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Magazine - Year 1974 - Version 2

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प्रत्युपकार की आशा से उपकार न करें

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दूसरों के साथ सेवा, उदारता अथवा शालीनता का व्यवहार इस अपेक्षा से नहीं करना चाहिए कि वे ठीक उसी रूप में बदला चुकायेंगे। हमने जो कुछ किसी के साथ किया है वह दूसरा भी हमारे साथ करें यह चाहना न तो नीति युक्त है और न बुद्धिमत्तापूर्ण।

हमने किसी रोगी या भिखारी की सेवा, सहायता की। यदि इसी रूप में अपने अनुदान का प्रतिपादन चाहे तो पहले हमें स्वयं रोगी या भिखारी बनना पड़ेगा। तभी तो वह बेचारा ठीक उसी प्रकार का बदला चुकायेगा जैसा कि हमने उसके साथ किया था। किसी अशिक्षित को शिक्षित बनाया। उसी रूप से वह व्यक्ति हमारी सेवा तभी कर सकेगा जब हम अपनी उपार्जित विद्या भूला दें। पूर्ण अशिक्षित बन जायें और वह व्यक्ति हमें अक्षर ज्ञान से पढ़ाना आरम्भ करें। यह कैसी उपहासास्पद बात होगी।

उपहार करना उन्हीं के साथ सम्भव होता है जो निर्धन, पिछड़े या दुखी हैं। अपने से उपकार कर सकना तभी बन बड़ा जब उनकी तुलना में अच्छी स्थिति में थे। जिस भिक्षुक को आज एक रोटी दी गई है कल वही एक रोटी बनाकर हमें देने आवेगा यह सोचकर कौन भिक्षा देता है? ठीक इसी प्रकार यह सोचना कि जिस सद्भावना के साथ हम दूसरों की सहायता कर रहें है उसीसे वे लोग हमें बदला देंगे वह भी बदला चुकायेंगे, यह कैसे संभव है? यदि उनकी मन स्थिति कृतज्ञता प्रकट करना अथवा प्रतिफल, प्रतिदान दे सकने की रही होती तो वे भी अपने ही जैसे वरन् अपने से भी ऊँचे रहे होते। तब उन्हें हमारी सहायता की ही आवश्यकता क्यों पड़ती?

मनुष्यों में से अधिकांश ऐसे है जो न केवल भौतिक दृष्टि से ही संकटग्रस्त हैं वरन् आत्मिक दृष्टि से भी बहुत पिछड़े हुए हैं। वस्तुतः उनका आन्तरिक पिछड़ापन ही भौतिक विपत्तियों एवं अभावों के रूप में उभर कर ऊपर आया है। ऐसे लोगों से प्रशंसा की—कृतज्ञता की एवं सद्व्यवहार की आशा करना व्यर्थ है। जो वस्तु जिसके पास नहीं है वह उसे दे भी कैसे सकता है नेकी करने वाले के प्रति कृतज्ञ होना उसका प्रशंसक रहना प्रतिपादन की बात सोचना भी तभी बन पड़ता है जब व्यक्ति के अंतरंग में उच्च आत्मिक दृष्टिकोण की स्थापना हो। इसके अभाव में वह नेकी करने वाले के प्रति नेकी करने की कृतज्ञता प्रकट करने की अथवा प्रशंसक रहने की बात रसोच न रहेगा। उसकी इच्छा तो यही रहेगी कि जितना मिला है उससे कहीं अधिक और भी किसी तरह झपट लिया जाय।

घटिया लोग अपने प्रति किये गये उपकार को अधिकार मान लेते हैं और चाहते है कि सहायता की धारा न केवल निरन्तर लाभान्वित करती रहे वरन् उसकी मात्रा भी बढ़ती रहे। जब उनकी इच्छानुकूल सहायता नहीं मिलती तो वे स्वार्थ पूर्ति में बाधा पड़तें देखकर तिल मिलाने लगते है और उपकारी को सताकर उससे अधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। यह उनके छोटेपन के अनुरूप ही है।

हमें किसी के साथ नेकी विशुद्ध कर्तव्य भावना से करनी चाहिए। बदले की बात तो सोचनी ही नहीं चाहिए। वस्तुओं का बदला देना तो संकटग्रस्तों के लिए सम्भव ही नहीं होता उनमें से अधिकांश ऐसे भी कंगाल होते हैं जो सद्भावना का बदला कृतज्ञता के रूप में भी नहीं चुका सकते। जिन दुर्गुणों ने उन्हें विपत्तियों में फंसाया उनमें से एक कृतज्ञता को भी मानकर चलना चाहिए। यदि हम सब सोचकर चलें और सेवा, सहायता को विशुद्ध कर्तव्य और आत्म−सन्तोष के लिए किया गया प्रयास भर मानें तो फिर इसके लिए दुख न मानना पड़ेगा कि उपकारी के साथ वही व्यवहार क्यों किया?

व्यक्ति गत सुख−सुविधाओं के अभिवर्धन का प्रयास करने में कुछ हर्ज नहीं है, पर उसके लिए औचित्य की सीमा अवश्य निर्धारित करनी चाहिए। अनियंत्रित स्वार्थ साधन की चपेट में ऐसे तत्व सहज ही जुड़ जाते हैं जिन्हें हेय, निन्दित एवं पाप कर्म की गणना में गिना जा सके।

शरीर की इन्द्रियाँ विविध−भोग भोग माँगती है और मन को अहंता की पूर्ति के लिए संग्रह, वैभव एवं वर्चस्व की ललक लगी रहती है। इन लिप्सा−लालसाओं की पूर्ति के लिए अधिकाधिक मात्रा में समृद्धि−सम्पदा उपलब्ध करने की आवश्यकता पड़ती है। शरीर के साथ जुड़े हुए स्त्री, पुत्र आदि सम्बन्धी भी ममत्व की परिधि में जुड़ जाते हैं अस्तु उनके लिए भी वैसे ही सुविधा साधन इकट्ठे करने पड़ते है जैसे कि अपने निज के लिए। इसी उपार्जन एवं उपभोग की प्रक्रिया को अपने निज के लिए। इसी उपार्जन एवं उपभोग की प्रक्रिया को मोटेतौर से स्वार्थ साधन कहते हैं। अधिकाँश व्यक्तियों का जीवन−क्रम इसी स्वार्थ संपादन में निरत रहता है।

यह स्वार्थ साधन यदि दो मर्यादाओं में बंधे रहे तो उसकी भर्त्सना न करनी पड़े। इन मर्यादाओं में एक है दूसरों के स्वार्थों को क्षति पहुंचाये बिना अपना प्रयोजन पूरा करना और दूसरा यह कि समीपवर्ती पतन एवं पीड़ा को उबारने की उपेक्षा न करना।

हमारी कमाई ऐसी न हो तो अन्य व्यक्तियों के अथवा समस्त साज के उचित अधिकारों का हनन करके उपलब्ध की गई हो, किसी के साथ अन्याय हुआ हो अथवा उनके कारण किन्हीं को पतन उत्पीड़न सहन करना पड़ा हो। हमारा उपयोग−आनन्द दूसरों के लिए कष्टकारक न बना हो, समुचित परिश्रम के मूल्य पर−बिना दूसरों को क्षति पहुंचाये यदि सुविधा सामग्री जुटाई गई है और उसका उपयोग किया गया है तो इसमें कुछ अनुचित नहीं है।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है उसे साथी, पड़ौसियों का ध्यान रखकर चलना पड़ता है। वस्तुतः समस्त मानव समाज एक ही परिवार है। परिवार में कुछ अधिक कमाने वाले होते है, कुछ कम कमाते हैं, कुछ बिलकुल नहीं कमाने वरन् अध्ययन चिकित्सा आदि में अतिरिक्त खर्च कराते हैं। परिवार की आचार संहिता सही है कि अधिक कमाने के कारण नहीं, आवश्यकता के कारण खर्च करने की नीति निर्धारित की जाय। कोई अधिक कमा तो सकता है, पर यदि कमाने वाला असामान्य या अनावश्यक खर्च करे तो सारे परिवार में विक्षोभ उत्पन्न होगा। सम्मिलित परिवार में रहने वाले प्रत्येक सदस्य का उपार्जित सम्पदा पर अधिकार होता है जो अनावश्यक खर्च करेगा वह कुटुम्ब के अन्य सदस्यों के अधिकारों का हरण करेगा और उनके उचित विकास में बाधा उत्पन्न करेगा। यह दूसरी मर्यादा है जिसे खर्च करते समय ध्यान में रखना चाहिए। उपार्जन बिना दूसरों को पतन ही दूसरा तथ्य यह भी आवश्यक है कि खर्च करते समय मानव परिवार की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाय ऐसी निष्ठुरता धारण न की जाय कि पीड़ा और पतन के चीत्कार चारों ओर होते रहें और कमाई का गुलछर्रें उड़ाते हुए हृदयहीन उपभोग करते रहें।

अन्य प्राणियों को उत्पीड़न देकर उनके माँस चर्म, बाल आदि का व्यवसाय अथवा उपभोग अवाँछनीय है। नशेबाजी, व्यसन, कामुकता भड़कने वाले व्यवसाय करके धन कमाना अनुचित है उससे कितनों को ही पतन के गर्त में गिरना पड़ता है मित्रता स्थापित करके किसी को व्यभिचार के लिए आकर्षित करना और उसका चरित्र तथा भविष्य बिगाड़ देना अपने लिए मनोरंजक हो सकता है, पर दूसरे पक्ष को इसमें भारी क्षति पहुँचती है। मिलावटी खाद्य−पदार्थों अथवा नकली हानिकारक वस्तुओं का व्यवसाय करना इसी प्रकार की पाप कमाइए में गिने जायेंगी जिनमें दूसरों को हानि पहुँचा कर ही अपना स्वार्थ सिद्ध होता है। इस प्रकार के कार्यों से यदि अधिक कमाया जाना हो तो उसका लोभ छोड़कर कम लाभ का कार्य करना चाहिए भले ही उससे गरीबों जैसा जीवन जीना पड़े डडडड विलासी सुख−सुविधाओं से वंचित रहना पड़े। किसी की अमानत हड़प कर— भागीदारों का गला काट कर —चोरी,बेईमानी की तरकीबें लड़ाकर अधिक कमाने और अधिक भोगने की लिप्सा छोड़ देनी चाहिए। थोड़े ही साधनों से काम चलाना चाहिए।

घर के अन्य सदस्य रूखी−सूखी रोटी खाये और अधिक कमाने वाले मिठाई, मिठाई उड़ायें तो इसे हृदयहीनता ही कहा जायगा। जो कमायेगा सो खायेगा वाली नीति पशु जगत में काम आ सकती है, मनुष्य समाज में उसे प्रश्रय नहीं मिल सकता। यदि ऐसा होगा तो सहृदयता,सज्जनता और सामाजिकता जैसे उन सिद्धांतों का दिवाला ही पिट जायगा जिनके आधार पर मानवी गौरव और उसका विकास इतिहास खड़ा हुआ है। समीपवर्ती पीड़ा का रूदन भी मानव अन्त करण के लिए निष्ठुरता एवं उपेक्षा पूर्वक सुनते रहना और उसके समाधान में कोई योग न देना भी उचित नहीं।

हम जो कमाते हैं उसमें मात्र अपना ही पुरुषार्थ या कौशल प्रधान नहीं रहता। दूसरों के सहयोग का उस प्रगति में भारी योगदान रहता है। कोई व्यक्ति कितना ही सुंदर क्यों न हो अपने आपसे अपना विवाह नहीं कर सकता। दाम्पत्य−जीवन का आरम्भ तभी होता है जब गृहस्थ रथ में कोई दूसरी महिला योगदान देने के लिए अपना सहयोग प्रदान करे। इसी तरह हमारे दैनिक जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ भी हम स्वयं उत्पन्न नहीं करते। अन्न,वस्त्र आदि वस्तुएँ दूसरों की बनाई हुई ही होती हैं व्यापार तभी चलेगा जब ग्राहक खरीदे। नौकरी तभी मिलेगी जब कोई अपने यहाँ रखे। एकाकी जीवन अन्य प्राणियों के लिए तो सम्भव है, पर मनुष्य तो पूर्णतया सामाजिक प्राणी है और दूसरों के सहयोग पर ही उसकी जीवन रक्षा विद्या,बुद्धि सुख−सुविधा एवं प्रगति निर्भर है। एकाकी रहने पर तो कोई बालक बोलने, सोचने जैसी सामान्य विशेषताओं से भी वंचित रह जायगा। हमें अनेकानेक जो सुविधा साधन उपलब्ध हैं उसे सामाजिक अनुदान ही कह सकते हैं। अब तक की समस्त मानवी प्रगति इस सहयोग वृत्ति का विकसित एवं कार्यान्वित करने से ही सम्भव हुई हैं।

इस अनुदान का प्रतिदान चुकाये बिना हम सामाजिक ऋण से उऋण नहीं हो सकते। परिवार की बड़ी पीढ़ी ने हमें स्नेह, सहयोग भरा उदार परिपोषण देकर इस योग्य बनाया है कि आज समर्थों की श्रेणी में खड़े हो सके। उचित यही है कि उस उपकारकर्त्ता बड़ी पीढ़ी की .कृतज्ञतापूर्वक सेवा, सहायता करें और उनका अनुकरण करते हुए छोटी पीढ़ी को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में उदारता बरतें। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी उपभोग वृत्ति पर अंकुश रखें और मर्यादा से बाहर न जाने दें। स्वल्प में सन्तोष करें और अपनी उपलब्धियों को— अन्यान्यों को लाभान्वित होने देने के लिए प्रस्तुत करें।

स्त्री−पुत्रों,भाई −बहिन या माँ−बाप तक ही कुटुम्ब की सीमा समाप्त नहीं हो जाती। जब आत्म−विस्तार की— आत्म विकास की स्थिति होती है तो समाज और समस्त विश्व अपना घर−परिवार जैसा प्रतीत होता है। तब यह आवश्यक प्रतीत होता है कि जहाँ कहीं भी पीड़ा और पिछड़ापन हो वहाँ उसके समाधान करने के लिए आगे बढ़ जाय। जहाँ कहीं इस विश्व को सुविकसित बनाने के प्रयास चल रहे हो वहाँ उनमें योगदान दिया जाय। समृद्धि का बढ़ाना ही लोक–मंगल के लिए पर्याप्त नहीं सत्प्रवृत्तियों और सद्भावना की विभूतियों का बढ़ाया जाना उससे भी अधिक आवश्यक है। सम्पदा बढ़ने से नहीं वस्तुतः भावात्मक और चारित्रिक उत्कर्ष से ही संसार की सुख−शांति में स्थिरता एवं अभिवृद्धि होती है। अस्तु लोक−कल्याण की दृष्टि से सद्भाव संवर्धन के लिए अपना अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए।

अपने लिए हम उतना ही खर्च करें जितना अनिवार्य हो। उपभोग की लिप्सा संग्रह की तृष्णा और अहंता की तुष्टि को संयमित,सीमित और मर्यादित रहने के उपरान्त ही हम इस योग्य बनते हैं कि मानवी कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का सह रीति से निर्वाह कर सके।

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