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Reading: लुभाने वाली माया (kahani) · Page 53

लुभाने वाली माया (kahani)

गुरु शिष्य कहीं जा रहे थे। रास्ते में प्रश्नोत्तर का क्रम भी चलता रहता।

शिष्य ने कहा- गुरुदेव! ज्ञान-विज्ञान में मन नहीं लगता। भजन भी बन नहीं पड़ता। कुछ उपाय करें।

गुरु ने दिव्य दृष्टि से वस्तुस्थिति समझी। शिष्य की पोटली में 100 रुपये थे। वह उनके सहारे कुछ करने की योजनाएँ बनाता रहता और सुनहरे सपने देखता रहता। कारण समझ में आ गया कि आसक्ति के रहते, विरक्ति के मार्ग पर चल सकना बन नहीं पड़ेगा।

अगले पड़ाव पर शिष्य शौच गया। पोटली वहीं रखी रखी गई। गुरु ने रुपयों की थैली निकाली और वही कुएँ में फेंक दी। धड़ाम की आवाज हुई। शिष्य भागा आया। पूछा क्या हुआ- किसकी आवाज हुई गुरुदेव! उत्तर मिला, लुभाने वाली, माया चली गयी। अब मन एकनिष्ठ होकर परमार्थ में लगेगा। दो घोड़ों की सवारी में असमंजस ही रहता है।