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Magazine - Year 1976 - Version 2

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यान्त्रिक जीवन में हमारी खो रही संवेदना

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आज के नागरिक की दिनचर्या, रहन-सहन और आदतें देखकर उसकी जो तस्वीर बनती है वह यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य का जीवन भी एक यन्त्र की तरह हो गया है। पाषाण, लौह और ताम्रयुगीन विभाजनों के साथ वर्तमान सन्दर्भों को देखा जाय तो इसे निश्चित ही यन्त्र युग कहना पड़ेगा। क्योंकि मनुष्य का जीवन और यान्त्रिक उपकरण परस्पर इतने घनिष्ठ हो गये हैं कि उन दोनों को एक दूसरे से विलग कर पाना ही असम्भव है। उस क्षण की स्थिति को कल्पनाँकित ही नहीं किया जा सकता, जबकि मनुष्य का जीवन यन्त्रों की सुविधा से एकदम रहित हो जाय। मिल कपड़े बनाते हैं, कारखानों में खाद्य तैयार होते हैं, साबुन, तेल, ईंधन आदि सब किसी न किसी रूप में मशीनों से सम्बद्ध मिलेंगे। यहाँ तक कि जिस रोशनी का हम रात-दिन उपयोग करते हैं वह भी रात-दिन मशीनों द्वारा ही पैदा होती है और हम तक पहुँचाई जाती है।

हम जिन परिस्थितियों, वातावरणों तथा वस्तुओं के संसर्ग में रहते हैं, उनका हम पर प्रभाव पड़ता है और हमारा उन पर। मनुष्य से समाज बनता है और समाज मनुष्य को बनाता है। मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित होता है और वातावरण मनुष्य को प्रभावित करता है। प्रभाव पड़ने या पैदा होने की यह प्रक्रिया दोनों ओर से होती है एकाँगी कभी नहीं। लेकिन यन्त्रों के सम्बन्ध में कुछ और ही सचाई है। सिलाई की मशीन पाँव चलाने से चलती है और रोक देने पर बन्द हो जाती है। बाद में वह कोई गति नहीं करती, परन्तु दिन-रात सिलाई मशीन पर बैठने वालों के पाँव कभी-कभी अपने आप भी चलने लगते हैं। यह आदतन प्रभाव है।

आदतन प्रभाव की तरह ही मनुष्य भावनाओं से भी प्रभावित होता है और आजकल ‘यान्त्रिक-सभ्यता’ की समीक्षा करते समय इसी भावनात्मक प्रभाव की चर्चा की जाती है। हाँलाकि संसर्ग के अतिरिक्त इसके और भी कई कारण हैं। इसी तथ्य की ओर इशारा करते हुए प्रसिद्ध विचारक नीत्शे ने कहा था-‘‘यन्त्र जितनी तीव्रता से प्रगति कर रहा है उसी अनुपात से मनुष्य की धर्म सम्वेदना का ह्रास हो रहा है। समस्त भौतिक सुविधाओं से सम्पन्न हो जाने पर भी मनुष्य इतना आत्म-विपन्न हो रहा है कि बीसवीं शती के अन्त तक वह एकदम खोखला हो जायेगा और भयंकर रूप से दुःखी रहने लगेगा।’’

इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक विचारक का कथन है कि- “आज के युग में जीने वाले व्यक्ति की स्थिति विचित्र कम और शोचनीय अधिक है। समस्त मानवीय सम्बन्ध अब केवल वित्तीय स्तर पर बनते हैं अन्य सभी माध्यमों को या तो नगण्य घोषित कर दिया गया है अथवा फिर यान्त्रिकता से जकड़े हुए नये समाज में वे किसी अज्ञात प्रक्रिया द्वारा स्वतः डूबते जाते हैं।” चूँकि मनुष्य समाज का एक अंग है और इस नाते उसे दूसरे अन्य अंगों के सम्पर्क में आना पड़ता है। मानवता का तकाजा तो यह है कि हम अपने पड़ौसियों के दुःख-सुख में काम आयें, उनकी खैर-खबर रखें और कुशल-क्षेम से अवगत रहने के साथ-साथ समय-समय पर काम भी आयें। परन्तु पड़ोसियों के प्रति यह आत्मीयता का भाव धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। महानगरों की स्थिति तो यह है कि वहाँ रहने वाला एक व्यक्ति अपने पड़ोसी के दुःख-दर्द में साथ देने के स्थान पर उसे जानता तक भी नहीं। शहरों और कस्बों के नागरिकों को भी अपनी समस्याओं से कम ही फुरसत मिल पाती है और इस फुरसत को पड़ौसियों से मेल-जोल बनाने के स्थान पर सिनेमा देखने या सैर करने में गुजारना अधिक अच्छा समझते हैं।

पड़ौसियों से कटे रहने तक की ही बात सीमित रहती तो इतनी शोचनीय स्थिति नहीं आती। आश्चर्य तो तब होता है जब लोगों को अपने रिश्तेदारों और सम्बन्धियों से सम्पर्क रखने का भी समय नहीं मिलता। यही नहीं आदमी अपनी बीमार पत्नी के पास बैठने की अपेक्षा दिन भर की थकान उतारने के लिए रेडियो सुनना और घूमने निकल जान अधिक अच्छा समझता है। कोई अभिभावक ऐसे हैं जो अपने बच्चों की पढ़ाई में क्या स्थिति है- इससे अनभिज्ञ रहते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें अपने शहर में रहने वाले मित्रों और सम्बन्धियों के घर न जाये ही महीनों बीत चुके हैं। अर्थात् मनुष्य समाज में रहता तो है अवश्य, पर समाज के प्रति उसके क्या उत्तरदायित्व हैं- या तो वह अनभिज्ञ है अथवा जान-बूझकर उनकी उपेक्षा करता है।

इतना एकाकीपन होने के बावजूद भी मनुष्य आर्थिक दृष्टि से किसी से सम्पर्क सूत्र कायम करने में चूकना नहीं चाहता। कई लोगों को अक्सर यह कहते सुना जाता है- फूफाजी के पास जाने से क्या फायदा अब तो वे चाय तक के लिए नहीं पूछते। जैसे चाय पीना ही मिलने का उद्देश्य हो और इन सबका कारण यंत्र युग को बताया जाता है। कारण है कि यंत्रों की बाढ़ ने मनुष्य का श्रम हल्का किया है और उसकी सुविधाएं बढ़ाई हैं। इसलिए उपभोग सामग्रियों से बाजार भरे पड़े हैं। जो समर्थ हैं, वे उन्हें खरीद सकते हैं तथा वे भी उनका वैसा ही उपयोग करने के लिए अतिरिक्त आर्थिक साधन चाहिए। इस समर्थता और असमर्थता ने सम्पन्नता को ही प्रतिष्ठा का बिन्दु बना दिया है। जिसे हर कोई बींधना चाहता है और उसे बींधने में इस कदर लवलीन है कि उसे अपने आस-पास की चीजें भी नहीं दिखाई दीं।

यान्त्रिक संसर्ग का जहां तक प्रश्न है मशीनी वातावरण में रहने का अपना एक अलग प्रभाव है। लेकिन उससे भी अधिक बुरी तरह प्रभावित और आत्म-विपन्न कर देने वाली स्थिति बदलते दृष्टिकोण से उत्पन्न हुई है। जिसने वित्तीय- दशा को ही सर्व प्रधान बना दिया और उसे पूरा करने के लिए मनुष्य इतना मदमत्त होकर दौड़ने लगा कि एकाकीपन, संत्रास, आत्म-विपन्नता, स्वकेन्द्रित मनोवृत्तियां, कुण्ठाएं और विक्षेप उसे चारों ओर से छेदने लगे हैं। मशीनों के संसर्ग का एक दिन व्यवस्थित कार्य-क्रम है, जो सुखी जीवन की एक निश्चित गारण्टी है। परन्तु उसके बावजूद और-और कारण जो यान्त्रिक सभ्यता के दोषों से विषाक्त करते हैं मनुष्य को तनावग्रस्त तथा असुरक्षित बनाते हैं।

अब से 25-50 साल पहले युवकों के सामने जीवन में प्रवेश करने का यह एक रेडीमेड तरीका था कि पढ़ना-लिखना और डिग्री प्राप्त करना तथा उसके बाद नौकरी से लग जाना या शिक्षा प्राप्त करना। नौकरी धन्धे से लगने और परिवार बस जाने के बाद भी युवक को परिवार का आर्थिक संरक्षण मिलता रहता था। इसका एक कारण तो यह था कि उस समय संयुक्त परिवार प्रथा थी। जिसके सभी सदस्यों के हित परस्पर जुड़े हुए थे तथा प्रत्येक एक दूसरे के प्रति अपने दायित्वों का अनुभव करते थे। लेकिन आज संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं और एकाकी परिवार अधूरी-अधकचरी स्थिति में जीते हुए अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की आशा बांधे रहते थे। अपने माता-पिता और सहोदर भाई-बहनों से सिकुड़ कर मानवी गतिविधियों का केन्द्र पत्नी, बच्चे और स्वयं तक ही सीमित हो गया है। जो संयुक्त परिवार किसी प्रकार टूटने से बचे हुए हैं, जिनके सदस्य एक दूसरे के प्रति अपने कुछ दायित्व अनुभव करते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए सजग रहते हैं, वे भी नौकरी और रोजगार करने के लिए बिखरे पड़े हैं। कहने का अर्थ यह है कि आर्थिक स्थिति मजबूत करने और सुदृढ़ बनाने के चक्कर में हम और अधिक दीन-हीन व एकाकी बनते जा रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जो लोग अपने माता-पिता और सहोदर भाई-बहिनों के लिए ही कुछ करना व्यर्थ समझते हों वे पड़ौसियों और मित्रों के लिए कुछ करने की क्या सोचेंगे?

अकेलेपन का यह मानसिक प्रभाव नगरीय लोगों में अधिकांशतः है। इसकी तुलना सौ वर्ष पुराने समाज से करते हुए लिखा गया है- ‘‘उन्नीसवीं शती का मनुष्य अपनी आत्म-सम्पन्नता के बल पर ही अनेक दुःख झेलकर भी मानवीयता से भ्रष्ट नहीं हो पाता था और उसकी इस आत्म-सम्पन्नता के पीछे संयुक्त परिवार प्रथा, धर्म और संस्कारों का बहुत बड़ा हाथ था। जब कि बीसवीं शती का मनुष्य इतना बहिप्रविष्ट हो गया है कि सामान्यतया स्वयं को नगण्य व एकाकी मानता हुआ किसी भी क्षण अपने आपको दूसरों के हाथों में छोड़ देने के लिए विवश हो जाता है या मजबूरन अपने को तैयार करता है।’’

यान्त्रिक सभ्यता में मनुष्य की दृष्टि का केन्द्र बिन्दु बदला है और उसने मानवीयता के स्थान पर आर्थिकता को व्यक्ति की प्रत्यभिज्ञा माना है। वही उसका अपना जीवन भी एकरस और उनके कारण विद्रोही बना है। हाल ही में पिछले वर्षों ब्राक्स में एक अद्भुत घटना घटी। एक बस ड्राइवर अपनी बस समेत अनायास लापता हो गया। तीन-चार दिन बाद वह बस समेत फ्लोरिडा में पकड़ा गया। इस बीच अखबारों में वह बड़ी चर्चा का विषय बन गया। बस कम्पनी के मालिकों ने जब उससे भागने का कारण पूछा तो उसने बताया कि पिछले सात वर्षों से वह एक ही रूट पर बस चलाते-चलाते और उन्हीं स्थानों पर बार-बार बस रोकते-रोकते बुरी तरह बोर हो गया है। परिवर्तन के लिए ही उसे फ्लोरिडा आने का निर्णय लेना पड़ा।

जैसा कि कहा जा चुका है कि मनुष्य के पास पहले की अपेक्षा आज अधिक सुनिश्चित और व्यवस्थित कार्य-क्रम है। परंतु उसकी उबाऊ एकरसता ने मनुष्य की चेतना को एकरस बना दिया है और वह इस स्थिति को स्वीकार करने के लिए एकदम से तैयार नहीं है। इस उबाऊ एकरसता के कारण वह बोरियत अनुभव करता है और उसे तोड़ देने के लिए स्वच्छंदता, उन्मुक्तता और हिप्पीवाद की अनेकानेक भ्रान्त धाराओं में वह निकलना चाहता है। यंत्र जिस प्रकार एक ही गति और लय में चलता है उसी प्रकार मनुष्य भी एक ही स्थिति को बार-बार भोगने के लिए अपने आपको विवश अनुभव करता है। कहने का अर्थ यह है कि वह अपने आपको कोल्हू के बैल वाली स्थिति में पाता है, जिसे उसकी प्रवाहमान गतिशील चेतना किसी भी दशा में भोगने को तैयार नहीं है। एक अर्थ शास्त्री के शब्दों में मनुष्य की चेतना ह्रासमान उपयोगिता की भांति सम्वेदना शून्य बनती जा रही है। वह व्यक्ति को इस सीमा तक जड़ी भूत किये दे रही है कि वह उकता कर अपने आपको ऐश्वर्य से बचाने के लिए छटपटा रही है।

यह स्थिति ऐश्वर्य सम्पन्न लोगों के लिए ही नहीं है। उन लोगों के लिए भी उसी प्रकार विकराल है जिनकी दौड़ ऐश्वर्य का लक्ष्य सामने रखकर चल रही है। ऐश्वर्यशाली अपने ऐश्वर्य में आत्मा को खोया अनुभव करते हैं तो ऐश्वर्य-अभिलाषी अपनी आकांक्षा के दहर में आत्मा को दग्ध पा रहे हैं।

इन सब बातों का यह अर्थ नहीं है कि यन्त्र सभ्यता को छोड़कर समाज पीछे चला जाये। यह एक और बड़ी गल्ती होगी। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने मूल्यों को सुरक्षित रखते हैं यन्त्रों द्वारा श्रम की थकान को कम करें, न कि नष्ट। इसके लिए बदलती आय की मान्यताओं पर तीक्ष्ण दृष्टि रखने की आवश्यकता है।

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