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Magazine - Year 1974 - Version 2

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इस विषपान से बचने में ही भलाई है

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शैतान की आँत की तरह बढ़ता हुआ तम्बाखू पीने का व्यसन किस तेजी से बढ़ रहा है और मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का कैसा सर्वनाश कर रहा है वह चिन्ता का विषय है। दुर्भाग्य यह है कि इस विनाशकारी कुटेव को सभ्यता का अंग माना जाने लगा है और शत्रु−शत्रु को नहीं, वरन् मित्र को भेंट करने लगा हैं।

धूम्रपान कितना विघातक है हम संदर्भ में स्वास्थ विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत किये गये विश्लेषण चौंका देने वाले हैं। इस विषपान की बुराइयों को जानते हुए भी लोग उसे जिस प्रकार अपनाते जा रहे हैं उसे देखते हुए उनकी बुद्धिमत्ता पर आश्चर्यजनक संदेह होता है।

तमाखू में 24 प्रकार के भयानक विषों का सम्मिश्रण पाया जाता है जिन में निकोटिन, पायरोडिन, पायकोलिन, कोलोडिन, मार्शगैस, साइनोजेन, परफोरेल, अमोनिया, कार्वनिक एसिड, यूरिक एसिड कार्बन मोनक्साई फुरफु रल, एकोलिन, राजोलिन मुख्य और अधिक विघातक है।

तमाखू में प्रधान रूप से पाये जाने वाले निकोठिन विष के अतिरिक्त स्वल्प मात्रा में कार्बन मोनोआक्साइड, मोनोसाइनाइड्स, साइनाइड्स, पायरिडिन आदि विष भी है जिनकी घातक शक्ति कम नहीं आँकी जा सकती।

जिस कागज से सिगरेट बनती है वह एक विशेष प्रकार के घोल द्वारा बनाया जाता है। एस घोल में सखिया का मिश्रण होता है। जब वह कागज जलता है तो वह परिवर्तित होकर फरफरोल नामक नया विष उत्पन्न हो जाता है। जो मस्तिष्कीय ज्ञानतन्तुओं पर मंद किन्तु दूरगामी प्रभाव डालता है।

एक पोण्ड तमाखू में 380 ग्रेन निकोटिन पाया जाता है। इसे शुद्ध रूप से कुत्ते जैसे जानवरों को दिया जाय तो उनकी मृत्यु एक ग्रेन से भी कम मात्रा में ही हो सकती है। अन्य कालिडिन, एकोलीन, कार्बन मोनोआक्साइड की मारकता भी कम नहीं है। इनकी भी एक ग्रेन मात्रा मेढ़क, चूहे जीवों का तत्काल प्राण हरण करने के लिए पर्याप्त है।

इन विषों के सेवन करते रहने पर भी लोग जीवित रहते हैं और सर्वनाशी स्वास्थ्य संकट में देर से फँसते हैं इसका कारण यह है कि वे विष तमाखू में घुले−मिले रहते है और धुँए के द्वारा धीरे−धीरे तथा थोड़ी−थोड़ी मात्रा में प्रवेश करते हैं। एक सप्ताह में डडडड जाने वाले तमाखू का यह सार तत्व निकाल कर उसका विष भाग तमाखू पीने वाले को एक बार में ही खिला दिया जाय तो निश्चित रूप से उसकी जान चली जायगी।

ऐलोपैथी के प्राचीन ग्रन्थों में तमाखू की गणना एकोनाइट,वेलाडोना धतूरा वर्ग के विषों में ही की गई है। हैजा के जीवाणुओं को मारने के लिए फिनायल की तरह तमाखू का घोल प्रयोग किया जाता था। ऐसा ही अन्य मारक प्रयोगों में उसका उपयोग किया जाता था। उसे नशे के रूप में धुंआ बनाकर पीने का प्रचलन तो बहुत पीछे हुआ और जब वह आरम्भ हुआ तो डाक्टरों ने उसका घोर विरोध किया और बताया कि उससे लकवा, पागलपन, अनिद्रा, दृष्टि मन्दता, खाँसी, श्वाँस नपुँसकता, अपच जैसे अनेक रोग हो सकते हैं। कनाडा के डाक्टरों ने तो तमाखू पीने वालों में पाये जाने वाले रोगों का नामकरण ही इस बुरी आदत के नाम पर कर दिया था। टेविको एमोलिओपिया अर्थात् सिगरेट जन्म दृष्टि हीनता और टोविकों डिसपेप्सिया अर्थात् धूम्रपान जन्य मन्दाग्नि।

यह नशा जैसे−जैसे अभ्यास में आता गया वैसे−वैसे रक्त की विष निरोधक शक्ति क्षीण होती चली गई और वह शरीर का एक व्यसन बन गया। तब उसकी हानियाँ उतनी तीव्र नहीं दिखाई देती। विषाक्त में तमाखू का विष भी कीचड़ और मिल जाने की तरह सामान्य बन गया। जिन दिनों लोगों के रक्त शुद्ध थे उन दिनों तमाखू की प्रतिक्रिया भी तत्काल और तीव्र होती थी अब उससे मन्द और समय साध्य दुष्परिणाम देखने में आते हैं।

अमेरिका में डा. एच. सेलवैट्ठे लिखित “मेडीकल यूजेज आफ टुवेको—पास्ट एण्ड प्रजेण्ट” नामक ग्रन्थ में बताया गया है कि तमाखू प्राचीन काल में मात्र मारक विषों की तरह प्रयुक्त होती थी किन्तु पीछे लोगों ने उसे नशे की तरह दैनिक व्यवहार में लाना आरम्भ कर दिया। पिछले चार सौ वर्षों में उसने मानव जाति को इतनी क्षति पहुँचा दी है जिसकी पूर्ति अगले हजारों वर्षों में भी नहीं हो सकेगी।

सिगरेट का धुंआ एक विचित्र विष और उत्पन्न करता है जिसे पोलोनियम कहते हैं। तमाखू के पत्तों में वह उतना नहीं होता पर उसमें जो विष रहता है उनके जलने से उसकी बड़ी मात्रा में नई सृष्टि और उत्पन्न हो जाती है जो वायु मण्डल को दूषित करती है और जो लोग उस धुएँ की साँस लेते हैं उन्हें भी अपने प्रभाव क्षेत्र में जकड़ लेती है।

एक किलों तमाखू से विषों को पूरी तरह पृथक करके उसे मारण प्रयोग में लगाया जाय तो उतने में ही 900 चूहे या 120 खरगोश या 30 मनुष्य आसानी से मर सकते हैं।

डा. आल्टन ओशनर ने लम्बे समय तक प्रजनन शक्ति पर धूम्रपान के पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है। उनने पीछे वाले और न पीने वाले नर−नारियों की यौवनानन्द एवं सफल प्रजनन का लेखा−जोखा लेने पर यही पाया है कि तमाखू पीने दोनों ही दृष्टियों से घाटे में रहते है। तमाखू छोटा नशा एवं विकृत बनाने में उसका बड़ा हाथ रहता है। नशे करने वालों की सन्तान शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से सदा दोषपूर्ण रहती है। तमाखू पीना उन केवल वरन् अपनी सन्तान की स्थिति को भी गई−गुजरी बनाने का एक अदूरदर्शिता पूर्ण व्यसन है।

इंग्लैंड के विज्ञान वेता डा. प्राइन्स होपकिन्स ने अपनी पुस्तक ‘गाँन अप इन स्मोक’ पुस्तक में लिखा हैं। इस देश में 43 बीमारियों की बढ़ोत्तरी की प्रधान जिम्मेदारी बढ़ते हुए धूम्रपान की है। इसी प्रकार क्रेम्ब्रिज युनिवर्सिटी के प्रो. डब्लू. ई. डिक्सन ने अपनी पुस्तक ‘टेविको हैविट’ में लिखा है। इंग्लैंड के नागरिकों की धूम्रपान की बढ़ती हुई आदत के कारण 50 से अधिक बीमारियों का इतना अधिक शिकार बनना पड़ रहा है जिसकी वस्तुतः कोई सम्भावना न थी।

मेटा्रेपोलियन लाइफ इन्श्योरेन्स कम्पनी ने अपनी रिपोर्ट में तमाखू पीकर असमय मरने वालों के कारण कम्पनी को जो घाटा उठाना पड़ता है उस पर चिन्ता व्यक्त की है और इन नशेबाजी पर अतिरिक्त बीमा दर लागू करने का सुझाव दिया है।

जानहोपकिन्स युनीवर्सिटी के डा. रेमाण्ड पर्ल मेयो फाउण्डेशन ने तमाखू सर्वेक्षण की इस रिपोर्ट का पूर्ण समर्थन किया है जिसमें धूम्रपान को निमोनिया मेनन जाइटिस, डायविटिज, केन्सर, ब्लड प्रेशर, मेन्टल टेन्शन, कान्स्टिपेशन आदि रोगों की पृष्ठभूमि बनाने वाला घोषित किया है।

न्यूयार्क के सायकोलॉजीकल रिसच् सेन्टर के डायरेक्टर हैनरी सी. लिस्क ने लिखा है—हर तमाखू पीने वाला अन्ततः अपनी इस गलती को महसूस करता है पर तब तक वह उस आदत का गुलाम हो चुका होता है और हानियों से बचने का समय हाथ से निकल चुका होता है।

जर्मनी जनता के स्वास्थ्य पर तमाखू का क्या असर पड़ा इसकी जाँच करने के लिए कुएज वर्ग विश्वविद्यालय द्वारा एक शोध कार्य प्रो. हार्स्ट वुलस्टाइन की अध्यक्षता में हुआ था। जिसने इसे एक बुरी आदत घोषित किया कि शरीर के अन्यान्य अवयवों को हानि पहुँचने के अतिरिक्त विशेष हानि कान के ‘ड्रम’ भाग को होती है। निकोटिन की भरमार से उसकी संवेदना शक्ति काफी घट जाती है और अपेक्षाकृत कम सुनाई पड़ने लगता हैं।

रसायन शास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता डा. लिनर्स वैलेग ने टोरेन्टो विश्वविद्यालय के छात्रों के सम्मुख एक विनोदात्मक भाषण देते हुए कहा—जो जिन्दगी से ऊब चुके हों उनके लिए आयु घटाने की दृष्टि से सिगरेट पीना अच्छा है। इसमें आत्महत्या का जुर्म भी नहीं बनता और बहुत दिन जीने के झंझट से भी छुटकारा मिल जाता है। दो पैकेट सिगरेट नित्य पीने वाला व्यक्ति अपनी जिन्दगी के 18 वर्ष कम कर लेता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ डा. अलबर्ट हस्ट का कथन है कि हर सिगरेट मनुष्य की 5 मिनट आयु घटाती है। दस सिगरेट नित्य पीने व्यक्ति हर वर्ष अपनी आयु में से प्रायः 12 दिन कम करता जाता है।

आस्ट्रेलिया के वायु सेना विभाग ने विमान चालकों को चेतावनी दी है कि बीस से अधिक सिगरेट न पियें। विशेषज्ञों द्वारा की गई खोज से यह परिणाम निकला है कि सिगरेट के धुँए का कार्बन मोनोआक्साइड रक्त के साथ मिलकर अन्य अंगों के अतिरिक्त आँखों पर भी बुरा असर डालता है और रात में देखने की क्षमता कुछ ही समय में 20 प्रतिशत तक घट जाती है।

लन्दन के रॉयल कालेज आफ फिजीजियन्य ने अपनी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा है—यदि तमाखू पीना लोग बन्द करदें तो उनकी आयु और निरोगता निश्चित रूप से बढ़ जायगी।

विटामिन विज्ञान के प्रसिद्ध शोध कर्त्ता डा. डब्ल्यू. जे. मेकाह्विक ने लिखा है—एक सिगरेट ही विटामिन सी, की 25 मिलियम मात्रा का उपयोगी प्रभाव नष्ट करके रख देती है।

अमेरिका सरकार को अकेले केन्सर से लड़ने के लिए एक पंच वर्षीय योजना बनानी पड़ी है। जिसमें 12, 60,000 डालर खर्च करने पड़ेंगे। इसी प्रकार अन्य कई रोग भी ऐसे हैं जो तमाखू से उत्पन्न होते है उनके निवारण का खर्च भी सरकार पर बहुत पड़ता है। उस देश के विचारशील लोग इस बात से चिन्तित है कि तमाखू कम्पनियों को मोटा लाभ उठाने देने की बात क्यों सहन की जाय पीड़ा और सरकार को निवारण के लिए खर्च की जाने वाले विषुवत धनराशि का भार बहन करना पड़े।

धूम्रपान की हानि से क्षुब्ध पीने वालों ने अपनी हानि में तमाखू कम्पनियों के बहकावे को भी एक कारण माना है और उन पर हर्जाने के दावे ठोंक दिये हैं।

अमेरिका के न्यू ओलियन्स नगर की निवासी श्रीमती विक्टोरिया सेन्ट पीथेर लाटिंग नामक एक विधवा ने लिग्गेट एण्ड मायर्स और आर. जे. रेनाल्डस नामक दो सिगरेट कम्पनियों पर 779500 डालर के दावे किये हैं। विधवा का कथन है कि उसका पति इन कम्पनियों की बनी 40 सिगरेट हर दिन पीता था। ऐसा उसने 14 वर्ष की उम्र से लेकर मरते समय 64 वर्ष की आयु तक किया। फिर उसे फेफड़े का केन्सर हुआ और मर गया। श्रीमती लांिटग यह भरोसा दिलाती रही कि सिगरेट स्वास्थ्य को बिगाड़ती नहीं। उनका यह दावा बहकावा मात्र था। उन्हीं के विश्वास में उसका पति असमय में ही बेमौत मारा गया अस्तु वे कम्पनियाँ उसके नुकसान की क्षति पूर्ति के लिए उपरोक्त रकम उसे दिलाने के बाध्य की जाये।

ऐसा ही एक और भी मुकदमा दायर हुआ है। पिट्स वर्ग के न्यायालय में प्रिटवार्ड नामक एक नागरिक नक अमेरिका की प्रख्यात तमाखू कम्पनी मैसर्स लिगी एण्ड मायर्स लि. पर 1250,000 डालर का दावा किया है कि उस कम्पनी की बनाई चेस्टर फील्ड मार्का सिगरेट पीते रहने के कारण उन्हें केन्सर हो गया और एक फेंफड़ा गाँ देना पड़ा।

आइसलेएड में धूम्रपान तेजी से बढ़ा है। दस वर्ष पूर्व वहाँ हर व्यक्ति पीछे महीने में 8 सिगरेटों की औसत खपत थी। अब वह 12 गुनी 100 हो गई। किन्तु साथ ही केन्सर का प्रकोप आश्चर्यजनक रूप से बड़ा। पुरुषों में 500 प्रतिशत और स्त्रियों में 175 प्रतिशत उस काल रोग की वृद्धि हुई। वहाँ हर एक हजार मरने वालों में 44 केन्सर ग्रस्त होकर मरे।

योरोप के अन्य देशों में भी धूम्रपान का प्रचलन से बढ़ा है किन्तु साथ ही फेफड़ों सम्बन्धी बीमारियों डडडड बढ़ोतरी भी अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से हुई है। केन्सर तो वृद्धि अनुपात की दृष्टि से सबसे आगे रहा है। ब्रिटिश पार्लियामेंट के मजदूर दल की संसद सदस्या डाक्टर एडियसमराक्सिल ने पार्लियामेंट में अपने विचार व्यक्त करते हुए आग्रह किया कि सरकार को चाहिए कि वह ब्रिटिश जनता के जीवन से धूम्रपान की बुराई को निकाल बाहर करने के लिए योजना बनावें और आन्दोलन चलाये। इस खतरनाक विष के जन जीवन पर किये जाने वाले आक्रमण को रोकना सरकार का वैसा ही कर्तव्य है जैसा कि शत्रु के आक्रमण अथवा महामारी के प्रकोप से निपटना।

अमेरिका की पब्लिक हैल्थ सर्विस—पेनसिलवेनिया मेडीकल सोसाइटी—जार्जिया मेडीकल एसोसियेशन आदि कितना ही स्वास्थ्य संस्थाएँ उस देश की जनता को तमाखू के दुष्परिणामों से अवगत कराती रही हैं और जो पीते हैं उसने अनुरोध करती रही हैं और जो पीते हैं उनसे अनुरोध करती रही हैं कि इस बुरी आदत के चंगुल से निकल कर अपनी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक बरबादी को रोकें।

जहाँ पाश्चात्य देश इस दुर्व्यसन से दुखी होकर उसके चंगुल से छूटने का मार्ग खोज रहे हैं वहाँ दुर्भाग्य वश भारतवासी अपनी गरीबी और गये−गुजरे स्वास्थ्य के बावजूद इसे अधिकाधिक उत्साह के साथ अपनाते जा रहे हैं। साथ ही उसका दुष्परिणाम भी भोग रहे हैं।

भारत में सिगरेट बीड़ी की खपत तेजी से बढ़ रही है। सन् 1948 में आबादी के अनुरूप हर व्यक्ति 6 का वार्षिक औसत था। सन् 60 में बढ़कर वह 78 पर पहुंचा और अब सन् 74 में 280 के लगभग जा पहुंचा है। यदि यही क्रम आगे बढ़ता रहा तो धीरे−धीरे सिगरेट बीड़ी की गणना अन्य खाद्य पदार्थों के स्तर तक ही जा पहुंचेगी।

भारतीय केन्सर अनुसन्धान केन्द्र ने टाटा मेमोरियल अस्पताल में भर्ती हुए 1460 मरीजों की जाँच−पड़ताल करने पर पाया कि तमाखू खाने से मुँह की और पीने से फेफड़ों का केन्सर होता है। उस अस्पताल में एक वर्ष के अन्दर 36550 रोगी आये जिनमें से 521 फेफड़े के केन्सर से ग्रसित थे। उन्हें यह अनुग्रह सिगरेट बीड़ी की कृपा से ही मिला था।

महाराष्ट्र, गुजरात, आन्ध्र और उत्तर प्रदेश में 30 वर्ष से अधिक आयु के 34 हजार स्वस्थ दिखाई पड़ने वाले धूम्रपान शौकीनों का उसी अनुसन्धान के अंतर्गत सर्वेक्षण किया गया तो पता चला कि इनमें से लगभग आधों के भीतर वह विष मौजूद था जो कभी भी केन्सर का संकट उत्पन्न करदे।

समय रहते तमाखू की कुटेव की हानियों को समझें और इस विषपान से अपने को विरत रखें इसी में भलाई है।

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