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Magazine - Year 1976 - Version 2

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आशा जगाएँ प्रशंसा करें और प्रोत्साहन दें

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प्रशंसा और प्रोत्साहन के आधार पर ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। अन्न और जल जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक विकास के लिए प्रशंसा और प्रोत्साहन की उपयोगिता मानी गई है। व्यक्ति अपने सम्बन्ध में जैसी निन्दा, प्रशंसा को क्षुद्र या महान होने की बातें सुनता रहता है, उसकी मान्यता अपने बारे में वैसी ही बन जाती हैं।

मनुष्य के अन्तः करण में अच्छी और बुरी वृत्तियाँ सोई पड़ी रहती हैं। बाह्य वातावरण से प्रभावित होकर उसके जीवन में धूप-छाँह की भाँति काली, सफेद छाया डालती रहती हैं। जिस वृत्ति को समाज में आश्रय मिल जाता है वह स्थिर रहती है जिसकी उपेक्षा होती है वह धीरे-धीरे विनष्ट होने लगती है। जिन बच्चों को आरम्भिक जीवन में नालायक, बेवकूफ, बदमाश आदि कहा जाता रहा है उनका व्यक्तित्व जीवन में कभी प्रभावशाली न बन सकेगा। जिन बच्चों को बचपन में स्नेह और सम्मान नहीं मिल पाता वे बड़े होने पर निकृष्ट प्रवृत्तियों से ग्रसित हो जाते हैं।

बच्चे हों या बड़े यह आवश्यकता सभी में समान रूप से बनी रहती है। हर किसी को अपनी प्रशंसा प्रिय है। जब दूसरे लोग हमारे किसी कार्य या गुण की प्रशंसा करते हैं तो हमारा मन प्रसन्नता से पुलकित हो उठता है। वे गुण धीरे-धीरे हमारे स्वभाव के अंग बन जाते हैं। जिन कार्यों को प्रोत्साहन मिलता है वैसे कार्य बार-बार करने की मन में प्रेरणा जागृति होती है।

प्रायः मनुष्य को अपने गुणों, अपनी शक्तियों व अपने महत्व का सही-सही ज्ञान नहीं होता। इसके मूल्याँकन के लिए दूसरों की सम्मति की आवश्यकता होती है। अतएव हम जहाँ कहीं भी अवसर मिले प्रशंसा करने और प्रोत्साहन देने से न चूकना चाहिए। अपने मित्र, स्वजन-सम्बन्धी, परिचित-अपरिचित जो भी व्यक्ति हमारे सम्पर्क में आवें उसके गुणों की प्रशंसा, सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण व अच्छाइयाँ विद्यमान रहती हैं। किसी व्यक्ति के हृदय में हम गुणों की राह से ही प्रवेश कर सकते हैं। जिसमें जो गुण दिखाई दें उसकी चर्चा, प्रशंसा उस व्यक्ति का प्रभाव उस पर पड़े बिना न रहेगा। किन्तु इस बात की सतर्कता बरतें हमारी प्रशंसा चापलूसी का रूप न धारण कर पाये।

जिस प्रकार दूसरों को अपना समय, धन या सलाह देकर उनका कुछ न कुछ भला किया जा सकता है, उसी प्रकार प्रशंसा और प्रोत्साहन देकर भी अनेकों की भलाई कर सकना सम्भव हो सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जिसको बार-बार जैसा कहा जाता रहे उसका अन्तर्मन धीरे-धीरे अपने को वैसा ही समझने लग जाता है। उसकी मनोभूमि उसी के अनुरूप ढलने लगती है।

जब कोई व्यक्ति दूसरों के मुँह से अपनी निन्दा, भर्त्सना और तुच्छता की बात सुनता है तो इन आलोचनाओं से उसका मन गिर जाता है। हीनता और निराशा की भावनाएँ उसके मनः प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लेती हैं।

ऐसे पुरुष बिरले देखे जाते हैं जो-‘‘निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय”

कहने वाले कबीर के कथन की पुष्टि करते हुए अपना आत्म-विकास करने में संलग्न रहते हैं। साधारणतः लोक निन्दा, प्रशंसा से हतोत्साहित अथवा उत्साहित होकर अपने मन को घटाते-बढ़ाते रहते हैं।

सुधार की दृष्टि से कभी एकान्त में आत्मीयता के साथ मधुर शब्दों दुर्गुणों की चर्चा की जा सकती है। उस व्यक्ति को अपनी सद्भावना का विश्वास अवश्य करा दिया जाय। यदि कोई व्यक्ति यह मान ले कि अमुक व्यक्ति मुझ से घृणा करता है-तब उसकी सलाह का कोई मूल्य नहीं होगा। उल्टे उस व्यक्ति के हृदय में उसके प्रति शत्रुता का भाव उदय हो जायगा। अपने घनिष्ठ मित्रों के दोष-दुर्गुणों के लिए भी यही सावधानी अपेक्षित है। इस बात का भी हर समय ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी के व्यक्तित्व का निराशाजनक चित्रण न किया जाय।

प्रोत्साहन अपने आप में एक चमत्कार होता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन से मनुष्य अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कई गुना काम कर जाता है। प्रोत्साहन और प्रशंसा वह जादू की छड़ी है जिसको छूकर साधारण बन्दर महावीर बन जाता है। नास्तिक छात्र नरेन्द्र स्वामी विवेकानन्द हो जाता है। राम की प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर बन्दर और भालू जैसे तुच्छ जीव लंका विजय में समर्थ हुए, कृष्ण के प्रोत्साहन से साधारण ग्वाल-बालों ने गिरि गोवर्द्धन उठाने में सहयोग दिया। युग निर्माण योजना की कहानी भी इससे भिन्न नहीं। पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी के प्रशंसात्मक मधुर वचन एवं प्रोत्साहन भरे पत्र लोगों के प्राणों में अतुल भक्ति भर देते हैं। छोटे-छोटे से दीखने वाले साधारण लोग कितना कार्य कर डालते हैं कि देखने वाले आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

भेड़ों के झुण्ड में पले हुए एक सिंह शावक की कथा प्रसिद्ध है जो अपने को भेड़ ही समझता था और घास खाता था। दूसरे सिंह द्वारा आत्मबोध कराने पर उसे ज्ञान हुआ था और वह पुनः अपने को सिंह समझने और वैसा ही आचरण करने में समर्थ हुआ था। हम सब इसी प्रकार की भेड़ें बने हुए हैं। जैसा हमने अपने को समझा है दूसरों ने जैसा कुछ हमें हमारा स्वरूप समझाया है वैसे ही हम बने और ढले हैं। करोड़ों अछूतों की दयनीय स्थिति का एकमात्र कारण यही है। मानव ने ही मानव को मानव नहीं समझा और उन पद-दलित मानवों ने अपने को सचमुच ही निम्नकोटि का जीव समझकर अपने को अछूत समझ लिया और उच्च वर्ण वालों के साथ उठने-बैठने और व्यवहार करने में संकोच करने लगे। एक बार उन्हें उनके सच्चे स्वरूप का बोध कराने की आवश्यकता है।

लोगों को दोष, दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा दिलाने के अनेक उपाय हैं। सामाजिक एवं शासकीय दण्ड, दमन, दबाव, निन्दा, तिरस्कार आदि उपाय भी काम में लाये जाते हैं। कुछ समय के लिए कोई दुर्गुण दब भले ही जाय किन्तु अवसर पाकर पुनः प्रकट हो जाते हैं। कभी-कभी तो प्रतिहिंसा का रूप धारण कर लेते हैं। व्यक्ति के सुधार में दण्ड मार्ग से सच्ची सफलता नहीं मिल सकती। दोषों के उन्मूलन में गुणों के सम्वर्धन का प्रोत्साहन और प्रशंसा का मार्ग सर्वश्रेष्ठ है।

एक पौराणिक कथा है कि विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों का वध कर डाला और छिपकर यह सुनने लगे कि देखें वशिष्ठ इस सम्बन्ध में क्या सोचते हैं? क्या कहते हैं? वशिष्ठ जी अपनी धर्म-पत्नी के शोक को शान्त करते हुए समझा रहे थे कि-विश्वामित्र बड़े तपस्वी हैं। यह दुष्कर्म तो वे किसी आवेश में कर बैठे हैं। हमें उनके प्रति बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए। उनकी श्रेष्ठता कभी न कभी निखरेगी, उससे लोक का कल्याण होगा। राज्य को त्याग कर तपस्या में लीन होने वाले विश्वामित्र स्वभावतः दुष्ट नहीं हो सकते। यह अपराध तो उनसे भूल से ही हो गया होगा।” कुटिया में छिपे विश्वामित्र ने जब अपनी प्रशंसा सुनी तो उनका सारा कलुष धुल गया और वशिष्ठ के चरणों पर गिरकर अपनी भूल पर फूट-फूटकर रोने लगे। सुधार का यही सबसे प्रभावशाली तरीका है।

प्रशंसा और प्रोत्साहन का यह ढंग दूसरों की सत्प्रवृत्तियों को जागृत करने वाला तो है ही, इससे अपने आपको भी बड़ा लाभ है। यदि हम प्रशंसा और प्रोत्साहन करने का अपना स्वभाव बना लें तो हमारे शत्रुओं की संख्या तेजी से घटती चली जायगी और मित्रों की संख्या में कई गुनी वृद्धि होती चली जायगी। बिना एक पैसा खर्च किये दूसरों का भारी उपकार करने का यह गुण अपने में विकसित करके परमार्थ का पुण्य प्राप्त करते रह सकते हैं। जीवन विद्या के इस अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य को हमें हृदयंगम कर ही लेना चाहिए।

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