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Magazine - Year 1976 - Version 2

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Language: HINDI
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अपनी हथौड़ी से अपने दाँत न तोड़ें

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First 30 32 Last
शक्कर को आहार विश्लेषण के अनुसार कार्बोहाइड्रेट वर्ग में गिना जाता है। शरीर में आवश्यक गर्मी बनाये रहने के लिए आहार में इस वर्ग की उपयोगिता को देखते हुए ही अन्न को भोजन का प्रधान भाग माना गया है। गेहूँ, चावल आदि में यही तत्व मुख्य रूप से होता है, अन्य तत्व तो उसमें स्वल्प मात्रा में ही विद्यमान रहते हैं। जिस तर्क के अनुसार अन्न को भक्ष्य ठहराया जाता है उसी के अनुसार मोटे तौर से शकर को आहार में सम्मिलित रखने की उपयोगिता कही जा सकती है।

किन्तु यहाँ शक्कर की संरचना अधिक विचारणीय है। जिसके अनुसार वह कार्बोहाइड्रेट वर्ग की होते हुए भी अपना विशेष प्रभाव छोड़ती और विशेष प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। वह पचने में कई अवयवों की स्वाभाविक क्षमता को चोट पहुँचाती है। बढ़ी हुई तनिक सी भी मात्रा दाँत, आमाशय और जिगर तीनों को क्षति पहुँचाती है और यदि यह क्रम अधिक दिन चलता रहे तो इन तीनों ही अवयवों को इतनी क्षति पहुँच जाती है जिसकी पूर्ति कर सकना उपचार प्रक्रिया से भी बाहर की बात हो जाती है।

अपने जमाने के रोग अभिशापों में अग्रणी है-‘दन्त क्षय’। दाँतों का सड़ना, गलना, टूटना, हिलना, खोखले होना, दर्द करना जैसी अनेकों खराबियाँ उत्पन्न होने से मुख की शोभा कहे जाने वाले दाँत न केवल अपना सौंदर्य खो बैठते हैं, वरन् आहार को चबाने के अपने प्रमुख उत्तरदायित्व से भी इनकार करने लगते हैं। इतना ही नहीं उनके उद्गम स्थल मसूड़ों तक में दाँत की खराबी से सड़न आरम्भ हो जाती है और वहाँ के सड़े हुए जख्म मवाद देते और दुर्गन्ध उत्पन्न करने लगते हैं। ‘पायेरिया’ से ग्रसित व्यक्ति पेट में मुँह का मवाद पहुंचते रहने के कारण पाचन तन्त्र की अपार क्षति सहते हैं। साथ ही मुँह से दुर्गंध आने के कारण दूसरे के सम्मुख मुँह खोलने, बातें करने से भी कतराने लगते हैं। दन्त-क्षय को छोटा रोग समझा जाने के कारण उसकी और अधिक ध्यान नहीं दिया जाता, फिर भी आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि रोग का विस्तार तेजी से हो रहा है। सभ्य कहे जाने वाले देशों और परिवारों में इसका आक्रमण अधिक तेजी से होता है। दन्त विशेषज्ञों के अनुसार अगली पीढ़ी के लिए पोपले होने का खतरा बढ़ता चला जा रहा है। अनुवाँशिक प्रक्रिया के अनुसार यदि यह कठिनाई पैतृक बन गई और वंश परम्परा में घुल गई तब फिर अगली पीढ़ियाँ दाँत जैसे उपयोगी आधार से वंचित रहकर पाचन एवं वार्तालाप में असाधारण कठिनाई अनुभव करेंगी।

रूसी वैज्ञानिक प्रो0 ब्लादी मिररुद्की के अनुसार दन्त क्षय का प्रधान कारण शक्कर की अधिक मात्रा और उसका देर तक दांतों के साथ सम्बद्ध रहना ही होता है। स्वाद की दृष्टि से नमक और शक्कर ने हमारी जिव्हा को एक प्रकार से वशीभूत कर रखा है। फलतः मानवी आहार में यह चटोरापन धीरे-धीरे अपनी जड़ें अधिक गहरी जमाता चला जा रहा है। इन दिनों ऐसा आहार कम ही मिलेगा जिसमें ऊपर से इन दोनों चीजों को किसी न किसी रूप से मिलाया न गया हो? यहाँ तक की दूध जैसे प्रकृति प्रदत्त स्वाद से भी काम नहीं चलता। उसमें भी शक्कर ऊपर से मिलानी पड़ती है। दही में शक्कर नहीं तो नमक चाहिए। अब तो फलों की भी खैर नहीं उनके अद्भुत स्वाद प्रकृति के अनुपम उपहार कहे जा सकते हैं, पर उतने से सन्तोष नहीं होता और फलों को काटकर ऊपर से मसाला छिड़कने के बाद ही वे भी सभ्य लोगों के लिए गृहण योग्य बन पाते हैं।

शरीर को जिन खनिजों की जितनी मात्रा में आवश्यकता है उतनी मात्रा अन्न, दूध, फल, शाक आदि स्वाभाविक आहार में सम्मिलित है और वह सहज ही उपलब्ध होती रहती है। आहार शास्त्र की दृष्टि से देखा जाय तो नमक या शक्कर की ऊपर से ली जाने वाली मात्रा अनावश्यक ही नहीं अहितकर भी है। जिव्हा को विकृत न किया गया हो तो नमक का-शक्कर का सीमित और सन्तुलित स्वाद सामान्य आहार से ही मिलता रह सकता है। पाचन की सुविधा के साथ-साथ प्राकृतिक स्वाद का आनन्द लेने की यदि उपयोगिता समझी जा सके तो फिर जीभ के वर्तमान चटोरपन को छोड़ना ही श्रेयस्कर प्रतीत होगा।

दन्त क्षय के सन्दर्भ में उसका अधिक दोष शक्कर के लिए लपकते रहने वाले चटोरेपन को दिया जा सकता है। लोग अपने भोजन में शक्कर की अनावश्यक मात्रा भर लेते हैं। अति का सर्वत्र वर्जन किया गया है इस तथ्य को भूला देने से ही शक्कर का रूप विकृत हो जाता है और वह हानिकर परिणाम उत्पन्न करने लगती है। अन्यथा उसे खजूर, किशमिश, चीकू, आम, खरबूजा, गन्ना जैसे प्राकृतिक सम्मिश्रणों के साथ सीमित मात्रा में लिया जाता रहता तो कार्बोहाइड्रेट की पूर्ति में अपनी लाभ दायक भूमिका भी निभती रह सकती थी।

दाँतों की संरचना पर ध्यान देते हैं तो आश्चर्य होता है कि उस सुदृढ़ दुर्ग को आखिर किस गोलाबारी से नष्ट किया जाता है। दाँतों पर ‘एनामेल’ नामक जो आवरण चढ़ा होता है वह असाधारण रूप से टिकाऊ है। अब तो उतने ही मजबूत कुछ प्यास्टिक भी बन गये हैं, पर पुरातन काल में हीरा ही एकमात्र ऐसा पदार्थ था जिसकी तुलना दाँतों से पर चढ़े एनामेल आवरण से की जा सके। यही कारण है कि वह रासायनिक क्षरण एवं तापमान से होने वाले ऐसे परिवर्तनों को भी सहन कर लेता है जिन्हें ग्रेनाइट जैसा कठोर पत्थर भी सहन नहीं कर पाता। इतना होते हुए भी एक ऐसी विडम्बना उसके साथ जुड़ी हुई है कि ‘शक्कर’ जैसे सामान्य पदार्थ के आघात को वह सहन नहीं कर पाता और उसके साथ लड़ाई लड़ने का अवसर सामने आने पर अतीव दुर्बल सिद्ध होता है। शक्कर के सम्पर्क से दाँत जितनी बुरी तरह गलते हैं उतने और किसी पदार्थ से नहीं।

दन्त विज्ञानियों का बहुत दिन पहले अनुमान था कि अम्ल पदार्थों से दाँत गलते हैं। पर पीछे यह बात आँशिक रूप से सत्य सिद्धि हुई। मुख ग्रन्थियों से निकलते रहने वाले स्रावों में यह विशेषता है कि आहार की सामान्य अम्लता पर चढ़ दौड़ते हैं और उसे कुछ ही समय में निरापद बना लेते हैं। नींबू की अम्लता सर्वविदित है। पर वह मुँह में जाने के बाद इस तरह पटकी, पछाड़ी जाती है कि बात की बात में निरापद बन जाती है और फिर उसके मुँह में या पेट में रहने से किसी प्रकार की हानि नहीं होती। यही बात अन्य पदार्थों के सम्बन्ध में भी है।

शक्कर पर मुख के स्रावों का वैसा प्रभाव नहीं पड़ता। फलतः वह निरापद नहीं हो पाती। आमतौर से खाने के बाद मीठे पदार्थ भी पेट में चले जाते हैं किन्तु यदि पूरी तरह ब्रुस या कुल्ला नहीं किया गया है तो वे दाँतों के बीच रहने वाले खड्डों में धंसे हुए रह जाते हैं अथवा दांतों पर पतली परत के रूप में चिपक जाते हैं। बैक्टीरिया के प्रभाव से वे ‘पोलीमार’ नामक योगिकों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार बना हुआ सान्द्रित अम्ल मुख की लार से अनुकूल स्थिति में ढल नहीं पाता और अपनी हानिकारक प्रतिक्रिया दाँतों को नष्ट करने में लगा देता है।

शरीर विज्ञानी मुद्दतों से यह कहते रहे हैं कि ठीक तरह न पची हुई शक्कर आमाशय पेंक्रियाज और जिगर की कार्य पद्धति में भारी अड़ंगा खड़ा करती है। फलतः उपापचयात्मक क्रिया में भारी गड़बड़ी उत्पन्न होती है और शरीर का खनिज सन्तुलन बिगड़ जाता है। मधुमेह मोटापा एवं रुधिर वाहनियों की दुर्बलता में आमतौर से शक्कर खाने के विरुद्ध चेतावनी दी जाती रही है। अब दन्त क्षय को ध्यान में रखते हुए भी शक्कर के सम्बन्ध में सतर्कता बरतने की बात जोरों से कही जाने लगी है। शक्कर की अधिकता से विकृत हुआ खनिज सन्तुलन शरीर की अवरोधक शक्ति को घटा देता है फलतः हानिकारक प्रतिक्रियाओं का अवरोध हलका पड़ने लगता है। दन्त क्षय की सम्भावना उत्पन्न होने पर भी यह अवरोध दुर्बलता अपना सुधारात्मक प्रयोजन ठीक तरह पूरा नहीं कर पाती और वहाँ का क्षरण निर्बाध गति से चलता रहता है।

दांतों के खड्डों में अथवा परत रूप से चिपकी हुई शक्कर-बैक्टीरिया के सम्पर्क से पोलीमार, प्लैक्स का अम्लीय भाग दाँतों को कुतरना शुरू कर देता है और जिस तरह छोटा सा घुन मजबूत लकड़ी को खोखला कर देता है वैसा ही उपक्रम इस अम्लीय प्रतिक्रिया द्वारा चल पड़ता है। यहीं से दन्त-क्षय की नींव पड़ती है और बढ़ते-बढ़ते किसी समय यही चिनगारी ज्वाला की तरह फूट पड़ती है।

इस विपत्ति से बचने के लिए अच्छा यही है कि ऊपर से मिलाई जाने वाली शक्कर को अपनी आहार रुचि में से बहिष्कृत कर दिया जाय और आवश्यकतानुसार उसे मीठे पदार्थों के रूप में लिया जाय। यों सामान्य अन्न भी मुँह की लार और पेट के रसों के समन्वय से पेट में पहुँचते-पहुँचते शक्कर के रूप में परिणत हो जाता है। यह क्रिया मुँह से ही आरम्भ हो जाती है। देर तक रोटी का ग्रास मुँह में चबाया जाता रहे तो उसके स्वाद में मिठास का आविर्भाव हुआ सहज ही अनुभव किया जा सकता है। ऐसी दशा में बाहर से अतिरिक्त शक्कर लेने की शरीर को कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती है। यदि उसकी कमी अनुभव की जाय तो मीठे फल भी सस्ते दाम में मिल सकते हैं और उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं। खजूर आदि में शक्कर के साथ-साथ अन्य ऐसे पदार्थ भी मिले रहते है जो उसे पचाने में सहायता करते हैं और वैसी गड़बड़ी उत्पन्न नहीं होने देते जैसी कि खालिस चीनी से उत्पन्न होती है।

तरह-तरह की मिठाइयाँ, टाफियाँ, लोलीपाप, लेमन ड्राप, मीठे बिस्किट आदि में जो लस रहता है वह दाँतों से, मसूड़ों से लिपट जाता है और वहाँ आराम से अड्डा जमाकर अपना कतरव्योंत करने में जुट पड़ता है। जिसका परिणाम समयानुसार दन्त-क्षय तथा मसूड़ों की विकृतियों के रूप में सामने आता है।

दांतों का स्थानीय उपचार आवश्यक तो है, पर पर्याप्त नहीं। उपचार रोगजन्य कष्ट उत्पन्न होने के उपरान्त आरम्भ होता है जबकि उतने समय तक तो विनाश की आधी मंजिल पूरी हो चुकी होती है। विनाश की गति मन्द हो तो हमें उसका पता भी नहीं चलता। उपद्रवों और आक्रमणों से जूझने की जो प्रक्रिया भीतर ही भीतर चलती रहती है उसका आभास प्राप्त करने का भी कोई साधन अपने पास नहीं है। पानी जब सिर से ऊपर निकल जाता है और बात असहाय हो जाती है तब पीड़ा उभर कर ऊपर आती है। अपने निजी साधन चुक जाने पर ही कोई भला आदमी बाहरी सहायता की पुकार करता है। शरीर की शालीनता जब देखती है कि अपनी निजी अवरोध शक्ति चुक गई तब वह ताप, सूजन, दर्द आदि के रूप में बाहरी सहायता की गुहार मचाती है और अपनी अन्तः व्यवस्था से काम न चल पाने की घोषणा करती है। दवादारु की बात तब कहीं सोची जाती है और उसी स्थिति में चिकित्सकों का दरवाजा खटखटाया जाता है। यह तो आधा घर जल जाने और आग की प्रचण्ड लहरें उठने लगने के उपरान्त फायर ब्रिगेड की दौड़-धूप जैसी बात हुई। बीमारी अच्छी भी हो जाय, आग बुझ भी जाय तो भी जो क्षति हो चुकी उसकी भरपाई कोई बीमा कम्पनी नहीं कर सकती।

अच्छा हो हम अपने हाथों, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने की आदत छोड़ें और अपनी हथौड़ी से अपने हीरा-मोती जैसे सुदृढ़ और सुन्दर दांतों को न तोड़ें। इसके लिए शक्कर की अनावश्यक मात्रा उदरस्थ करने की आदत छोड़े। सफेद चीनी से तो परहेज करना आरम्भ कर ही दें। इससे तो गुड़ कही अच्छा है जिसमें खनिजों और लवणों का उपयोगी अंश तो शेष रह जाता है जबकि शक्कर में मिठास की छूँछ ही बाकी रहती है। उसे निचोड़े हुए नीबू के बचे खुचे छिलके के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।

कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता पूरी करने के तर्क को लेकर अनावश्यक मात्रा में प्रयुक्त होने वाली सफेद चीनी की वकालत नहीं की जा सकती। फिर यदि उसे लेना ही हो-किसी प्रकार स्वाद का संयम नहीं ही बन पड़ रहा हो- तो उतना तो करना ही चाहिए कि प्रत्येक भोजन के बाद भली प्रकार कुल्ला करने की आदत डाली जाय। यह चिन्ह पूजा के लिए किये जाने वाले धर्म-कृत्यों की तरह नहीं, वरन् सफाई का प्रयोजन भली प्रकार कर सकने के लिए होना चाहिए। हर आहार के बाद-विशेषतया उस भोजन के बाद जिसमें मिठास सम्मिलित हो अनिवार्य रूप से भली प्रकार कुल्ला करने का नियम पालन किया जाना चाहिए। प्रातःकाल तो मुँह का स्वाद और गन्ध ठीक करने के लिए सभी लोग कुल्ला दाँतोन करते हैं, पर इतने से ही काम नहीं चल सकता। उठते समय की तरह ही रात को सोते समय भी कुल्ला करने की आदत डालनी चाहिए। दन्त क्षय में यह उपेक्षा भी बड़ी हानिकारक सिद्ध होती है कि रात्रि को सोते समय मुँह साफ करने की आवश्यकता न समझी जाय। रात को आहार के जो कण दांतों के इर्द-गिर्द जमा रह जाते हैं वस्तुतः उन्हीं को रात भर चुपचाप सड़ते रहने और अपनी विनाश लीला निश्चिन्त होकर चलाते रहने का अवसर मिलता है। रोगों के उपचार से पूर्व उनके उत्पन्न करने वाले कारणों को रोकना अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण है। ठीक यही नीति दन्त क्षय जैसे विनाशकारी रोग की रोकथाम के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए। शक्कर की लिप्सा घटाने और दांतों की समुचित सफाई करते रहने जैसी छोटी आदतें हमें दन्त क्षय जैसे भयंकर रोग से सहज ही त्राण दिला सकती हैं।

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