देने वाला कभी घाटे में नहीं रहता
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जो रोकता है, सो सड़ता है, जो देता है, सो पाता है। छोटे पोखर का पानी सूखता है, घटता है और सड़ता है, किन्तु झरने में सदा गतिशीलता के साथ-साथ स्वच्छता भी बनी रहती है। न वह सूखता है, न सड़ता है। उसका स्त्रोत कभी समाप्त होता ही नहीं। गतिशीलता का नियम तोड़ेगा, संचय करेगा, उसे थोड़ा ही मिलेगा। अक्षय अनुदान पाने की पात्रता से उसे वंचित ही रहना पड़ेगा।
धरती अपना जीवन तत्व निरन्तर वनस्पतियों को देती रहती है। अनादि काल से यह क्रम चल रहा है। सभी प्राणी अपना अहार धरती से प्राप्त करते हैं। इतने पर भी उसका भण्डार कभी रीता नहीं हुआ। वनस्पति के सूखे पत्ते और प्राणियों का मल-गोबर उसकी उर्वरता को घटने नहीं देते। प्रकृति उसके दान के बदले अनुदानों का विपुल वैभव उसे निरन्तर लौटाती रहती है। सबका पेट भरने वाली धरती ने अपना पेट खाली होने की शिकायत कभी की नहीं है।
वृक्ष वनस्पतियाँ अपनी हरितमा और जीवनी शक्ति प्राणियों को निरन्तर प्रदान करती हैं। लगता है इनका कोश अब नहीं तो तब खाली होकर रहेगा। पर जड़े हैं,जो धरती की गहराई में घुस जाती हैं और उस वनस्पति सम्पदा को यथावत जीवन्त बनाये रहती हैं।
समुद्र बादलों को देता है। बादलों की माँग कभी पूरी नहीं होती। लगता है बादल समुद्र को खाली करके रहेगा, किन्तु सृष्टि के आदि से लेकर अब तक चली आ रही इस याचना को इन्कारी का उत्तर नहीं सुनना पड़ा है। नदियों में समुद्र के घर पहुँच-पहुँच कर उसका भण्डार भरते रहने की कसम खायी और पूरी तरह निभायी है। समुद्र अब तक घटा नहीं, बादलों को उसने जो दिया है, नदियों ने उस क्षति को पूरी तरह पूर्ण कर दिया है।
फिर नदियाँ घाटे में रहती होंगी? बादल नदियों के ऊपर इतने नहीं बरसते, जिससे वे समुद्र के द्वारा बादलों को दिया अनुदान पूरा कर सकें। इस कमी को हिमालय पर जमने वाली बर्फ पूरा करती है और किसी शानदार नदी को घाटे में नहीं रहने देती। बर्फ पिघलती रहती है और नदियों का पेट पूरी तरह भरती रहती है। फिर पिघलता हुआ हिमालय ठूँठ हो जाता होगा? वह भी नहीं होता। आसमान के खजाने में इतनी बर्फ भरी पड़ी है कि नदियों को दिये गये उसके अनुदान को पूरा कर सके। हिमानी चोटियाँ हजारों वर्ष पहले जिस तरह बर्फीली थीं। उससे कम कभी भी नहीं हुई हैं।
जो दिया था, वह किस दिन वापस लौटेगा, इसकी तिथियाँ गिनने की जरूरत नहीं है। इस तथ्य पर विश्वास किया जा सकता है कि देने वाले का खजाना खाली नहीं होता। कल नहीं तो परसों इस हाथ का दिया हुआ उस हाथ में वापस लौट आता है।
पतझड़ में पत्ते जमीन पर गिरते हैं ताकि भूमि को खाद मिलती रहे और उसकी उर्वरता घटने न पाये। पीले पत्ते गिरते देर नहीं लगती कि हरी कोपलें उग आती हैं और पेड़ पहले से भी अधिक हरा-भरा हो जाता है। फलों का सिलसिला भी इसी प्रकार चलता है। खाने वाले उन्हें तोड़ने में कोताही नहीं करते, पर इससे कुछ बिगड़ता नहीं। साल में दो बार हर टहनी पर नये फल आते हैं और ‘दानी को घाटा नहीं उठाना पड़ता, इस तथ्य को अक्षरशः सही सिद्ध करते रहते हैं।
ऊन वाली भेड़ की आदत भी यही है। वह बच्चों के लिए गरम कपड़े बनाने के लिए नयी ऊन उगाती है। काटने वाले उसे काटते रहते हैं, पर हर मौसम में नयी ऊन आती रहती है। सारी जिन्दगी वह यही करती रहती है, पर उसका शरीर कभी बिना ऊन का नहीं देखा गया।

