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Magazine - Year 1976 - Version 2

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क्या हम सचमुच ही मर जायेंगे?

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‘दि अदर वर्ल्ड’ ‘जर्नीज आऊट आफ दि बॉडी’ आदि ग्रन्थों में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का वर्णन है- जिसमें आत्माओं ने अपने शरीर को छोड़ कर सूक्ष्म शरीर के सहारे बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ किया है। इन घटनाओं से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि अशरीरी आत्माओं का किन्हीं दूसरों के शरीर में प्रवेश करके उनसे कुछ विशेष कार्य करा लेना सम्भव है। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि सूक्ष्म शरीर स्वयं इतना परिपुष्ट हो जाय कि शरीर धारी की तरह स्वयं ही अपने क्रिया-कलाप का परिचय दे सके।

अरविन्द आश्रम की संचालिका माता जी के बारे में कहा जाता है कि वे अपने बाल्यकाल में देह से आत्मा को बाहर निकाल कर सूक्ष्म शरीर से दूर-दूर की यात्राएं करती थीं।

परा मनोविज्ञान वेत्ता प्रो0 मुलडोन ने अपने ग्रन्थ ‘दि प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रेल बॉडी” में परकाया प्रवेश के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि एक ‘रजत तन्तु’ से आत्मा अपने स्थूल शरीर से सम्बन्ध बनाये रख कर भी अन्यत्र किस प्रकार जा सकता है और क्या कर सकता है?

हमारे शरीर का प्रत्येक भाग कोशिकाओं से बना है। एक इंच जगह में 6 हजार कोशिकाएं समा जाती हैं। प्रत्येक कोशिका के भीतर प्रोटोप्लाज्म नामक पतला चिकना पदार्थ भरा रहता है। यह प्रोटोप्लाज्म वायु-खींचता व कार्बन (दूषित वायु) बाहर फेंकता है। इस तरह हमारे शरीर के लाखों-करोड़ों प्रोटोप्लाज्म हमारी साँस के साथ साँस लेते हैं। प्रोटोप्लाज्म में एक ‘न्यूक्लियस’ होता है। वैज्ञानिक उसे ही जीवन का आधार मानते हैं। नई कोशिकाएं बनाने की उसी में क्षमता होती है। जब न्यूक्लियस निर्बल होने लगता है, तो प्रोटोप्लाज्म भी सूखने लगता है और एक दिन प्रोटोप्लाज्म से मूल चेतना गायब हो जाती है। वह कहाँ चली जाती है, यह अभी वैज्ञानिक नहीं समझ सके हैं।

वीर्य का प्रत्येक ‘सेल’ पिता के और माता की प्रत्येक डिम्बकोश (आवेम) माता के सभी गुणों को धारण किए रहती है। सूक्ष्म रोगों, तक का वीर्य के प्रत्येक ‘सेल’ में प्रभाव होता है। ‘सेल्स’ के ‘नाभिक’ में अचेतन के समस्त भावों का प्रभाव रहता है। यानी व्यक्ति के समस्त संस्कारों की छाप प्रत्येक सेल में होती है।

संस्कारों के इतने सूक्ष्म ‘सेल्स’ में भी पूर्णतः विद्यमान होने और उनका एक शरीर से दूसरे शरीर में संप्रेषण सम्भव होने का यह सिद्धान्त स्पष्टतः पुनर्जन्म के सिद्धान्त की भी युक्ति-युक्तता प्रतिपादित करता है। जिस तरह वीर्य के सेल के साथ सूक्ष्म संस्कार जाते हैं उसी तरह जीवात्मा के साथ भी वे बने रहते हैं और पुराने शरीर से नये शरीर में जाते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिकों की मान्यता है कि सम्भवत मृत्यु के समय शरीरस्थ ‘प्रोटोप्लाज्म’ शरीर से पृथक् हो मिट्टी राख आदि में मिल जाते हैं और वहाँ से वनस्पतियों, फसलों आदि में पहुँच जाते हैं। वनस्पतियों, फसलों, पेड़-पौधों की पत्तियों, फूलों और फलों-दानों आदि में वे सन्निहित रहते हैं। इन पत्तियों, फूलों, फलों-अनाज आदि को गुण-साम्य के अनुरूप भेड़-बकरी, कुत्ता, बैल-गाय-भैंस, कौआ-तोता, मनुष्य आदि खाते हैं और उनके द्वारा ‘प्रोटोप्लाज्म’ शरीर के भीतर पहुँच जाते हैं। यही ‘प्रोटोप्लाज्म’ ‘जीन्स’ में समाहित रहते हैं और नये शिशु के साथ पुनः जन्म लेते हैं। इस प्रकार पूर्व शरीर के प्राणी का प्रोटोप्लाज्म ही नये शरीर के साथ जन्म लेता है।

शिशु के स्मृति पटल में पहुँच कर जब कभी कोई प्रोटोप्लाज्म जाग्रत हो उठता है, तो उससे सम्बन्धित पूर्वजन्म की घटनाएं भी याद आ जातीं हैं। इस तरह पुनर्जन्म प्रोटोप्लाज्म का होता है, आत्मा का नहीं! लेकिन इधर आत्मा सम्बन्धी खोजें वैज्ञानिकों को अपना पूर्वाग्रह परिवर्तित करने को प्रेरित कर रही हैं।

विलियम मैण्ड्रगल ने आत्मा के बारे में तरह-तरह से वैज्ञानिक खोजें की हैं। उन्होंने एक ऐसा तराजू तैयार किया, जो पलंग पर पड़े रोगी का ग्राम के हजारवें हिस्से तक वजन ले सके। उस पर एक मरणासन्न रोगी को लिटाया। कपड़े सहित पलंग का वजन, फेफड़े की साँसों का वजन, सब ले लिया। रोगी का वजन भी लिया और दी जाने वाली दवाइयों का भी। रोगी जब तक जीवित रहा। तराजू की सुई एक ही स्थान पर टिकी गई। वह 1 ओंस यानी आधा छटाँक वजन कम बता रही थी। फिर कई रोगियों पर यह प्रयोग किया गया। एक चौथाई से डेढ़ अंश तक वजन में कमी पाई गई। इससे मैण्ड्रगल ने निष्कर्ष निकाला कि शरीरस्थ कोई सूक्ष्म तत्व ही जीवन का आधार है। विभिन्न निरीक्षणों, प्रयोगों द्वारा उन्होंने उसका सामान्य औसत भार भी निकाला।

डॉ0 गेट्स ने कालापन लिए लाल सी यानी वनफशई रंग की किरणें खोजी हैं। इन किरणों का प्रकाश मनुष्य आंख से नहीं देख सकता, पर कमरे की दीवारों पर ‘रोडापसिन नामक पदार्थ का लेप कर उस पर ये किरणें फेंकी गईं, तो उसका रंग बदल गया। ये किरणें हड्डी, लकड़ी, पत्थर, धातु को पार करके चमकने लगती हैं, पर इन किरणों को दीवार पर डाला जाए और बीच में कोई मनुष्य आ जाए, तो दीवार पर उसकी छाया दिखेगी यानी ये किरणें जीवित प्राणी का शरीर नहीं भेद सकतीं।

डॉ0 गेट्स ने इन प्रकाश- किरणों को तत्काल मरे पशुओं की आँखों से प्राप्त किया है। एक मरणासन्न चूहे को गिलास में रखकर ये किरणें फेंकी गईं। दीवार पर उस चूहे की छाया पड़ी। पर जैसे ही चूहे के प्राण निकले, एक छाया गिलास से निकली और मसाला लगी दीवार की तरफ लपकी। वह कुछ ऊपर तक गई और लुप्त हो गई। अब दीवार पर चूहे की छाया नहीं थी यानी चूहे का मृत शरीर उन किरणों के लिए पारदर्शी हो चुका था। परीक्षा के समय दो अध्यापक भी मौजूद थे। उन्होंने भी मृत्यु क्षण में छाया को ऊपर नीचे-जाते व सहसा लुप्त होते देखा। अब डॉ0 गेट्स का प्रयास है कि यह जाना जाए कि छाया जब शरीर से निकलती है-लुप्त होने के लिए तो उस समय उसमें ज्ञान रहता है या नहीं।

इन किरणों के लिए चूहा जीवित अवस्था में पारदर्शी क्यों नहीं था? गेट्स ने उत्तर के लिए गैलवानों मीटर से उन किरणों की शक्ति तथा मानवीय देह में संचालित विद्युत तरंगों की शक्ति को मापा व बताया कि शारीरिक बिजली की शक्ति अधिक है।

जीवित स्थिति में शारीरिक विद्युत प्रवाह तीव्रतर होने से ये किरणें शरीर से टकराकर लौट जाते हैं, शारीरिक विद्युत प्रवाह उन्हें धकेल देता है। निष्प्राण होने पर ऐसी कोई बाधा बचती नहीं और किरणें शरीर को भेद जाती हैं।

डॉ0 गेट्स शरीर की विद्युत शक्ति को ही आत्मा की प्रकाश-शक्ति मानते हैं।

फ्रांस के डॉ0 हेनरी वाराहुक ने अपनी मरणासन्न पत्नी एवं बच्चे पर प्रयोग कर मृत्यु के फोटो लिए तो कुछ रहस्यमय किरणों के चित्र प्राप्त हुए। डॉ0 एफ॰ एम॰ स्ट्रा ने तो इस तरह का सार्वजनिक प्रदर्शन ही किया, जिसमें अखबारी प्रतिनिधियों ने भी चित्र लिए और रहस्यमय किरणों के चित्र प्राप्त किए।

अमरीका में विलसा क्लाउड चेम्बर द्वारा आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी अनेक प्रयोग किए गए हैं। यह चेम्बर एक खोखला पारदर्शी सिलेण्डर है। इसके भीतर से हवा पूरी तरह निकालकर, भीतर रासायनिक घोल पोत देते हैं। इससे सिलेण्डर में एक मन्द प्रकाशपूर्ण कुहरा छा जाता है। इस कुहरे से यदि एक भी इलेक्ट्रॉन गुजरे तो फिट किए गये शक्ति सम्पन्न कैमरों द्वारा उनका फोटो ले लिया जाता है। सिलेण्डर में होने वाली हर हलचल का चित्र आ जाता है।

इस चेम्बर में जीवित चूहे और मेंढक रखकर बिजली के करेंट से उनको प्राणहीन किया गया। देखा गया कि मरने के बाद चूहे या मेंढक की हूबहू शक्ल उस रासायनिक कुहरे में तैर रही है। उस आकृति की गति विधियाँ सम्बन्धित प्राणी के जीवनकाल की ही गतिविधियों के अनुरूप थी। क्रमशः यह सत्ता धुंधली होती जाती है फिर कैमरे की पकड़ से बाहर चली जाती है।

लन्दन के प्रसिद्ध डॉ0 डब्लू0 जे0 किल्लर ने एक पुस्तक लिखी है-‘दि ह्यूमन एटमास्फियर’। इसमें उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण तथ्य गिनाकर भौतिक विज्ञान को इन चुनौतियों से जूझने का आह्वान किया है। एक तथ्य यह है-अपने सेन्ट जेम्स अस्पताल में डॉ0 किल्लर ने रोगियों के परीक्षण के दौरान एक दिन खुर्दबीन पर एक दुर्लभ रासायनिक रंग के धब्बे देखे। यह रंग आया कहाँ से, वे व्यग्रता से खोज करने लगे।

दूसरे दिन इसी रासायनिक रंग की लहरें उन्होंने एक रोगी की जाँच करते समय शीशे से देखीं और चौंक पड़े। रोगी के सभी कपड़े हटा दिए फिर देखा-रोगी के छह सात इंच की परिधि में वही लहरें एक आभामण्डल बनाए हैं। वह प्रकाश किसी भी शारीरिक अस्वस्थता का परिणाम नहीं था। प्रकाशमण्डल मन्द पड़ रहा था। डॉ0 किल्लर सतर्क हो गये। रोगी मरणासन्न था। जैसे-जैसे प्रकाश मण्डल मन्द पड़ता गया, रोगी शिथिल होता गया। सहसा वह प्रकाश जाने कहाँ खो गया। डॉ0 किल्लर ने देखा, रोगी निष्प्राण हो चुका था। अब उस ठण्डे शरीर के आस पास कहीं कोई रासायनिक रंग शेष नहीं रहा था। इस घटना की रिपोर्ट छपी तो लोग चकित रह गये।

वार्कले, कैलीफोर्निया (अमरीका) में कार्यरत डॉ0 लीसनेला और उनके साथियों ने इस विषय पर न केवल खोज की है, बल्कि ‘साइकोसिस और ट्रान्सेन्डेन्स?’ शीषेग् एक लेख में ‘द रिबर्थ प्रासेस’ (पुनर्जन्म प्रक्रिया) की गहरी छानबीन व दस्तावेजों से भरी व्याख्या भी प्रस्तुत की है।

डॉ0 सनेला के समूह ने शीजोफ्रेनिया, मेनिअक, डिप्रेसन (एक अवधि के लिए मानसिक उन्माद की स्थिति आ जाना फिर सामान्य मनःस्थिति, इसी तरह अनवरत क्रम) तथा मानसिक असन्तुलन जन्य अन्य रोगों के रोगानुसन्धानों का विवरण देते हुए यह तथ्य प्रदर्शित किया है कि उनमें से अधिकाँश उच्चतर मानसिक विकास की प्रक्रिया वाले वे लोग हैं, जो विराट आन्तरिक शक्तियों के अपरिपक्व तथा असन्तुलित प्रस्फुटन के कारण इस स्थिति में पहुँचे हैं। सनेला- समूह के अनुसार विकास की यह स्थिति वस्तुतः मानसिक रोग नहीं है बल्कि ‘पुनर्जन्म-प्रक्रिया’ की ओर यह गति मात्र है।

पहले विज्ञान पदार्थ की चार अवस्थाएं ही जानता था- ठोस, द्रव, गैस और प्लाज्मा। प्लाज्मा मात्र बाह्य अन्तरिक्ष में विद्यमान है, किन्तु भौतिकी प्रयोगशालाओं में भी उसे अत्युच्च तापमान पर उत्पादित किया जा सकता है।

प्रो0 ग्रिश्चेन्को के अनुसार जैव प्लाज्मा में इयान्स स्वतन्त्र इलेक्ट्रान और स्वतन्त्र प्रोटान होते हैं, जो कि नाभिक से स्वतन्त्र अस्तित्व रखते हैं। यह तीव्र संचालक है और दूसरे अवयवों या जीवधारियों में शक्ति के संग्रहण, रूपांतरण तथा संवहन में सक्षम होता है। यह मनुष्य के मस्तिष्क में और सुषुम्ना नाड़ी में एकत्रित रहता है। यह अत्यधिक दूरियों को तीव्र गति से लाँघ सकता है और इस तरह टेलीपैथी, मनोवैज्ञानिक और मनोगति की प्रक्रियाओं से सम्बन्धित है।

इस अनुसन्धान के बाद, सोवियत विज्ञान ने तेजी से इस क्षेत्र में प्रगति की है। अपने प्रयोगों के दौरान रूसियों ने अत्यधिक विकसित उपकरणों का उपयोग किया उच्च वोल्टेज वाली फोटोग्राफी की प्रक्रिया जिसमें इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप भी शामिल हों, क्लोज-सर्किट टेलीविजन तथा माशेन पिक्चर, टेक्नीक का उपयोग, जिसे एस0 डी0 कीर्लियन और व्ही0 के0 कीर्लियन ने विकसित किया है। रेडिएशन-फील्ड फोटोग्राफी को रूसी “कीर्लियन औरा’’ कहते हैं। इनके द्वारा प्रो0 ग्रिश्चेन्को की ‘बायो प्लाज्मा’ और उसके भारतीय समतुल्य ‘सूक्ष्म शरीर’ तथा उसमें परिव्याप्त प्राण आवरण की अवधारणाओं की पुष्टि होती है। इस तरह यह अज्ञात ईथर तत्व के जगत में वैज्ञानिकों द्वारा अति महत्वपूर्ण भौतिक आधारों की खोज है।

सोवियत रूस के प्रसिद्ध अन्तरिक्ष केन्द्र के पास अत्माअता में कजाकिस्तान राज्य विश्वविद्यालय की जैव विज्ञान प्रयोगशाला के निर्देशक डॉ0 ह्वी0 एम0 इन्युशिन पी0 एच0 डी0 ने अपने एक शोधपत्र में कहा है कि उच्चस्तरीय विशेषीकृत तथा क्लिष्ट विधियों के द्वारा अत्युच्च संवेदना वाली कीर्तियन-फोटोग्राफिक प्रक्रियाओं द्वारा पहले खरगोश और बाद में मनुष्यों के फोटोग्राफ लिए जाने पर, सोवियत वैज्ञानिक ‘बायोप्लाज्मा’ तथा शरीर के चारों ओर उसकी परिव्याप्ति (झीनी चादर) की फोटो लेने में सफल रहे हैं। कीर्लियन फोटोग्राफों से पता चलता है कि जैविक-प्रकाश (चमक) का कारण जैव प्लाज्मा है। इनका आकार होता है और इनमें ध्रुवीय छोर होते हैं।

प्रयोगों से प्रमाणित होता है कि-

(1) प्लाज्मा मस्तिष्क में सर्वाधिक सघन है।

(2) सुषुम्ना नाड़ी और उसकी स्नायविक कोशिकाएं बायोप्लाज्मा गतिविधियों के केन्द्र हैं।

(3) यह अंगुलियों के छोर तथा सूर्य चक्र कीं पीठ में अधिक सुदृढ़ होता है।

(4) रक्त की तुलना में स्नायुओं के केन्द्रों में अधिक प्लाज्मा होता है।

नेत्र तीव्र विकिरण के स्रोत हैं। (इससे पता चलता है कि हिप्नोटिस्ट क्यों अपने सब्जेक्ट की आँखों में गहराई तक झाँकते हैं और इस तरह अपने विचारों से उसे प्रभावित करते हैं।)

डॉ0 इन्सुशिन स्पष्ट करते हैं-अपनी प्रयोगशाला में हमने लगातार प्रयोग किये हैं- यह जानने के लिए कि क्या बायोप्लाज्मा का (प्राण शक्ति का) वास्तविक अस्तित्व है। हम जानते हैं कि प्रत्येक जीवधारी के पास एक ऐसी प्रणाली है जो शक्ति का विकरण करती है और अपने चारों ओर एक क्षेत्र (सूक्ष्म शरीर) तैयार करती है।

किन्तु हम जीवधारियों की शक्ति- प्रक्रिया को बहुत कम जानते हैं, विशेषकर टेलीपैथी में, जबकि दो व्यक्ति एक ऐसी दूरी पर रहते हुए एक साथ परस्पर सम्बद्ध क्रियाएं करते हैं कि उसकी प्रक्रिया परंपरागत साधनों द्वारा ठीक से समझाई नहीं जा सकती।

एक जीवित देहधारी को एक जैविक क्षेत्र कहा जा सकता है, जिसमें एक दूसरे को प्रभावित करने वाली शक्तिधाराओं का अस्तित्व हो। इन जैविक क्षेत्रों द्वारा विनिर्मित हैं-इलैक्ट्रोस्टेटिक, इलैक्ट्रोमैग्नेटिक, हाइड्रोडायनमिक, श्रव्य तथा सम्भवतः ऐसे अनेक क्षेत्र भी, जिनके बारे में हम अभी नहीं जानते। बायो-प्लाज्मा इनमें से किसी एक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।

मनुष्य की विभिन्न शरीर क्रिया वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं की जाँच की गई। देखा गया कि सुषुम्ना नाड़ी का केन्द्र, अनेक स्नायविक कोशिकाओं के गुच्छों के साथ (चक्र) जैव-प्लाज्मीय सक्रियता का केन्द्र है। बायो-प्लाज्मिक सक्रियता ‘भूड़’ पर निर्भर देखी गई। उदाहरणार्थ कलाकार किसी कलाकृति के बारे में सोचते समय उच्चस्तरीय चेतना की स्थिति में थे। यानी उनका ‘कोरोना’ अत्यन्त प्रकाशवान था, जबकि कुण्ठित, तनावग्रस्त व्यक्ति का ‘कोरोना’ बहुत पतला था तथा उसमें कई काले धब्बे थे।

शरीर में जैव प्लाज्मीय (बायो-प्लाज्मिक) क्षेत्र की सापेक्ष स्थिरता के बावजूद बायोप्लाज्मा के द्वारा शक्ति का एक महत्वपूर्ण अंश अन्तरिक्ष में विकीर्ण होता है। यह माइक्रोस्टीमर्स के रूप में हो सकता है या फिर ‘बायो-प्लाज्माइड्स के रूप में। माइक्रो स्टीमर्स हवा के द्वारा बनने वाले बायो-प्लाज्मिक अवयवों के स्रोत हैं, जबकि बायोप्लाज्माइड्स बायो प्लाज्मा के वे टुकड़े हैं, जो शरीर से अलग हो गये हैं (यानी वे कॉस्मिक-चेतना को मानवीय चेतना से जोड़ने के स्रोत हैं।)

एक अन्य प्रख्यात वैज्ञानिक जर्मनी के प्रो0 विलहेमरीच भी प्राण शरीर के अस्तित्व में भारतीय सिद्धान्त का, मानवीय देह की एक प्रतिकृति के अस्तित्व के रूप में समर्थन करते हैं। वे इसे ‘आर्गोन’ कहते हैं यानी एक जैव विद्युतीय शक्ति, जो नीले रंग की है।

सोवियत खोज को अमेरिकी वैज्ञानिकों के सामने प्रस्तुत करते हुए, शैला आस्ट्रेन्डर तथा लिन स्क्रोडर ने लिखा है, “सोवियतों को ऐसा साक्ष्य मिल गया प्रतीत होता है कि समस्त जीवधारियों में शक्ति का कोई साँचा, एक प्रकार का अदृश्य शरीर अथवा भौतिक शरीर को परिवृत करने वाला कोई प्रकाश पिंड होता है।’’

“इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की आँखों से इन वैज्ञानिकों ने प्रशान्त उच्चस्तरीय ‘फ्रीक्वेन्सी’ पर कोई ऐसी वस्तु निरन्तर ‘डिस्चार्ज’ होते देखी है, जो पहले ‘क्लेयर वोमेन्टस’ (भविष्यदृष्टा) ही देख पाते थे। उन्होंने जीवित देह में एक जीवित प्रतिकृति को गतिवान देखा है।

“यह प्रतिकृति क्या है? यह एक समग्र एकीभूत देह ही है।” जो एक इकाई की तरह काम करती बताई जाती है। यह अपने स्वयं के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों का अतिक्रमण करती है तथा जीव वैज्ञानिक क्षेत्र का यह आधार है।

यह जैविक प्रकाश पिंड, जो कीर्लियन चित्रों में देखा जा सकता है, बायोप्लाज्मा के द्वारा विनिर्मित है। कजाक वैज्ञानिकों के अनुसार इस कम्पनशील रंगीन, शक्ति-शरीर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसकी एक विशिष्ट स्थानिक संरचना है। उसमें आकार है तथा वह पोलराइण्ड भी है (यानी उसमें घोर भी है)।

यह हैं कुछ निष्कर्ष जो पदार्थ विज्ञान के आधार पर मरणोत्तर जीवन की सम्भावनाओं पर प्रकाश डालते हैं और शरीर त्यागने के उपरान्त भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहने की मान्यता का समर्थन करते हैं। किन्तु यह यों तो तथ्य का एक छोटा और भोंड़ा पक्ष है। वस्तुतः उस संदर्भ में दूसरे आधार पर नये सिरे से विचार करना होगा। विशाल ब्रह्माण्ड का लघुत्तम घटक अणु-अण्ड है। दोनों के सघन समन्वय पर ही इस संसार की विविध हलचलों की व्याख्या विवेचना सम्भव होती है। भौतिकी का सुविस्तृत शास्त्र इन्हीं शोध प्रयोजनों में संलग्न रहता है। यह विश्व का स्थूल आवरण हुआ उसका प्राणतत्व उस सूक्ष्मसत्ता के रूप में जाना जाता है जिसे ब्रह्माण्डीय चेतना अथवा ब्रह्म तत्व कहते हैं। विराट् ब्रह्म का लघुतम घटक जीव है। जीव और ब्रह्म के बीच होने वाले आदान-प्रदान पर ही चेतनात्मक हलचलों का आधार खड़ा है। जीव ब्रह्म में से ही उदय होता है और अन्ततः उसी में उसे लय भी होना पड़ता है। भौतिकी को आवरण विवेचना कहा गया है और ब्रह्म विद्या को चेतना का तत्वदर्शन। दोनों के अपने-अपने क्षेत्र हैं और अपने-अपने प्रयोजन। जिस दिन भौतिकी की तरह ब्रह्मविद्या का भी सुनिश्चित एवं प्रामाणिक शास्त्र बन कर तैयार हो जायगा उसी दिन जीव सत्ता और ब्रह्म सत्ता का पारस्परिक सम्बन्ध सम्पर्क ठीक प्रकार समझा जा सकेगा। ऋषियों ने अपने ढंग से दार्शनिक पृष्ठभूमि पर ब्रह्मविद्या का ढाँचा खड़ा किया था आज उन निष्कर्षों का समर्थन प्रत्यक्षवादी आधारों पर किये जाने की युग अपेक्षा है सत्य तो सत्य ही है। तथ्य तो तथ्य ही है। उन्हें इस आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है और उस आधार पर भी। ब्रह्म सत्ता को प्रत्यक्षवादी आधार ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में। दोनों का तारतम्य बैठ रहा है। आशा की जननी चाहिए कि अगले ही दिन जीव चेतना के सम्बन्ध में अनेकों महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रत्यक्षवादी पृष्ठभूमि पर भी प्रस्तुत हो सकेंगे तब सर्वसाधारण के लिए मरणोत्तर जीवन के अस्तित्व के तथ्य को सिद्ध कर सकना भी कुछ कठिन न रह जायगा।

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