आधुनिक दर्शन जिसमें दुर्बल के लिए कोई स्थान नहीं
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
दर्शन संस्कृतियों को जन्म देता है और उसी के अनुरूप बनने वाली मान्यताएँ प्रथा परम्पराएँ बन जाती हैं। कभी आरण्यक दर्शन था। तब साधुओं और ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा। प्रथाएँ तद्नुरूप चलती रहीं। बाद में दर्शन ने मोड़ लिया। वह भक्ति परक बना। देवता उपास्य बने। उनके प्रति विशेष भावना प्रदर्शित करने वालो ने देवालयों का निर्माण किया और अपने अपने इष्ट देव को अधिक वैभव सम्पन्न प्रदर्शित करने के लिए उन्हें राजा रईस की तरह ठाट-बाट युक्त बना डाला। इन दिनों खिड़की के रास्ते पाश्चात्य दर्शन भारतीय लोक मानस पर स्थान जमा रहा है। स्वभाव और आदतें, वेश विन्यास धीरे-धीरे पश्चिमी ढर्रे में ढलता जा रहा है।
आरम्भ में दर्शन बदले हैं और बाद में उन्होंने संस्कृतियों का रूप धारण कर लिया है। मान्यताएँ और प्रथाएँ इसी आधार पर बनती बदलती हैं। मध्यकाल में ईसाई और इस्लाम धर्म प्रायः इसी उत्साह में चले जैसा कि कभी बौद्ध परम्परा ने अपने बल विक्रम का परिचय दिया था। ईसाई और इस्लाम धर्म प्रायः समकालीन हैं। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा सी रही है कि कौन अधिक व्यापक बने? किसका वर्चस्व मान्यता प्राप्त करे? इसके लिए बल प्रयोग को भी मान्यता मिली। ईसाई और मुसलमानों के बीच मारकाट होती रही। वही नीति हथियाये हुए इलाकों पर भी बरती गई। काफिरों के कत्ल में सबाब मिलने के प्रतिपादन हुए जिससे नादिरशाह, तैमूरलंग, औरंगजेब आदि द्वारा कत्ले आम की नीति भी अपनाई गई। यह सब बदल हुए दर्शन की करामात है। वे बदलते हैं तो अपने साथ एक नई परिपाटी भी लाते हैं और एक नई संस्कृति को भी जन्म देते हैं।
अपने समय दार्शनिक उथल पुथल इतनी तेजी से और इतनी बहुमुखी हो रही है कि उसका स्वरूप समझना कठिन हो रहा है। फिर भी यह निश्चित है कि भूत कालीन दर्शनों की तुलना में वह अपेक्षाकृत अधिक सशक्त है। कारण कि उसे श्रद्धा मूलक नहीं रक्खा गया है। वरन् तर्क, तथ्य और प्रमाणों का आश्रय इस स्तर का बनाया गया है कि उसे इतिहास, विकासवाद नृतत्व विज्ञान आदि का रूप मिले और वह सहज स्वाभाविक प्रतीत हो। यह भान न हो पाए कि किसी दर्शन को गढ़ा और किसी संस्कृति को जन्म दिया जा रहा है पर यथार्थता यह है कि हम वस्तुतः सशक्त दर्शन और संस्कृति को जन्म दे रहे हैं।
इसकी पृष्ठभूमि विकासवाद के आधार पर रखी गई है। विकासवाद अर्थात् प्राणियों की उत्पत्ति और अभिवृद्धि का इतिहास। इसमें बताया गया है कि प्राणी का आरम्भ कीटाणुओं के रूप में हुआ और उसने प्रगति की आशंका से प्रेरित होकर जीवन संघर्ष “स्ट्रगल फौर लाइफ” का क्रम अपनाया। सजातियों से प्रतिद्वन्द्विता और उनके साधन हथियाना आरम्भ कर दिया। इसी रास्ते पर चलते हुए सभी जीवधारी आगे बढ़े हैं। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। संसार में जो कुछ दिख पड़ता है, वह इसी मान्यता को अपनाने का प्रतिफल है। भविष्य में यदि प्रगतिक्रम जारी रखना है तो यही करते रहना पड़ेगा।
“जीवन संघर्ष” के सिद्धांत की मोटी रूप रेखा तो यह भी है कि अधिक परिश्रम किया जाय। योग्यता बढ़ाई जाय। स्वामित्व जगाने वाला स्वभाव बढ़ाया जाय पर साथ ही उसी दर्शन का एक भाग यह भी है कि अन्यान्यों में विशेष कर साथियों से उपयोगी साधनों को छीन लिया जाय, उन्हें वशवर्ती बनाया और अपने लिए मजूरी करने वाला बनाया जाय। जो इस योग्य नहीं अथवा इन्कार करे उनका सफाया कर दिया जाय। स्वच्छन्द विलास के अतिरिक्त वर्तमान का प्रगतिवादी दर्शन यही है। इसी के अनुरूप पिछले पाँच सौ वर्षों का इतिहास बना है दो सौ वर्षों में तो उसकी प्रौढ़ावस्था रही है। “सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट” के तर्क को यह विकासवाद इन्हीं सिद्धांतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
छुटपुट लड़ाइयों के अतिरिक्त पिछले दिनों दो महायुद्ध होकर चुके हैं। उनके सामयिक कारण इतने बड़े नहीं थे कि उन्हें टाला न जा सकता हो, हलका न किया जो सकता हो या पंच फैसले से गुत्थी को सुलझाया न जा सकता हो। दोनों युद्धों की जड़े इतनी उथली थीं कि उन्हें अन्य समस्याओं की तरह सुलझाया जा सकता था। यह दो बड़े युद्ध प्रख्यात हैं। इनके अतिरिक्त पिछले पचास वर्षों में एक दिन भी शांति का नहीं बीता है। छोटे-बड़े युद्ध बराबर चलते रहते हैं। कोरिया, वियतनाम, ईराक, ईरान, अफ्रीका के क्षेत्रों में गोली की गड़गड़ाहट बराबर सुनी जाती रही है। हजारों मरते और घायल होते रहे हैं। पश्चिमी पाकिस्तान के साथ दो बार और बंगाली पाकिस्तान (अब बंगला देश) के साथ एक बार हमारी करारी टक्करें होकर चुकीं हैं। इन गरम युद्धों के अतिरिक्त शीत युद्धों का तो कहना ही क्या? इससे सूना तो कोई क्षेत्र दिखाई नहीं पड़ता। शतरंज की गोटी की तरह बराबर चालें चली जाती रहती हैं, व अभी भी निरन्तर चली जा रही हैं।
यहाँ उनके राजनैतिक और सामयिक कारनामों पर विचार नहीं किया जा रहा है। क्योंकि इस विचारणा से कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होना है। अब तो समय का दर्शन ही यह कहता है कि संसार में केवल सशक्त ही जीवित रहें। कमजोरों को तभी तक जीने दिया जाय जब तक कि वे सशक्तों के लिए वफादार नौकर की तरह प्रसन्नतापूर्वक काम करने के लिए आत्मसमर्पण हेतु सहमत हों। इसके कमी पड़ते ही उनसे सारे साधनों को छीन लिया जाय और कमजोर होते हुए भी वे उनका उपभोग करते रहें।
कुछ समय पूर्व अफ्रीका के जंगलों में से मनुष्यों को रस्सों से कसकर लाया जाता था और अमेरिका में ही नहीं योरोप में भी उन्हें जानवरों की तरह बेच दिया जाता था। इन से वही व्यवहार होता था जो पशुओं के साथ मुद्दतों से होता आया है। जब विरोध में आन्दोलन उठे तो साथ में पूरा आधुनिक दर्शन ही प्रस्तुत किया गया, जिसमें बताया गया कि समर्थों और चतुरों को दुर्बलों के दोहन का अनादिकाल से अधिकार मिला हुआ है।
साम्यवाद के सशक्त एवं आकर्षक नारे को सुनकर लोगों ने यह अनुभव किया था कि दुर्बल सबल सबके समान न्याय मिलेगा। गाय सिंह एक घाट पर पानी पियेंगे, किंतु क्रान्ति के नारे ठण्डे होते ही परिस्थितियाँ बदल गईं। रूस और चीन की क्रांतियों में सरकारें उखाड़ने में जितने लोग हताहत हुए। उससे दूने साँस्कृतिक क्रान्ति के नाम पर नेताओं द्वारा भून डाले गये। इनका कसूर इतना भर था कि वे बँधुआ मजूरों की स्थिति स्वीकार करने में आनाकानी कर रहे थे। जिन्हें जीवित रहना मंजूर था। उनने हाथ ऊँचे करके समर्पण कर दिया कि जो कहा जायेगा वही करेंगे, जैसे रखा जायेगा वैसे रहेंगे।
कभी-कभी मानवी अधिकारों के लुभावने प्रतिपादन सुनने को मिल जाते हैं। लिखने का अधिकार, बोलने का अधिकार, सोचने का अधिकार, जीने का अधिकार आदि मौलिक अधिकारों के सम्मिलित किये गये हैं और उनकी व्याख्या एवं वकालत भी आकर्षक ढंग से की जाती है। लगता है कि सतयुग जैसा शांति युग निकट आ रहा है, पर इस छलावे का नंगा रूप तब खुलता है जब इस दर्शन का वह स्वरूप सामने आता है जिसे एक प्रकार से हर समर्थ ने स्वीकार कर लिया है।
अब समय ने दर्शन वह प्रस्तुत किया है कि समर्थों को उन्नति और सुख-सुविधा तभी मिलेगी या बढ़ेगी जब दुर्बलों के निमित्त जो साधन व्यय होते हैं न होने दिये जांय। उन्हें ठण्डे या गरम तरीके से छीन लिया जाय। इस दर्शन को ‘‘जीवन के लिए संघर्ष’’ नाम दिया गया है। इसके लिए प्रकृति का समर्थन प्रस्तुत किया जाता है। कि वह “वह योग्यतम का चुनाव” स्वीकार करती है। जो योग्यतम नहीं है वह जीकर जगह क्यों घेरे? जीवन संघर्ष में जो हारता है वह हानि का दण्ड भोगे और अपने साधनों को योग्यतम वर्ग के लिए खाली करे। यही है वह दर्शन जिसने अपने जन्मकाल के सौ वर्ष के भीतर ही करोड़ों को उदरस्थ कर लिया है और जो बचे हैं उन्हें जितनी जल्दी सम्भव हो, निगल जाने के लिए योजनापूर्वक कटिबद्ध है। यही है आज की परिस्थितियों का अब तक का लेखा-जोखा।

