महाप्राण से मिलन (kavita)
तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये।
महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिए॥
‘मिलन’ विश्व की तरुणाई से, बूढ़े मन का कब होता है।
महाप्राण के आलिंगन में, कब प्राणों का शव होता है॥
महाप्राण से महामिलन को, यौवन भरा उफान चाहिये।
तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये॥
लेती आई मजा मिलन का, सदा-सदा से नयी जबानी।
बूढ़े प्राण रहे बहलाते अपने को, सुन कथा, कहानी॥
अगर चाहिए मजा मिलन का, तो वैसा सामान चाहिये।।
महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये॥
जीवन जियें न निष्प्राणों-सा, जीवित रहते मृत न कहायें।
प्राणवान जैसा जीकर हम, महा-मिलन का अमृत पायें।।
समरूप को समान स्तर का ही आदान-प्रदान चाहिये।
महाप्राण से महा मिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये।।
प्राणवान होने का परिचय दें हम मुस्कानें बिखरा कर।
संघर्षों की भरी जवानी से अपना यौवन टकराकर॥
महाप्राण दें स्वयं निमन्त्रण, और अधिक क्या मान चाहिये।
तन बूढ़ा होगा, होने दो, लेकिन प्राण जवान चाहिये।
महामिलन से मिली सुधा का, जन-मानस को पान करायें।
जन-मानस के सुप्त प्राण को, शंखनाद कर चलो जगायें।
युग के प्राणों को लहराने, प्राण-सुधा का पान चाहिये।
महाप्राण से महामिलन को, अरे! मचलते प्राण चाहिये॥
*समाप्त*

