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Magazine - Year 1976 - Version 2

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साधना सिद्धि का मूल आधार श्रद्धा

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अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति ही सर्वोपरि है। जिस प्रकार शक्ति के आधार पर भौतिक हलचलें गतिशील होती हैं और उनके सहारे अभीष्ट उपलब्धियां हस्तगत होती हैं। उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा ही मूल है। उसी की सघनता चमत्कार दिखाती है। श्रद्धा विहीन उपचार सर्वथा निष्प्राण रहते हैं और उनमें किया गया श्रम प्रायः निरर्थक चला जाता है। सामान्य लोक व्यवहार में भी दृढ़ता, श्रद्धा विश्वास के आधार पर ही आती है। आत्म-विश्वास के बल पर ही कोई बड़े कदम उठा सकना सम्भव होता है। शौर्य और साहस आत्म विश्वास के ही नाम हैं। आशा और उत्साह के मूल में आत्म-विश्वास ही काम आता है। परिवार में एक दूसरे को स्वजन, घनिष्ठ एवं आत्मीय होने की मान्यता ही उन्हें पारस्परिक स्नेह सहयोग के सुदृढ़ सूत्र में बाँधे रहती है। वह मात्र श्रद्धा ही है जिसके आधार पर परिवारों में स्नेह दुलार का अमृत बरसता है। और एक दूसरे के लिए बढ़े-बढ़े त्याग करने को तत्पर रहता है। श्रद्धा की कड़ी टूट जाये तो फिर परिवारों का विगठन सुनिश्चित है वे तनिक सी बातों पर अन्तः कलह के अखाड़े बनेंगे और देखते-देखते बिखर कर अस्त-व्यस्त हो जायेंगे।

कृषि, उद्योग, शिल्प, खेल आदि सब में अपने कार्य हम से सही होने का विश्वास रख कर ही चला जाता है। व्यवसायी एक दूसरे पर विश्वास करके लेन -देन करते है। बैंक बड़े-बड़े जोखिम उठाते हैं। उधार का आधार ही विश्वास है। कर्मचारियों के हाथ में व्यवसाय की लगाम रहती है। मोटर ड्राइवर की मुट्ठी में अपनी जान रहती है, रसोइया भी विष देकर आसानी से सारे घर को मृत्यु की गोद में सुला सकता है। पत्नी सारी सम्पत्ति लेकर गायब हो सकती है। यह आशंकाएं रहते हुए भी मनुष्य को विश्वास का ही सहारा लेना पड़ता है। अविश्वासी के लिए कोई कारोबार करना तो दूर आशंका व्यस्त जीवन की भयंकरता का बोझ सँभालना ही कठिन हो जायेगा और वह चैन से जीवित तक नहीं रह सकेगा। ऐसी स्थिति में कोई किसी पर अपने गुप्त भेद तक प्रकट न कर सकेगा और दुरावपूर्ण मनः स्थिति की घुटन में घुटता हुआ उद्विग्न विक्षिप्त स्तर की जिन्दगी जियेगा।

श्रद्धा और विश्वास के बिना भौतिक जीवन में भी गति नहीं, फिर आध्यात्म क्षेत्र का तो उसे प्राण ही कहा गया है। आदर्शवादिता में प्रत्यक्षतः हानि ही रहती है, पर उच्च स्तरीय माध्यताओं में श्रद्धा रखने के कारण ही मनुष्य त्याग-बलिदान का कष्ट सहन करने के लिए खुशी-खुशी तैयार होता है। ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व तक प्रयोगशालाओं की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता। वह निश्चित रूप से श्रद्धा पर ही अवलम्बित है। मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का-आदतों का गहरा पुट रहता है। वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार की आदतें और मान्यतायें अत्यन्त गहराई तक घुसी रहती हैं। और वे उन्हें छोड़ने को सहज ही तैयार नहीं होते। यह संस्कार और कुछ नहीं चिरकाल तक सोचे गये माने गये और व्यवहार में लाये गये अभ्यासों का ही परिपाक है। तथ्यों की कसौटी पर इन संस्कारों में से अधिकाँश बेतुके और अन्ध विश्वास स्तर के होते हैं, पर मनुष्य उन्हें इतनी मजबूती से पकड़े होते हैं कि उसके लिए वे ही ‘सत्य’ बन जाते है। और सत्य और तथ्य कह कर वह उन पूर्वाग्रहों के प्रति अपनी कटुता का परिचय देता है। उनके लिए लड़ने-मरने तक को तैयार हो जाता है। यह मान्यता परक कटुता और कुछ नहीं मात्र श्रद्धा द्वारा रची गई खिलवाड़ मात्र है।

स्वभाव में सम्मिलित हुई गतिविधियाँ आदतें बन जाती हैं और वे जब नशेबाजी स्तर की बन कर अचेतन की गहराई में घुस जाती है। तो तर्क के आधार पर हानि-कारक सिद्ध कर देने पर भी वे छुड़ाये नहीं छूटतीं। छोड़ना चाहने वाला भी उन्हें छोड़ नहीं पाता। इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह है कि श्रद्धा की शक्ति तर्क से भी असंख्य गुनी अधिक है। यों सारा लोक व्यवहार तर्क के आधार पर चलता है और बुद्धि बल के सहारे ही विभिन्न प्रयोजन पूरे होते हैं; पर जहाँ सिद्धान्तों का और स्वार्थों का प्रश्न आता है वहाँ पूर्व मान्यताएँ ही मस्तिष्क तन्त्र को पूरी तरह जकड़ कर बैठ जाती हैं और तर्क के सारे तीर एक ही तरकर में से निकल कर एक ही दिशा में उड़ते दिखाई पड़ते हैं। पक्षपाती समर्थन में बुद्धि कौशल कैसे-कैसे विचित्र तर्कों का प्रहार करता है इसे देख कर कई बार तो निष्पक्ष विचारक को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

यहाँ श्रद्धा की शक्ति का संक्षिप्त सा आभास दिया है कि उसे मानव जीवन की सर्वोपरि सामर्थ्य के रूप में समझ सकने में सुविधा हो। देव लोक यही है। देवता इसी क्षेत्र में जन्मते, बढ़ते, परिपुष्ट होते और वरदान दे सकने के लिए सक्षम बनते हैं। उनका उदय एवं अस्त भी इसी श्रद्धा के अनन्त अन्तरिक्ष में होता रहता है। मन्त्र, देवता, गुरु, उपासना, साधन सिद्धि आदि का सारा आधार श्रद्धा की आधार शिला पर खड़ा है। सच तो यह है कि साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जकड़ कर श्रद्धा विश्वास रूपी महादैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है-श्रद्धा से अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन और उन्हें सफलता के उच्चस्तर तक पहुँचा सकना सम्भव होता है। आत्मा का सब से विश्वस्त और सबसे घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते हैं।

आत्मिक प्रगति का सर्वोपरि आधार ‘श्रद्धा’ को समझा जा सकता है। साधकों की सफलता-असफलता इसी पर निर्भर रहती है। अस्तु गुरुदीक्षा-शक्तिपात से लेकर अनेकों चित्र-विचित्र कष्टसाध्य तप साधना इसी प्रयोजन के लिए करायी जाती हैं आकर्षक महात्म्य इसीलिए सुनाये बताये जाते हैं कि साधक की श्रद्धा अधिकाधिक परिपुष्ट हो सके और अभीष्ट सत्परिणाम प्राप्त कर सकने का अधिकारी बन सके।

श्रद्धा की स्थापना और परिपुष्ट का चिरस्थायी और सर्वमान्य आधार यह है कि जिस तथ्य पर विश्वास जमाया जाना आवश्यक है, उसको यथार्थता और वैज्ञानिकता को सघन तथ्यों और तर्कों के आधार पर समझ सकने का अवसर दिया जाय। बुद्धि का सर्वतोमुखी समाधान हो सके तो श्रद्धा की स्थिरता सुनिश्चित मानी जा सकती है और उस अभीष्ट परिणामों की अधिकाधिक अपेक्षा रखी जा सकती है। जिस-तिस से सुन कर जल्दी-जल्दी कुछ सुन समझ कर यदि कोई श्रद्धा बनेगी तो उसकी जड़े उथली रहने के कारण तनिक से आघात में उखड़ जाने की आशंका बनी रहेगी। प्रायः होता भी ऐसा ही रहता है। अमुक व्यक्ति के कहने से भावावेश उमड़ा और तत्काल वह साधना आरम्भ कर दी। कुछ ही समय बाद किसी दूसरे ने उस विधान के दोष बता दिये और किसी नये प्रयोग के माहात्म्य सुना दिये बस इतने भर से मन शंका-शंकित हो गया और पिछला प्रयोग छोड़ कर नया मार्ग अपना लिया गया। इस परिवर्तन के बीच यह नई आशंका बनी रहती है कि पिछली साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पड़े और उसमें भी कोई दोष वैसा ही न घुसा हो जैसा कि पहली वाली में निकल पड़ा था। कभी कोई चर्चा इस नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य के पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है संदिग्ध, शंका-शंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती फिर अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित है। यदि मूल तथ्य का अभाव रहा तो फिर ज्यों-त्यों करके कर्म-काण्डों की लकीर पीटते रहने से बात बनेगी नहीं। तब असफलताओं का कारण विधि-विधानों की होरा-फेरी में ढूंढ़ा जाने लगेगा और यह खोज की जाने लगेगी कि किसी क्रिया-कृत्य में कोई अन्तर तो नहीं रह गया जिससे असफलता मिली या उलटा परिणाम निकला।

वस्तुतः विधि-विधानों का महत्व साधना विज्ञान में एक चौथाई और श्रद्धा विश्वास का तीन चौथाई है। सघन श्रद्धा के रहते अटपटे विधि-विधान भी चमत्कारी परिणाम उपस्थित कर सकते हैं जब अविश्वासी संदिग्ध मनःस्थिति में पंडिताऊ ढंग से किये गये परिपूर्ण कर्म-काण्ड भी निष्प्राण होकर रह जाते हैं और उनका परिणाम निराशाजनक ही रहता है। अस्तु साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक में श्रद्धा तत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझा जाना चाहिए।

इसके दो उपाय हैं एक तो यह कि शास्त्र वचन, गुरु वचन, परम्परा, अनुशासन को सब कुछ मानकर चला जाय और उसे ही वेद वाक्य पत्थर की लकीर मानकर पूर्ण सत्य होने का विश्वास कर लिया जाय और दूसरा यह कि उस तथ्य का गहरा अध्ययन किया जाय और वास्तविकता समझ कर किसी सुनिश्चित निष्कर्ष पर पहुँचा जाय। इन दो ही परिस्थितियों में यह सम्भव हो सकता है कि श्रद्धा की परिपक्वता उस स्तर तक जा पहुंचे जिसमें किये गये प्रयोग सफल होकर ही रहते हैं।

साधना क्षेत्र में प्रवेश करके आत्मिक प्रगति और उसके आधार पर मिलने वाली उपलब्धियों को श्रद्धा तत्व की गरिमा समझनी चाहिए और आप्त वचनों के सहारे तर्क तथ्यों का आश्रय लेकर अपने-आदर्शों और साधनों पर विश्वास भरी निष्ठा परिपक्व करनी चाहिए। साधना की सिद्धि श्रद्धा की प्रगाढ़ स्थिति में ही सम्भव हो सकती है यह मान कर चलने वालों को आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में असफल नहीं रहना पड़ता।

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