उपवास आरोग्य का संरक्षक
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भोजन की अधिकता एवं अनियमितता से बने शरीर में विजातीय द्रव्य एवं विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का प्रभावशाली उपाय है-उपवास। स्वास्थ्य को बनाए रखने, पाचन संस्थानों में आई खराबी को दूर करने तथा आँतों को पुनः सबल बनाने के लिए उपवास का कम महत्व नहीं है।
उपवास का अर्थ उप+वास- पास में रहना अर्थात् स्वस्थ, नीरोग जीवन के निकट रहना। उपवास आन्तरिक शुद्धि एवं आँतों की सफाई का एक सुगम उपाय बताया गया है। धर्म ग्रन्थों एवं पौराणिक कथाओं में भी उपवास के महत्व का प्रतिपादन किया गया है।
उपवास सम्बन्धी आज की हमारी मान्यताएं हास्यास्पद एवं मूर्खतापूर्ण हैं। लोग उपवास के दिन तो अन्य सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक गरिष्ठ एवं मात्रा में भी अधिक, भिन्न-भिन्न प्रकार का मिष्ठान एवं पकवान खाते हैं। उपवास के एक दिन पूर्व से ही भोजन में भिन्नता दिखाई देती है। इसे उपवास न कहकर चटोरेपन की आदत ही कहेंगे, जिससे न तो किसी उद्देश्य की पूर्ति होती है और न स्वास्थ्य पर ही लाभकारी प्रभाव पड़ता है।
जिस प्रकार एक मशीन को लगातार चलते रहने पर कुछ घण्टे आराम की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधिक एवं अभक्ष्य भोज्य पदार्थों के खाने के अत्याचार से पीड़ित पेट को आराम देने के लिए आवश्यकता होती है।
पुराने समय के लोग मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से अधिक स्वस्थ रहते थे। इसका कारण उसकी दिनचर्या, उनका खान-पान था। वे दिनभर परिश्रम करते थे तब कहीं उन्हें भोजन की उपलब्धि होती थी। जंगलों की स्वच्छ हवा, ताजे फल एवं सब्जियाँ उन्हें उपभोग हेतु मिलती थीं। पाकशास्त्र आज जैसे विकसित रूप में उस समय नहीं था। इसी कारण उनके भोजन में सादगी एवं सात्विकता होती थी। मिर्च मसाले से युक्त, गरिष्ठ एवं तले-भुने पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता था तथा धर्मानुसार सही ढंग से व्रत एवं उपवास का सही ढंग से पालन किया जाता था। आज की स्थिति सही इसके विपरीत है फलतः आंतें कुछ ही दिनों में कमजोर हो जाती हैं और व्यक्ति अनेक रोगों से घिर जाता है।
उपवास शरीर में बढ़े तथा जमा स्टार्च एवं चर्बी को जिसके कारण शरीर में एसिड की मात्रा कम हो जाती है बाहर निकाल कर शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। साधारणतः व्यक्ति यह समझ लेता है कि शरीर से मल बाहर निकल ही जाता है, भूख लगती ही है तो पेट सम्बन्धी विकार क्यों होने लगा चाहे वह कैसा भी भोजन करे उसे नुकसान नहीं करेगा। परन्तु यह भूल है, जो खाना खाया जाता है उसमें कुछ का रस बनता हैं, खून बनता है, माँस, मज्जा एवं हड्डी का निर्माण होता है और शेष मल-मूत्र के रास्ते से निकल जाता है। परन्तु गरिष्ठ एवं अधिक मात्रा में किये भोजन का कुछ अंश आँतों के चारों ओर चिपक जाता है जो सड़ांद पैदा करता है और रोगों को आमन्त्रित करने का कारण बनता है। उपवास इसी गन्दगी को बाहर निकाल कर पेट एवं आँतों को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
उपवास का अर्थ पेट को पूर्ण आराम देना तथा भोजन का पूर्णतः त्याग देना है। यह साप्ताहिक भी हो सकता है पाक्षिक अथवा मासिक भी जैसी भी स्थिति हो। तथा लम्बी बीमारी एवं रोग को देख कर लगातार क्रम में भी।
उपवास करने के पूर्व संध्या समय भोजन न करके फलों का रस या उबली तरकारी ही लेनी चाहिए। उपवास के दिन काफी मात्रा में जल लेकर 1-2 मील का पैदल चक्कर लगाना चाहिए तत्पश्चात एनीमा लेना चाहिए इससे आन्तरिक सफाई अच्छी प्रकार हो जाती है। कमजोरी महसूस होने पर नीबू या शहद का पान लिया जा सकता है। उस दिन पूरा-पूरा विश्राम करना चाहिए। उपवास के दूसरे दिन बड़ी सावधानी एवं धैर्य से कार्य लेना चाहिए- क्योंकि उपवास के बाद भूख जोर से लगती है इसलिए ऐसा न हो जाए कि एकदम खाने पर टूट पड़ें इससे लाभ की अपेक्षा हानि होने की सम्भावना हो सकती है। दूसरे दिन फलों के रसों से उपवास तोड़ा जाय- दोपहर या संध्या को फल और सादा भोजन, रोटी, दलिया, तथा उबली सब्जियां ली जावें।
लम्बी बीमारी के पश्चात् किये उपवास या दीर्घकालीन उपवासों में योग्य चिकित्सक से परामर्श एवं सहयोग लेना आवश्यक है। जब एकत्रित विजातीय एवं विषैले पदार्थ बाहर निकल जाएँ और पेट साफ हो जाए तो उपवास चालू नहीं रखना चाहिए अन्यथा स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
युग के महापुरुष महात्मा गाँधी हमेशा उपवासों के समर्थक रहे हैं, तभी वे वृद्धावस्था में भी उतना ही कार्य कर लेते थे जितना कि जवानी में। सन्त बिनोवा की जीवनी शक्ति का रहस्य सादगीपूर्ण जीवन एवं उपवास ही है। व्रत एवं उपवास को किस योगी पुरुष एवं धर्म ग्रन्थों ने नहीं सराहा। परन्तु चिकित्सा पद्धति में रोग निवारणार्थ उपवासों का विशेष महत्व है इसे भुलाया नहीं जा सकता है। उपवास प्रणाली को अपनाकर अर्थ भार से तथा रोगों से आसानी से मुक्त हो सकते हैं। औषधियाँ रोगों को जड़-मूल से भगाती नहीं बल्कि उन्हें दबा देती हैं। जबकि उपवास विधि रोगों को उत्पन्न ही नहीं होने देती। दीर्घ एवं स्वास्थ्यपूर्ण सुखी-सम्पन्न जीवन के लिए उपवास के बारे में जितना लिखा जाए थोड़ा है।
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