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Magazine - Year 1985 - Version 2

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कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र

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First 21 23 Last
हमारे कर्म ही समयानुसार भले बुरे परिणामों के रूप में सामने आते रहते हैं। सृष्टा ने ऐसी स्वसंचालित प्रक्रिया बनाई है कि अपने कृत्यों का परिणाम स्वयं भुगत लेने का चक्र सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है। यह उचित ही हुआ। अन्यथा हर व्यक्ति के द्वारा चौबीस घण्टे में जो भले बुरे कृत्य होते रहते हैं वे जन्म भर में इतने अधिक इकट्ठे हो जाते हैं कि इन फाइलों को पढ़ना और दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करना एक न्यायाधीश के लिए सम्भव न होता। इतने मनुष्य के लिए इतने न्यायाधीश नियुक्त करने में भगवान की कितनी परेशानी पड़ती।

झंझट से बचने और व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए भगवान ने मनुष्य के भीतर ऐसा स्वसंचालित तन्त्र फिट कर दिया है जो कर्मों का लेखा जोखा रखता और उसके दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करता है। यह है मनुष्य का अचेतन मन जिसे धर्म ग्रंथों की भाषा में चित्र गुप्त भी कहा गया है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्मफल का बहीखाता उन्हीं के पास है और प्रतिफल का निपटारा यथावत् वे ही करते रहते हैं। फोटोग्राफी के फिल्म की तरह वे दृश्यों का अंकन करते रहते हैं। टेप रिकार्डर की तरह उनकी मशीन पर जो घटित होता रहता है उसका अंकन चलता रहता है और समय आने पर उसकी प्रतिक्रिया यथा समय सामने आ खड़ी होती है।

शास्त्रों ने अनेक स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य अपने कर्मों को स्वयं ही भोगता रहता है। साधारणतया यही देखने में भी आता है। सत्कर्म करने वाले ऊँचे उठते, प्रतिष्ठा पाते और सुखी रहते हैं। कुकर्मी उनकी बुरी परिणति भुगतते रहते हैं। इसमें कई बार देर लग जाती है और मनुष्य अधीर होकर कर्मफल पर अविश्वास व्यक्त करने लगता है और निर्भय होकर उच्छृंखलता पर उतारू हो जाता है। सत्कर्म करने वाले जैसे सत्परिणामों की आशा करते थे वैसा न मिलने पर वे भी निराश होते और अविश्वासी बनते देखे गये हैं। इसे सृष्टि व्यवस्था का एक रहस्य कह सकते हैं। कर्मों का परिणाम यथावत् होने की बात निश्चित होते हुए भी उसमें विलम्ब लग जाता है। इस विलम्ब का समाधान बताने के लिए इतने शास्त्रों की रचना हुई है। धर्मों उपदेशकों को समय-समय पर इसके लिए भारी श्रम करते रहना पड़ा है। मनुष्य की विवेक बुद्धि एवं श्रद्धा निष्ठा की परीक्षा इसी पर होती रही है। अन्यथा यदि हाथों हाथ कर्मफल मिला होता तो समझने समझाने की इतनी जरूरत न पड़ती।

चोरी करते ही हाथों में लकवा मार जाय। कुमार्ग पर चलने वालों के पैर लड़खड़ा जाते। झूठ बोलने वाले की जीभ ठप्प हो जाती। कुदृष्टि डालने वालों को दिखना बन्द हो जाता। व्यभिचारी नपुंसक हो जाते तो फिर धर्मशास्त्रों की, उपदेशकों की, पुलिस कचहरी की कोई आवश्यकता न पड़ती। कुकृत्य करने की किसी की हिम्मत ही न पड़ती। अच्छे कर्मों के सत्परिणाम हाथों हाथ मिलते तो हर आदमी इसी को लाभदायक व्यवसाय समझकर अपने मन से ही किया करता। पर इसे भगवान की मसखरी ही समझना चाहिए कि विलम्ब से प्रतिफल मिलने के कारण लोग अधीर हो उठते हैं और विश्वास ही गँवा बैठते हैं। उससे उत्पन्न होने वाले असन्तुलन को सम्भालने के लिए संतों और सुधारकों को आना पड़ता है और बात बेकाबू होती है तो उसके लिए भगवान को आना पड़ता है। मनुष्य की अपनी दूरदर्शिता की परीक्षा का तो यही केन्द्र है।

बीजों में कुछ ऐसे होते हैं जो एक सप्ताह के भीतर हरियाली दे जाते हैं और तीन महीने उनकी फसल भी कट जाती है। पर कुछ ऐसे हैं जो बहुत देर लगाते हैं। ताड़ का बीज बोने पर एक वर्ष में अंकुर फोड़ता है हर वर्ष कुछ इंच बढ़ता है और पाँच सौ वर्ष की आयु तक जीता है जबकि मक्का पकने में थोड़े ही दिन लगते हैं। स्कूल में दाखिल होने के उपरान्त स्नातक बनने और अफसर पद पर नियुक्त होने में चौदह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। होता यह भी है कि मजूर दिन भर मेहनत करने के बाद शाम को अपनी मजूरी के पैसे ले जाता है।

असंयम बरतने वालो का स्वास्थ्य खराब तो होता है पर उसमें देर लगती है। देखा यह भी गया है कि नशा पीते ही मदहोशी चढ़ दौड़ती है। उपरोक्त उदाहरणों में यह प्रकट है कि कभी-कभी तो परिणाम जल्दी मिलता है पर कभी उसमें देर हो जाती है। कुछ देर तो हालत में लगती है, आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है। कर्मफल के सम्बन्ध में भी यह देर सबेर का चक्र चलता है। पर परिणाम होना सुनिश्चित है। भाग्य का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह पिछले किये हुए कर्मों का ही प्रतिफल है।

चिकित्सा विज्ञान की नवीनतम खोज यह है कि शारीरिक और मानसिक बीमारियों का प्रधान उद्गम केन्द्र मस्तिष्क है। क्योंकि सारे शरीर पर मूल नियंत्रण उसी का है। मनः क्षेत्र उद्विग्न होगा तो शरीर की स्थिति सामान्य होने पर भी कोई न कोई रोग आये दिन घेरे रहेंगे। विकृति रहने तक औषधि उपचार में कोई स्थायी निराकरण न हो सकेगा। यदि मन प्रफुल्ल और हलका हो तो शारीरिक कारणों से उठने वाले रोग तो प्रकृति ही समयानुसार अच्छे कर देती है या फिर मामूली उपचार से दूर हो जाते हैं। पर एक के बाद एक उठते रहने का सिलसिला मनोविकारों के कारण ही होता है।

मानसिक दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बड़े बेतुके, अविचारी, उद्धत, सनकी, शेख चिल्ली लोकाचार का ध्यान न रखने वाले होते हैं। उन्हें पागल तो नहीं कह सकते पर अधपगले से कम भी उनकी स्थिति नहीं होती। ऐसे लोग अपने लिए और दूसरों के लिए भारभूत ही सिद्ध होते हैं। वे किसी को नहीं सम्भाल पाते उल्टे उन्हीं को दूसरों के द्वारा सम्भालना पड़ता है। ऐसे लोगों को विकृत व्यक्तित्व कहते हैं। उनकी उपयोगिता, प्रगति एवं सफलता निरन्तर घटती ही जाती है। बुढ़ापा आने पर तो ऐसे लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाती है।

मानवी चेतना का मौलिक स्वभाव सज्जनता सद्भावना से जुड़ा हुआ है। उसमें जब अनाचार घुसते पड़ते हैं तो काँटे की तरह चुभते रहते हैं और बेचैनी उत्पन्न करते हैं। दुष्टता बरतने से दूसरों की जो हानि होती है उसकी तुलना में अपनी हानि कहीं अधिक होती है। दूसरे तो चोट खाते समय ही हैरान होते हैं पर अपने भीतर आत्म प्रताड़ना का एक ऐसा राक्षस घुस बैठता है जो आजीवन त्रास देता रहता है।

कुकर्मों की आदत डालते ही अपने भीतर एक असुर उत्पन्न होता है। स्वाभाविक प्रकृति दैवी है। जगह एक के रहने लायक ही है पर मनःक्षेत्र में दो व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रकृति के घुसते हैं तब निरन्तर संघर्ष करते हैं। देवासुर संग्राम की स्थिति बना देते हैं। एक आगे धकेलता है दूसरा पीछे घसीटता है। दो साँड जिस खेत में लड़ते हैं उसकी हरी-भरी फसल को रौंद कर रख देते हैं। कोई उपयोगी सामान उधर रखा हो वह भी बिखर जाता है। एक म्यान में दो तलवारें ठूंसने पर म्यान फटता है और तलवारों को भी खरोंच आती है। दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्व गढ़ लेने पर उनका द्वन्द्व युद्ध देखते ही बनता है। आत्म हनन इसी स्थिति को कहते हैं।

संसार में पागलपन तेजी से बढ़ रहा है। आँकड़े बताते हैं कि शारीरिक रोगियों की तुलना में मानसिक रोगियों की संख्या कई गुनी है। सनकी एवं अर्ध विक्षिप्तों की संख्या गिनी जाय और उनके द्वारा हानियों का लेखा जोखा लगाया जायेगा तो प्रतीत होगा कि मानव समाज की सबसे बड़ी समस्या यही है। गरीबी से भी बड़ी। गरीब की समझदारी तो कायम रहती है पर अधपगले तो आये दिन ऐसा सोचते और करते रहते हैं जिससे उन्हें स्वयं भी नहीं, मित्र-शत्रुओं, परिचितों तक को पग-पग पर त्रास सहने पड़ें।

मनोविज्ञान शास्त्र में मस्तिष्क की श्रेष्ठता को खा जाने वाला दो व्यक्तित्वों का उपजना, परस्पर अन्तर्द्वन्द्व करना ही प्रधान कारण है। यह दूसरा असुर अपने ही अचिन्त्य चिन्तन और कुकर्म करने से उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो सदा बेचैन रहते ही हैं, जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें भी सताते रहते हैं। कुकर्मी, दुर्व्यसनी भी होते हैं। उन्हें नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, छल, ठगी, शेखीखोरी जैसी कितनी ही कुटेवें पीछे लग लेती हैं। और उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति दयनीय बना देती हैं। ऐसे लोगों पर से दूसरों का विश्वास उठ जाता है। अविश्वासी के साथ कोई आदान-प्रदान नहीं करता। सहयोग देना तो दूर। साथियों का अविश्वास पात्र बना हुआ व्यक्ति मरघट के भूत की तरह एकाकी रह जाता है। समय पर काम आने वाला उसका एक भी मित्र नहीं रहता। चाटुकार ही स्वार्थ सिद्धि के लिए पीछे लगे रहते हैं और जब उन्हें उसमें कमी दिखती है तो छिटक कर अलग हो जाते हैं। यह हानि साधारण नहीं समझी जानी चाहिए, व्यक्तित्व गँवा बैठने के उपरान्त फिर आदमी के पास बचता ही क्या है। वह जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिना जा सकता है।

यह नारकीय स्थिति है। भीतर से आत्म प्रताड़ना और बाहर से भर्त्सना जिस पर बरसती है उसे साक्षात् नरकवासी कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक रोगों से उद्विग्न रहने वाले नरक ही भोगते हैं। लोक-लोकांतरों में नरक है या नहीं। कुम्भीपाक, वैतरणी आदि का अस्तित्व है या नहीं। इस विवाद में पड़े बिना इतने से भी काम चल सकता है कि जो अपनी शांति और प्रतिष्ठा गँवा बैठा उसके लिए मानव जीवन की सरसता कोसों पीछे रह गयी।

सरकार को चकमा देकर राज दण्ड से बचा जा सकता है। समाज की आंखों में भी धूल झोंकी जा सकती है। पर आत्मा की अदालत ऐसी है जिसने सब कुछ देखा सुना है उसके दण्ड से छुटकारा पा सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। यहाँ देर तो है पर अन्धेर नहीं है। मनुष्य के लिए थोड़े से दिन का विलम्ब ही उसकी आस्था डगमगा देता है, पर तत्वज्ञानियों की दृष्टि से यह जीवन असीम और अनन्त है। एक जन्म का समय बीतना उसके लिए एक रात की निद्रा लेकर नये प्रभात पर फिर उठने के समान है। आज का लिया कर्ज परसों चुकाने की शर्त पर मिल गया है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सदा के लिए मुफ्त में मिल गया और फिर कभी वह देना न पड़ेगा। बहुत से लोग जन्म से ही अन्धे, अपंग उत्पन्न होते हैं। कइयों की प्रतिभा जन्म से ही ऐसी अद्भुत होती है कि दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसे पूर्व संचित संस्कारों का प्रतिफल कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी

किसी के पास यदि पैसा कम है, पद छोटा है अथवा शरीर मोटा नहीं है तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि वे भाग्यहीन हैं। सच तो यह है कि यह जंजाल जितने कम होंगे आदमी उतनी ही तेजी से श्रेय पथ पर बढ़ सकेगा और वह लाभ प्राप्त कर सकेगा। जिसके कारण आत्मा की प्रसन्नता और परमात्मा की अनुकम्पा अजस्र मात्रा में बरसने लगे। ऋषियों में से प्रत्येक के पास साधन सामग्री स्वल्प थी। विवेकवानों को औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार करना पड़ता है और इससे अधिक यदि वे किसी प्रकार उपलब्ध कर सकें तो दूसरे हाथ से उसे सत् प्रयोजनों के लिए अविलम्ब लगा भी देते हैं। तपस्वी शक्ति संग्रह करते हैं। यह प्रक्रिया अपने साथ कठोरता बरतने और सर्वतोमुखी संयम अपनाने से ही बन पड़ती है। इस मार्ग को अपनाने वालो में से किसी को अपने दुर्भाग्य की शिकायत करते नहीं सुना गया। वरन् उनकी गरीबी की गरिमा को समझते हुए, हरिश्चन्द्र, हर्ष-वर्धन, अशोक आदि ने अपनी अमीरी को स्वेच्छापूर्वक निछावर कर दिया था।

ऊँचा उठने वालों को हलका बनाना पड़ता है, यदि किसी को कम वैभव से काम चलाने की परिस्थिति में रहना पड़ रहा है। अथवा अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने में कष्ट सहना पड़ रहा है तो उसे आन्तरिक दृष्टि से प्रसन्नता अनुभव करते ही पाया जायेगा। इसके विपरीत जिनने अनीतिपूर्वक वैभव जमा कर लिया है। अथवा उच्छृंखल विलास दम्भ पूर्ण प्रदर्शन का साधन जुटा लिया है तो उसे भीतर और बाहर से लानत ही बरसती अनुभव होगी। इस सन्तोष पर कुबेर के खजाने को निछावर किया जा सकता है।

कर्मफल सुनिश्चित है। उसके लिए किसी अन्य न्यायाधीश की या अन्य लोक में जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। अपने भीतर ही ऐसा स्वसंचालित तंत्र विराजमान है, जो कृतियों का प्रतिफल उपस्थित करता रहता है, इसमें थोड़ा विलम्ब लगते देखकर किसी को तनिक भी अधीर नहीं होना चाहिए।

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