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Magazine - Year 1976 - Version 2

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सभ्यता की उपेक्षा करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना

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मनुष्य मशीन नहीं है जिसे ईंधन, चिकनाई और सफाई की आवश्यकता पूरी करके सन्तुष्ट किया जा सके। रोटी, कपड़ा और मकान होने से ही उसका काम नहीं चल सकता। आहार, निद्रा का प्रबन्ध कर देने से जिन्दा तो रहा जा सकता है, पर जीवन को पल्लवित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए कुछ और भी चाहिए। निर्वाह साधनों में उसे निश्चिन्तता का आश्वासन और आक्रान्ताओं से बचे रहने का संरक्षण चाहिए। उसे यश, सम्मान एवं वर्चस्व के प्रकटीकरण का अवसर चाहिए। सामाजिक शान्ति और सद्व्यवहार की उसे अपेक्षा है। कला ओर सौन्दर्य के स्पर्श से जो गुदगुदी उत्पन्न होती है-प्रेम सम्वेदनाओं से जो उल्लास उभरता है वह भी उसकी आन्तरिक आवश्यकताओं का एक अंग है। उत्पादन के लिए श्रम- न केवल शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता पूरी करता है- बल्कि क्षुधा निवारण के साधन जुटाता है और बुद्धि की प्रखरता के अनेकों आधार खड़े करता है। ममत्व का विस्तार व्यक्तियों तथा वस्तुओं में करने से उसे आत्मविस्तार की अनुभूति होती है। इस प्रकार के अवसर न मिलें और किसी प्रकार गुजारा हो सके तो उसे बन्दी जीवन के अतिरिक्त और कुछ न कहा जा सकेगा। जीने को तो लोग एकान्त कारावासों में भी लम्बी उमर गुजार देते हैं। पर नीरस और निरानन्द, मूर्छित और एकाकी परिस्थितियों में रहने वाली चेतना ऊब, खीज और बेचैनी ही अनुभव करती रहेगी। भूखा पेट सारे शरीर को बेचैन करता है और भूखा अंतस् ऐसे विद्रोह पर उतारू हो जाता है जिसे आत्म-हत्या के समतुल्य स्थिति का आँका जा सके।

प्रगति की लम्बी मंजिल पार करते हुए मनुष्य ने जो बहुमूल्य उपलब्धि अर्जित की है उसे एक शब्द में ‘सभ्यता’ कहना उचित होगा। उसे प्राप्त करने में उसने समुचित मूल्य चुकाया है। प्राणधारी को सामान्य प्रवृत्तियाँ-इन्सटिन्क्ट्स-उसके साथ ही जन्म जात रूप में मिली थीं। उनके यथावत बनी रहने पर वह पशु वर्ग से ऊँचा नहीं उठ सकता। वे उसे सामाजिक सहयोग और चिन्तन के परिष्कार का अवसर ही नहीं मिलने दे सकती थीं। सभ्यता ही है जिसने उसे आदर्श अपनाने और मर्यादा पालन के लिए प्रोत्साहित किया। यही था वह सभ्यता का अवलम्बन जिसके सहारे आदिकाल में नर-वानर को आज के समुन्नत मानव के स्तर तक पहुँचने का श्रेय प्राप्त हुआ है।

भीतर के क्रोध उठने पर भी उसे पी जाना, यौन स्वेच्छाचार को दाम्पत्य मर्यादा में सीमाबद्ध करना, लाभदायक अवसर आने पर भी उन्हें नीति-अनीति का विश्लेषण करने के उपरान्त ही स्वीकार करना, अधिकारों का कर्तव्यों के पक्ष में त्याग करना, स्वयं भूखे रहकर दूसरों को खिला देना-जैसे अनेकों विशिष्ट आचरण सभ्यता की देन हैं। नर-वानर के लिए इतनी शालीनता प्रस्तुत कर सकना सम्भव न था। वह आत्म-निरीक्षण और आत्मनिर्माण की स्थिति में था ही नहीं। आदिम काल में नैसर्गिक प्रवृत्तियाँ ही उस पर छाई रहती थीं। सभ्यता ने उसे इतना विवेक और साहस दिया है कि उन जन्म-जात प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा ही कर सके वरन् उन्हें बदलने, सुधारने और परिष्कृत करने का साहस दिखा सके।

यह तो प्रवृत्ति परक नियन्त्रण और परिष्कार की बात हुई। सभ्यता के चिन्तन को सीमाबद्ध, क्रमबद्ध एवं दिशाबद्ध भी किया है। कल्पना शक्ति, संकल्प शक्ति, तुलनात्मक समीक्षा दृष्टि, दूरगामी परिणामों की अनुभूति, समाज-निष्ठा, चरित्र-निष्ठा जैसी विशेषताओं को अति मानस का विकास कह सकते हैं। विकास का यही वह केन्द्र बिन्दु है जहाँ से पशु और मनुष्य के बीच मौलिक अन्तर आरम्भ होता है। व्यक्तित्व की अनुभूति को ही आत्मा कहते हैं। निकृष्ट स्तर के जीव क्रिया तो बहुत करते हैं, पर अपने आपे के सम्बन्ध में निजी तौर से कुछ सोच नहीं पाते। प्रकृति प्रेरणा ही उनकी निजी इच्छा होती है। इसमें उनका अपना कोई हाथ नहीं होता। मनुष्य की स्थिति इससे भिन्न है वह शरीर के अतिरिक्त एक पृथक चेतना के रूप में न केवल आत्मानुभूति करता है, वरन् उसके विकसित करने में भी यत्नपूर्वक प्रयास करता है। दर्शनशास्त्र और आत्म-विद्या का विशालकाय कलेवर आत्म विश्लेषण एवं आत्मोत्कर्ष की दिशा-धारा निर्धारित करने के लिए ही विनिर्मित हुआ है। आग जलाने-पहिये का उपयोग जानने- नोकदार उपकरणों का प्रयोग समझने से मानवी प्रगति में असाधारण योगदान मिला समझा जाता है, पर वास्तविकता यह है कि वह श्रेय सभ्यता की कल्पना और उसका स्वरूप निर्धारित करने की सफलता को ही दिया जा सकता है। बोलना, लिखना और हँसना जैसे दिव्य अनुदान उसने सभ्यता की साधना करके ही प्राप्त किये हैं। कृषि, पशु पालन, वस्त्र, वाहन, वस्तु विनिमय, परिवार, शासन, शिक्षा, चिकित्सा, स्वच्छता जैसी उपलब्धियाँ शारीरिक अथवा पदार्थपरक नहीं-विशुद्ध रूप से सुविकसित चिन्तन की ही प्रतिक्रिया है। इन्हें सभ्यता की प्रगति के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता।

शरीर निर्वाह एवं मनःतोष ही अब जीवनयापन के आधार नहीं रह गये हैं। व्यक्तित्व इन सबसे बड़ी इकाई बन चला है। अब ‘अहं’ का भी एक तथ्य है और उसकी तुष्टि के लिए इतना करना पड़ता है जितना शरीर और मन दोनों को सन्तोष देने के लिए किया जाता है। आत्मपरितोष के लिए विकृत रीति-नीति अपनाई गई या परिष्कृत आधार अपनाया गया यह आगे का प्रश्न है। बात वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ शरीर और मन को भी पीछे धकेल कर-दोनों पर कष्टसाध्य अंकुश रखकर आत्म गौरव के लिए कुछ किया जाता है। यह आत्म सत्ता का परिचय है। इसी को आत्मा कहा गया है। शरीर शास्त्र, मनः शास्त्र का अपना विस्तार और अपना उपयोग है। आत्मःशास्त्र अपना वर्चस्व इन दोनों से ऊपर सिद्ध कर रहा है। कर्म और ज्ञान की क्षमता सर्वविदित है पर इच्छाएँ, भावनाएँ अपनी सामर्थ्य उन दोनों से ऊपर सिद्ध कर रही हैं। यह नैसर्गिक प्रवृत्तियों की प्रेरणा की ओर नहीं भाव सम्वेदनाओं की ओर इंगित किया जा रहा है। आत्मा का स्वरूप और कार्य क्षेत्र कितना अधिक बढ़ गया है इसे हम स्पष्ट देखते हैं अहं को विकृत अथवा परिष्कृत आधार पर पूरा करने के लिए जन साधारण को कितना कठिन प्रयास करना पड़ता है, इसे कौन नहीं जानता ? आत्म चेतना का स्वरूप निर्धारण करना और उसकी पूर्ति के नये आधार खड़े करना वस्तुतः प्रकृत प्रवृत्तियों के समानान्तर एक नया विज्ञान खड़ा कर देने के समान है। अविकसित जीवधारी इन उपलब्धियों से सर्वथा अपरिचित ही होते हैं। मानवी उपलब्धियों में भौतिक साधनों की लम्बी शृंखला सामने है, पर सभ्यता के विकास ने उसे जो ‘आत्मा’ दी है और उसका सुविस्तृत ढाँचा वरदान रूप में दिया उसने वस्तुतः मनुष्य को कृतकृत्य कर दिया है। किसी दिव्य लोक का निवासी बना दिया है। दुनिया यही है जिसमें कृमि-कीटक निवास निर्वाह करते हैं। पर मनुष्य कला, सम्वेदना, व्यवस्था, सम्पदा और वर्चस्व से भरे पूरे जिस लोक में रहता है वह अनोखा है। अविकसित जीवधारी भी यों इसी धरती पर रहते हैं पर उनके और मनुष्य के ‘लोक’ को भिन्न माना जाय तो इसमें अत्युक्ति जैसी कोई बात नहीं है।

शरीर और मन के सुविधा साधनों के उपार्जन, संग्रह एवं उपभोग में जो उत्साह रहता है उसी ने अपने युग में व्यस्तता के चक्र घुमाने में अतिशय तीव्रता उत्पन्न की है। पर यदि गम्भीरता से देखा जाय तो नैतिक एवं अनैतिक दुस्साहसों के पीछे ‘अहं’ की सामर्थ्य जितनी बढ़ी-चढ़ी है उतनी ही भयंकर उसकी विकृति भी है। इस तथ्य को तत्वदर्शियों ने भुलाया नहीं है और उन्होंने सोते साँप को जगाने के साथ-साथ उसके विषैले दाँतों को कीलित करने के लिए कीलन मन्त्र के भी आविष्कार में उपेक्षा नहीं बरती है।

चेतना की प्रौढ़ता-आत्मानुभूति के रूप में देखी जाती है उसका परितोष आत्म गौरव में होता है। विकृत चिन्तन उसका परितोष ध्वंस में देखता है। वह अपेक्षाकृत सरल है। एक बालक भी माचिस की तीली लेकर आग लगा सकता है और पूरे घर, गाँव को भस्म कर सकता है। आतंकवादी आये दिन ऐसे ही उत्पात करते रहते हैं। और ध्वंस के द्वारा अपनी विशिष्टता सिद्ध करते रहते हैं। आततायी अपराध प्रायः अभाव पूर्ति के लिए नहीं अपने वर्चस्व और कौशल द्वारा दूसरों को आतंकित कर देने के लिए होते हैं। किसी इमारत को गिरा देना स्वल्प श्रम से ही संभव हो सकता है उसे कोई मूर्ख भी कर सकता है, पर निर्माण अति कठिन है। उसके लिए भावना, सूझ-बूझ, योग्यता एवं साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। यह कठिन है। इसलिए सृजनात्मक गतिविधियाँ अपनाकर आत्म-गौरव का परिचय देना किसी-किसी से ही बन पड़ता है। आतंक-वाद अपनाकर ओछी सफलता प्राप्त करने के लालच पर अंकुश करना भी प्रखर आदर्शवादिता अपनाने वाले के लिए ही सम्भव हो सकता है। सभ्यता का लक्ष्य असुरता का-विकृतियों का अभिवर्धन नहीं, वरन् उस उत्कृष्टता का अनवरत अभिवर्धन है जिसे अपनाकर प्रगति की इतनी मंजिल पूरी हो सकी है।

आत्मानुभूति से लेकर आत्म गौरव तक का अनुदान देकर सभ्यता का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता वरन् वह अपूर्णता को पूर्णता में-अणु को विभु में परिणित करने के लिए अनवरत प्रयास के लिए सतत् संलग्न रही। उसने मनुष्य के सामने चरम उत्कृष्टता का लक्ष्य प्रस्तुत किया है। वह है - परमात्मा। परमात्मा का विश्वास - उसके अनुग्रह का उपार्जन - और अन्ततः उसी के समतुल्य बनने की उत्कण्ठा का उत्पादन। यही है ईश्वर भक्ति और उसकी प्राप्ति का वह चरम लक्ष्य जिसकी पूर्ति के लिए उपासना एवं साधनों के अनेकों विधि-विधान विनिर्मित हुए हैं।

सृष्टि संचालक सत्ता का निरूपण, ब्रह्म के रूप में किया गया है। उसकी मान्यता के सन्दर्भ में विज्ञानवादियों और आत्मवादियों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है। सृष्टि सन्तुलन, इकॉलाजी सिद्धान्त सिद्ध करते हैं कि प्रकृति जड़ नहीं वरन् अत्यन्त-दूरदर्शी और सन्तुलन बनाये रहने में आश्चर्यजनक रीति से क्रिया कुशल है। उसका ब्रह्माण्डव्यापी कौशल इतना ही दूरदर्शितापूर्ण है जितना कि कोई बुद्धिमत्ता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ ‘अति मनुष्य’ हो सकता है। ‘परमाणु’ संरचना और उसकी गतिविधियों का अति सूक्ष्म निरीक्षण करने पर भी यही प्रतीत होता है कि विज्ञान के छात्रों द्वारा कही जाने वाली प्रकृति की जड़ता वस्तुतः विवेकशील चेतना के भी कान काटती है। अणु जगत में अन्धेरगर्दी नहीं चल रही है, वरन् आश्चर्यचकित करने वाली ऐसी सुव्यवस्था काम कर रही है जो उच्चस्तरीय विवेकशीलता के लिए ही सम्भव हो सकती है। “अणोरणीयां महता महीयान्” की स्थिति में सर्वत्र संव्याप्त विवेकशीलता को जड़ माने या चेतन इस विवाद में न पड़ा जाय तो उसका अस्तित्व आस्तिक और नास्तिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मान्य हो सकता है। समष्टि ब्रह्मवर्चस् को स्वीकार करने में शाब्दिक लड़ाई भले ही हो, पर उस विवाद में तथ्य कुछ नहीं। ब्रह्म की सत्ता को सर्वमान्य घोषित किया जाय यह स्थिति दिन-दिन निकट ही आती चली जा रही है।

सभ्यता ने जो ‘परमात्मा’ मनुष्य जाति को दिया है वह ब्रह्म से सम्बद्ध भले ही कहा जाय, पर उसकी संरचना एक प्रकार के स्वतन्त्र कहने में भी कोई संकोच नहीं माना जाना चाहिए। प्राणि मात्र में संव्याप्त चेतना के साथ आत्मिक एकता-‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु” की मान्यता करुणा, ममता, सहकारिता, उदारता, सेवा जैसी परमार्थ प्रवृत्तियों को जगाती है। ईश्वरवाद का यह ऐसा अनुदान है जो विकृत अहं के द्वारा उत्पन्न होने वाले आततायी उत्पातों पर बहुत हद तक अंकुश लगाता है। पुनर्जन्म स्वर्ग-नरक, ईश्वरीय न्याय, कर्मफल की देर-सवेर में सुनिश्चितता जैसे सिद्धान्त ईश्वरवाद के अविच्छिन्न अंग है। ईश्वर का स्वरूप निर्धारण करते हुए उसे सर्वव्यापी, घट-घट वासी, सर्वदर्शी और साथ ही न्याय निष्ठ माना गया है। मनुष्य के ऊपर ईश्वरीय अनुशासन होने और उच्छृंखलता बरतने पर अदृश्य सत्ता द्वारा दंडित किये जाने की मान्यता ही आस्तिकता का मूलभूत सिद्धान्त है। सभ्यता ने इस प्रकार के ईश्वर का सृजन करके मनुष्य समाज का भारी उपकार किया है। अदृश्य अंकुश की मान्यता हटा देने पर विकृत अहं के उत्पातों का चरम सीमा तक जा पहुँचने का खतरा है। समाज व्यवस्था में अपराध की न्यूनतम सजा बोली हो तो बात दूसरी है अन्यथा सुधारवादी उदारता की न्याय व्यवस्था से दुष्टता की बहुत ही स्वल्प मात्रा में रोकथाम की जा सकती है। अदृश्य अंकुश की मान्यता का प्रतिफल शासकीय अपराध नियन्त्रण व्यवस्था से भी असंख्य गुना प्रयोजन पूरा करता है। इस मान्यता के रहते हुए भी जब सामाजिक सुव्यवस्था और शान्ति में इतना व्यवधान खड़ा है तब उसके सर्वथा अभाव में तो स्थिति एक प्रकार से असहाय ही हो जायगी।

भक्ति भावना में प्रेम तत्व की अभिवृद्धि मनोवैज्ञानिक साधना है। यह सद्भावना जितनी मात्रा में उपार्जित की जा सकेगी उतना ही मनुष्य सज्जन, सहृदय, उदार, सेवा भावी बनता चला जायगा और न केवल स्वयं आन्तरिक उल्लास का अनुभव करेगा वरन् सम्पर्क क्षेत्र में भी शालीनता की प्रभावी शक्ति से स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करेगा। तत्काल कर्मफल न मिलने से अधीर होकर लोग दुष्कर्म करने पर उतारू होते और सत्कर्मों में निराश होते देखे गये हैं। इस विलम्ब के कारण आस्तिक को अधीर नहीं होना पड़ता और सज्जनता की नीति शान्तिपूर्वक अपनाये रहता है।

ऐसे-ऐसे अगणित लाभ आस्तिकता के हैं। एकाकी आदर्शवादिता अपनाये रहने से ईश्वर विश्वास के कारण असाधारण साहस प्राप्त होता है। सर्वत्र परमेश्वर की सत्ता संव्याप्त है, इस मान्यता से चिन्तन को ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ की अनेकों कलात्मक भाव-सम्वेदना के रसास्वादन का अवसर मिलता है।

आज सभ्यता के प्रति अनास्था उत्पन्न हो रही है। अवज्ञा और उच्छृंखलता को शौर्य-साहस एवं प्रगतिशीलता का चिन्ह माना जाने लगा है। नैतिक मर्यादाएँ उपहासास्पद और सामाजिक मर्यादाएँ अव्यावहारिक कही जान लगी हैं। फलतः उद्धत आचरण और विकृत चिन्तन के प्रति रोष प्रकट करने के स्थान पर उन्हें सहन करने तथा कभी-कभी तो प्रोत्साहन करने तक की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह सब थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हो है भयंकर? छोटी चिनगारी भी कभी व्यापक विध्वंस खड़ा कर सकती है। सभ्यता के प्रति अनास्था बढ़ती गई और उस खतरे को न समझा गया तो इसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होगी जैसी कि अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की।

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