दान बड़ा या ज्ञान (kahani)
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विवाद यह चल रहा था कि दान बड़ा या ज्ञान। दान के पक्षधर थे वाजिश्रवा और ज्ञान के समर्थक थे याज्ञवल्क्य।
निर्णय हो नहीं पा रहा था। दोनों प्रजापति के पास पहुँचे। वे बहुत व्यस्त थे सो निर्णय कराने के लिए शेष जी के पास भेज दिया।
दोनों ने अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत किये। शेष जी ने कहा मैं बहुत थक गया हूं। सिर पर रखा पृथ्वी का बोझ बहुत समय से लदा है। थोड़ी राहत पाऊँ तो विचारपूर्वक निर्णय करूं। आप में से कोई एक मेरे बोझ को एक घड़ी अपने सिर पर रख लें। इसी बीच निर्णय हो जायेगा।
वाजिश्रवा आगे आये। अपनी दानशीलता को दाँव पर लगाकर उनके धरती के बोझ को अपने सिर पर रखने का प्रयत्न किया। पर वे उसमें तनिक भी सफल न हुए।
याज्ञवल्क्य को आगे आना पड़ा। उनने अपने ज्ञान बल का प्रयोग किया और देखते-देखते भू-भार कन्धों पर उठा लिया।
निर्णय हो गया। शेष भगवान बोले- ज्ञान बड़ा है। उस अकेले के बलबूते भी अपना और असंख्यों का उद्धार हो सकता है जबकि दान अविवेक पूर्वक दिया जाने पर कुपात्रों के हाथ पहुँच सकता है और पुण्य के स्थान पर पाप बन सकता है।

