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Magazine - Year 1976 - Version 2

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एक आँख दुलार की एक आँख सुधार की

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प्यार शब्द में असीम मृदुलता और सुखद सम्भावना भरी पड़ी है। सद्भाव और सद्व्यवहार की सघनता को प्यार कहते हैं। जिनके साथ इस प्रकार के आश्वासन का आदान-प्रदान चल पड़े, उन्हें स्नेह सूत्र में आबद्ध हुआ कहा जा सकता है। मैत्री यों समवयस्कों में अधिक फवती है, पर वह इतने तक ही सीमित है। आयु, पद, वैभव, वर्चस्व आदि में असाधारण अन्तर होने पर भी वह निर्बाध रूप से निभती है। अन्तर इतना भर होता है कि दोनों पक्षों की स्थिति के अनुरूप उसके स्वरूप एवं व्यवहार में थोड़ा सा अन्तर आ जाता है। इतने पर भी मूल स्थिति यथावत् बनी रहती है।

बड़े और छोटे के बीच पनपने वाली मैत्री वात्सल्य एवं श्रद्धा के नाम से जानी जाती है। बड़े, छोटों के प्रति वात्सल्य भाव रखते हैं और छोटों को बड़ों के प्रति श्रद्धा रहती है। सेवक और स्वामी के बीच भी गहरा सद्भाव और वफादारी का सुदृढ़ आधार बना रह सकता है, उनकी यह ‘मैत्री अनुराग या ऐसे ही किसी नाम से पुकारी जा सकती है। सघन मित्रता तो घनिष्ठ सम्पर्क क्षेत्र में कुछ ही व्यक्तियों तक सीमित रहती है, पर सौजन्य असंख्य लोगों तक विस्तृत हो सकता है। आत्मवत् सर्वभूतेषु- वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्शानुसार वह मानव मात्र की परिधि तक सीमित न रह कर प्राणि मात्र तक व्यापक हो सकती है। श्रुति अनुशासन है कि हम मैत्री की आँख से सब को देखें। इस प्रकार का दृष्टिकोण अपना लेने पर आत्मीयता इतनी विस्तृत बन जाती है कि उसके आँचल में इस समस्त संसार को ढका जा सके।

आदान-प्रदान के क्षेत्र में मित्रता, लाभ और लोभ के आधार पर प्रारम्भ होती है और उपलब्धियों के आधार पर घटती-बढ़ती रहती है। ग्राहक और व्यापारी के बीच प्रधानतया इसी कारण घनिष्ठता पनपती है और पीछे उसमें स्वभाव की समता एवं व्यक्तिगत सद्व्यवहार का खाद पानी लगते रहने पर पौधा और भी अधिक तेजी से पनपता रहता है। वर्ष प्रवेश में कलेण्डर आदि उपहार तथा दिवाली, क्रिसमस जैसे त्यौहारों पर ‘ग्रीटिंग कार्ड’ आदि भेजने में-चाय पर बुलाने तथा जाने में-मिलने पर स्वागत सत्कार पर कुछ खर्च करने में प्रायः मित्रता की अनुभूति उभारना ही प्रधान कारण रहता है। समान व्यसन के लोग भी स्वभाव गत आकर्षण से मित्र बन जाते हैं। नशेबाजी, आवारागर्दी, खिलाड़ीपन, व्यभिचार, जुआ, शौकीनी आदि पतनोन्मुख एवं सत्संग, सहगान सेवा सहकार, साम्प्रदायिक समता जैसे कारणों से प्रगतिशील मैत्री पनपती देखी गई है। किसी आपत्ति से बचा लेने अथवा उन्नति में विशेष सहायता कर देने पर भी मित्रता का बीजाँकुर जम जाता है और यदि उसका सिंचन होता रहे तो कृतज्ञता की अनुभूति के साथ वह बढ़ता भी रहता है।

गुण, कर्म, स्वभाव की समता सहज ही मित्रता के रूप में परिणत हो जाती है भले ही वह उथले स्तर की सिद्ध होती हो। समता में कई प्रकार की आकर्षक सम्भावनाएं जुड़ी रहती हैं। समर्थन, सहकार एवं आदान-प्रदान की अधिक गुंजाइश समान स्तर के लोगों में ही होती है। अस्तु ‘चोर-चोर मौसेरे भई की उक्ति ऐसे प्रसंगों में सहज ही चरितार्थ होने लगती है। रूप, यौवन, वेश-विन्यास, सज-धज आँखों में मादकता उत्पन्न करती है। और सुन्दरता के ऊपर मन अनायास ही टूट पड़ता है। वाणी की मधुरता, मृदुल व्यवहार बहुधा अपना आकर्षक प्रभाव छोड़ता है। गीत, वाद्य, नृत्य, साहस, चातुर्य, कला-कौशल जैसे गुणों में भी ऐसा खिंचाव रहता है। जिसके आधार पर अपरिचितों तक के बीच बात की बात में मित्रता हथेली पर सरसों की तरह जादुई रीति से जमती, उछलती देखी गई है। भले ही वह पानी के बुलबुले की तरह देखते-देखते ही समाप्त क्यों न हो जाय।

प्यार भौतिक कारणों से भी हो सकता हैं, पर उसमें न तो स्थायित्व है, न गहराई, न तृप्ति। साधारणतया नर और नारी के बीच प्रकृति प्रेरणा से उत्पन्न यौनाकर्षण ही प्यार के नाम से बहुचर्चित है। शृंगारिकता से लेकर अश्लीलता तक की पृष्ठभूमि पर इसी की विरुदावलियाँ गाई जाती हैं। कला क्षेत्र में प्रायः इसी तत्व का साम्राज्य है। गायक इसी के गीत गाते-वादक इसी पर बजाते और अभिनेता इसी के अभिनय करते देखे जाते हैं। मूर्तिकार, चित्रकार, गीतकार, साहित्यकार अपनी-अपनी कलाकृतियों में वासना भड़काने वाली मांसलता को उभारने और भड़काने में संलग्न पाये जाते हैं। यदि प्रेम का यही आधार है तो फिर वासना तृप्ति की तरह क्षुधा-तृप्ति का उपक्रम भी प्रेम ही कहा जायगा। जिह्वा इन्द्रिय को सुस्वादु भोजनों में कितनी सरसता अनुभव होती है और पाक-विद्या के अन्तर्गत इस प्रयोजन के लिए की जाने वाली दौड़-धूप और जुटाया गया सरंजाम भी प्रेम प्रसंग ही कहा जायगा। अन्यान्य इन्द्रियाँ भी अपने रुचि क्षेत्र पर इसी प्रकार का दावा कर सकती हैं। तब कदाचित हिंस्र पशुओं द्वारा कोमल माँस वाले प्राणियों का रुचिपूर्वक उदरस्थ करना भी, इस श्रेणी के क्रिया-कलापों में गिने जाने में आना-कानी करने की भी गुंजाइश न रहेगी।

प्रेम वस्तुतः भौतिक नहीं आत्मिक है वह पदार्थ-परक नहीं। शरीरों समेत अन्यान्य पदार्थों के प्रति जो आकर्षण दृष्टिगोचर होता है-उसमें लोभ और लाभ की ललक ही प्रधान रूप से काम कर रही होती है। अस्तु पदार्थों की उत्पत्ति, वृद्धि, शिथिलता, परिवर्तन एवं समाप्ति का उपक्रम उसमें चलते रहना भी स्वाभाविक है। ऐसा ही होता भी रहता था। तथाकथित मैत्रियाँ बरसाती उद्रिजों की तरह उपजती-अपने क्षेत्र को काटती कचोटती रहती है और शरद की तनिक सी परीक्षा सामने आते ही अपने अस्तित्व को समाप्त कर लेती है। यौनाचार सहित अन्यान्य भौतिक कारणों से उत्पन्न हुई घटाटोप जैसी मैत्री का अन्त भी इन्द्रधनुष की तरह देखते-देखते ही होता रहता है।

आत्मा का सहज गुण आत्मीयता है। यह सनातन और शाश्वत है। उसमें स्थायित्व है। क्योंकि वह आदर्शों पर टिकी होती है और प्रतिदान का पोषण पाये बिना भी एकाकी अपने पथ पर अड़ी-खड़ी रहती है। माता का अपने शिशु के प्रति ऐसा ही वात्सल्य देखा जा सकता है। बच्चा अपनी माँ को कोई प्रतिदान नहीं दे पाता उलटे हर घड़ी गड़बड़ी और कठिनाई ही उत्पन्न करता रहता है। इतने पर भी माँ के दुलार में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। बच्चे की हरकतों से जो असुविधा उत्पन्न होती है उसका उसे न तो बुरा लगता है और न अखरने वाला दबाव ही अनुभव होता है। माता अपने पक्ष को पूरी तरह निभाती रहती है। उसके वात्सल्य की अजस्र वर्षा में कहीं कोई त्रुटि दिखाई नहीं पड़ती। वयस्क होने पर बच्चे उपेक्षा, कृतघ्नता, अवज्ञा और दुष्टता बरतते भी देखे गये हैं, फिर भी माँ की ममता में बहुत बड़ा अन्तर नहीं आता। ऐसे ही आदर्श प्रेम की साधना भक्तियोग के अन्तर्गत की जाती है। पाषाण प्रतिमाओं की पूजा अर्चा करने वाले न तो प्रतिदान पाते हैं और न प्रत्युत्तर। फिर भी वे एकाँगी-एकाकी उपासना श्रद्धा पूर्वक अपनाये रहते है।

स्नेह विशुद्ध रूप से आत्मिक उत्कृष्टता की सहज सुलभ झाँकी है, जिसे दूसरे शब्दों में आत्म-विकास की प्रक्रिया कह सकते हैं। अविकसित स्थिति में ‘अहम्’ मात्र शरीर तक सीमित रहता है। उस स्थिति में पेट और प्रजनन में ही रुचि रहती है। वासना और तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ रुचता ही नहीं। तब लोभ और मोह की समस्त हलचलों के केन्द्र बने होते हैं। अहंता का परिपोषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के आडम्बर रचे जाते रहे हैं। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति में अविकसित मनुष्य आतुर रहता है और उसके लिए नीति-अनीति की मर्यादायें तोड़कर कुछ भी कर गुजरने पर उतारू हुआ देखा जाता है। किन्तु जब अन्तरात्मा विकासोन्मुख होती है तो उसका ‘आपा’ अपना क्षेत्र विस्तार करता चला जाता है। निकटस्थ लोगों से आरम्भ होकर उसकी परिधि दूरस्थ लोगों तक फैलती चली जाती है, तब थोड़े से ही स्वजन सम्बन्धी नहीं रहते वरन् उस आँचल में अगणितों को आश्रय मिलता चला जाता है।

सच्चा प्यार आत्मा की अपनी सुविकसित स्थिति है। उसमें दूसरे का आकर्षण बहुत ही कम मात्रा में प्रभावोत्पादक होता है। सहज सौजन्य की ममता और शुचिता की सत्प्रवृत्तियाँ ही आत्मीयता की निर्झरिणी बन कर प्रवाहित होती हैं और उसमें अनेकानेकों को अपनी तृष्णा जलन बुझाने का अवसर मिलता रहता है। परमात्मा की तरह आत्मा भी अहेतुकी अनुकंपा बरसाते हुए अपनी गरिमा का परिचय देती रहती है। सकारण नहीं वरन् अकारण ही वर्षा ऋतु की तरह स्नेह सलिल बरसाते रहना आत्मवानों का सहज आचरण होता है।

उत्कृष्टता जुड़ी रहने के कारण आत्मीयता में जहाँ सघन सद्भाव और उदार सहयोग का प्रवाह बहता है। वहाँ हित कामना भी पूरी तरह जुड़ी रहती है ऐसी दशा में दुलार की तरह सुधार का उपक्रम भी चलता रहता है। यही उचित भी है और आवश्यक भी। माता के संतुलित व्यवहार में इन दोनों तत्वों का समुचित समावेश रहता है। वह बालक को असीम प्यार करती है, पर वह होता एक आँख से ही है। दूसरी आँख वह सुधार के लिए सुरक्षित रखती है। बच्चा बड़ा होता जाता है साथ ही उसमें कई प्रकार के सम्पर्क एवं संस्कार जन्य दोष उभरते आते है। उन्हें सुधारने संभालने के लिए कुशल माता उतनी ही प्रयत्नशील रहती है, जितनी कि दुलार के साथ सहायता करने के लिए। हाँ इतना अवश्य होता है कि यह सुधार प्रक्रिया रोष-आक्रोश से, द्वेष-दुर्भाव से सर्वथा अछूती रहती है और उसमें सहृदय चिकित्सक जैसी करुणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।

मित्रता के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख करते हुए रामायण में कहा गया है-‘‘कुपथ निवारि सुपंथ चलावा” गुण प्रकटै अवगुणहिं दुरावा।” मित्र को जहाँ स्नेह सहकार दिया जाना है वहाँ उसे कुपथ से विरत करने की दृष्टि भी प्रखर रखे जाने की आवश्यकता है। मित्र के गुणों को उभारने और दुर्गुणों को निरस्त करने का प्रयास भी हितवादी मित्रता के कर्त्तव्यों में ही सम्मिलित है।

स्वभावतः मनुष्य अपनी रूचि का समर्थन और स्वार्थों का पोषण चाहता है। न्याय और औचित्य के झंझट में न पड़कर अपने प्रति मित्र से मात्र सहयोग की अपेक्षा करता है। भले ही वह अनीतियुक्त एवं अहितकर ही क्यों न हो? मित्रता के दबाव में प्रायः एक दूसरे के प्रति ऐसे ही पक्षपातपूर्ण सहयोग की आशा अपेक्षा करते हैं। उसमें शिथिलता दिखाई पड़ती है तो मित्रता में शिथिलता का आरोप लगाते हैं। ऐसे प्रसंगों में यह समझा जाना चाहिए कि मैत्री मात्र सहयोग तक ही सीमित नहीं है वरन् उसके साथ असहयोग एवं विरोध के उत्तरदायित्व भी जुड़े हुए हैं। कई बार तो इस प्रकार का प्रतिरोध-सहयोग से भी अधिक आवश्यक होता है।

माता से अधिक शुभ चिन्तक और कोई नहीं हो सकता पर वह भी कई बार बच्चों पर लाल पीली होती देखी जाती है। डॉक्टर की भरपूर सद्भावना होते हुए भी उसे रोगी के शरीर में नश्तर चुभाते हुए देखा जाता है। यह अप्रिय प्रसंग देखने में निष्ठुरता एवं शत्रुता जैसे लगते हैं, पर तात्विक दृष्टि उनके पीछे ऐसी आत्मीयता झाँकती दिखती है जिसमें कल्याणकारी हित चिन्तन के अतिरिक्त और कोई अनुपयुक्त उद्देश्य नहीं ढूंढ़ा जा सकता। वह मित्रता तो अदूरदर्शिता मात्र है जिसमें प्रसन्नता प्रदान करने के लिए अनुचित को भी सहन किया जाता है और अनौचित्य में भी सहयोग दिया जाता है। इसमें मित्र को प्रसन्न करने भर का लक्ष्य है उसका भविष्य अन्धकारमय बनने के संदर्भ में उपेक्षा बरती गई होती है। इससे मित्र का अन्ततः अहित ही होता है। प्रत्यक्षतः उसका रूप कुछ भी क्यों न हो परिणामतः यह प्रसन्न करते रहने भर की नीति शत्रुता से कम विघातक सिद्ध नहीं होती।

स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि प्यार आध्यात्मिक गुण है। उसकी सार्थकता तभी है, जब उसके साथ उत्कृष्टतावादी आदर्शों में समन्वय रह सके। ऐसा प्यार ही प्रयोक्ता और उपभोक्ता के लिए समान रूप से श्रेयस्कर होता है। सच्चे प्यार में एक आँख दुलार की और एक आँख सुधार की रहती है। इसके बिना अनीति पोषक मैत्री तो अमैत्री से भी अधिक अहितकर सिद्ध होती है।

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