Quotation
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥
-महाभारत वनपर्व
नित्य अगणित मनुष्य मृत्यु के मुख में प्रवेश कर रहे हैं–यह देखते हुए भी बचे प्राणी न जाने क्यों यह सोचते हैं कि हम तो सदा बने ही रहेंगे। इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है?

