भाग्य का बीज पुरुषार्थ
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सकडाल पुत्र मिट्टी के बर्तन बनाया और बेचा करता था। नगर के बाहर से वह मिट्टी खोद-खोद कर लाता और उसमें पानी मिला कर रोंध कर खिलौने बनाने के लिए मिट्टी तैयार करता था। उसका यह कार्य काफी अच्छा चलता था। जमा जमाया व्यवसाय था- इसलिए सकडाल पुत्र यह मानने लगा था कि यह सब भाग्य का खेल है। वह नहीं जानता था कि उसके पूर्वजों को यह व्यवसाय जमाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी थी। वह तो यही समझता था कि सब नियतिवश होता है और यह धारणा बनने के कारण वह धीरे-धीरे अकर्मण्य होता गया। भाग्यवाद के पोषक और महावीर स्वामी के प्रतिद्वन्द्वी गोशालक का भी वह अनुयायी बना और फिर तो एकदम वह आलसी बन गया और जब वह अकर्मण्य होने लगा तो उसका काम भी मन्द चलने लगा। व्यापार में भी घाटा होने लगा। घाटा होते देख कर सकडाल पुत्र घबराया। यह मान्यता तो उसकी नस-नस में भर गयी थी कि जो कुछ होता है, वह नियतिवश ही होता है- अतः वह एक तरह से परास्त होकर बैठ गया और किंकर्तव्यविमूढ़ रहने लगा। एक दिन ग्राम में महावीर स्वामी का आगमन हुआ। उसने सोचा क्यों न महावीर के पास जाकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाये तथा अपने भाग्य के डूबते हुए सितारे को पुनः उदय होता हुआ देखा जाय। लेकिन तभी उसके मन में बैठा दुराग्रह का नाग फुफकार उठा-यह सोच कर कि-‘‘मैं महावीर का अनुयायी तो हूँ नहीं। अतः उनकी कृपा पाने के लिए क्यों उनके आगे हाथ पसारूं ! ’’ तभी उसने देखा सड़क पर दूर से आता हुआ श्वेत-वस्त्र धारियों का जुलूस। यह जुलूस महावीर और उनके अनुयायियों का ही था। धीरे-धीरे वह जुलूस समीप आता जा रहा था और सकडाल पुत्र असमंजस की स्थिति में तेजोद्दीप्त चेहरे की ओर देखता हुआ अपने मानसिक द्वन्द्व से झूल रहा था। एक मन तो हो रहा था कि महावीर के चरण पकड़ ले और उनसे कृपा की भीख माँगे तथा दूसरा कह रहा था नहीं। ऐसा नहीं करना चाहिए। क्या करूं, क्या न करूं के द्वन्द्व में नाचते हुए सकडाल पुत्र को आश्चर्य तो तब हुआ, जब महावीर उसके घर के समीप रुक गये। महावीर ने न जाने क्या सोच कर पूछा-‘‘सकडाल पुत्र ! ये इतने सुन्दर खिलौने और इतने बढ़िया बर्तन क्या तुम बनाते हो ? कैसे बनाते हो भाई ! जरा हमें भी तो बताओ।” सकडाल पुत्र बोला-‘‘सब संयोग वश होता है महाराज ! जब संयोग मिल जाते हैं तब ऐसा हो जाता है।” महावीर ने फिर पूछा-‘‘अच्छा ! अगर तुम्हारे इन खिलौनों और बर्तनों को कोई फोड़ दे तो ? ” अब की बार वह तमक गया-‘‘फोड़ेगा कैसे, इससे मेरा नुकसान जो होता है। और फोड़ने वाला मेरा नुकसान करने वाला होता है ?” “अच्छा ठीक है और अगर कोई अत्याचारी तुम्हारी पत्नी का शील भंग करे तो.....?” महावीर ने पूछा। कौन माई का लाल है जो मेरे रहते मेरी पत्नी की ओर आँख उठा कर भी देखे-अब की बार सकडाल पुत्र उबल पड़ा। ‘पर उसका क्या दोष है ? जो होता है, वह तो सब नियतिवश ही होता है’ महावीर का इतना कहना था कि सकडाल पुत्र की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे भान हुआ कि वह कैसी गलत मान्यता बनाये हुए था। तब महावीर ने कहा-‘‘पुत्र ! भाग्य का बीज पुरुषार्थ है। मैं जानता हूँ कि तुम भाग्य द्वारा छले गये हो, पर पुरुषार्थ से पुनः नये भाग्य का सृजन करो।” और महावीर वहाँ से चल दिये। ----***----

