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Reading: शाश्वत सौंदर्य का बोध · Page 1

शाश्वत सौंदर्य का बोध

मैंने पूछा-”मैं किसे प्यार करूं?”- तो ध्यान की गहराइयों से एक आवाज आयी- “उन्हें, जिन्हें लोग दलित, गर्हित और गया-गुजरा समझते हैं। जो निन्दा और भर्त्सना के पात्र हो चुके हैं। उनके मित्र बनकर उन्हें प्यार और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इस पर नहीं कि तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते हैं, वरन् तुम संसार को प्यार करके गौरवान्वित होगे।”

मैंने कहा-”लोग कहते हैं कि जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं हैं, उन्हें देखने से सुख और शान्ति नहीं मिलती।” मेरी प्यारी आत्मा ने कहा-”तुम असुन्दर के माध्यम से उस शाश्वत सौंदर्य की खोज करो, जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुँधला बादल छट जाएगा तो सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही न जाएगा।”

मैंने जानना चाहा- ऐसा भी तो है, लोग शरीर, कुल-जाति से सुन्दर होते हुए भी मानसिक मलीनता से ग्रस्त हैं। वासनाओं के अँधेरों से घिरे हैं। तब क्या मैं उनसे घृणा करूं? हृदयाकाश में प्रदीप्त ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल से आता हुआ एक स्वर पुनः गूँजा-नहीं, घृणा मत करना, घृणा उनके अँधेरों को और अधिक घना करेगी। इससे उनकी मलीनता और अधिक प्रगाढ़ होगी। उन्हें अधिक और अधिक प्यार की जरूरत है। प्रेम का निर्मल जल उन्हें परिशुद्ध करेगा। प्रेम की उज्ज्वलता उनके अँधेरों को प्रकाशित करेगी और वासनाओं को समाप्त। मलीनताओं के नष्ट होते ही उनका शाश्वत सौंदर्य स्वतः प्रकट हो जाएगा। वैसा ही सौंदर्य जिसके ध्यान में तुम इन क्षणों में तल्लीन हो।

मैंने कहा-”ये संसार कोलाहलपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रन्दन गूँज रहे हैं, तुम बताओ मैं सुनूँगा क्या?”

अविचल और शांतभाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई वेदमाता गायत्री की एक और स्वर झंकृति सुनायी दी-”वत्स ! उन शब्दों को सुना करो जिनका उच्चारण न जिह्वा करती है, न आठ और न कण्ठ। नीरव अन्तराल से जो मौन प्रेरणाएँ और परागान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव जीवन धन्य हो जाएगा।

तब से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दीन-दुःखी को प्यार करने में लगा हूँ। उन्हें भी मैं अपने निर्मल प्रेम के जल से धोता हूँ, जा वासनाओं की मलीनता से ग्रस्त हैं। मेरे अन्दर अब प्यार के सिवा और कुछ नहीं। तब से मैं हृदय गुहा में आसीत सौंदर्य के ध्यान में निमग्न हूँ तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनन्दपूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभोमण्डल का कोई अदृश्य गायक गाता और शाश्वत सौंदर्य का बोध कराता रहता है।