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Magazine - Year 1976 - Version 2

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अहिंसा कितनी व्यावहारिक कितनी अव्यावहारिक

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प्रायः किसी को हानि पहुँचाने के लिए-किसी के साधनों एवं व्यक्तित्व का अपहरण करने के लिए ही आक्रमण किये जाते हैं। इसलिए उन्हें बुरा कहा जाता है, उनकी निन्दा की जाती है और आक्रमणकारियों को अपराधियों की पंक्ति में खड़ा करके दण्डित प्रताड़ित किया जाता है। समाज को आक्रमण की नीति असह्य है। प्रत्येक के नागरिक अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और उपार्जन पर किसी दूसरे को आक्रमण नहीं करना चाहिए यह सभ्य समाज की मान्यता है। इसे अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए समाज व्यवस्था, कानून व्यवस्था एवं दण्ड व्यवस्था का निर्धारण किया गया है। यह औचित्य एवं विवेक की मर्यादा है कि हर व्यक्ति अपना जीवनयापन स्वेच्छा से करे तो सही, पर साथ ही यह भी ध्यान रखे कि वह किसी दूसरे से टकराता तो नहीं-किसी को अनीति-युक्त क्षति तो नहीं पहुँचाता। व्यक्ति विशेष को अथवा समाज व्यवस्था को-सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुँचाना भी गर्हित है। किसी को यह छूट नहीं मिल सकती कि वह अपनी सुविधा के लिए दूसरों के अधिकारों का अपहरण करे और अवाँछनीय रीति-नीति अपनाकर अपने बड़प्पन का ठाठ बनाये। सामान्यतया नागरिक शास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र की विविध निर्धारणाएं इसी सन्तुलन को बनाये रखने के लिए हुई हैं।

अहिंसा को अध्यात्म मर्यादा का अति महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। उसका तात्पर्य इतना ही है कि किसी के उचित अधिकार अथवा सम्मान पर आक्रमण न किया जाय। जीव हिंसा या चोट पहुँचाना तो प्रत्यक्ष हिंसा है ही, अप्रत्यक्ष हिंसा किसी की अवमानना, उपेक्षा करना भी है। छल करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना एवं दूसरों को हानि पहुँचाना भी हिंसा है। यद्यपि उसमें मार-पीट जैसा कुछ नहीं होता। दूसरों को बहकाना, भ्रम में डालना, अनैतिक परामर्श-प्रोत्साहन देना, कुमार्गगामी बनाना, बुरी आदतों में फंसाना, मनोबल गिराना, अन्धकारमय भविष्य के चित्र दिखाकर खिन्न –उद्विग्न कर देना, डराना, हिंसा है। विवशता के कारण कोई अनैतिक दबाव, अनिच्छा रहते हुए भी करने के लिए बाध्य हो जाय ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करना भी हिंसा है। इस प्रकार की गतिविधियों में खून-खराबी या मार-पीट नहीं होती किन्तु दूसरों को भटकने या पतित करने का पथ प्रशस्त होता है। ऐसे आचरण हिंसा वर्ग में गिने जायेंगे।

मनुष्य एक दूसरे की सहायता ऊंचे उठने-आगे बढ़ने और सुखी बनाने के लिए करते रहें यही धर्म मर्यादा है। वैयक्तिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का ठीक तरह पालन किया जाता रहे तो ही दूसरों को बिना क्षति पहुँचाये सज्जनता भरा जीवन निर्वाह हो सकता है। मनुष्य एकाकी नहीं है, वह समाज यन्त्र का पुर्जा मात्र है। व्यक्ति की असंख्य आवश्यकताएं दूसरों की सहायता से ही पूरी होती है। अपने बलबूते दैनिक जीवन में उपस्थित होती रहने वाली आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकती। भोजन, वस्त्र, आजीविका एवं उपयोग में आने वाले छोटे-छोटे पदार्थों के लिए उसे दूसरों के श्रम तथा उपार्जन पर निर्भर रहना पड़ता है। इस सहयोग शृंखला की एक कड़ी स्वयं को भी बनना चाहिए और जिस प्रकार सहकारिता के सद्भावनाओं के उदार आधार विकसित होते रहें ऐसा ही दृष्टिकोण एवं आचरण रखा जाना चाहिए। इसी को सदाचरण एवं सद्व्यवहार कहते हैं। सज्जनता एवं शालीनता यही है। अध्यात्म की भाषा में इसी को अहिंसा कहते हैं। अहिंसा निषेधात्मक शब्द है अच्छा होता इसे प्रेम अथवा सद्भाव, उदार, सहकारिता कहा जाता और उसकी व्याख्या अधिकार से अधिक कर्त्तव्य का ध्यान रखने की रीति-नीति के रूप में की जाती।

हिंसा का अर्थ मारकाट या खून-खराबी मानने तक सीमित कर देने से उस उच्चस्तरीय तत्व दर्शन की एक प्रकार से मिट्टी पलीद हो जाती है और उपहासास्पद दुर्दशा बन जाती है। बौद्ध धर्मानुयायी बकरे को मुँह बाँधकर गला मरोड़ कर मारते और उसका माँस पकाकर खाते हैं। उनकी अहिंसा मान्यता इतने भर में पूर्ण हो जाती है कि किसी प्राणी के शरीर से रक्त न टपके। इतनी ही बात हो तो अफीम जैसा कष्ट रहित विष देकर किसी का प्राण हरण कर लेने में भी हिंसा नहीं मानी जायगी।

दूसरी ओर यह भी अहिंसा का अतिवाद है कि साँस या पानी के माध्यम से पेट में पहुँचने वाले अदृश्य जीवाणुओं की रक्षा करने की बात सोची जाय। ऐसे तो अन्न, शाक एवं वनस्पतियों में भी जीवन है। कृषि योग्य जमीन में रहने वाले जीवाणु ही वनस्पति बनते हैं और हमारे जीवन का आधार रहते हैं। “जीवों जीवस्य भोजनम्” उक्ति का तात्पर्य इतना ही है कि जीवन युक्त खाद्य पदार्थ प्राणियों का आहार है। यहाँ माँसाहार का समर्थन नहीं। मात्र इस तथ्य का प्रतिपादन है कि प्राणियों के शरीर जीवन युक्त पदार्थों के सहारे टिके रहते हैं। वनस्पति में जीवन का होना तो स्पष्ट है। उनमें ज्ञान सम्वेदनाएं न्यूनतम होती हैं वे हमारी तरह न तो मरण कष्ट अनुभव करते हैं और न जीवन की हमारे जैसे विकसित स्तर की प्रसन्नता होती है, फिर कुछ होती भी हो तो विवशता है। वनस्पति को उदरस्थ करके जीवित रहा जाय अथवा अन्न, जल और वायु में रहने वाले जीवाणुओं का ध्यान रखकर इनका उपयोग छोड़ा जाय और जीवन समाप्त किया जाय? इस प्रश्न के समाधान में जीवन रक्षा को ही प्रधानता देनी पड़ती है और उसे प्रकृति व्यवस्था मानकर सन्तोष करना पड़ता है। वनस्पति आहार एवं जल ग्रहण में भी हिंसा मानी जाय तो उसे न्यूनतम अनिवार्य अपरिहार्य मानकर अंगीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।

रास्ता चलते पैरों के नीचे छोटे कीड़े-मकोड़े अनजान में ही मर जाते हैं, चूल्हा जलाने में-खेत जोतने, पौधे सींचने में भी अवश्य ही कुछ दृश्य-अदृश्य कीड़े अनजान में ही मरते होंगे। इनकी रक्षा अपने जीवन को निष्क्रिय बनाकर अथवा अन्त करके ही की जा सकती है। इतने आगे की बात सोचना भावनात्मक दृष्टि से प्रतीक रूप में तो हो सकता है, पर पूर्णतया पालन सम्भव नहीं। पानी छानकर पीने या नाक पर पट्टी लटकाने से भी सूक्ष्म जीवाणु भीतर नहीं जायेंगे इसकी कोई गारण्टी नहीं। रास्ते झाड़ते हुए चलने पर भी उस झाड़ने की क्रिया से भी हिंसा होती-हो सकती है। इसलिए भाव प्रतीक के रूप में ही ऐसी रक्षा पंक्ति खड़ी तो की जा सकती है, पर वस्तुतः इस प्रकार की अति अहिंसा व्यावहारिक नहीं हो सकती।

हिंसा वस्तुतः एक वृत्ति है जिसमें प्राणि मात्र के प्रति न्याय का उद्देश्य जुड़ा है। किसी को कष्ट होने न होने के रूप में उसकी व्याख्या होने लगे तब तो वह स्थूल परिभाषा ऐसा धर्म संकट उत्पन्न कर देगी जिसे आत्महत्या के अतिरिक्त और किसी प्रकार सुलझाया न जा सकेगा।

डाक्टरों को नित्य ही इन्जेक्शन लगाने पड़ते हैं और आये दिन छोटे-बड़े आपरेशन करने पड़ते हैं। इन्हें हिंसा कहा जाय या अहिंसा? न्यायाधीश को मृत्यु दण्ड जैसे फैसले करने पड़ते हैं और बन्दीगृह के अधिकारियों को उस कठोर कर्म की व्यवस्था करनी पड़ती है। उन न्यायाधीशों और जेल अधिकारियों को क्या कहा जाय? सामाजिक सुरक्षा, न्यायनिष्ठा एवं अव्यवस्था निवारण के लिए की गई हिंसा के सम्बन्ध में शास्त्र की उक्ति है “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” अर्थात् विवेक की दृष्टि से न्यायोचित आधार पर किसी को दिया गया कष्ट वस्तुतः हिंसा की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे तो पुलिस को लाठी चार्ज और सेना को गोलाबारी भी करनी पड़ती है। यह आत्मरक्षा के लिए-न्याय रक्षा के लिए औचित्य बनाये रहने के लिए किया गया बलप्रयोग किन्हीं को कष्टकर भी हो सकता है, पर उससे अहिंसा के आदर्श को कोई क्षति नहीं पहुँचती।

कुछ हिंसा कर्म प्रत्यक्ष होते हैं और उन्हें अपनी ओर से भी करना पड़ता है, पर वे अनिवार्य हैं- न किये जायं तो आत्म रक्षा भी सम्भव न हो सकेगी। घर में बस गये साँप, बिच्छुओं को प्रेमपूर्वक विदा करने का कोई उपाय नहीं है। उन्हें हटाने के लिए मारने की आवश्यकता पड़ सकती है। घर में बढ़े हुए मक्खी, मच्छरों का क्या किया जाय? कपड़ों और बालों में पड़ने वाले जुएं तथा चारपाइयों में घूम हुए खटमलों से कैसे निपटा जाय। इसका अहिंसात्मक समाधान ढूँढ़ा जाय तो एक ही हल निकलेगा कि अपने आपको जोखिम में डालकर बेमौत मरा जाय?

आँतों में कई बार आँखों से दिख पड़ने वाले कीड़े पाये जाते हैं। जख्मों में पड़ने वाला मवाद कीटाणुओं द्वारा उत्पन्न की गई सड़न प्रतिक्रिया ही है। उसमें ‘माइक्रोस्कोप’ से विषाणु रेंगते हुए प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। प्रायः प्रत्येक रोग में विषाणुओं की उपस्थिति पाई जाती है और उन्हीं को मारने के लिए समस्त चिकित्सा उपचार किये जाते हैं। यदि शाब्दिक हिंसा-अहिंसा के फेर में पड़ा जाय तो पूरे का पूरा चिकित्सा कार्य एवं औषधि निर्माण कार्य हिंसा कृत्य ठहराया जा सकता है।

आक्रमणकारी आततायियों से जूझना आवश्यक है। अन्यथा वे दुष्टता का प्रतिरोध न होने पर अधिकाधिक उद्दण्ड होते चले जायेंगे और अपनी विनाशलीला को चरम सीमा तक पहुँचाये बिना रुकेंगे नहीं। हिंस्र जन्तुओं के प्रति दया पाली जाय तो वे असंख्य निरीहों का प्राण हरण करेंगे। एक हिंसा रुकी और हजार हिंसा करने का कठोर निर्णय करना पड़ेगा। आक्रमणकारी आततायियों का मुँह तोड़ने के लिए यदि प्रत्याक्रमण करना पड़ता है तो उसका आपत्ति धर्म की तरह पालन करना ही पड़ेगा।

अहिंसा धर्म के प्रबल प्रतिपादक महात्मा गाँधी कहते थे- ‘‘कायरता से हिंसा अच्छी” वे अनीति का प्रत्येक सम्भव निराकरण चाहते थे। अहिंसा द्वारा वैसा हो सकता हो तो सर्वोत्तम अन्यथा यदि अनीति और हिंसा में से एक का चुनाव करना पड़े तो अनीति सहने की अपेक्षा हिंसा जैसे कदम उठाये जा सकते हैं। यही उनका प्रतिपादन था। गाँधी जी ने एक बार अति कष्ट पीड़ित असाध्य एक बछड़े को आसानी से प्रयाण कर सकने की सुविधा देने के लिए डॉक्टर को जहर की सुई लगा देने की इजाजत दे दी थी। वह प्रत्यक्षतः हिंसा ही हुई, पर उसमें उस मरणासन्न प्राणी की अति पीड़ा को सरल बनाने की करुणा का ही भाव था इसलिए उसे अहिंसा के स्तर पर ही रखा जायगा।

जीवित रहने के लिए आक्रमणकारी कृमि-कीटकों से लेकर आक्रमणकारी हिंस्र आततायियों से जूझने और उन्हें निरस्त करने की आवश्यकता पड़ती है। निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं में अन्न, जल, वायु, आग आदि को गिना जा सकता है उनके उत्पादन उपयोग में भी किन्हीं छोटी जाति के कृमि कीटकों का हनन हो सकता है। यह अनिवार्य हिंसा है। आततायी आक्रमणकारियों से जूझना वैदिकी हिंसा है। उसमें न्याय एवं औचित्य की रक्षा करने की दूरदर्शी विवेकशीलता जुड़ी हुई है। ऐसी हिंसा मानवी मर्यादाओं को तथा सामाजिक सुव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए करनी पड़ती है। इसमें कुछ अवाँछनीय तत्वों को कष्ट हो सकता है, पर सार्वजनिक सुरक्षा का उद्देश्य पूरा करने वाले उस कठोर कृत्य को भी मान्यता देनी पड़ती है।

अहिंसा एक आदर्श एवं दृष्टिकोण है। जिसमें दूसरों के सम्मान तथा अधिकार को अक्षुण्ण रहने देने की दृढ़ता का समावेश है। उसमें आत्मीयता, सहनशीलता, करुणा एवं उदारता का समावेश है। अपने कष्ट की ही तरह यदि दूसरों के कष्ट को भी माना जाय, अपनी क्षति की तरह ही यदि दूसरों की क्षति भी आँकी जाय तो सहज ही उस तरह की नीति अपनानी पड़ेगी जैसी कि हम दूसरों द्वारा अपने प्रति अपनाये जाने की अपेक्षा करते हैं। अहिंसा का मोटा अर्थ दूसरों को कष्ट न देना होता है, पर यह तभी व्यावहारिक होगा जब उसमें अनिवार्य जीवन रक्षा, औचित्य एवं आक्रान्ताओं को निरस्त करने के लिए अपनाई गई हिंसा को भी आपत्ति धर्म के रूप में स्वीकार सम्मिलित कर लिया जाय।

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