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Magazine - Year 1974 - Version 2

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अपनों से अपनी बात - समय की चुनौती हमें स्वीकार करनी ही होगी

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अखण्ड−ज्योति ने अपने वर्ष के जीवन काल में युग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए—अपने ढंग से जो असाधारण अध्यवसाय और अथक प्रयत्न किया है; महत्व इस बात का भी है कि वह अपने समय की एक ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर सकी किन्तु उन प्रेमी परिजनों के सहकार को भी इस संदर्भ में कम महत्व नहीं दिया जा सकता है जिन्होंने सम्पादक सञ्चालक न होते हुए भी इस मिशन के प्रति इतनी गहरी निष्ठा का परिचय दिया मानो वे स्वयं ही इसे चलाते हों— मानो वे स्वयं ही इसके संस्थापक और प्रबन्धक हो।

ऐसा अन्य पत्र−पत्रिकाओं के बारे में भले ही होता हो पर अखण्ड−ज्योति के बारे में ऐसा कहीं भी—कभी भी—नहीं सुना। उसे आदि से अन्त तक कई बार पढ़ा गया है— अपने प्रयोजनों को अनुरोध करके आग्रहपूर्वक पढ़ाया गया। उसमें प्रकाशित विचारों को अपने निजी विचार समझकर उन्हें फैलाया गया है जहाँ भी विवाद का अवसर आया है आगे बढ़कर उनका समर्थन किया गया है। इतना ही नहीं प्रत्येक पाठक ने यह प्रयास किया है कि वह अकेला ही ग्राहक न रहे वरन् अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्य लोगों को भी उसका सदस्य बनाये। इसके लिए उसे कई बार तो इतना आग्रह अनुरोध करना पड़ा है मानो वह प्रयास किसी आर्थिक लाभ के लिए किया जा रहा हो। उसकी नीयत पर सन्देह तक किया गया—ऐजेन्ट बताया गया−पर इसका कौन बुरा मानता।

चुनाव के दिनों में वोटें माँगने के लिए लोग बिना मान अपमान का विचार किये घर−घर जाते हैं और सीधी उलटी दोनों ही तरह की बातें सुनते हैं। इतने पर भी उनका उत्साह नहीं टूटता। ठीक यही नीति अपने परिजनों की रही है। उन्होंने अखण्ड−ज्योति के अध्ययन से लेकर प्रसार तक हर कार्य में अपना उत्साह भरा प्रयास जारी रखा है। यही कारण है कि उसकी लोक प्रियता बढ़ती गई और उस उत्साहपूर्वक स्थिति में पत्रिका अपनी सवा साधना के गहनतम स्तर तक उतरती गई। यही है उभयपक्षीय सत्प्रयत्नों का प्रतिफल। यही है इस संस्थान के युगान्तरकारी प्रयत्नों का आधार। जिसका मूल्याँकन करने वाले लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और समझ नहीं पाते कि इतने व्यापक कार्य कैसे किया जा सकता है।

अखण्ड−ज्योति लोकरंजन के लिए व्यवसाय बुद्धि अपनाकर चल रहे अनेकानेक प्रकाशन प्रयत्नों से हजारों लाखों मील दूर है। इसलिए उसकी तुलना अन्य किसी के साथ किसी भी दृष्टि से नहीं की जा सकती। मूल्य का सस्तापन—विज्ञापन लेकर प्रकारान्तर से पाठकों की जेब काटने और अपना लाभाँश बढ़ाने की चक्करदार तरकीब उसे कभी पसन्द नहीं आई। आधे पृष्ठ विज्ञापनों के और आये पृष्ठ पाठ्य सामग्री के दना—डडडड मोटा डडडड डडडड देकर प्राथमिक आकर्षण उत्पन्न करना—मनोरञ्जक उथली चीजें छापते रहना यही है आज की पत्र प्रकाशन नीति। अखण्ड−ज्योति उससे पूर्णतया बचकर चली है। अनाकर्षक कलेवर ठोस पाठ्य सामग्री—लागत मात्र मूल्य यही शालीनता की नीति अपनाने की घोषणा की गई थी तो इस क्षेत्र में काम करने वाले हर ‘समझदार’ शुभ चिन्तक ने यही कहा यह नीति सफल नहीं हो सकती। इस जमाने में यह नहीं चलेगा। पत्रिका बन्द हो जायगी, कोई उसे पसन्द नहीं करेगा। यह सब धैर्य पूर्वक सुना गया और यह विश्वास अडिग रखा गया है कि पारखी लोगों से यह भूमि पूर्णतया रहित नहीं हुई है। आदर्शवादिता को सर्वथा अमान्य ठहरा दिया जाय ऐसी स्थिति अभी उत्पन्न नहीं हुई है। श्रेष्ठता ‘भले ही दुर्बल हो बिखरी हुई हो—पर वह जीवित अवश्य है और उसे यदि संगठित सजीव किया जा सके तो वह सशक्त भी बहुत है। प्रसन्नता की बात है कि समय की चुनौती जिस साहस पूर्वक स्वीकार की गई थी उसे न तो असफल होना पड़ा और न निराशा। लक्ष्य तक पहुँचने में हम सफलता की दिशा में काफी लम्बी मंजिल पार कर चुके।

अखण्ड−ज्योति का महत्व उस दैन को है जिसने जनसाधारण को नई दिशा दी है—नये ढंग से सोचने को विवश किया है और यह हृदयंगम कराया है कि आदर्शवादी दर्शन अपनाकर ही हम आज की अनेकानेक गुत्थियों की हल निकाल सकते हैं—संकटों के अनेकानेक बन्धनों से छुटकारा पा सकते हैं। यह तथ्य इतनी अच्छी तरह समझा गया कि अखण्ड−ज्योति को संसार भर की भाषाओं में छापने की माँग प्रबल हो उठी। भारत की 14 भाषाओं में छापना तो प्रायः निश्चय ही हो चुका था। उसके अनुवाद (1) अँग्रेजी युग−निर्माण योजना, (2) गुजराती युग−निर्माण योजना (3) मराठी युग−निर्माण योजना (4) उड़िया युग−निर्माण योजना के नाम से चार भाषाओं में सफलता पूर्वक प्रकाशित भी होने लगे। यदि पक्षाघात एवं बज्र प्रहार जैसी महंगाई द्वार रोककर खड़ी न हो जाती तो अब तक कितनी ही अन्य भाषाओं में भी उसके अनुवाद प्रकाशित होने लगे होते। समय की माँग वस्तुतः इतनी ही प्रबल है।

स्पष्ट है कि तुच्छ से मानवी कलेवर में जो कुछ विशेषता है वह उसके चिन्तन पक्ष की—आस्था आधार की है। उसका स्तर नीचे गिरेगा तो व्यक्ति और समाज को पतनोन्मुख दिशा में चलते और अनेकानेक संकटों में ग्रसित होते दिशा जा सकेगा, यदि दर्शन में उत्कृष्टता आदर्शवादिता भरी रही तो चेतना को महामानव स्तर पर विकसित करने का अवसर मिलेगा और भौतिक एवं आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता चला जायगा। प्रगति के लिए जितने भौतिक प्रयास किये जाते रहे हैं यदि उतने ही दार्शनिक उत्कृष्टता को विकसित एवं परिपुष्ट करने के लिए किये गये होते तो आजे जिन जटिल समस्याओं के समाधान के लिए हमें घोर प्रयत्न करने हुए भी अँधेरे में भटकना पड़ रहा है उनके प्रस्तुत होने की ही आवश्यकता न पड़ती। तब कोई संकट एवं अभाव दिखाई ही न पड़ता।

अखंड−ज्योति इसी अभाव की पूर्ति के लिए अपने जन्म काल से लेकर आज तक अथक प्रयत्न करती रही है। उसने युग की माँग को समझा है और बुद्धिवादी आधार लेकर उत्कृष्टतावादी दर्शन की प्रतिपादिता शैली को अपनाया है। पिछले दिनों शास्त्र वचन—आप्त वाक्य ही प्रमाण माने जाते रहे हैं। श्रद्धा ही धर्म का आधार रही है। अब तर्क और तथ्य की माँग की जा रही है। इसकी पूर्ति न हो सकी तो धर्म को उपहासास्पद ठहराया गया। विज्ञाना और धर्म का समन्वय होने पर जो सर्वतोमुखी प्रगति का आधार बन सकता था वह न बन सका। अखण्ड−ज्योति ने इस दिशा में अभिनव प्रयत्न किया है। उसकी प्रतिणदति शैली को प्रजातन्त्र सिद्धान्त के जन्मदाता रूसो और साम्यवाद के सूत्रधार कार्लमार्क्स के साथ बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा तोला गया है। पिछले दिनों बुद्धिवाद ने ही आस्तिकता को उखाड़ कर नास्तिकता को प्रतिष्ठापित किया था। अब रूसी शस्त्र से उलटा प्रहार किया जा रहा है। अब नास्तिकता को आस्तिकता में बदले जाने की तैयारी हो रही है। बुद्धिवाद इस नये रूप में सामने आया है कि वह भौतिकतावादी दर्शन को निरस्त करके उसके स्थान पर अध्यात्मवादी तत्व चिन्तन की यथार्थता और उपयोगिता सिद्ध कर सके। सूक्ष्मदर्शी यह भली प्रकार समझ रहे हैं कि उत्कृष्टतावादी दर्शन को बुद्धिमानी प्रतिपादन का जो नया आधार मिला है उसके परिणाम दूरगामी होंगे। समय को पलटने की—युग परिवर्तन की बात अब दिवास्वप्न न समझी जायगी। धरती पर स्वर्ग के अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय की संभावना अगले दिनों निश्चित रूप से यथार्थता बनकर सामने आवेगी।

अखण्ड−ज्योति संस्थान ने अपने जिम्मे का कार्य ईमानदारी से पूरा किया है। समय की आवश्यकता पूरी करने में उसने तपस्वियों जैसी उत्कृष्ट श्रम साधना को युग देवता के चरणों पर अनन्य श्रद्धा के साथ समर्पित किया है। परिजनों ने अपना पक्ष समुचित सद्भावना के साथ निवाहा है, उन्होंने उसे अपनाने और फैलाने में कहीं कोई कोर−कसर नहीं छोड़ी है। उभयमयी तत्परता का ही यह फल है कि उस प्रयास को समस्त संसार में आशा भरी दृष्टि से देखा जा रहा है और समझा जा रहा है कि प्रस्तुत विश्व संकट के समाधान में— मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने में अखण्ड−ज्योति द्वारा ऐतिहासिक भूमिका निबाही जायगी।

पिछले लम्बे समय से चले आ रहे इन प्रयत्नों की सफलता पर दृष्टिपात करते हुए सहसा यह विश्वास नहीं होता कि अखण्ड−ज्योति के सामने प्रस्तुत वर्तमान संकट उसे अकाल में ही काल कवलित करने के लिए विवश कर देगा। पर वस्तुतः स्थिति है ऐसी ही। अक्टूबर की अखण्ड−ज्योति के इसी स्तम्भ में प्रस्तुत तथ्य यह बताते है कि असाधारण साहस किये बिना इस संकट का निवारण नहीं हो सकता। कागज के दाम तीन गुने और छपाई के दाम ढाई गुने हो जाने से लागत बढ़ जाने का सन्तुलन मूल्य बढ़ाये बिना और किसी प्रकार नहीं हो सकता। मूल्य बढ़ाने से ग्राहकों पर पड़ने वाला दबाव उन्हें यह सोचने को विवश क र सकता है कि शरीर निर्वाह के अतिरिक्त अन्य कामों में होने वाले खर्चों में जो कमी की जा रही है उसी कटौती में अखण्ड−ज्योति मंगाना बन्द करने की बात भी क्यों न सम्मिलित कर ली जाय। यदि ऐसा हुआ तो मूल्य बढ़ाने वाला कदम भी निरर्थक हो जायगा। कम उत्पादन पर लागत का अनुपात बढ़ता है इसे कौन नहीं जानता। ग्राहक घटे तो भी पत्रिका के सामने जीवन संकट जहाँ का तहाँ बना रहेगा। अस्तु जहाँ पाठकों को अपना बढ़ा हुआ चन्दा देने के लिए तैयार रहना है वहाँ नये सदस्य बढ़ाने वाले प्रयास को दूने उत्साह के साथ अपनाना है। कुछ ग्राहक तो निश्चित रूप से टूटेंगे ऐसी दशा में उस खाई को पाटने के लिए दूने उत्साह के साथ—दूनी सफलता का लक्ष्य लेकर चलने से ही काम बनेगा। खाई इसी उपाय से पटेगी।

यदि अखण्ड−ज्योति की उपयोगिता पाठको ने सचमुच ही समझ ली है तो उन्हें इन जीवन मरण की घड़ियों में इस समय आपत्ति कालीन सहयोग देना पड़ेगा। यह सहयोग क्या हो सकता है, इसकी चर्चा ऊपर की पंक्ति यों में की जा चुकी है। अपनी और अपने परिचितों की चालू सदस्यता को बढ़ हुए चन्दे की स्थिति में भी चालू बनाये रहने का सुदृढ़ निश्चय और साथ ही संख्या घटने न देने के लिए नये ग्राहक बढ़ाने के लिए चुनाव जीतने जैसे उन्मादी प्रयास के लिए अदम्य उत्साह। यह दोनों ही कर्त्तव्य प्रत्येक पाठक अपने कन्धे पर ले तो अखण्ड−ज्योति के जीवन काल में प्रथम बार आये इस जीवन मरण के संकट से जूझा जा सकता है और उस प्रकाश को बुझने से बचाया जा सकता है जिसने युग की आवश्यकता को पूरी करने की दिशा में इतनी लम्बी मञ्जिल पूरी कर ली है। ये संकट भी कम भयंकर नहीं है पर यदि परिजनों ने इस अवसर पर शिथिलता दिखाई उपेक्षा, बरती तो फिर यही कहा जायगा कि पत्रिका की मौत संकट ने नहीं की बन्द अपनों की अश्रद्धा ने ही उसका गला घोंट दिया।

हर वर्ष अखण्ड−ज्योति का जन्म दिन प्राय सभी परिजनों द्वारा पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मिशन के प्रति गहरी निष्ठा के प्रदर्शन का साल में एक बार विशिष्ट अवसर आता है बसन्त पर्व का। उस दिन पाठकों में से हर एक का यह प्रयत्न होता है कि इस पुण्य पर्व पर अपनी श्रद्धाञ्जलि चढ़ाने में हाथ न सिकोड़े और अपनी डडडड व्यञ्जना को साकार रूप से व्यक्त करने के लिए कुछ सक्रिय तत्परता प्रस्तुत करे। इस वर्ष उस प्रयास से पिछले सभी सालों की तुलना में अधिक तत्परता डडडड की समान अर्थ सिद्ध किया जाना चाहिए। समय की डडडड डडडड डडडड। कदम को बढ़ाये बिना और किसी प्रकार हो ही नहीं सकता।

बसन्त पञ्चमी इस वर्ष 16 फरवरी 75 रविवार की है। वह हम सब का सर्वोपरि प्रेरणा पर्व है। इसी दिन (1) अखण्ड−ज्योति पत्रिका निकलनी आरम्भ हुई थी (2) इस वर्ष युग−निर्माण योजना मिशन की स्थापना हुई (3) इसी दिन वेद शास्त्र, दर्शन पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद का शुभारम्भ हुआ (4) इसी दिन शान्ति कुञ्ज का निर्माण आरम्भ करने का है (6) अखण्ड−ज्योति संस्थापक का आध्यात्मिक जन्म एवं साधना श्री गणेश पर्व यही है। यों बसन्त पञ्चमी ज्ञान−विज्ञान की देवी सरस्वती का जन्म दिन है। ज्ञान−विज्ञान के समन्वय की—व्यक्ति और समाज को परिष्कृत करने की जो उपासना ही कह सकते हैं। बसन्त ऋतु इसी पुण्य वेला में अवतरित होकर प्रकृति गत सौंदर्य और मानवी चेतना गत उल्लास को प्रफुल्लित करती है। यों बसन्तोत्सव भारत भर में मनाया जाता है पर अपने लिए तो वह जीवन प्राण है। उस दिन अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्य भाव−विभोर मनः स्थिति में रहते हैं। पिछले वर्ष का कार्यक्रम निर्धारण करने में संलग्न रहते हैं। हर जगह प्रभात फेरी, हवन, दीपदान, संगीत, कीर्तन, कवि सम्मेलन विचार गोष्ठी प्रवचन, आयोजन आदि हैं। विविध कार्यक्रम रखते हैं। यह उस दिन की एक दिवसीय उत्सव प्रक्रिया हुई। मूल प्रक्रिया यह रहती है कि मिशन को सींचने और समुन्नत बनाने के लिए क्या किया जाय। उसके अनेकों प्रकार हैं पर सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिकता देने योग्य श्रद्धाञ्जलि प्रयास यह है कि उस दिन तक अधिकाधिक अखण्ड−ज्योति—ग्राहक बढ़ाकर अपना भाव भरा श्रम सहयोग उत्साहवर्धक स्तर का बनाकर प्रस्तुत किया जाय। इससे बढ़कर और दूसरी कोई अभिव्यञ्जना हो नहीं सकती।

पिछले वर्षों में भी यह श्रद्धाञ्जलि प्रत्येक प्रेमी परिजन ने किसी न किसी रूप में प्रस्तुत की है। इस वर्ष उसे आपत्ति कालीन आवश्यकता समझा जाय और अपने निजी कामों में डडडड करके भी समय की माँग समझ कर पूरा किया जाय। इसके लिए टोली बनाकर निकलने की व्यवस्था बन सके तो और भी अधिक सफलता मिलेगी। अखण्ड−ज्योति परिजनों को इकट्ठे होकर प्रचार टोली कार्यक्रम बनाना चाहिए और योजनानुसार बसन्त पञ्चमी तक विचारशील लोगों के पास ग्राहक बनाने का अनुरोध करने के लिए जाना चाहिए। चालू लोगों से चन्दा वसूल करना चाहिए और इस संग्रह को जल्दी−जल्दी मथुरा भिजवाते रहना चाहिए। लिस्ट बसन्त पञ्चमी को ही भेजी जाय इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। बसन्त तक का लक्ष्य निर्धारण और उसके लिए अनवरत प्रयास का संकल्प करना ही पर्याप्त है। उस दिन तक के कार्यों का लेखा−जोखा शान्ति−कुञ्ज हरिद्वार श्रद्धाँजलि विवरण के रूप में भेज देना चाहिए।

अखण्ड−ज्योति के प्रत्येक प्रेमी परिजन के लिए यह आवश्यक बना दिया गया है कि वह अपनी भौतिक और आत्मिक हलचलों का विवरण वर्ष में दो बार शान्ति−कुञ्ज भेज कर अपनी घनिष्ट पारिवारिकता का परिचय दिया करें। गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ सुदी पूर्णिमा) बसन्त पंचमी (माघ सुदी पञ्चमी) यह दो पर्व श्रद्धा पर्व कहलाते हैं। इनमें छै−छै महीने का अन्तर भी है। इन दोनों अवसरों पर यों अधिकाँश परिजन अपना स्थिति विवरण भेजते हैं और उत्तर पाने के लिए जबानी लिफाफा साथ ही रख देते हैं। अब उसे एक अनिवार्य क्रम बना दिया गया है और आशा की है कि वर्ष में दो बार प्रत्येक अखण्ड−ज्योति का पत्र हरिद्वार पहुँचा करेगा। उससे पारस्परिक आदान−प्रदान के सम्बन्ध सूत्रों में स्वभावतः अधिक प्रखरता उत्पन्न होने में सहायता मिलती है। इस बार बसन्त पर्व पर जो विवरण पत्र भेजा जाय उसमें यह शानदार उल्लेख रहना ही चाहिए कि इस बार श्रद्धांजलि के रूप में कितने अखण्ड−ज्योति सदस्य बढ़ाने में सफलता प्राप्त की गई।

*समाप्त*

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