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Reading: शकडाल भाग्यवादी (kahani) · Page 7

शकडाल भाग्यवादी (kahani)

शकडाल भाग्यवादी था। वह पुरुषार्थ की उपेक्षा करता और हर बात में भाग्य की दुहाई देता। जाति का वह कुम्भकार था। उस दिन वह अपने विश्वास की पुष्टि कराने भगवान महावीर के पास पहुँचा और अपनी मान्यता के समर्थन में उनका अभिमत प्राप्त करने की हठ करने लगा।

भगवान ने उससे उलटकर कुछ प्रश्न किये, कोई तुम्हारे बनाये बर्तन को तोड़-फोड़ करने लगे तो? कोई तुम्हारी पत्नी का शील भंग करने लगे तो? कोई तुम्हारे धन का अपहरण करने लगे तो? क्या करोगे। चुप बैठे रहोगे न?

शकडाल ने कहा-देव, ऐसा अनाचार सहन नहीं हो सकेगा, मैं उसके साथ लड़ पड़ूंगा और अच्छी तरह खबर लूँगा।

भगवान ने कहा- तो फिर तुम्हारा भाग्यवाद कहाँ रहा? मान्यता तो तब सही होती जब तक सब कुछ होते देखकर भी चुप बैठे रहते यहाँ तक कि बर्तन बनाने और रोग की चिकित्सा तक न करते। शकडाल समझ गया कि भाग्यवाद का सिद्धान्त निरर्थक है। पुरुषार्थ ही सब कुछ है। कर्म ही भाग्य बनता है।