स्वस्तिक सार्वभौम संस्कृति का प्रतीक चिन्ह
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ऋग्वेद की एक ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सूर्य को समस्त देव शक्तियों का केन्द्र और भूतल तथा अन्तरिक्ष में जीवन दाता माना गया है। स्वस्तिक को सूर्य की प्रतिमा मान कर इन्हीं विशेषताओं के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जागृत करने का उपक्रम किया जाता है।
पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं चारों के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है। विष्णु की चार भुजाओं की संगति भी कहीं-कहीं सुदर्शन चक्र के साथ बिठाई गई है।
गणेश की प्रतिमा की स्वस्तिक चिन्ह के साथ संगति बैठ जाती है। गणपति की सूँड़, हाथ, पैर, सिर आदि को इस तरह चित्रित किया जा सकता है जिसमें स्वस्तिक की चार भुजाओं का ठीक तरह समन्वय हो जाय। ‘ॐ’ को स्वस्तिक रूप में लिखा जा सकता है। लिपि विज्ञान के आरम्भिक काल में गोलाई के अक्षर नहीं रेखा आधार पर उनकी रचना हुई थी। ॐ को लिपिबद्ध करने के आरम्भिक प्रयास में उसका स्वरूप स्वस्तिक जैसा बना था। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता ‘ॐ’ की है। उसको उच्चारण से जब लिपि लेखन में उतारा गया तो सहज ही उसकी आकृति स्वस्तिक जैसी बन गई।
आर्य, धर्म और उसकी शाखा-प्रशाखाओं में स्वस्तिक का समान रूप से सम्मान है। बौद्ध, जैन, सिख धर्मों में उसकी समान मान्यता है। योरोप और अमेरिका की प्राचीन सभ्यता में स्वस्तिक का प्रयोग होते रहने के प्रमाण मिलते हैं। आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के मावरी आदि वासी स्वस्तिक को अभी भी मंगल प्रतीक की तरह प्रयुक्त करते हैं। साइप्रस की खुदाई में जो मूर्तियाँ मिली हैं उन पर स्वस्तिक अंकित है। ऐसे ही प्रमाण मिश्र, यूनान आदि की खुदाई में उपलब्ध हुए हैं। जापानी लोग स्वस्तिक को ‘मन जी’ कहते हैं और धर्म प्रतीकों में उसका समावेश करते हैं।
यास्क ने ‘स्वस्तिक’ को अविनाशी ब्रह्म की संज्ञा दी है। अमर कोश में उसे पुण्य, मंगल, क्षेम एवं आशीर्वाद के अर्थ में लिया है। निरुक्ति है- “स्वस्ति क्षेमं कायति कथयति इति स्वस्तिकः। स्वस्तिक अर्थात्-कुशल एवं कल्याण, संस्कृत में ‘सु-अस्’ धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर श्रेयस्कर अस् अर्थात् उपस्थिति अस्तित्व।
स्वस्ति वाचन के प्रथम मन्त्र में लगता है- स्वस्ति का ही निरूपण हुआ है। उसकी चार भुजाओं को ईश्वर की चार दिव्य सत्ताओं का प्रतीक माना गया है। ‘‘स्वस्तिक न इन्द्रो वृद्ध श्रवाः” में कीर्तिवान इन्द्र को- ‘‘स्वस्ति न: पूषा विश्व वेदाः सर्वज्ञ पूषा को -ࡡ‘‘स्वस्तिनस्तार्क्ष्यों अरिष्ट नेमिः” में अरिष्ट निवारक तार्क्ष्य को और “स्वस्ति नो बृहस्पति र्दधातु” में सर्वतोमुखी समृद्धि दाता बृहस्पति को कल्याण में योगदान देने के लिए आमन्त्रित किया गया है।
सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है।
अन्य ग्रन्थों में चार युग-चार वर्ण-चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन रखने वाले संकेतों को स्वास्तिक में ओत-प्रात बताया गया है।
हम स्वास्तिक का महत्व समझें और उसे समुचित श्रद्धा मान्यता प्रदान करते हुए अभीष्ट प्रेरणा ग्रहण करें- यही उचित है।
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