षा करने की क्रिया आरम्भ होती है। इस दृष्टि से प्राथमिकता ज्ञान की है। इच्छ और क्रिया का उदय इसके उपरान्त होता है।

विचार उठने से लेकर किसी निर्णय निष्कर्ष पर पहुँचने तक चेतना द्वारा उस पर कितने ही दृष्टिकोणों से विचार कर लिया जाता है। साधारणतया इन परखों के लिए जाँच पड़ताल के कुछ आधार मन क्षेत्र में प्रस्तुत रहते हैं इन आधारों को (1)समानता (2)विपरीतता (3) समीपता (4) बारम्बारता (5) नवीनता (6)प्रबलता (7) प्राथमिकता। इन्हीं आधारों पर हमारे तक—पक्ष−विपक्ष की सम्भावनाओं को प्रस्तुत करते हैं। अपने या दूसरों के अनुभवों के सहारे—प्रमाण साक्षी ढूँढ़कर— संभावनाओं का कल्पना चित्र खड़ा करके हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जो इच्छा उठ रही है किस हद तक और किस प्रकार पूरा किया जा सकता है।

छोटे बच्चों में इच्छा एवं कल्पना की ही भर−मार रहती है। तर्क−वितर्क करके किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए गुण अवगुण समझाने वाले दृष्टिकोण का उनमें विकास नहीं होता अस्तु उनकी कल्पनाएँ मधुर या भयानक होते हुए भी वे कुछ निर्णय नहीं कर पाते। किसी दिशा में उनके अंग भी इच्छा पूर्ति के लिए आवश्यक क्रियायें कर नहीं पाते। उनके अंग कोमल होते हैं डडड ठीक है पर उससे भी अधिक बड़ा अशक्तता का कारण निर्णायक शक्ति का अभाव ही होता है।

अन्य जीव−जन्तुओं के सचेतन मन की अपेक्षा अचेतन—अधिक समर्थ होता है। इसलिए उनके परम्परागत चिर−सञ्चित अनुभव जो अभ्यास या संस्कार के रूप में जमे होते हैं उपयोगी निर्णय सहज ही कर देते हैं। उन्हें कब क्या करना है इसका निष्कर्ष निकालने के लिए बहुत सोच−विचार नहीं करना पड़ता—का सहारा नहीं लेना पड़ता। उनकी सहज चेतना ही आवश्यक मार्ग दर्शन कर देती है। किन्तु मनुष्य के बारे में यह बात नहीं है। उसका सचेतन प्रबल होता है और अचेतन की हर बात को सहज ही स्वीकार नहीं करता। उनके लिए परिस्थितियों और सम्भावनाओं के भले−बुरे पक्षों को समझकर अन्तिम फैसला करना चाहता है। इसलिए निर्णायक मार्ग दर्शन अचेतन के हाथ से निकल कर सचेतन के कन्धों पर चला जाता है। इसी विशेषता के कारण उसे मननशील मनुष्य—कहा जाता है। मनुष्य के सर्वांगीण उत्कर्ष ने उसे अनेक परिस्थितियों और समस्याओं से निपटने के लिए बाध्य किया है इसलिए उसकी चेतना का भी बहुमुखी विकास हुआ है। अन्य जीवों के सामने वैसा कुछ उन्हें मात्र शरीर यात्रा के सम्बन्ध में ही सोचना पड़ता है आहार, विश्राम, सुरक्षा एवं प्रजनन की समस्याओं को सुलझाने के अतिरिक्त उन्हें अधिक कुछ नहीं सोचना पड़ता। उनका समाज बहुत छोटा और निर्माण या संचय उन्हें नहीं करना पड़ता। अस्तु मस्तिष्क को अधिक कुछ सोचने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। आवश्यकता को आविष्कारों की जननी कहा गया है। चेतनात्मक विकास से मनुष्य को लाभान्वित कराने का श्रेय उसकी परिस्थितियों एवं समस्याओं को ही है जिन्हें उसने अपने क्रमिक विकास के साथ−साथ अनवरत रूप से आगे बढ़ाया है।

मनोविज्ञानी ड्रमंड एवं मैलोने यह मानते हैं कि चिंतन की प्रखरता जो सामान्यतया सचेतन मन की दक्षता प्रतीत होती है वस्तुतः अचेतन द्वारा प्रदत्त की हुई होती है। अचेतन एवं तिजोरी है जिसमें उपयोगी और अनुपयोगी सभी प्रकार के रस विष भरे होते हैं उनमें से जिन्हें आगे कर लिया गया होगा वे ही सचेतन पर अधिकार जमा लेगी और उसकी अभीष्ट दक्षता प्रखर करती चली जायेंगी। बुद्धिमान, विवेकशील, दूरदर्शी और निर्णय लेने वाले और सही ढंग से काम करने वाले व्यक्ति वस्तुतः अचेतन की गहरी पर्तों से ही अपनी इन विशेषताओं को उपलब्ध करते हैं।

जे. डब्ल्यू. ब्रिज ने बताया है कि व्यक्तित्व को पतनोन्मुख और अस्त−व्यस्त बनाने की प्रक्रिया भी अनजाने ही चलती रहती है। अचेतन में सब कुछ भला−भला ही जमा नहीं है वरन् पाशविक कुसंस्कार भी उसमें सत्प्रवृत्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में जमे रहते हैं। बगीचे में जितने उपयोगी पेड़−पौधे होते हैं उससे कहीं काटा−छाँटा न जाय तो फिर उपयोगी पेड़ों का विकास क्रम रुक जायगा यही बात मनःक्षेत्र में उगी हुई प्रवृत्तियों के बारे में लागू होती है। अवांछनियताओं पर नियन्त्रण न किया जाय—उनकी उपेक्षा बरती जाय तो वे सत्प्रवृत्तियों की अपेक्षा कहीं आगे बढ़ती हैं। इस बढ़ोतरी से घिरा हुआ व्यक्ति डडड वार, अस्त−व्यस्त अदूरदर्शी और कुमार्गगामी बन जाता है।

सिगमंड फासड का मत यह है कि अव्यक्त मनःक्षेत्र ही व्यक्तित्व का आधार भूत कारण है। मनुष्य जैसी भी कुछ है उसकी जड़ अचेतन में गहराई तक घुसी हुई पाई जायगी।

सचेतन को शिक्षा, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन आदि द्वारा प्रशिक्षित एवं परिष्कृत किया जा सकता है पर अचेतन पर इन प्रक्रियाओं का बहुत थोड़ा प्रभाव पड़ता है। उसे निरन्तर के दीर्घकालीन अभ्यास ही प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से तत्व वेत्ताओं ने कितने ही प्रकार की विशिष्ट साधनाएँ विनिर्मित की हैं। इन्हें योगाभ्यास के नाम से पुकारा जाता है। जप और ध्यान इस प्रयोजन की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करते हैं। आसन, प्राणायाम, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य,मौन, तप आदि क्रिया करके अभ्यासों का दीर्घकालीन सेलव भी अचेतन मन को उत्कृष्ट स्तर का बनाने में सहायक होता है। लोहे को गर्म करके ही अभीष्ट आकृति में ढाला जा सकता है। अचेतन को अवांछनीय स्थिति से छुड़ा कर परिष्कृत स्तर का बनाने के लिए योग और तप जैसे उपायों का अवलम्बन लेना पड़ता है।

सचेतन और अचेतन की किसी ऊँचे पर्वत के शिखर और उसकी तलहटी से उपमा दी जा सकती है। शिखर दूर से दीखता है और सूर्य प्रकाश से चमकता है जब कि घाटी की तलहटी दबी छिपी और अँधेरी पड़ी रहती है। समुद्र में तैरने वाले आइस वगं पर्वतों का बहुत बड़ा भाग पानी में डूबा रहता है जो ऊपर उभर रहता है वही दीखता है। ठीक इसी प्रकार हम किसी का व्यक्तित्व एवं बुद्धि−कौशल ही देख समझ पाते हैं जबकि उसकी वास्तविक स सत्ता एवं पूँजी अव्यक्त मनःक्षेत्र में ही दबी छिपी होती है। नाटक के पात्र जब रंगमञ्च पर आते है तो वे आकर्षक सज डडडड में होते हैं पर उसकी तैयारी उन्हें उस ग्रीन रूप में करनी पड़ती है जिसे दर्शक देख नहीं पाते। अव्यक्त मन एक प्रकार का ग्रीन रूप है जिसमें व्यक्तित्व सँजोया जाता है। परिचय क्षेत्र में तो उस तैयारी की साधारण सी जानकारी भर मिलती है। यदि किसी का अव्यक्त मन देखा समझा जा सका होता तो पता चलना कि वस्तुतः यह व्यक्ति अपने यथार्थ रूप में क्या?

मूल्य व्यक्तित्व की तीन परतें होती हैं(1) अह—ईगो (2) परिष्कृत चेतना—सुपर ईगो (3) इदम् ‘इड’—बहिरंग समूह चेतना।

अहम् वह स्तर है जिसमें हमें आत्म−सत्ता का बोध होता है। परिष्कृत वह जिसमें आदर्शों के अपनाने एवं विशिष्ट बनने की आकाँक्षा प्रबल रहती है। इद्म् वह जो अपने परिवार एवं समाज के साथ जुड़ा रहता है। परिस्थितियों के अनुरूप अपने सम्बन्ध में सुख दुख की—उत्थान−पतन की—मान्यताएँ बदलता रहता है। इसी संदर्भ में स्त्री−पुरुष की मान्यता भी है। प्राणी अपने को नर या नारी मान लेता है तो डडडड के अनुरूप उसकी विचारणा एवं चेतना ढलने लगती है। यौन अवयवों का विकास इस मान्यता के अनुरूप ही होता है। पुराना शरीर छोड़ने पर भी यह मान्यता बनी रहती है और अगले जन्म में उसी वेग में जन्म ग्रहण कराती है। जो पुनर्जन्म नहीं मानते उनके सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि रज−वीर्य के गुण सूत्रों में पाये जाने वाले जीवाणुओं की संज्ञा में पाई जाने वाली प्रबलता भ्रूण पे नर−नारी के लक्षण पैदा करती है। शरीर की स्थिति के अनुरूप प्राणी अपना आपको नर−नारी डडडड का मानता है यह बात स्थूल विश्लेषण की दृष्टि से ही सही है। गहराई तक उतरा जाय तो यह पता चलता है कि जीवधारी की सूक्ष्म सत्ता में जो नर या नारी की मान्यता घुसी होती है वही उसमें लिंग भेद के लक्षण उत्पन्न करती है।

अपने सम्बन्ध में जैसी भी मान्यताएँ अचेतन में जमी हुई होगी हमारा जीवन संकट उसी दिशा में अग्रगामी होगा और परिस्थितियाँ उसी प्रकार की बनती ढलती अभीष्ट दिशा में प्रगति की जा सकती है पर अन्त क्षेत्र की अनवरत प्रेरणा से तो मनुष्य अनायास ही स्वसंचालित यन्त्र की तरह आगे बढ़ता जाता है। अन्त स्थिति के अनुरूप बाह्य साधनों का विकसित होते जाना और उसी दिशा में अनवरत प्रगति होते जाना सहज स्वाभाविक है।

अचेतन मन की व्याख्या स्नायु सिद्धान्त—न्यूरोलॉजी−कल थ्योरी एवं मानसिक सिद्धान्त—सायकोलॉजीकल संस्थान की उत्तेजना से अचेतन मन की स्थिति बनती या बदलती सिद्धान्त वाले यह कहते हैं कि मन स्थिति का शरीर पर पूरा नियन्त्रण है। मन जिस दिशा में चलेगा शरीर को उसी ओर चलना पड़ेगा। यह पक्ष मृत्यु तक को स्वनिर्मित या स्वेच्छित बताता है जबकि यह कहना सुनना बहुत अजीब सा लगता है।

उपरोक्त दोनों मान्यताओं का समन्वय विद्वान मार्टिन प्रिंस ने किया है वे मनो स्नायु सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं। उनकी साइको न्यूरोलॉजीकल थ्योरी—स्नायु संस्थान और अचेतन मन के समन्वय पर ही व्यक्तित्व की कोई दिशा धारा निर्धारित होना मानते है। दोनों पक्षों को अपूर्ण ठहराते है और कहते इनमें से किसी एक की गति−विधियाँ अपूर्णता और अस्त−व्यस्तता के रूप में ही बनी रहती है।

व्यापारिक जीवन में जो क्रिया−कलाप मनोयोग पूर्वक देर तक अपना या गया है वही संस्कार बनकर अचेतन में समा जायगा और फिर उसी की प्रेरणा से व्यक्तित्व की अनेक धाराओं एवं क्रियाओं का प्रवाह बढ़ेगा। अचेतन अत्यन्त शक्ति शाली होते हुए भी स्वनिर्मित नहीं है हमारे दीर्घकालीन मनोयोगों एवं क्रिया−कलापों से ही उसका निर्माण एवं परिवर्तन होता है।

मस्तिष्क के बुद्धि संस्थान को विकसित करने के लिए जिस प्रकार मस्तिष्क को शिक्षित और हाथों को अभ्यस्त करने का दीर्घकालीन प्रयत्न किया जाता है उसी प्रकार अचेतन को पाशविक कुसंस्कारों से मुक्त करके देवोपम अन्त स्थिति प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक साधना क्रम अपनाना पड़ता है। योग और तप का महत्व इसी दृष्टि से है। जिनका अनाड़ी मस्तिष्क प्रगति में बाधक है उसी प्रकार असंस्कृत अचेतन भी व्यक्तित्व को विकसित होने के मार्ग में प्रधान अवरोध है। ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार सामान्य प्रशिक्षण प्रयासों की उपयोगिता समझी गई है उससे भी अधिक आवश्यकता अचेतन को परिष्कृत करने के लिए योग एवं तप की समझी जानी चाहिए।

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