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Magazine - Year 1976 - Version 2

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आत्महत्या पलायन ही नहीं प्रतिशोध भी

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माना कि परिस्थितियों से हताशा, गरीबी से निराशा और बीमारियों के कारण टूटी हुई जीवन-आशा आत्महत्या की कापुरुषता के लिए उकसाती है। इन प्रयासों में स्पष्ट रूप से मनोबल का अभाव ही कारण है परन्तु घरेलू झगड़ों तथा भाई-भतीजे के विवादों में व्यक्ति जब आत्महत्या का प्रयास करे तो यह तो नहीं कहा जा सकता कि उस प्रयास का कारण केवल मनोबल का अभाव ही है।

वस्तुतः आत्महत्या के कई कारणों में से एक प्रधान और प्रमुख कारण प्रतिशोध की भावना भी है। आत्महत्या कई व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक कारणों से आहत होकर यह विवश कदम उठाता है। लेकिन आत्महत्या करने से पूर्व वह कई अर्थों में इस प्रकार टूट भी चुका होता है-जो उसे प्रतिशोध के लिए भी प्रेरित करता है। कुछ वर्षों पूर्व बरेली के एक युवक को आत्महत्या का मामला प्रकाश में आया था। यह युवक हट्टा-कट्टा और स्वस्थ होने के साथ-साथ उद्दण्ड तथा उपद्रवी भी था। परिवार अच्छी स्थिति का था अतः किसी प्रकार का दायित्व भी उसके कन्धों पर नहीं आया था जो उसे गम्भीर बना सके। अपने साथी संगियों की सोहबत में रहकर वह शराब भी पीता, मारपीट भी करने लगा और बाहर भी रहने लगा। माँ जरा भावुक स्वभाव की थी और अपने बेटे की उन करतूतों से परेशान रहती थी अतः वह रोक-टोक भी करती। इस रोक-टोक को लेकर उच्छृंखल बेटे और ममत्वमयी माँ में झगड़ा हुआ करता। पिता तो अपने बेटे की प्रवृत्तियों से इतने अधिक क्षुब्ध थे कि वे उससे बात भी नहीं करते थे।

जब उक्त युवक की प्रवृत्तियाँ काफी अटकने लगीं तो चचेरे भाई ने उसे स्नेह और ममत्व दिया। इस प्रकार आरम्भ हुई उसके सुधार की प्रक्रिया। भाई उसे अपने साथ रखने लगा, पास बिठाता और सम्मानपूर्ण तथा स्नेहाभिभूत व्यवहार करता। भाई ने उस युवक को यह अनुभव करा दिया कि उसे अपनी दिशाओं को बदलना चाहिए। आर्थिक सहायता भी की तथा कुछ महीने बाद ही उक्त युवक टाइप सीखकर टाइपराइटर लेकर कचहरी में बैठने लगा। अच्छी आमदनी भी होने लगी और बुरी आदतें भी धीरे-धीरे छूटती गईं।

परन्तु माता-पिता ने तो उसे बिगड़ैल और आवारा ही समझ रखा था। वे उससे पहले की तरह ही पेश आते। घर में रोज झगड़ा होता। आखिर एक दिन उसने अपने आपको कमरे में बन्द कर मिट्टी का तेल छिड़का और आग लगा दी। अस्पताल में जब उसे बचाने के प्रयास किये गये तो माँ-बाप छाती पीट कर रो रहे थे और युवक की आँखों में सन्तोष झलक रहा था। शायद इसलिए कि जिस विष को वह अब तक चुपचाप पीता रहा-उसका प्रतिशोध ले लिया है।

आदमी जब खुलकर प्रतिशोध नहीं ले पाता तो इस प्रकार प्रतिशोध लेता है। एक प्रकार से प्रतिशोध का यह उपाय आत्मघाती है और निर्वीर्य भी, परन्तु यह एक तथ्य है कि दुश्मन से लड़ना आसान है और अपनों से लड़ना बहुत ही मुश्किल। अब अपनों से तो सीधा स्पष्ट प्रतिशोध लेने का कोई मार्ग नहीं सूझता क्योंकि अभ्यासवश पड़े संस्कार तथा परिवेश मजबूर करते हैं और इसी कारण क्रुद्ध होने के बावजूद भी व्यक्ति अपनों से-अपने परिवार से टक्कर लेने में असहाय होता है।

और दूसरी ओर अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहारों को भी सहन करते रहने की क्षमता नहीं है। वह घुटन बढ़ती रहती है और बाहर के प्रतिबन्ध भी उसी अनुपात से कसते जाते हैं ऐसी स्थिति में प्रतिशोध और निस्तार का यही उपाय सूझता है कि आत्महत्या कर ली जाय। ‘परिवार वालों को मेरा अभाव निश्चित रूप से खलेगा ही और जमाना भी उन्हें बुरा कहेगा’-अपने जीवन का अर्थ ही जब घुटन और कुण्ठाओं के अन्धकार में खो जाता है तो यह भाव उदय होते हैं और इन्हीं भावों की परिणति देखी जाती है-आत्महत्या के रूप में।

पारिवारिक कलह के कारण की गई आत्म-हत्याओं के पीछे जीवन से निराशा का कारण जितना ज्वलन्त है उतनी ही ज्वलन्त है प्रतिशोध की भावना। इसी कारण देखा जाता है कि महिलाएं जो अपने पति, सास ससुर अथवा परिवार के अन्य लोगों का विरोध नहीं कर पाती, वे आत्महत्या की राह पर चल पड़ती हैं। उनकी मृत्यु से उनके तो जीवन की ही क्षति होगी, परन्तु परिवार के अन्य लोगों का समूचा जीवन ही नारकीय बन जाता है। लोग उन्हें लम्बे समय तक अपने अत्याचार और उत्पीड़न के लिए लाँछित करते रहेंगे।

यद्यपि जीवन संघर्ष और बाह्य परिस्थितियों का सामना प्रायः पुरुष वर्ग को ही करना पड़ता है। इस कारण जीवन से निराश हो पलायन कर जाने की प्रवृत्ति के कारण आत्म-हत्याओं की संख्या में पुरुष ही अधिक है, जबकि महिलाओं को बाह्य-संघर्षों का प्रायः कोई सामना नहीं करना पड़ता। वे पारिवारिक कलह के कारण आत्म-हत्या करती हैं और इसमें पारिवारिक यन्त्रणाओं से मुक्ति के साथ परिवार के लोगों से प्रतिशोध की भावना भी मुख्य रूप से काम करती है।

महानगरों में जहां आधुनिक सभ्यता का नशा युवा पीढ़ी में आया है वही स्वच्छन्द जीवन और उन्मुक्त मैत्री की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। लड़के-लड़कियाँ इसी कारण एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं तथा मिलते हैं। इन सम्बन्धों में से सभी की परिणति विवाह के रूप में तो नहीं होती परन्तु थोड़े बहुत पूर्व परिचित और सम्बद्ध युवक-युवतियाँ दाम्पत्य सूत्रों में बंधते हैं अपने संजोये सपनों को टूटते देखते हैं। विवाह से पूर्व प्रेमी और प्रेमिका भावुकता जन्य सपनों के संसार में विचरण करते हैं और विवाह के बाद जीवन के कठोर यथार्थों से सामना करना पड़ता है तो खीझ ही उठते हैं।

प्रायः देखा गया है कि युवक-युवतियाँ जो स्वच्छन्द सम्बन्ध बना लेते हैं और एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में देखना चाहते हैं-अपने परिवार के अन्य सदस्यों को बाधा रूप में खड़े देखते हैं। कारण चाहे जो भी हो, परिवार के अन्य सदस्य स्वेच्छया जीवन साथी के चुनाव को प्रायः मान्य नहीं ही करते हैं। युवक-युवतियाँ चूंकि निर्वाह और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए परिवार पर ही निर्भर रहते हैं इसलिए प्रत्यक्ष रूप से उसकी उपेक्षा भी नहीं कर सकते। फिर भी अन्त तक उनके प्रयास अपनी आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए होते हैं और जब उनकी आकाँक्षाएं निश्चित रूप से अपूर्ण रह जाती हैं-प्रेमी या प्रेमिका का विवाह अन्य कहीं हो जाता है तो परिवार के प्रति प्रतिशोध आत्म-हनन का उग्र रूप धारण कर लेता है। दूसरे लड़की जब बहू बनकर किसी के घर जाती है तो वहाँ एक सर्वथा नया ही संसार देखने को मिलता है। माँ की प्रतिमूर्ति सास के रूप में तो दिखाई देती है और सास के लिए भी बहू बेटी के समान ही है। लेकिन दोनों एक दूसरे को भिन्न रूप में ही ग्रहण करते हैं। बहुत से रूपों में व्यवहार क्षेत्र में इसकी प्रतिक्रिया देखने में आती है और एक दूसरे की अपेक्षाएँ पूर्ण न होने के कारण उत्पन्न होता है-गृह-कलह।

परिवार में एक शीतयुद्ध का-सा वातावरण बन जाता है। दहेज, पिता-माता और बहू के परिवार रिश्तेदारों से लेकर कुलरीति तथा खानदानी परम्पराओं के बखान के वाक्युद्ध में तीखे तीर चलते हैं। पति न तो पत्नी की ओर बोल सकता है और न माता-पिता का पक्ष ले सकता है, प्रायः तटस्थ ही रहने में अपना भला समझता है। इन परिस्थितियों में-पारिवारिक परिवेश में स्त्रियाँ मात्र प्रतिशोध लेने के लिए कोई और उपाय न देखकर आत्म-हनन कर लेती हैं, जिसके दोहरे लाभ दीखते हैं। पहला तो यह कि प्रतिशोध की भावना भी पूरी हो जाती है और दूसरा यह कि उन परिस्थितियों, यन्त्रणाओं से भी छुटकारा मिल जाता है, प्रतिशोध की भावना का एक प्रमाण यह भी है कि आत्म-हत्या करने वाली बहुओं में से 70 प्रतिशत युवतियाँ अपने ससुराल में ही आत्महत्या कर लेती है। निस्सन्देह इसका कारण यह है कि सास जहाँ बहू को दूसरे घर से आई लड़की और मुफ्त की नौकरानी समझती है और बहू भी सास को माँ के स्थान पर प्रतिष्ठित नहीं कर पाती और यह स्थिति बहू के लिए आत्म-हननकारी परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती है।

महिलाओं की तरह विषम पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन से परेशान होकर पुरुष भी आत्महत्या करते हैं। पुरुष भावुक किस्म के कम होते हैं, फिर भी कलह की एक सीमा होती है जिसका अतिक्रमण पुरुष की सहन शक्ति से बाहर की बात हो जाती है। बाहर के संघर्षों और द्वन्द्वों से हारा-थका आदमी घर में अपनी पत्नी की मुस्कान और बच्चों की तोतली बातों में डूबकर कुछ समय के लिए मानसिक उद्वेगों से बाहर आ जाना चाहता है। जीवन, समय और श्रम जिन लोगों के लिए लगा रहा है उनसे यह थोड़ी-सी आशा की जाय तो अनुचित नहीं होगा। लेकिन यह आशा जब पूरी नहीं होती, उल्टे सामने आती है फरमाइशों और शिकायतों की लम्बी फेहरिस्त तो उद्वेगपूर्ण वातावरण का निर्मित होना स्वाभाविक ही है।

पत्नी की फरमाइशों और शिकायतों के कारण तो छोटे-छोटे हैं परन्तु इनके साथ अन्य ऐसी गुत्थियों और समस्याएं भी हैं-जिन्हें मनोवैज्ञानिक भी अपने बस के बाहर समझते हैं। पति-पत्नी के तनावपूर्ण सम्बन्ध और बाहरी संघर्ष दोनों मिलकर आदमी को तोड़ डालते हैं। कहा जा सकता है कि बाहरी संघर्ष ज्यों के त्यों रहते और पति-पत्नी के सम्बन्ध मधुरतापूर्ण रहे होते तो कई पुरुष आत्महत्या का कदम उठाने के लिए अपने आपको विवश अनुभव नहीं करते।

आँकड़े बताते हैं कि अविवाहित पुरुषों की अपेक्षा विवाहित पुरुष ही अधिक आत्महत्याएं करते हैं। इन आत्महत्याओं के पीछे असन्तुष्ट विषम दाम्पत्य-जीवन का कारण अविच्छिन्न रूप में जुड़ा हुआ है। बाहरी संघर्षों से निराशा और आन्तरिक पारिवारिक सम्बन्धों की विषमता व तज्जनित प्रतिशोध का भाव व्यक्ति को आत्मघात की ओर धकेल दे तो इस असम्भावित घटना नहीं कहना चाहिए।

पारिवारिक कलह और दाम्पत्य जीवन की असफलता व्यक्ति के जीवन को एक ओर जहाँ नीरस बना देती है। वहीं दूसरी ओर ऐसे भयंकर आत्मघाती प्रतिशोध की आग भी जला देती है जिसकी ज्वालायें आत्महन्ता के जीवन का अन्त तो करती ही हैं, उससे उड़ता धुँआ और फैलती दुर्गन्ध आसपास के लोगों की आँखें भी जला देती है और साँस लेना भी मुश्किल कर देती है।

इस कदम के लिए मनोबल का अभाव तो उत्तरदायी है ही, जीवन और जगत के प्रति व्यावहारिक तथा स्वस्थ दृष्टिकोण की असमता भी है। आवश्यकता है ऐसे प्रयासों की जो व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह, परिस्थितियों से संघर्ष का साहस और प्रतिशोध के साथ प्रेम का सम्मिश्रण करा दे। यह सब जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण के विकास से ही सम्भव हो सकता है।

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