शाकाहारी भोजन ही पूर्ण है।
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किसी भयंकर रोग से ग्रसित होकर अधिकाँश रोगी जब किसी चिकित्सक के पास उपचार हेतु जाते हैं तो वे स्वास्थ्य लाभ तथा शक्ति संवर्द्धन हेतु माँस तथा अण्डा खाने के लिए परामर्श देते हैं। सामान्य बुद्धिजीवी वर्ग के मस्तिष्क में भी यह भ्राँति धारणा घर कर गई है कि स्वास्थ्य की रक्षा तथा शक्ति प्राप्त करने के लिए माँसाहार आवश्यक है, पर वास्तविकता इसके परे है।
शरीर विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर को शक्ति और स्फूर्ति उस खाद्य पदार्थ से प्राप्त होती है जिसे पाचन संस्थान ठीक से पचा लेता है। माँस का 75 प्रतिशत भाग हानिकारक तथा गंदा पानी होता है। यह शरीर को दूषित करता है। माँस गरिष्ठ पदार्थ है जो देर में ही नहीं पचता अपितु इसका कुछ भाग बिना पचा भी रह जाता है जो आंतों में चिपक कर सड़ने लगता है। शाकाहार की अपेक्षा माँसाहार को पचाने के लिए जिगर को कई गुना अधिक श्रम करना पड़ता है जिससे जिगर की कार्य क्षमता कुप्रभावित होती है। माँस में पाये जाने वाले फास्फोरस का विघटन करने के लिये जितने कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है उतना शरीर में नहीं होता अतः अलग से कैल्शियम के लिये विटामिन डी0 की आवश्यकता होती है।
माँस, शराब और चाय की तरह एक उत्तेजक पदार्थ है जिसके खाने के बाद एक प्रकार की स्फूर्ति अनुभव होती है, पर यह स्फूर्ति माँसाहार की नहीं वरन् पूर्व में किये गये सुपाच्य भोजन की होती है माँसाहार शरीर में आवश्यकता से अधिक ताप उत्पन्न करता है जिससे मनुष्य सुस्त तथा आलसी बन जाता है। उसकी बुद्धि की प्रखरता भी समाप्त हो जाती है अधिकतर व्यक्तियों को माँस खाने के बाद चाय, काफी या मदिरा जैसे किसी उत्तेजक पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है।
प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक जानकीशरण वर्मा ने माँसाहार की हानियों पर प्रकाश डालते हुए कहा है-‘‘माँस हानिकारक इसलिए है कि जानवर के शरीर के बहुत से टूटे-फूटे रेशे, खून के विकार और जहरीले पदार्थ उसमें रह जाते हैं। जिस समय जानवर मारे जाते हैं उस समय मरने के डर से भी उनके खून में जहर पैदा हो जाता है। इन सब बातों के फलस्वरूप आगे चलकर माँस खाने वालों के शरीर में बहुत तरह के विकार एकत्र हो जाते हैं। माँस का सूप जिसे डॉक्टर लोग बहुत अच्छा बताते हैं अनेक प्रकार के विषों से भरा होता है। उससे रोगी को पहले शक्ति सी मिलती सी प्रतीत होती है किन्तु पीछे विषों के संचय के कारण अनेक भयंकर रोग पल्ले पड़ जाते हैं। यूरोप और अमेरिका में भी माँसाहार का प्रचलन कम होता जा रहा है। वहाँ तो सफेद डबल रोटी और बिस्किट का रिवाज भी कम हो रहा है, पर विलायत की दुम हिन्दुस्तान में वहाँ की छोड़ी हुई चीजें भी बहुत दिनों तक जारी रहती हैं।’’
जर्मनी की होम्योपैथिक चिकित्सक एलिजाबेथ वेगेन माँस को विलासिता की वस्तु तथा जीवन के लिए अनुपयोगी मानती हैं। उन्होंने अपने रोगियों पर यह अनुभव करके देखा है कि जिन व्यक्तियों का जीवन सात्विक, पवित्र तथा स्वास्थ्यवर्द्धक है और जो माँसाहार से बचे हुए हैं उन पर होम्योपैथिक औषधियाँ शीघ्र और स्थायी प्रभाव डालती हैं। ऐसे व्यक्तियों पर संक्रामक रोग के कीटाणु भी शीघ्र आक्रमण नहीं कर पाते। माँसाहारी रोगी को शक्तिशाली औषधियाँ सेवन हेतु देनी पड़ती हैं फिर भी रोग घटने से स्थान पर बढ़ने लगता है। इसीलिए पश्चिमी देशों के अस्पताल स्थायी रोगों से पीड़ित रोगियों से भरे पड़े हैं।
भारत आगमन पर जब यहाँ की पाठ्य पुस्तकों में श्रीमती वेगेन ने माँस और मछली की उपयोगिता पढ़ी तो वे दंग रह गईं, उस समय उनके मुँह से यही निकला कि माँस के बिना भी जीवन को स्वस्थ, मितव्ययी और श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। जिन देशों में कसाई घरों की संख्या अधिक है वहाँ युद्ध और अपराधों की संख्या में वृद्धि हो रही है। शाकाहार जीवन को स्वस्थ ही नहीं बनाता वरन् जीवधारियों की निर्मम हत्या के विरुद्ध स्वस्थ वातावरण निर्मित करता है।
योगशास्त्र और आयुर्वेद के सिद्धान्तों के आधार पर यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि शुद्ध, सात्विक, अन्न, फल, दूध और साग-सब्जी आदि से बना भोजन करने वाले तथा माँस, अधिक मसाले, उत्तेजक पदार्थ तथा चर्बीयुक्त भोजन करने वाले व्यक्तियों की शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमताओं में अन्तर पाया जाता है। इसीलिये भोजन का सीधा सम्बन्ध शरीर से ही नहीं वरन् मन और मस्तिष्क से भी होता है। ‘जैसा खाये अन्न वैसा बने मन’ वाली कहावत गलत नहीं है। डॉ0 हेग ने ‘खाद्य पदार्थ और भोजन’ नामक रचना में लिखा है-‘माँस भक्षण करने वाला व्यक्ति सर्वतोभावेन अपने शरीर का विनाश करता है। बुद्धि के तमोगुणी हो जाने से विवेकाविवेक का ध्यान नहीं रहता; इसी से समाज के सत्व पदार्थ भक्षी व्यक्तियों के विचारों से इनका मेल नहीं हो पाता।’
विदेशों में अनेक चिकित्सक अपनी चिकित्सा पद्धति में शाकाहारी भोजन को स्थान देकर रोगियों का उपचार करने लगे हैं। वह रोगी को संतुलित शाकाहारी भोजन देकर उसके रोग को समूल नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे चिकित्सकों में पश्चिम जर्मनी की महिला चिकित्सक गटुई स्मदिक का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने 22 रोगी बच्चों पर अपने प्रयोग किये। उन्हें विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ थी वे सब शाकाहारी भोजन के सहारे स्वस्थ हो गये। एक बच्चा जो दमे का रोगी था चार दिन में ही इतना स्वस्थ हो गया कि उसे दौरे पड़ने बन्द हो गये। इस बीच किसी को सर्दी नहीं हुई। त्वचा भी सुन्दर और चिकनी हो गई।
अर्द्ध विकसित बच्चों के भोजन में जब हेर-फेर किया गया तो उनकी अस्थियों, दाँतों, बालों और माँस-पेशियों का विकास संतुलित ढंग से होने लगा। टी0 बी0 और मानसिक रोगियों तक ने शाकाहारी भोजन से लाभ उठाया। वृद्ध व्यक्तियों पर शाकाहारी भोजन के प्रयोग से जो परिणाम देखने को मिले वे आश्चर्यजनक थे। थोड़े ही दिनों में उनकी शारीरिक दुर्बलता दूर हो गई और उनकी नेत्र ज्योति में भी वृद्धि हुई। थोड़े ही समय में वे इतने स्वस्थ हो गये कि अपना दैनिक कार्य बिना किसी कष्ट के आसानी से कर सकते थे।
डॉ0 स्मदिक ने शाकाहारी भोजन में सभी प्रकार के पोषक तत्वों का पूरा-पूरा ध्यान रखा था। भोजन में दुग्ध, अन्न, ताजे फल, हरी सब्जी, सलाद आदि शाकाहारी वस्तुओं को सम्मिलित किया था। उन्होंने नाश्ते में सफेद शक्कर तथा मिठाइयों को कोई स्थान नहीं दिया था।
यदि हम आर्थिक दृष्टि से भी देखें तो पता चलेगा कि माँसाहार अधिक खर्चीला भोजन है। मिर्च, मसालों, तेल और घी का भी काफी खर्च इसके साथ जुड़ा हुआ है। लोगों का कहना है कि घर में जिस दिन माँस बनता है उस दिन सामान्य दिनों के अपेक्षा रोटियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। फिर हम माँसाहार द्वारा खाद्यान्न की समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं ? अमेरिका की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार यह कहा जा सकता है कि माँस भक्षण करने वाले प्रति व्यक्ति पर जितना खर्च आता है उससे शाकाहार करने वाले कम से कम तीन व्यक्तियों का भोजन हो सकता है।
इस तरह यह कहा जा सकता है कि स्वस्थ, सुखी तथा निरोग जीवन व्यतीत करने के इच्छुक लोगों को पूर्ण शाकाहारी होना चाहिए। अलबर्ट स्वाइत्जर ने एक बार कहा था-‘जब तक मनुष्य दूसरे जीवों पर जीवित रहेंगे तब तक इस धरती पर शान्ति नहीं रहेगी।’
माँस की उत्पत्ति किसी, वनस्पति, वृक्ष या पत्थर के खान आदि से नहीं होती। इसका सीधा सम्बन्ध जीव की हत्या से है इसलिए महाभारतकार ने माँसाहारी को महापातकी बताया है-
‘न हि माँसं तृणात् काष्ठात् उपलाद्वापि जायते।
हत्व जन्तुं ततोमाँसं तस्माद्वोषस्तु भक्षणे॥’

