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Magazine - Year 1976 - Version 2

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ब्रह्माण्ड में पदार्थ की तरह चेतन भी भरा पड़ा है।

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विज्ञान की आकाश में गहरी रुचि और अध्ययन-अनुसंधान जिन रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन कर रहे हैं, वे भारतीय तत्वदर्शन के निष्कर्षों को ही पुष्ट कर रहे हैं। बीसवीं शताब्दी के पहले तक भौतिक विज्ञान भारतीय तत्वदर्शन की वैदिक काल से चली आ रही इस मान्यता का उपहास उड़ाता था कि आकाश पोला नहीं है, बल्कि हमारे शरीर की और पृथ्वी की संरचना में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है तथा वह ईश्वरीय चेतना के सर्वाधिक निकट है।

इधर वैज्ञानिकों का ध्यान तेजी से आकाश की गहराइयों की ओर गया है। ब्रह्माण्डीय किरणों तथा आकाश के उच्च ऊर्जा सम्पन्न व अदृश्य गुणों वाले सूक्ष्म कणों के अध्ययन से प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों के उद्घाटन की सम्भावना है। इससे माइक्रोकोस्म के गुणों की जानकारियाँ मिल सकेंगी तथा गैलेक्सी में एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में चल रही कई रहस्यमय गतिविधियों की समझा जा सकेगा।

भौतिकीविद् प्राथमिक कणों की लगातार खोज कर रहे हैं। क्योंकि उनकी मान्यता है कि प्राथमिक कणों के गुण-धर्मों के बोध से ही विश्व की उत्पत्ति तथा विकास-क्रम को समझा जा सकेगा। प्राथमिक कण का अर्थ है द्रव्य की वह सबसे छोटी इकाई या वह मूल कण, जिससे सभी बड़ी इकाइयों का संयोजन हो सका है। स्पष्ट है कि प्राथमिक कण केवल कोई एक विशेष कण ही हो सकते हैं। पर इस अर्थ में अभी तक किसी प्राथमिक कण की खोज नहीं की जा सकी है। इसलिए अभी तो भौतिकवेत्ता प्रोटॉन, न्यूट्रॉन आदि सौ से भी अधिक कणों को प्राथमिक कण कहते हैं।

न्यूट्रॉन की खोज होने पर ही परमाणु-ऊर्जा का परमाणु-बम दोनों बने। ‘न्यूट्रॉन-भौतिकी’ नामक विज्ञान शाखा चल पड़ी।

इधर वैज्ञानिक अन्वेषणों से ज्ञात हुआ है कि परमाणु के सूक्ष्म विश्व में प्रत्येक कण का एक प्रतिकण विद्यमान है ऐसे ऋणावेशी कण इलेक्ट्रान है, तो उसका विरोधी, धनवेशी कण है-पोजिट्रान। उसी तरह प्रत्येक कण का प्रतिकण है।

कण और प्रतिकण सब परस्पर पास आते हैं विस्फोट होता है और ऊर्जा का उत्सर्जन होता है।

इस ऊर्जा की इकाई है-इलेक्ट्रान वोल्ट। किसी वस्तु को पेन्सिल की नोंक से हल्के से टक-टक करके उस वस्तु के परमाणु को एक इलेक्ट्रानिक वोल्ट ऊर्जा मिल जायगी। पर इस ऊर्जा से परमाणु में कोई गति या चंचलता नहीं आ सकेगी। 1 हजार से 10 हजार तक इलेक्ट्रान-वोल्ट ऊर्जा पाकर परमाणु के इलेक्ट्रान चंचल हो उठते हैं। इसी से रासायनिक द्रव्यों का संयोजन होता है। पर परमाणु का नाभिक अभी भी गतिशील नहीं होता। वह 1 लाख से 100 लाख इलेक्ट्रान-वोल्ट ऊर्जा से ही गतिशील होता है।

लाखों रुपयों की लागत से साइक्लोट्रोन, सिंकोट्रोन आदि विशेष प्रकार के त्वरण यन्त्र बनाये जाते हैं जो प्रोटान आदि कणों को करोड़ों, अरबों इलेक्ट्रान वोल्ट ऊर्जा प्रदान करते हैं। प्रोटान धनावेशी कण है, ऋणावेशी इलेक्ट्रान इनका चक्कर काटते हैं।

जब न्यूट्रॉन का वीटा-विखंडन होता है, तब प्रोटान, इलेक्ट्रान तथा न्यूट्रिनों ये तीन कण उत्सर्जित होते हैं। वैज्ञानिक इस दिशा में तेजी से काफी काम कर रहे हैं। किन्तु प्राथमिक कणों की खोज अभी भी जारी है। अभी तक ज्ञात प्राथमिक कणों की वैज्ञानिकों ने कुछ वर्गों में बाँट दिया है- जैसे लेप्ट्रोन, मेसोन, बोरिओन आदि। इनमें से प्रोटोन, न्यूट्रिनों, इलेक्ट्रान और पोजिट्रोन स्थायी कण हैं। शेष अस्थायी कण हैं। फोटोन तथा न्यूट्रिनों का स्थिर द्रव्यमान शून्य है। इलेक्ट्रान और पोजिट्रोन का 1 स्थिर द्रव्यमान है। प्रोटान का 1836 तथा न्यूट्रॉन का 1838 है।

न्यूट्रिनों का स्थिर द्रव्यमान शून्य है, इसका तात्पर्य यह है कि स्थिर न्यूट्रिनों नाम की कोई वस्तु नहीं। न्यूट्रनो कण जन्म के साथ ही प्रकाश की गति से यानी 3 लाख किलोमीटर प्रति सैकिण्ड के वेग से दौड़ने लगते हैं। ये न्यूट्रिनो अन्य द्रव्य कणों के साथ बहुत मन्द परस्पर क्रिया दर्शाते हैं। इसीलिए ये अन्य द्रव्य कणों से सामान्यतः कराते नहीं। अतः न्यूट्रिनो, पृथ्वी पिण्ड से आर-पार हो सकते हैं। यहाँ तक कि सूर्य में से भी आर-पार हो सकते हैं। इन न्यूट्रिनो के भी प्रतिकण विद्यमान हैं-जिन्हें प्रतिट्रिनो कहते हैं।

खोजों से यह भी पता चला है कि आकाश में विद्युत कणों की अनेक परतें हैं। इन अनेक परतों को अयनमंडल (आइनोस्फियर) कहते हैं। हमारी पृथ्वी आकाश में स्थित है। अयनमंडल पृथ्वी को सभी ओर से घेरे हुए है। विद्युत कणों की इन अनेक परतों में तीन मुख्य हैं। एयल्टन ने इन्हें “ई”, “एफ” और “डी” परतें कहा है।

धरती की ऊंचाई पर कब वायुमंडलीय दबाव वाले क्षेत्र में अणु-परमाणु अपना ऋणाणु (इलेक्ट्रान) खो देते हैं। सूर्य इलेक्ट्रानों को तोड़ता है। यह क्रिया जितनी तीव्र होती है, अयनमंडल उतनी ही तीव्रता से पृथ्वी में मौसम आदि का नियन्त्रण करता है। साथ ही अयनमंडल लोगों के मन, हृदय और गुणों को भी प्रभावित करता है। इलेक्ट्रान के तोड़ लिए जाने के बाद अणु परमाणुओं में केन्द्रक शक्ति शेष रहती है। अयनमंडल में विद्यमान यह केन्द्रक शक्ति ही लोगों के गुणों को, मन और हृदय को प्रभावित करती है। इससे पता चलता है कि केन्द्रक कोई मनोमय शक्ति है, मात्र भौतिक शक्ति नहीं।

पृथ्वी की ओर नीचे आने पर इन कणों की शक्ति घट जाती है। जैसे-जैसे वायुमंडलीय दबाव बढ़ता है, अयन-मंडलीय दबाव घटता है। क्योंकि पृथ्वी तक आते-आते उन कणों में धूलि कण व गैसों के कण मिल पाते हैं। अधिक ऊंचाई पर अधिक स्वच्छ वायु ही स्वास्थ्य को पुष्ट नहीं करती। प्रत्युत, मनोमय शक्ति वाले तथा अत्युच्च ऊर्जा वाले ये प्रकाश कण चित को प्रसन्नता, स्फूर्ति व शक्ति देते हैं। इस प्रकार ऊंचे स्थानों पर उत्तम स्वास्थ्य का शुद्ध वायु से भी बड़ा कारण ये सूक्ष्म कण होते हैं। ‘फोटोन’ की विलक्षण कर्तृत्व शक्ति ज्ञात हो चुकी है। फोटोन तथा न्यूट्रिनो दोनों निरन्तर गतिशील रहते हैं। इनके प्रतिकणों के भी गुण, धर्म जाने जा सके तो कई नये रहस्य सामने आयेंगे। इसीलिए इसी दिशा में तेजी से वैज्ञानिक कण अन्वेषण कर रहे हैं। क्योंकि अनुमान है कि विश्व की उत्पत्ति व विकास विस्तार में न्यूट्रिनों एवं प्रतिन्यूट्रिनों कणों का महत्वपूर्ण योगदान है। स्मरणीय है कि कुछ ही वर्षों पूर्व रूसी और अमरीकी वैज्ञानिकों की खोजों से पता चला कि प्रकृति में अत्युच्च ऊर्जा वाले कण विद्यमान हैं।

एक एक्सीलरेटर से दस लाख इलेक्ट्रान वोल्ट तक की ऊर्जा के कण उत्पन्न किये जा सकते हैं। इसी क्रम में सायक्लोट्रान और वीटाट्रान का निर्माण हुआ है, जिनसे डेढ़ करोड़ इलेक्ट्रान वोल्ट की ऊर्जा वाले कण उत्पन्न किये जा सकते हैं। इतनी शक्ति से विशाल अन्तरिक्षयानों को ढोया और सुदूर नक्षत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।

पर प्रकृति के ऊर्जा कणों की शक्ति तो इससे बहुत अधिक है। आकाश की ‘कॉस्मिक’ किरणों में मेसान, हायपरान आदि अस्थित कण है, जिनमें प्रचण्ड प्रचण्ड ऊर्जा है।

‘गैलेक्सी’ के केन्द्रीय क्षेत्र में सूर्य जैसे प्रायः 10 खरब नक्षत्र पुंज हैं। अब तक इस क्षेत्र में ज्ञात कुल तारों की संख्या दस घात चौबीस है। यह सम्पूर्ण विस्तार ही गैलेक्सी कहलाता है।

ज्योतिषी भौतिकी विदों (एस्ट्रा फिजिसिस्ट्स) के अनुसार इस केन्द्रीय क्षेत्र में कणों का विघटन तेजी से होता है। तारों के अदृश्य कण निकलकर प्लाज्मा के रूप में पोले दीखने वाले आकाशीय क्षेत्र में फैल जाते हैं। इनके इस फैलाव से ही विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र तथा गुरुत्वाकर्षण आदि की क्रियाएं सम्पन्न होती है। ऐसे फैले हुए प्लाज्मा को आयनीकृत प्लाज्मा (आइनोस्फेरिक प्लाज्मा) कहते हैं। आइनोस्फेरिक प्लाज्मा द्वारा कई तरह के क्षेत्र बनते हैं। आइनोस्फेरिक प्लाज्मा के रूप में फैले ये कण ही विभिन्न विचारों, प्रक्रियाओं, घटनाओं, दृश्यों वाले हलचल पूर्ण जगत का कारण है तथा उसे प्रभावित नियन्त्रित करते हैं। लाखों वर्षों से आवारागर्दी करते-करते ये कण भूल ही गये हैं कि वे कहां से आये हैं।

ये भूले हुए कण ही कॉस्मिक कणों के रूप में पृथ्वी की ओर भी आते रहते हैं। इन कणों में उच्च गति वाले प्रोटान तथा कई तत्वों के परमाणु होते हैं, इनमें अत्यधिक ऊर्जा होती है। वायुमंडल में इनके प्रवेश करते ही हलचल मच जाती है। इसी हलचल से एक्सटेन्डेड एयर शावर्स (फैले हुए वायु-शावरों) का निर्माण होता है। पृथ्वी की स्थूल हलचल इस प्रकार इन अनेक स्वभाव तथा गुणों वाले कणों के कारण ही होती है।

विचार तरंगें पैदा करने वाले आकाशस्थ कण अति सूक्ष्म होते हैं। इनका जीवन काल सैकिण्ड का भी अत्यल्प अंश ही होता है। उनका उद्भव और विनाश अनुमान में भी नहीं आ पाता। ये कण धन तथा ऋण दोनों आवेशों वाले होते हैं।

विचार तरंगें पैदा करने वाले अत्युच्च ऊर्जा सम्पन्न कणों का संचय ध्यान-धारणा द्वारा सम्भव है। जिस देव-शक्ति (चेतन-शक्ति) की ध्यान-धारणा करेंगे, उसी प्रकार की क्षमताओं वाले सूक्ष्म ऊर्जास्वी कण व्यक्तित्व में संचित हो जायेंगे। इस तरह जो शक्तियां जितनी बलवान होती हैं, वे अपने उपासक को उतनी ही अधिक सिद्धि व सामर्थ्य दे पाती हैं। ये चित्-शक्तियां वस्तुतः नाभिकीय चेतनाएं (न्यूक्लियर एक्टिविटीज) हैं। इनका कारण क्यू-मेसान, न्यूट्रिनो और पाई-मेसान जैसे अत्यन्त सूक्ष्म कणों में से कोई भी हो सकते हैं। इन कणों तथा नाभिकीय-चेतनाओं पर गैलेक्सी के चुम्बकीय क्षेत्र भी प्रभाव नहीं डाल सकते हैं।

बम्बई के टाटा इन्स्टीट्यूट के प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ0 प्राइस की खोजों से प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार ये ऊर्जस्वित कण तथा ब्रह्माण्डीय किरणें जब ठोस पदार्थों से गुजरती हैं तो उन पर अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं। इस प्रभाव को सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से देखा, परखा जा सकता है। जड़ पदार्थों में करोड़ों वर्ष पूर्व का इन चेतन किरणों का प्रभाव भी अभी भी विद्यमान है। इसका अर्थ है कि इन चेतन किरणों के अध्ययन, विश्लेषण तथा उनके सम्पर्क की विधि ज्ञात हो गई तो ब्रह्माण्ड में अतीत में घटित, वर्तमान में घट रही या कि भविष्य में करोड़ों वर्षों तक घटित होने वाली घटनाओं का दृश्य देखा जाना जा सकता है। इन ब्रह्माण्डीय किरणों के वर्ग भी अधिक नहीं हैं।

‘काल’ तत्व की गम्भीर विवेचना डबल्यू0 एच0 डन ने अपने ग्रन्थ ‘एक्सपेरीमेंट विथ टाइम’ में बताया है कि आमतौर से मनुष्य की चेतना समय के उस छोटे से केन्द्र पर जुड़ी रहती है जिसे वर्तमान कहते हैं। बन्धन की इसी जकड़न के कारण मन से इतना ही बन पड़ता है कि वह वर्तमान की समस्याओं और अनुभूतियों के क्षेत्र में अपनी हलचलें केन्द्रित रखे। किन्तु ऐसी भी स्थिति प्राप्त की जा सकती है जब चेतना को वर्तमान के बन्धन शिथिल करने का अवसर मिल जाय। गहरी सुषुप्ति भी ऐसी स्थिति हो सकती है। उस स्थिति में समय के अन्य दो आयाम भूत और भविष्य भी उसी तरह अनुभव की परिधि में आ सकते हैं जिस तरह कि आमतौर से वर्तमान अनुभव में आता है।

इसी प्रकार एअर शावर्स (वायु शावरों) में लाखों करोड़ों अत्युच्च ऊर्जा सम्पन्न कण हैं, जिनके हजारवें हिस्से की शक्ति ही विशाल अन्तरिक्षयानों को किसी भी ग्रह-नक्षत्र तक पहुंचाने में समर्थ है।

वायु शावरों के अध्ययन से पता चला कि उनमें इलेक्ट्रान और पाजिट्रान कण भी सम्मिलित हैं। कॉस्मिक किरणों के वायुमण्डल में पहुंचने से विभिन्न भौतिक पदार्थों की रचना होती है। इन भौतिक पदार्थों की मानसिक क्रियाएं भी अब अध्ययन का विषय है। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि सृष्टि के आविर्भाव काल से अब तक ब्रह्माण्ड के विस्तार के मूल तत्व इन स्थूल भौतिक पदार्थों में बीज रूप में विद्यमान है। उनका अध्ययन अनेक क्रियाएं उद्घटित करेगा तथा असंख्य रहस्यों का भेदन करेगा।

विचारों की तरंगें वही तत्व पैदा करते हैं जिस दिन इस तथ्य का उद्घाटन होगा कि विचार तरंगें आकस्मिक नहीं पैदा हो जातीं, बल्कि वे अगणितीय नियमों के अनुसार तथा संकल्प के कारण निःसृत तथा विस्तृत होती हैं, उस दिन ब्रह्माण्ड-व्यापी चेतन-शक्तियों की भी जानकारी हो जायेगी तथा उन चेतन-शक्तियों से मानसिक सम्पर्क की जरूरत महसूस होगी। क्योंकि इस मानसिक सम्पर्क से अनेक प्रकार की उपलब्धियां सम्भव हैं। इन चेतन-शक्तियों को ही देव-गण तथा उनके समन्वय को ईश्वर कहा जाता है।

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