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Magazine - Year 1974 - Version 2

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विवशता का सदाचरण रेती का महल

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विवशता कई बार ऐसे काम करा लेती है जो इच्छित नहीं होते। बुरे काम छोड़ने के लिए भी कई बार मनुष्य को विवश, बाध्य होना पड़ता है। जेल में बन्द होने के बाद जुआ, चोरी, व्यभिचार, डकैती, हत्या आदि वे दुष्कर्म कर सकना जो बाहर स्वच्छन्द विचरण की स्थिति में सुविधा पूर्वक किये जा सकते थे। बीमारी के दिनों में दूसरों पर इच्छा रहते हुए भी आक्रमण कर सकना सम्भव नहीं होता। बुढ़ापा आने पर इन्द्रियों की शिथिलता काम सुख प्राप्त कर सकने की सम्भावना को समाप्त कर देती है। निर्धन उन खर्चीले विलासों का उपभोग नहीं कर सकता जिनके लिए उसकी लिप्सा, लालसा निरंतर बनी रहती है। विवशता की स्थिति में भी मनुष्य उन कामों से बच सकता है—बचा रह सकता है जो भले और बुरे की कसौटी पर कसे जाने पर हेय या त्याज्य समझे जाते हैं।

यह विवशता जन्य त्याग अथवा बचाव हो सके तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसे सदाचारी की पंक्ति में बैठने का अधिकार मिल गया। भीतर की अभिलाषाएँ और मान्यताएँ ही किसी को भला या बुरा बनाती हैं। उन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर विविध−विधि क्रिया−कलापों का सृजन होता है।

बहुत दिनों से जिन्हें सज्जन, सदाचारी समझा जाता रहा है वे भी कभी−कभी ऐसे हेय कर्म कर बैठते हैं जिनकी अपेक्षा नहीं की जाती। बाहरी विश्लेषण करने पर यह सब अचानक या आकस्मिक हुआ प्रतीत होता है पर वास्तविकता कुछ और ही होती है। ऐसे लोग विवशता अथवा बनावट के कारण बाहर से सदाचरण की चादर ओढ़े रहते हैं पर भीतर ही भीतर अचिन्त्य चिन्तन करते रहते हैं। दुराचरण में रस लेते रहते हैं फलतः मनःस्थिति दुष्प्रवृत्तियों से समझौता कर लेती हैं और प्रकारान्तर से उनकी समर्थक बन जाती हैं। बाहर से विरोध भीतर से समर्थन भी दुहरे व्यक्तित्व वाली मनःस्थिति का होना कुछ आश्चर्यजनक नहीं है। इन दिनों तो ऐसा बहुत अधिक ही होता है। दम्भ का अर्थ ही भीतर और बाहर की स्थिति में भिन्नता का होना है। छल, असत्य और मत्सर इसी मनःस्थिति के प्रतीक माने जाते हैं। जब तक अन्तःकरण ऐसा ही बना रहे तब तक किसी को सदाचारी की पंक्ति में बैठ सकने योग्य नहीं गिना जा सकता। बाध्य होकर निवाहा गया संयम एक विवशता भरी परिस्थिति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

दण्ड का भय, क्षमता का अभाव, साधनों का न जुट पाना, परिस्थितियों का दबाव किसी दुराचारी और दुष्ट को भी सन्त सज्जन जैसी स्थिति में बने रहने के लिए बाध्य कर देता है; पर इससे न तो वह व्यक्ति प्रामाणिक बन जाता है और न सुसंस्कृत। ऐसे व्यक्ति अवसर मिलते ही अप्रमाणिक सिद्ध हो सकते हैं और अकरणीय कृत्य कर सकते हैं। नैष्ठिक सदाचारी के अन्तःकरण में जो प्रफुल्लता रहती है और आत्मशान्ति का जैसा अनुभव होना चाहिए उसकी झाँकी उन्हें कभी भी नहीं मिलती, निष्ठावान आदर्शवादिता ही अन्तःस्थिति को परिपक्व करती है। उसी में वह प्रेरणा रहती है जो भय और प्रलोभनों से भरी विषम स्थिति सामने आने पर ही मनुष्य को बिना डगमगाये अविचल खड़ा रख सके।

प्रखर व्यक्तित्व के लिए आन्तरिक निष्ठा का पोषण चाहिए। अन्तःकरण में गहराई तक जमी हुई आदर्शवादी आस्थाएँ ही आत्मबल का सृजन करती हैं और उसी सामर्थ्य के सहारे सामान्य मनुष्य का महामानव बन सकना सम्भव होता है। यही जीवन की महान सम्पदा है जिस पाने के बाद वह सब कुछ मिल जाता है जिसके लिए मनुष्य जन्म मिलता है। विवशता एवं विडम्बना के आधार पर चल रहा सदाचरण इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर सकता उसे रेत के महल की तरह कभी भी ढहता हुआ देखा जा सकता है।

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