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Magazine - Year 1976 - Version 2

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आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व ज्ञान संगत भी और विज्ञान संगत भी

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इन दिनों प्रामाणिकता का आधार प्रत्यक्षवाद माना जाने लगा है। ‘जो प्रत्यक्ष वही प्रामाणिक की मान्यता दिन-दिन जोर पकड़ती है। विज्ञान के बढ़ते हुए चरण ज्ञान क्षेत्र में और तथ्य की कसौटी को मान्यता देते हैं। उनका कहना है-पुरातन मान्यताओं में से कितनी ही अधूरी और अप्रमाणिक सिद्ध हुई हैं, उन्हें बदलना और सुधारना पड़ा है। ऐसी दशा में जो कुछ कहा और माना जाता रहा है उस सब का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए। अब यही बात जोर पकड़ती जा रही है कि श्रद्धा को भावुकता भर माना जाय और महत्वपूर्ण विषयों को प्रत्यक्षवादी तर्क, तथ्यों द्वारा परखने के बाद ही स्वीकार किया जाय।

इस संदर्भ में ईश्वर और आत्मा की मान्यता भी एक विषय है जिस पर नया प्रकाश पड़ने की आवश्यकता है। इस दिशा में भी खोजबीन हुई और इतनी मंजिल पार कर ली गई है कि प्राणियों में पाई जाने वाली चेतना का अपना निजी अस्तित्व है वह रासायनिक पदार्थों के मिलन से जन्मती और बिछुड़न से मर जाती हो ऐसी बात नहीं है। उसका स्वतन्त्र अस्तित्व है। यह रासायनिक पदार्थों और परमाणुओं को अपनी इच्छानुसार खींचती बदलती एवं प्रयुक्त करती है। इस प्राणि चेतना का अपना आकर्षण और प्रभाव है। अपनी आकाँक्षा, अभ्यास , प्रकृति एवं आवश्यकतानुसार वह शरीर धारण करती है उस शरीर में आवश्यक हेर-फेर करती है। शरीर को ही नहीं वातावरण को भी वह प्रभावित करती है।

वृक्षों की सघनता वर्षा के बादलों को आकर्षित करती है यह सर्वविदित है। पेड़ कट जाने पर वर्षा घट जाती है। उद्यानों की अभिवृद्धि से मौसम बदलता और बादल खिंचते चले आते हैं। यह वृक्षों में रहने वाली चेतना का आकर्षण एवं प्रभाव है। सृष्टि के इतिहास से अनेकानेक परिवर्तनों की लम्बी शृंखला और उनके पीछे तत्कालीन प्राणियों की आकाँक्षाओं का दबाव भारी काम करता रहा है। अपने-अपने शरीरों की स्थिति में तथा अपनी इन्द्रिय चेतना में भी उनने भारी परिवर्तन कर लिए हैं

प्राणि जगत की चेतना अनुभवों का लाभ उठाते हुए, ठोकरों से शिक्षा लेते हुए, भूलों को सुधारते हुए प्रगति के प्रस्तुत स्तर तक पहुँच पाई है। आदिमकाल के ‘डाइनासोरों’ जैसे विशालकाय प्राणी पूँछ, दाँत और पीठ पर आक्रमणकारी शस्त्र साधनों से सुसज्जित थे। तब शायद संघर्ष और विजय का मत्स्य न्याय ही उपयुक्त समझा गया होगा, पर वह प्रयोग सफल न रहा। एक दूसरे की चमड़ी उधेड़ने और अण्डे निगलने की नीति सार्थक सिद्ध नहीं हुई कायिक दृष्टि से विशाल और सामर्थ्य की दृष्टि से सबल होते हुए भी आदिमकाल के पशु-पक्षी अपनी हिंसक आदतों के दुष्परिणाम भुगतते हुए अपना अस्तित्व ही गँवा बैठे।

पीछे नया अध्याय प्रारम्भ हुआ और नीति बदली। प्राणियों की ममता बच्चों के प्रति बढ़ी और उन्होंने अण्डों को घोंसलों में सेने की अपेक्षा पेट में ही पकाने का निश्चय किया इतना ही नहीं उन्हें शरीर रस निचोड़कर दूध भी पिलाया। यह प्रकृति परिवर्तन की एक महाक्रान्ति थी। हिंसा की निरर्थकता समझी गई और स्नेह सहयोग भरे अनुदान का आदान-प्रदान क्रम चल पड़ा।

माँसाहारी प्राणियों की मूल चेतना ने अपने शारीरिक अवयव अपनी आवश्यकतानुसार उपलब्ध एवं विकसित किये हैं। पेड़ों की छाया में तथा घास की झाड़ियों में अपने को छिपाये रहने की जितनी आवश्यकता समझी उनकी चमड़ी का रंग तथा दाग धब्बे उसी प्रकार के उत्पन्न हो गये। शाकाहारियों को दाँत-आँत की जैसी स्थिति आवश्यक थी उसी के अनुरूप उनने अपने कलेवरों को प्राप्त कर लिया। घोर शीत में आहार प्राप्त कर सकने की कठिनाई देखकर हिम प्रदेश के रीछों ने उन दिनों गहरी निद्रा में पड़े रहने की आदत बना ली। देशकाल के अनुरूप विभिन्न प्राणियों ने जहाँ अपने को बदला है वहाँ ऐसे प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं। कि अमुक क्षेत्र में बहुसंख्यक प्रबल चेतना सम्पन्न प्राणियों ने अपनी आवश्यकता के अनुरूप व्यवस्था बदलवा लेने के लिए प्रकृति को सहमत कर लिया।

यह बहुत पुराने जमाने की गई-गुजरी बात हो गई जब प्राणी को रासायनिक पदार्थों का समूह और उसकी चेतना को जीवाणुओं की सम्मिलित स्फुरणा मात्र कहा गया था और उसे चलता-फिरता पौधा घोषित किया गया था। शरीर के साथ ही जीवन का आदि और मरण के साथ अन्त होने की बात भी कभी-कभी विज्ञान क्षेत्र से उठी थी पर अब उस मान्यता में लगभग आमूल-चूल परिवर्तन कर लिया गया। मरणोत्तर जीवन के प्रमाण इतने अधिक मिले हैं कि उन्हें झुठलाया जा सकना सम्भव नहीं रहा। पुनर्जन्म की घटनाएँ आये दिन सामने आती हैं। ऐसे बालक जन्मते रहते हैं जो पूर्व जन्म की अपनी स्थिति के आधार पर प्रामाणिक सिद्ध कर सके। प्रेतात्माएँ कैसी होती हैं-कहाँ रहती और क्या करती हैं इस सम्बन्ध में अभी बहुत जानना शेष है, पर उनके अस्तित्व को अब अप्रामाणिक ठहरा देना सम्भव नहीं। इस संदर्भ में भी इतने अधिक प्रमाण मिलते रहते हैं कि इन्हें अन्धविश्वास या भ्रान्ति समुच्चय कह देने से काम नहीं चल सकता।

परमाणुवादी पदार्थ विज्ञान ने आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार किया है और यह प्रयत्न किया है कि उस अस्तित्व की संगति किसी प्रकार प्रकृति की विज्ञान सम्मत व्याख्या के साथ ही बैठ जाय।

आत्म-सत्ता के अस्तित्व संदर्भ में अधिक सुबोध प्रकाश टामस एडिसन ने डाला है। फोनोग्राफ रोशनी के बल्ब आदि के आविष्कार कर्ता इस प्रख्यात विज्ञानी का कथन है कि “प्राणी की सत्ता उच्चस्तरीय विद्युत कण गुच्छकों के रूप में रहती है। मरने के बाद भी यह गुच्छक विधिवत नहीं होते और परस्पर सघन सम्बद्ध बने रहते हैं। यह गुच्छक बिखरते नहीं वरन् मरने के उपरान्त अनन्त आकाश में भ्रमण करने के उपरान्त पुनः जीवन चक्र में प्रवेश करते और नया जन्म धारण करते हैं। यह गुच्छक मधुमक्खियों के झुण्ड की तरह हैं। पुराना छत्ता वे एक साथ छोड़ती और नया छत्ता एक साथ बनाती हैं। इसी प्रकार उच्चस्तरीय विद्युत कणों के गुच्छक अपने साथ स्थूल शरीर की साधन सामग्री और अपनी आस्थाओं और संवेदनाओं को साथ लेकर जन्मते-मरते रहने पर भी अमर बने रहते हैं।”

क्वांटम के थ्योरी के परिपूरक सिद्धान्त ने यह सिद्ध किया है कि जड़ और चेतना की सत्ता एक दूसरे से भिन्न स्तर की दिखते हुए भी वस्तुतः उनके बीच सघन तादात्म्य मौजूद। ‘पदार्थ’ एक स्थिति में ठोस रहता है पर दूसरी स्थिति में वह अपदार्थ बन जाता है। इस प्रकार जड़ चेतन में और चेतन जड़ में परिणत हो सकता है। मन की सत्ता शरीर रूप में पदार्थ रूप में प्रकट हो सकती है और अमुक स्थिति में पहुँच कर पदार्थ भी बन सकती है।

विज्ञानी हाइसन वर्ग का प्रतिपादन है कि अन्तरिक्ष में अमुक स्थिति पर पहुँचने पर परमाणु पदार्थ न रहकर अपदार्थ में-ऊर्जा में परिणत हो जाते हैं। पदार्थ सत्ता परिधि काल और रूप में ढाँचे में बंधी है मनः सत्ता में अनुभूतियाँ, स्मृतियाँ, विचार और बिम्ब के रूप में व्याख्या होती है। इतना अन्तर रहते हुए भी उन दोनों के बीच अत्यधिक घनिष्ठता है यहाँ तक कि वे दोनों एक दूसरे को प्रभावित ही नहीं करते वरन् परस्पर रूपांतरित भी होते रहते हैं।

इस तथ्य को नोबुल पुरस्कार विजेता यूजोन विगना ने और भी अधिक स्पष्ट किया है वे कहते हैं कि यह जान लेना ही पर्याप्त नहीं कि वस्तुओं की हलचलों से चेतना ही प्रभावित होती है वस्तु स्थिति यह है कि चेतना से पदार्थ भी प्रभावित होता है।

रूस के इलेक्ट्रॉनिक विज्ञानी सेमयोन किर्लियान ने एक ऐसी फोटोग्राफी का आविष्कार किया है जो मनुष्य के इर्द-गिर्द होने वाली उसकी विद्युतीय हलचलों के छायाँकन करती है। इससे प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर के साथ-साथ किसी सूक्ष्म शरीर की सत्ता विद्यमान है और वह ऐसे अविज्ञात पदार्थों से बनी है जो इलेक्ट्रॉन से बने ठोस पदार्थ की अपेक्षा भिन्न भी है और अधिक गतिशील भी।

विज्ञान-विश्लेषण के अनुसार मनुष्य विद्युत आवेगों से सम्पन्न एक विशेष प्राणी है। वह अदृश्य ऊर्जाओं के समुद्र में तैरता है । हर मनुष्य में अपने स्तर के कुछ विशेष चुम्बकीय प्रवाह उठते रहते हैं और वे अपने सजातीय ऊर्जा तत्वों को इस निखिल आकाश में से खींच कार अपने में धारण करते रहते है। साथ ही मनुष्य अपनी इन चुम्बकीय विशेषताओं को अन्तरिक्ष में बखेरता भी रहता है। उसका यह ग्रहण और प्रक्षेपण क्रिया-कलाप निरन्तर चलता रहता है। अदृश्य ऊर्जाओं से वह प्रभावित होता है और उनमें अपना योगदान सम्मिलित करता है। इसी आकर्षण-विकर्षण में मृत आत्माओं के साथ संपर्क स्थापित करना और आदान-प्रदान का क्रम चल पड़ना भी सम्भव हो सकता है।

ख्याति नामा वैज्ञानिक यू0ई0 वर्नार्ड का कथन है कि अभी मनः तत्व के बारे में हमारी जानकारी बहुत स्वल्प है पर वह दिन दूर नहीं जब चेतना के उन रहस्यों का उद्घाटन होगा जो उपलब्ध भौतिक शक्तियों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। निकट भविष्य में यह सम्भव हो सकेगा कि मनः तत्व की शक्ति से पदार्थों का गठन, विगठन एवं रूपांतरण हो सके। इसी प्रकार यह भी सम्भावना है कि संकल्प शक्ति के सहारे मनुष्य अपने शरीर में अभीष्ट परिवर्तन प्रस्तुत कर सके।

मनुष्य के सम्बन्ध में अध्यात्म की वैज्ञानिक व्याख्या यह है कि ⲵ‘थ्री डाइमेन्शंस ऑफ स्पेस’ और वन डाइमेन्शन आवट्यून के समन्वय से यह अद्भुत निर्माण सम्भव हुआ है। इन में जो अनुपात है वही मनुष्य की वर्तमान स्थिति का आधार है यदि इस अनुपात में थोड़ा सा हेर-फेर सम्भव हो सके तो स्थिति में इतना अन्तर हो सकता है। कि आज का सामान्य मनुष्य कल अनेक कसौटियों पर असामान्य सिद्ध हो सके।

प्राणियों को चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार कर लेने और उसका प्रभाव पदार्थों पर पड़ने के वैज्ञानिक निष्कर्ष उस बचपन से छुटकारा पा लिया जिसमें आत्मा का अस्तित्व ही अस्वीकार कर दिया गया था और प्राणियों के जन्म-मरण को रासायनिक पदार्थों की एक विशेष हलचल ठहराया गया था। अब प्राणि सत्ता को चेतना घटक के रूप में जाना माना जा रहा है। आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार करने से अब वैज्ञानिक आना-कानी, बहाने बाजी मात्र कही जा सकती है। वह दिन दूर नहीं जब इस संदर्भ में आड़े आ रहा असमंजस भी समाप्त होकर रहेगा।

अब दूसरा प्रश्न है परमात्म सत्ता का-उसे विज्ञान ने ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में स्वीकार किया है। आत्मा को अर्ध चेतन और अर्ध जड़ के रूप में ही अभी विज्ञान ने मान्यता दी है। इसी अनुपात से परमात्मा को भी अर्ध ब्रह्मा और अर्ध प्रकृति के रूप में स्वीकारा है। काम इतने से भी चल सकता है। अध्यात्मवाद को यह स्थिति भी स्वीकार है। अर्धनारी नटेश्वर की प्रतिमाओं में इस मान्यता की स्वीकृति है। ब्रह्म और प्रकृति का युग्म ब्रह्म विद्या के तत्वदर्शन ने स्वीकार किया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश अपनी-अपनी पत्नियों को साथ लेकर ही चलते हैं। अन्य देवताओं में से भी कदाचित ही कोई कुमार या विधुर हो। प्रकृति और परमात्मा के समन्वय से जीवात्मा की उत्पत्ति हुई है ऐसे प्रतिपादन ब्रह्मविद्या की अनेक व्याख्याओं में उपलब्ध हैं।

विज्ञान अपनी भाषा में परब्रह्म को-परमात्मा को-‘ब्रह्माण्डीय चेतना’ के रूप में स्वीकार करने लगा है और उसका घनिष्ठ सम्बन्ध जीव चेतना के साथ जोड़ने में उसे अब संकोच नहीं रह गया है। यह मान्यता जीव और ब्रह्म को अंश और अंशी के रूप में मानने की वेदान्त व्याख्या से बहुत भिन्न नहीं है।

अब विज्ञान वेत्ताओं ने एक ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अस्तित्व स्वीकार किया है। इससे पूर्व पृथ्वी पर चल रही भौतिकी को ही पदार्थ विज्ञान की सीमा माना जाता था; पर अब एक ऐसी व्यापक सूक्ष्म सत्ता का अनुभव किया गया है जो अनेक ग्रह-नक्षत्रों के बीच ताल-मेल बिठाती है। पृथ्वी पर ‘इकॉलाजी’ का सिद्धान्त प्रकृति की एक विशेष व्यवस्था के रूप में अनुभव कर लिया गया है। वनस्पति, प्राणी, भूमि, वर्षा, रासायनिक पदार्थ आदि के बीच एक संतुलन काम कर रहा है और वे सब एक दूसरे के पूरक बन कर रह रहे हैं। जड़ समझी जाने वाली प्रकृति की यह अति दूरदर्शिता पूर्ण चेतन व्यवस्था उन भौतिक विज्ञानियों के लिए सिर दर्द थी जो पदार्थ के ऊपर किसी ईश्वर जैसी चेतना का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। अब ब्रह्माण्डीय ऊर्जा उससे बड़ी बात है ग्रह पिंडों के बीच एक दूसरे के साथ आदान-प्रदान की-सहयोग संतुलन की जो ‘इकॉलाजी’ से भी अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवस्था दृष्टिगोचर हो रही है उसे क्या कहा जाय?

परा मनोविज्ञान की नवीनतम शोधें भी इसी निष्कर्ष पर पहुँची है मनुष्य चेतना ब्रह्माण्ड चेतना की अविच्छिन्न इकाई है। अस्तु प्राण सत्ता शरीर में सीमित रहते हुए भी असीम के साथ अपना सम्बन्ध बनाये हुए है। व्यष्टि और समष्टि की मूल सत्ता में इतनी सघन एकता है कि एक व्यक्ति समूची ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

परमाणु सत्ता की सूक्ष्म प्रकृति का विश्लेषण करते हुए विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि दो इलेक्ट्रॉनों को पृथक दिशा में खदेड़ दिया जाय तो भी उनके बीच पूर्व संबंध बना रहता है वे कितनी ही दूर रहें एक दूसरे की स्थिति का परिचय अपने में दर्पण की तरह प्रतिबिम्बित करते रहते हैं। एक की स्थिति को देखकर दूसरे के बारे में बहुत कुछ पता मिल सकता है। एक को किसी प्रकार से प्रभावित किया जाय तो उसका दूसरा साथी भी अनायास ही प्रभावित हो जाता है। इस प्रतिपादन पर आइन्स्टाइन रोजेन पोटोल्स्की जैसे विश्व विख्यात विज्ञान-वेत्ताओं की मुहर है। इस सिद्धान्त से एक व्यापक सत्ता और उसके सदस्य रूप में छोटे घटकों की सिद्धि तथा पृथक रहते हुए भी एकता का तारतम्य बने होने की पुष्टि होती है।

विज्ञान की मान्यता के अनुसार पूर्ण को जानने के लिए उसका अंश जानने का और अंश के अस्तित्व को समझने के लिए उसके पूर्ण रूप को समझने की आवश्यकता पड़ती है इसके बिना यथार्थता को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता । मूर्धन्य विज्ञान वेत्ता डॉ0 एफ0 केफ्रा ने अंश या अंशी के बीच अविच्छिन्न सम्बन्ध होने की बात का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया है और कहा है कि परमाणु का प्रत्येक घटक विश्व ब्रह्माण्ड का परिपूर्ण सदस्य है इस सदस्यता को किसी भी प्रकार निरस्त नहीं किया जा सकता। दोनों एक दूसरे के पूरक होकर ही आदिकाल से रहे हैं और अनन्त काल तक अपना सघन सम्बन्ध यथावत बनाये रहेंगे।

पिछली पीढ़ी के वैज्ञानिकों में से गेटे ने कहा था-ब्रह्माण्डीय चेतना का अस्तित्व सिद्ध कर सकने योग्य ठोस आधार मौजूद हैं रुडोल्फ स्टीनर ने अपने ग्रन्थ में गेटे के प्रतिपादन को और भी अच्छी तर सिद्ध करने के लिए आधार प्रस्तुत किये हैं।

जीव विज्ञानी टामस हक्सले ने ब्रह्माण्डीय चेतना के अस्तित्व और उसके कार्यक्षेत्र पर और भी अधिक प्रकाश डाला है वे उसे जीवाणुओं में अपने ढंग से और परमाणुओं में अपने ढंग से काम करती हुई बताते हैं और भारतीय दर्शन की परा और अपरा प्रकृति को ब्रह्मपत्नी के रूप में प्रस्तुत करने वाली मान्यता के समीप ही जा पहुँचते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने विस्तृत प्रकाश अपनी ‘हेवेन एण्ड हेल’ पुस्तक में डाला है।

परमाणु की इलेक्ट्रॉन प्रक्रिया को मात्र मन्त्रों से नहीं जाना जा सकता है। उसके अस्तित्व का दर्शन और निरूपण करने वाला एक ही यन्त्र है-मानवी मस्तिष्क। अन्य उपकरण तो इस संदर्भ में थोड़ी-सी सहायता मात्र करके रह जाते हैं। परमाणु की विवेचना नेत्र का नहीं गणित का विषय है। उसको हलचलों से उत्पन्न प्रतिक्रिया का आधार पर गणित करके यह पता लगाया जाता है कि परमाणु और उसके उदर में हलचल कर रहे घटकों का स्वरूप, स्तर एवं क्रिया-कलाप क्या होना चाहिए। विज्ञानी लुडविग ने इसे और भी अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि क्वांटम शास्त्र यन्त्रों पर नहीं वैज्ञानिकों की मानसिक चेतना पर अवलम्बित है।

विज्ञान को प्रामाणिकता की साक्षी के रूप में मान्यता मिलती रहती है, पर गहराई यह है कि विज्ञान का अस्तित्व ही जीव चेतना की ज्ञानधारा के द्वारा ही प्रकाश में आया है। सृष्टि के अन्तराल में सूक्ष्म हलचलें अनादिकाल से ही चलती रही हैं तब से अब तक वे अविज्ञात ही बनी रहीं, उन्हें जानना तथा प्रयोग में लाना जिन आविष्कारों और आविष्कारकों के द्वारा सम्भव हुआ है वह चमत्कार ज्ञान की परिष्कृत स्थिति का ही परिणाम है। अब प्रकृति के अन्तराल में छिपे हुए रहस्यों का बहुत कुछ उद्घाटन होना शेष है। जितना जाना जा चुका उससे कहीं अधिक जानने की मंजिल और पार करनी पड़ेगी। यह सब मानवी ज्ञान चेतना के सहारे ही सम्भव होगा।

विज्ञान के आधार पर चेतना को सिद्ध किया जाय या चेतना को विज्ञान की जननी माना जाय? आज हम इसी असमंजस भरे चौराहे पर खड़े हैं। यों विज्ञान द्वारा भी आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध होने जा रहा है, पर अधिक बुद्धिमत्ता इसी में थी कि चेतना की सर्वव्यापी और सर्व समर्थ सत्ता को स्वीकार किया जाता और माना जाता कि पदार्थ और कुछ नहीं सूक्ष्म चेतना की सघन एवं दृश्यमान एक स्थिति मात्र है। वेदान्त चिरकाल से ‘सर्व खिल्विदं ब्रह्म’ का उद्घोष करता रहा है। अब विज्ञान की सर्वत्र ब्रह्माण्डीय चेतना की सत्ता जड़ और चेतन में संव्याप्त मानने की सहमति प्रकट कर रहा है। लगता है कल नहीं तो परसों आत्मा और परमात्मा की सत्ता व्यष्टि और समष्टि चेतना के रूप में संव्याप्त होने की स्वीकृति प्रदान करेगा। ज्ञान और विज्ञान की दोनों ही धाराएं आरम्भ में भले ही भिन्न एवं विपरीत दिखाई देती हों, पर आगे चलकर उन दोनों का समन्वय, एकीकरण होना सुनिश्चित है।

पौराणिक गाथा है कि महर्षि कश्यप की दो पत्नियाँ थीं-एक दिति दूसरी अदिति। दिति से दैत्य और अदिति से देव उत्पन्न हुए। दैत्य है- विज्ञान और देव है- अध्यात्म। दोनों आपस में लड़ेंगे तो कलह और विनाश के अतिरिक्त किसी के पल्ले कुछ न पड़ेगा। मिल-जुलकर समुद्र मन्थन करेंगे तो उनको श्रेय तथा समस्त विश्व को विविध-विधि लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।

गंगा और यमुना हिमालय के एक ही क्षेत्र से निकलती है। दोनों का उद्गम केन्द्र एक है। आँखें दो है, पर दोनों की अनुभूतियों के आधार पर दृश्य बिम्ब का निर्धारण एक ही मस्तिष्क केन्द्र करता है। कुछ दूर अलग-अलग बहने के कारण वे आगे चलकर परस्पर मिल जाती हैं। नेत्रों की ज्योति पृथक-पृथक है, पर दृश्य पर दोनों का ही फोकस एक हो जाता है और वे दोनों अलग-अलग दृश्य न देख कर जो देखती हैं उसका निष्कर्ष एक ही होता है। अध्यात्म और विज्ञान को एक ही हिमालय की दो गंगा-यमुना एक ही मस्तिष्क में धंसी हुई दो आँखें कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। वे एक दूसरे की प्रतिद्वन्दी या प्रतिपक्षी नहीं वरन् वस्तुतः परस्पर पूरक बन कर रह सकती हैं।

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