विक्षुब्ध जीवात्मा की दयनीय स्थिति प्रेत-दशा
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जीव चेतना का शरीर मरण के साथ ही अन्त नहीं हो जाता। वरन् उसका अस्तित्व पीछे भी बना रहता है इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी बहुधा मिलते रहते हैं। पिछले दिनों वह तथ्य परम्परागत मान्यताओं एवं कथा पुराणों के प्रतिपादनों पर ही निर्भर था कि मरणोत्तर काल में भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहता है। उसे परलोक में रहना पड़ता है। स्वर्ग-नरक भुगतना पड़ता है एवं पुनर्जन्म में चक्र में भ्रमण करना पड़ता है।
इस सन्दर्भ में अब तक के अन्वेषणों ने कई अनोखे तथ्य प्रतिपादित किये हैं। मरने के उपरान्त अनेकों को शान्ति मिलती है और वे प्रत्यक्ष जीवन में अहिर्निश श्रम करने की थकान को दूर करने के लिए परलोक की गुफा में विश्राम लेने लगते हैं। इसी निद्राकाल में स्वर्ग नरक जैसे स्वप्न दिखाई पड़ते रहते होंगे। थकान उतरने पर जीव पुनः क्षमता सम्पन्न बनता है और अपने संग्रहीत संस्कारों के खिंचाव से रुचिकर परिस्थितियों के इर्द-गिर्द मंडराने लगता है। वहीं किसी के घर उनका जन्म हो जाता है। कभी-कभी कोई मनुष्य प्रेत योनि प्राप्त करते हैं। यह न जीवित स्थिति कही जा सकती है न पूर्ण मृतक ही। जीवित इसलिए नहीं कि स्थूल शरीर न होने के कारण वे कोई वैसा कर्म तथा उपभोग नहीं कर सकते जो इन्द्रियों की सहायता से ही सम्भव हो सकते हैं। मृतक उन्हें इसलिए नहीं कह सकते कि वासनाओं और आवेशों से अत्यधिक ग्रसित होने के कारण उनका सूक्ष्म शरीर काम करने लगता है अस्तु वे अपने अस्तित्व का परिचय यत्र-तत्र देते फिरते हैं। इस विचित्र स्थिति में पड़े होने के कारण वे किसी का लाभ एवं सहयोग तो कदाचित ही कर सकते हैं, हां डराने या हानि पहुंचाने का कार्य वे सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। इसी कारण आमतौर से लोग प्रेतों से डरते हैं और उनका अस्तित्व अपने समीप अनुभव करते ही उन्हें भगाने का प्रयत्न करते हैं। प्रेतों के प्रति किसी का आकर्षण नहीं होता वरन् उससे भयभीत रहते और बचते ही रहते हैं। वैज्ञानिक शोध की दृष्टि से—वस्तुस्थिति जानने एवं कौतूहल निवारण की दृष्टि से कोई उस क्षेत्र में प्रवेश करके तथ्यों की जानकारी के लिए प्रयत्न करें तो यह दूसरी बात है।
प्रेतात्माओं द्वारा अपने अस्तित्व का परिचय दिये जाने तथा अमुक व्यक्तियों को अपना माध्यम बनाकर त्रास देने की घटनाओं का वर्णन करना इन पंक्तियों में अभीष्ट नहीं। जन श्रुतियों से लेकर सरकारी रिकार्ड में दर्ज और परामनोविज्ञान के अन्वेषकों द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसी असंख्यों घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनसे प्रेतात्माओं के अस्तित्व की पुष्टि होती है। यहां तो चर्चा यह की जानी है कि प्रेत योनि में सभी को जाना पड़ता है। अथवा किसी विशेष स्थिति के व्यक्ति ही उसमें प्रवेश करते हैं। उत्तर स्पष्ट है। उद्विग्न, विक्षुब्ध, आतुर, अशान्त, क्रुद्ध, कामनाग्रस्त, अतृप्त लोगों को ही प्रायः प्रेत बनना पड़ता है। शान्त चित, सौम्य एवं सज्जन प्रकृति के लोग सीधी सादी जन्म मरण की प्रक्रिया पूरी करते रहते हैं।
प्रेत-योनि की प्राप्त के दो मुख्य कारण होते हैं—पहला प्रबल आकांक्षाओं की अतृप्ति। दूसरा—तृष्णा-वासनाओं की तीव्रता। प्रबल आकांक्षा की व्यक्ति-चित्त में प्रचण्ड प्रतिक्रिया होती है। दैनिक जीवन में भी यह देखा जाता है कि जब कोई नवीन योजना दिमाग में होती है, तो उसकी सुनिश्चित रूपरेखा बनने तक मन-मस्तिष्क चैन से नहीं बैठ पाता, नहीं नींद आती है। ऐसी आकांक्षा खंडित हो जाने पर कई-कई रातों तक लोगों की नींद उड़ जाया करती है। यही बात तृष्णाओं के बारे में है। तृष्णा से व्याकुल लोग न शान्त रह पाते, न आराम कर पाते, न सो पाते। जब तक तीव्र तृष्णा की कुछ पूर्ति नहीं होती, वे उद्विग्न ही बने रहते हैं। प्रेत योनि भी ऐसी ही उद्विग्नता और अशान्ति से भरी जीव-दशा का नाम है जो मरणोत्तर अवधि में होती है।
हम भारतीयों की यह जो मान्यता है कि धन, पुत्र वासना आदि पर आसक्ति रहते यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसे कई बार मृत्यु के बाद बहुत समय तक किसी भूत-प्रेत की योनि में रहना पड़ता है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में सदैव ही अनासक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है। चार आश्रम—(1) ब्रह्मचर्य विद्याध्ययन, (2) गृहस्थ, (3) वानप्रस्थ, (4) और संन्यास में अन्तिम दो की अधिकांश शिक्षायें और कर्तव्य ऐसे हैं जिनमें प्रत्येक व्यक्ति के धीरे-धीरे परिवार धन-सम्पत्ति का मोह हटाकर अपना मन परमार्थ-साधना में लगाना पड़ता था। संन्यास दीक्षा के बाद तो वह सब कुछ त्याग कर अपने आप को उस तरह अनुभव करता था जैसे मकड़ी अपने बने बनाये जाले को स्वयं खाकर सन्तोष अनुभव करती है। तब जिसके पीछे बेटे होते थे वह उनकी आवश्यकता की सम्पत्ति उन्हें देकर शेष लोक-कल्याण में लगाकर घर छोड़ देते थे और आत्म-कल्याण की साधना में जुट जाते थे।
मोहान्ध व्यक्तियों के प्रेत-योनि में जाने का कोई वैज्ञानिक आधार तो अभी समझ में नहीं आता किन्तु बौद्धिक और प्रामाणिक आधार अवश्य हैं। हम में से अनेकों को भूत का सामना करना पड़ जाता है पर यदि सामान्य लोगों की बात को भ्रम या अन्धविश्वास मानें जैसा कि अनेक लोग किसी स्वार्थवश या किसी को धोखा देने के लिये भी भूत-प्रेत की बात कहकर डरा देते हैं तो भी संसार में कई ऐसी घटनायें घटी हैं जिनमें इस विश्वास को विचारशील लोगों का भी समर्थन मिला है।
यह घटना ऐसी ही है और उसे स्वयं श्री जे.डी. विलियम्स ने स्वीकार भी किया है। दुल्ली स्ट्रीट के अनेक लोगों ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा। श्री विलियम्स महोदय ने इस घटना को 3 नवंबर 1968 के इन्दौर से छपने वाले दैनिक अखबार नई दुनिया में छपाया भी उनका यह लेख विश्व के अनेक अखबारों में छपा और बहुत समय तक लोगों की चर्चा का विषय भी बना रहा।
मैनचेस्टर की दुल्ली स्ट्रीट पर स्थित छोटे से मकान के पास जैसे ही प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री डा. जे.डी. विलियम्स पहुंचे घर के लोगों ने उनका स्वागत किया। इस घर में पति-पत्नी और उनके दो बच्चे कुल चार ही व्यक्ति रहते थे। चारों तब घर में ही उपस्थित थे।
घर की स्त्री श्री विलियम्स को एक अलमारी के पास ले गई। यहीं पर वह भूत था जो दिखाई तो नहीं दें रहा था पर पूछे गये किसी भी प्रश्न और अपनी उपस्थिति का प्रमाण एक विशेष प्रकार की खटपट के द्वारा दें रहा था। उसके संकेत बड़े ही शिक्षित व्यक्तियों जैसे थे। अंग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षर ‘‘ए’’ के लिये वह एक बार (खट् खट्) की आवाज करता था और ‘‘बी’’ के लिये दो बाद (खट् खट्) की आवाज करता था। इसके आगे जो अक्षर जितने नम्बर पर पड़ता है उस अक्षर के लिये उतने ही बात बिना रुके खट् खट्-खट् का उसने संकेत बना लिया था उसी के माध्यम से वह पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी देता था।
यह खेल सारे दिन चलता रहा। घर के दूसरी ओर ऐसी कोई वस्तु नहीं थी कि वहां से खट्-खट् की आवाज आ रही होती लोगों ने सारी सम्भावनायें पहले ही छानबीन ली थीं। श्री विलियम्स को तो बहुत देर के बाद बुलाया गया था। उनकी पराविद्या में रुचि होने के कारण ही उन्हें सूचना दी गई थी। उन्होंने सब जांच पड़ताल कर ली पर उन्हें कोई भौतिक कारण न मिला जिससे खट्-खट् का सूत्र समझ में आता।
स्त्री ने सर्वप्रथम श्री विलियम्स का परिचय कराया फिर पूछा—क्या तुम यहां उपस्थित हो तो भूत ने उत्तर में सर्वप्रथम बिना रुके 24 बार खट्-खट् की (इससे अंग्रेजी के वाई अक्षर की सूचना मिलती मिलती है।) फिर थोड़ा रुक कर 5 बार (ई) फिर रुककर 19 बार (एस) खट्-खट् की इस तरह उसने अंग्रेजी में ‘यस’ कहकर अपने वहां होने की सूचना दी।
इसके बाद श्री विलियम्स ने उससे अनेक प्रश्न पूछे—भूत ने उनमें से अनेक प्रश्नों के उत्तर दिये। पर ऐसे किसी भी प्रश्न से सहमति प्रकट नहीं की न उनके उत्तर ही बताये जो मनुष्य जाति के लिये हितकर नहीं होते। उदाहरण के लिये जुये, सट्टे, शराब सम्बन्धी प्रश्न उसने नहीं बताये। भूत का कहना था जिन बातों से वह स्वयं दुखी है वह बात नहीं बतायेगा। पर इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि मनुष्य को मृत्यु के बाद जीवन की अनेक घटनाओं की ही नहीं भाषा आदि की भी जानकारी रहती है और उससे भविष्य को भी जानने की क्षमता आ जाती है जो आत्मा के गुण का ही परिचायक है।
एकाएक श्री विलियम्स ने पूछा—‘‘आप कौन हैं क्यों उपस्थित हुये हैं’’ इस प्रश्न के उत्तर में उसी खट्-खट् वाली विधि से उसने बताया—मैं इसी मकान में रहता था, जब में वृद्ध था तभी मैंने अपने घर वालों से कह दिया था कि मुझे अमुक कब्रिस्तान में दफनाया जाये पर मेरी इच्छा के अनुसार मुझे नहीं दफनाया गया।’’
इसके बाद मैंने लोगों से पूंछ कर उस मकान में रहने वाले पहले किरायेदारों का पता लगाया तो उनसे मालूम हुआ कि सचमुच उनके पिता ने मृत्यु से पूर्व इस तरह की इच्छा व्यक्त की थी।
एक और विलक्षण बात थी कि यह भूत तभी तक यह खट्-खट् की आवाज करता था जब तक घर में सबसे छोटा वाला लड़का उपस्थित रहता था। पहले कई दिन जब-जब स्कूल या घर से बाहर रहा भूत ने उपस्थिति नहीं दर्शायी। उस दिन श्री विलियम्स और अधिक खोज-बीन के लिये एक मनोवैज्ञानिक और एक पादरी को भी लाये। इनकी उपस्थिति में भूत एक दो बातों के ही सामान्य उत्तर दे सका था कि लड़का जो आज कई दिन से छिपा-छिपा रहा था इतना भयभीत हो गया कि उसे तीव्र ज्वर हो आया। उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। इसके बाद उसके माता-पिता को भी बच्चे की ओर से बड़ी चिन्ता हो गई और उन्होंने दूसरा मकान ढूंढ़ कर उस मकान को ही बदल लिया। श्री विलियम्स ने भूत सम्बन्धी जिन तथ्यों का पता लगाया उनमें से कई जानकारी की दृष्टि से बड़े उपयोगी हो सकते हैं। भूत किसी का अहित नहीं कर सकता यदि कर सकता है तो वह कोमल और भीरु मस्तिष्क वालों को ही डरा सकता है या शरीर पर किसी तरह का नियन्त्रण कर सकता है। दूसरे भूत को जिस वस्तु में इच्छा होती है वह केवल उतना ही सोचता रहता और उसी का दुःख करता रहता है। जब तक उस अवस्था में भी उसकी यह इच्छा शिथिल नहीं पड़ जाती तब तक मृत्यु वाली निद्रा नहीं आती जीवात्मा दूसरे जन्म की तैयारी नहीं कर पाती।
लंदन में एक अंग्रेज-दम्पत्ति थे। पति-पत्नी दोनों शराबी। पत्नी की मृत्यु के बाद पति ने मकान का कुछ हिस्सा मार्टिन को किराये में दे दिया। एक दिन मार्टिन की स्त्री ने घर में एक काले वस्त्र धारण किये हुए स्त्री को देखा, उन्होंने समझा यह मेरी मां है, जैसे ही वह उससे मिलने के लिए आगे बढ़ी कि वह स्त्री सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गई और ऊपर के कमरे में जल रही मोमबत्ती बुझा दी। फिर उसके बाद कोई दिखाई न दिया। इसके कई दिन बार वैसी ही छाया फिर दिखाई दी, पर प्रयत्न करने पर भी न तो उससे कोई बात-चीत की जा सकी, न उससे मिला ही जा सका। आगे बढ़ते ही वह छाया अदृश्य हो जाती। इस घटना को बाद में पड़ोसियों ने भी देखा और यह माना कि यह पूर्व अंग्रेज स्त्री की भटकती हुई आत्मा है। आत्माओं के इस तरह के क्रिया-कलापों की घटनायें भारतवर्ष में बहुतायत से होती हैं।
प्रसिद्ध साहित्यकार लार्ड ब्रोह्म के जीवन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना आत्मा के अस्तित्व पर प्रकाश डालती है। उनके एक मित्र थे, उन्हें आत्माओं के अस्तित्व के सम्बन्ध में जानने का बड़ा चाव रहता था। दोनों ऐसे लेख जिनमें कोई ऐसी जानकारी होती थी, ढूंढ़-ढूंढ़कर पढ़ते थे। उन्होंने सुना था कि भारतवर्ष में कुछ ऐसे योगी हैं, जो मृतात्माओं के साथ साक्षात्कार कराते हैं। एक दिन इस पर दोनों मित्रों ने निश्चित किया—‘‘हम में से जिसकी मृत्यु हो, वह दूसरे से मिलने अवश्य आये।’’ यह बात मस्तिष्क में गहराई तक बैठ जाये, इसके लिये उन्होंने उंगली काट कर एक कागज में हस्ताक्षर भी किये।
कुछ दिन बाद मित्र सर्विस के लिये भारतवर्ष चला आया। इसके बाद 19 दिसम्बर 1799 की बात है, लार्ड ब्रोह्म अपने स्नानागार पहुंचे, कपड़े उतार कर कुर्सी में रखे और दरवाजा बन्द करके टब में स्नान करने लगे। ब्राह्म साहब लिखते हैं—‘‘जैसे ही मैंने टब से अपना सिर बाहर निकाला कि देखता हूं, मेरे मित्र महोदय सामने कुर्सी पर बैठे हैं। दरवाजे बिल्कुल बन्द थे, मैं घबरा गया कि वह कोई प्रेत तो नहीं है और उसके बाद मुझे जब होश आया तो कुर्सी में कोई नहीं था, दरवाजे पहले की तरह बन्द थे। उसके 8-10 दिन बाद भारत से आया एक पत्र मिला, जिसमें यह लिखा था कि 19 दिसम्बर के दिन मित्र की मृत्यु हो गई है। इस घटना से मुझे पूरा विश्वास हो गया कि मृत्यु के बाद भी आत्मा रहती है और जागृत जीवन की उसमें तमाम स्मृतियां भी रहती हैं।’’
ये घटनायें यही प्रकट करती हैं कि तीव्र आकांक्षा और राग-आसक्ति के बंधन जीवात्मा को मृत्यु के उपरान्त भी खींचते और तदनुकूल हलचल के लिए बाध्य करते रहते हैं। इसीलिए जीवन में मोहसक्ति के बंधन ढीले कर रखने की शिक्षा प्राचीन भारत में दी जाती थी तथा उसी के अनुरूप आश्रम-व्यवस्था भी की गई थी। वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम मोहासक्ति की समाप्ति के लिए तथा चेतना के विस्तार द्वारा आत्मविकास के पथ पर निरन्तर अग्रसर होने के लिए ही रखे गये थे।
मृत्यु के समय, मरणशील व्यक्ति से दान कराने की व्यवस्था भी इसी कारण थी कि व्यक्ति के सब मोह मिट जायें, आसक्ति के बंधन छूट जायें। अन्तिम समय व्यक्ति के भीतर वे ही संस्कार तथा वे ही आकांक्षाएं प्रबल होकर उभर आती हैं, जो जीवन भर आस्था के क्षेत्र में, व्यक्तित्व का मूल बनी फैल और घुली-मिली रहती हैं। अन्त समय में उभरी भावनाएं ही मरणोत्तर जीवन में भी सक्रिय रहती है। श्रीमद्भगवङ्गाता में भी कहा है—
‘‘यं यं वापि स्मरन्मानं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कोन्तेय सदा तद्भाव-भावितः ।।’’
अर्थात् हे अर्जुन! जो अन्त समय में जिन भावों का स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, उन्हीं भावों से अनुप्राणित होकर वैसा ही नया शरीर, नया व्यक्तित्व प्राप्त करता है। संन्यासी से इसीलिए संन्यास लेते समय उसके श्राद्ध-संस्कार भी उसी के द्वारा करा लिए जाते हैं कि उसकी कोई भी आकांक्षा-आसक्ति सूक्ष्म रूप में भी शेष न रहे। जो मनुष्य जितनी अधिक वासनाएं-आकांक्षाएं साथ लेकर मरता है, उसके भूत होने की सम्भावना उतनी ही अधिक रहती है। अतः इस दुर्दशा से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय ऐसी जीवन दृष्टि, चिन्तन पद्धति तथा आचरण-अभ्यास को विकसित करना है, जो वासनाओं-तृष्णाओं और आकांक्षाओं से निर्लिप्तता का भाव दृढ़ करे।
मनु संहिता में कहा है—
वान्ताश्त्यल्कामुाखः प्रेतो विप्रो धर्मात् स्वकाच्युतः । अमेध्य कुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ।। मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् । चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्म्मात्-स्वकाच्युतः ।।
अर्थात् ब्राह्मण कर्तव्य भ्रष्ट होने से दर्दिभक्षक ज्वालामुख प्रेत होता है। क्षत्रिय ऐसा होने से शव एव विष्ठाभक्षक कटपूतन नामक प्रेत होता है। वैश्य कर्मभ्रष्ट होने से पूयभक्षक मैत्राक्ष ज्योतिक नामक प्रेत होता है एवं शूद्र ऐसा होने से चैलाशक नामक प्रेत होता है।
तात्पर्य यही कि कर्तव्य भ्रष्टता और विवेक भ्रष्टता ही मरणोत्तर जीवन में प्रेतावस्था का कारण बनती है। साधारण मनुष्य के सूक्ष्म शरीर की स्थूल शरीर एवं इन्द्रियों के साथ विशेष आसक्ति होने से मनुष्य इच्छानुसार स्थूल शरीर धारण नहीं कर सकता। योगियों का सूक्ष्म शरीर वासना द्वारा आबद्ध नहीं होने से वे अपनी इच्छानुसार शरीर धारण कर सकते हैं। प्रेतों का स्थूल शरीर होता ही नहीं, केवल सूक्ष्म शरीर होता है। सूक्ष्म शरीर में असीम बल है, इस कारण प्रेत वासना के वेग को प्रबल बनाकर आवश्यकतानुसार स्थूल शरीर धारण कर सकता है। किन्तु योगी के स्थूल शरीर धारण एवं प्रेत के स्थूल शरीर धारण में अनेक अन्तर है। योगी का अन्तःकरण वासना रहित होने से वह योगसिद्धि की सहायता से अपनी इच्छानुकूल नाना प्रकार का शरीर धारण कर सकता है। प्रेत ऐसा नहीं कर सकता, वह केवल अपनी किसी तीव्र प्रबल वासना में अनुसार थोड़े समय के लिए स्थूल शरीर बना सकता है।
उदाहरणार्थ, यदि किसी माता का चित्त अपने पुत्र में आसक्त हो, वह उसी का ध्यान करते हुए शरीर त्याग करे एवं इसी कारण उसको प्रेस योनि की प्राप्ति हो तो, वह उस वासना के तीव्र वेग से अपने पूर्व स्थूल शरीर के अनुरूप ही स्थूल शरीर बनाकर पुत्र के निकट आ सकती है। ऐसे ही स्त्री पति के निकट या पति स्त्री के निकट आ सकता है। प्रेतों का शरीर सब समय एक जैसा नहीं होता, सूक्ष्म पंचतत्वों पर आधिपत्य होने से प्रेत आवश्यकतानुसार किसी न किसी तत्व का आकर्षण करके उसी के अनुसार शरीर धारण कर सकता है, यदि वह शक्तिशाली प्रेत हो। वायु तत्व का आकर्षण करके वह प्रबल आंधी का रूप धारण कर किसी को भयभीत कर सकता है। किस समय अग्नितत्व की सहायता से भयानक आग्नेय रूप धारण करके मनुष्य को डरा सकता है। कभी छाया रूप धारण करके मनुष्य के सामने आ सकता है एवं बातचीत भी कर सकता है। प्रेतों के छाया शरीर की ये बातों कान से नहीं सुनी जा सकतीं। प्रेत जिससे अपनी बात कहना चाहता है, उसके हृदय में ऐसी प्रेरणा उत्पन्न करता है, जिससे वह मनुष्य अपने मन में प्रेत की बात सुन सकता है एवं उसके साथ वार्तालाप भी कर सकता है। कुछ प्राणियों की ऐसी स्वाभाविक दृष्टि भी होती है कि वे प्रेत देख सकते हैं। कुछ मनुष्यों में भी प्रेत देखने की स्वाभाविक दृष्टि होती है। ऐसे मनुष्य प्रेत की छाया, प्रेत की मूर्ति या प्रेत ने किसी व्यक्ति पर आवेश किया हो तो उस व्यक्ति के अन्दर प्रेत को देख सकते हैं। इस सामर्थ्य को ही ‘साइकिक साइट’ कहते हैं।
स्वभाव के अनुसार प्रेत भी अच्छे-बुरे नाना प्रकार के हुआ करते हैं। सच्चरित्र निरीह व्यक्ति मोहादि के कारण प्रेतयोनि प्राप्त करके भी किसी का अनिष्ट अथवा हानि नहीं करते हैं, किन्तु जो मनुष्य स्त्री या पुरुष जीवित अवस्था में ही दुष्ट प्रकृति के होते हैं, वे मृत्यु के अनन्तर प्रेतयोनि प्राप्त करने पर अपनी दुष्टता से बाज नहीं आते हैं। इसी श्रेणी के प्रेत मनुष्य को भय दिखाते हैं, अत्याचार करते हैं, दूसरों पर आक्रमण करते हैं और नाना प्रकार के उपद्रव करते हैं। परन्तु ये सब उपद्रव दुर्बल हृदय मनुष्यों के ऊपर ही प्रभाव डाला करते हैं। आत्मबल सम्पन्न, उन्नत मन के सदाचारी एवं पवित्र स्त्री-पुरुषों को प्रेत कुछ भी हानि नहीं पहुंचा सकता है। प्रायः स्त्री या बालक पर ही प्रेतों का आक्रमण देखा-सुना जाता है। क्योंकि इन दोनों में मानसिक भावनाओं की स्वभावतः प्रधानता हुआ करती है, ज्ञान की प्रधानता नहीं रहती। नीच प्रकृति के दुष्ट प्रेत जिस पर आक्रमण करते हैं, उसको आत्महत्या कर डालने के लिए भी प्रेरणा करते हैं, जिससे वह मरने के बाद उन्हीं की योनि में आ जाए। आत्महत्या करके प्राण त्याग करने वाले प्रेतों में आत्महत्या करने की अन्तिम प्रवृत्ति प्रबल रूप में रहती है, इस कारण वह दूसरों को भी उसी के लिए प्रेरित करता है। विक्षुब्ध, अशान्त, उद्विग्न जीव अपने विक्षोभ और उद्विग्नता के ही विस्तार की धुन में रहते हैं। विक्षोभ प्रेरित प्रेतों का जीवन बड़ा ही दुःखमय होता है। क्योंकि जिन वासनाओं के कारण प्रेतयोनि की प्राप्ति होती है, प्रेतयोनि में उनकी कमी नहीं होती, किन्तु वे और भी प्रबल हो उठती हैं। अतः प्रेत अपनी उन वासनाओं की आधार वस्तुओं को पाने एवं भोग करने के लिए सदा लालायित रहता है। परन्तु उस योनि में उन वस्तुओं का वह यथेच्छ भोग नहीं कर सकता, इस कारण निराशा की अग्नि में वह दिन-रात जला करता है। मोह-मुग्ध प्रेत सदा पत्नी-सन्तति आदि के साथ मिलकर जीवित अवस्था की तरह रहना चाहता है, यह सुविधा न मिलने से वह बड़ी यन्त्रणा भोगा करता है। कभी-कभी प्रेत अपने प्रियपात्र उन व्यक्तियों को मारकर अपनी योनि में लाना चाहता है, एवं इसके लिये चेष्टा करता है। उस चेष्टा में कृतकार्य न होने से भी वह हताश होकर बड़ा दुःख पाता है। कभी कोई पुरुष अपनी प्रथम पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह करता है, ऐसी दशा में यदि उसकी प्रथम पत्नी को प्रेतत्व हुआ हो एवं उस मृत स्त्री की आसक्ति अपने जीवित प्रति पर हो जैसा होना स्वाभाविक है, तो वह अपनी सपत्नी की ईर्ष्या में दिन-रात जला करती है और वह अपने पति के पास स्वयं आना चाहती एवं सौत के साथ पति का विच्छेद कराने की यथासाध्य चेष्टा भी करती है। जिस घर में दम्पत्ति रहते हैं, उसी में वह प्रेतयोनि प्राप्त स्त्री भी रहने की चेष्टा करती है। इसी प्रकार आजीवन धन संचय करके जो कृपण धन के मोह से प्रेत होते हैं, वे भी घर के जिस स्थान में उनका धन रहता है, वहीं सदा रहने की चेष्टा करते हैं, वह धन ले जाने का भी प्रयत्न करते हैं एवं उस प्रयत्न में कृतकार्य न होने पर हताश होकर बड़ी वेदना भोगते हैं। ऐसे ही व्यभिचारी पुरुष प्रेतयोनि में जाकर अपनी व्यभिचार वासना को परित्याग नहीं कर सकते, इस कारण ऐसे प्रेत परस्त्री या ऐसी प्रेतिनी परपुरुष के साथ अपनी नीच वासना चरितार्थ करने की चेष्टा करती है। प्रेतों की इस प्रकार की कामासक्ति के अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण सुने गये हैं। प्रेत जिस पुरुष या स्त्री पर कामासक्त होता है, बहुत समय उसे मार डालने का भी प्रयत्न करता है और प्रेत निवारक मन्त्र-औषधि आदि के द्वारा परास्त एवं निराश होकर दुःख से मर्माहत होता है। प्रेत योनि अज्ञानमय होने के कारण बहुत समय प्रेत यह समझ भी नहीं पाता कि उसके अन्तःकरण में क्यों इतना दुःख का दावातुषानल जल रहा है और क्यों उसका दुःख शान्त नहीं होता। अज्ञान से विमोहित चित प्रेत यों ही दुःख से व्याकुल होकर पागल की तरह इधर-उधर दौड़ता रहता है। हृदय क्या चाहता है, यह भी वह नहीं समझ पाता, अन्तःकरण में इतनी अशान्ति क्यों है, यह भी वह निर्णय नहीं कर सकता, फिर भी दिन-रात उसका हृदय दुःख-दावानल से भस्मीभूत हुआ करता है। इस प्रकार प्रेतों की दशा बड़ी ही दुःखमय होती है। जो उनके जीवनकाल की अशान्ति, अविवेक और अनाचारमय जीवन की ही प्रतिध्वनि होती है।
इस सन्दर्भ में अब तक के अन्वेषणों ने कई अनोखे तथ्य प्रतिपादित किये हैं। मरने के उपरान्त अनेकों को शान्ति मिलती है और वे प्रत्यक्ष जीवन में अहिर्निश श्रम करने की थकान को दूर करने के लिए परलोक की गुफा में विश्राम लेने लगते हैं। इसी निद्राकाल में स्वर्ग नरक जैसे स्वप्न दिखाई पड़ते रहते होंगे। थकान उतरने पर जीव पुनः क्षमता सम्पन्न बनता है और अपने संग्रहीत संस्कारों के खिंचाव से रुचिकर परिस्थितियों के इर्द-गिर्द मंडराने लगता है। वहीं किसी के घर उनका जन्म हो जाता है। कभी-कभी कोई मनुष्य प्रेत योनि प्राप्त करते हैं। यह न जीवित स्थिति कही जा सकती है न पूर्ण मृतक ही। जीवित इसलिए नहीं कि स्थूल शरीर न होने के कारण वे कोई वैसा कर्म तथा उपभोग नहीं कर सकते जो इन्द्रियों की सहायता से ही सम्भव हो सकते हैं। मृतक उन्हें इसलिए नहीं कह सकते कि वासनाओं और आवेशों से अत्यधिक ग्रसित होने के कारण उनका सूक्ष्म शरीर काम करने लगता है अस्तु वे अपने अस्तित्व का परिचय यत्र-तत्र देते फिरते हैं। इस विचित्र स्थिति में पड़े होने के कारण वे किसी का लाभ एवं सहयोग तो कदाचित ही कर सकते हैं, हां डराने या हानि पहुंचाने का कार्य वे सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। इसी कारण आमतौर से लोग प्रेतों से डरते हैं और उनका अस्तित्व अपने समीप अनुभव करते ही उन्हें भगाने का प्रयत्न करते हैं। प्रेतों के प्रति किसी का आकर्षण नहीं होता वरन् उससे भयभीत रहते और बचते ही रहते हैं। वैज्ञानिक शोध की दृष्टि से—वस्तुस्थिति जानने एवं कौतूहल निवारण की दृष्टि से कोई उस क्षेत्र में प्रवेश करके तथ्यों की जानकारी के लिए प्रयत्न करें तो यह दूसरी बात है।
प्रेतात्माओं द्वारा अपने अस्तित्व का परिचय दिये जाने तथा अमुक व्यक्तियों को अपना माध्यम बनाकर त्रास देने की घटनाओं का वर्णन करना इन पंक्तियों में अभीष्ट नहीं। जन श्रुतियों से लेकर सरकारी रिकार्ड में दर्ज और परामनोविज्ञान के अन्वेषकों द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसी असंख्यों घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनसे प्रेतात्माओं के अस्तित्व की पुष्टि होती है। यहां तो चर्चा यह की जानी है कि प्रेत योनि में सभी को जाना पड़ता है। अथवा किसी विशेष स्थिति के व्यक्ति ही उसमें प्रवेश करते हैं। उत्तर स्पष्ट है। उद्विग्न, विक्षुब्ध, आतुर, अशान्त, क्रुद्ध, कामनाग्रस्त, अतृप्त लोगों को ही प्रायः प्रेत बनना पड़ता है। शान्त चित, सौम्य एवं सज्जन प्रकृति के लोग सीधी सादी जन्म मरण की प्रक्रिया पूरी करते रहते हैं।
प्रेत-योनि की प्राप्त के दो मुख्य कारण होते हैं—पहला प्रबल आकांक्षाओं की अतृप्ति। दूसरा—तृष्णा-वासनाओं की तीव्रता। प्रबल आकांक्षा की व्यक्ति-चित्त में प्रचण्ड प्रतिक्रिया होती है। दैनिक जीवन में भी यह देखा जाता है कि जब कोई नवीन योजना दिमाग में होती है, तो उसकी सुनिश्चित रूपरेखा बनने तक मन-मस्तिष्क चैन से नहीं बैठ पाता, नहीं नींद आती है। ऐसी आकांक्षा खंडित हो जाने पर कई-कई रातों तक लोगों की नींद उड़ जाया करती है। यही बात तृष्णाओं के बारे में है। तृष्णा से व्याकुल लोग न शान्त रह पाते, न आराम कर पाते, न सो पाते। जब तक तीव्र तृष्णा की कुछ पूर्ति नहीं होती, वे उद्विग्न ही बने रहते हैं। प्रेत योनि भी ऐसी ही उद्विग्नता और अशान्ति से भरी जीव-दशा का नाम है जो मरणोत्तर अवधि में होती है।
हम भारतीयों की यह जो मान्यता है कि धन, पुत्र वासना आदि पर आसक्ति रहते यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसे कई बार मृत्यु के बाद बहुत समय तक किसी भूत-प्रेत की योनि में रहना पड़ता है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में सदैव ही अनासक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है। चार आश्रम—(1) ब्रह्मचर्य विद्याध्ययन, (2) गृहस्थ, (3) वानप्रस्थ, (4) और संन्यास में अन्तिम दो की अधिकांश शिक्षायें और कर्तव्य ऐसे हैं जिनमें प्रत्येक व्यक्ति के धीरे-धीरे परिवार धन-सम्पत्ति का मोह हटाकर अपना मन परमार्थ-साधना में लगाना पड़ता था। संन्यास दीक्षा के बाद तो वह सब कुछ त्याग कर अपने आप को उस तरह अनुभव करता था जैसे मकड़ी अपने बने बनाये जाले को स्वयं खाकर सन्तोष अनुभव करती है। तब जिसके पीछे बेटे होते थे वह उनकी आवश्यकता की सम्पत्ति उन्हें देकर शेष लोक-कल्याण में लगाकर घर छोड़ देते थे और आत्म-कल्याण की साधना में जुट जाते थे।
मोहान्ध व्यक्तियों के प्रेत-योनि में जाने का कोई वैज्ञानिक आधार तो अभी समझ में नहीं आता किन्तु बौद्धिक और प्रामाणिक आधार अवश्य हैं। हम में से अनेकों को भूत का सामना करना पड़ जाता है पर यदि सामान्य लोगों की बात को भ्रम या अन्धविश्वास मानें जैसा कि अनेक लोग किसी स्वार्थवश या किसी को धोखा देने के लिये भी भूत-प्रेत की बात कहकर डरा देते हैं तो भी संसार में कई ऐसी घटनायें घटी हैं जिनमें इस विश्वास को विचारशील लोगों का भी समर्थन मिला है।
यह घटना ऐसी ही है और उसे स्वयं श्री जे.डी. विलियम्स ने स्वीकार भी किया है। दुल्ली स्ट्रीट के अनेक लोगों ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा। श्री विलियम्स महोदय ने इस घटना को 3 नवंबर 1968 के इन्दौर से छपने वाले दैनिक अखबार नई दुनिया में छपाया भी उनका यह लेख विश्व के अनेक अखबारों में छपा और बहुत समय तक लोगों की चर्चा का विषय भी बना रहा।
मैनचेस्टर की दुल्ली स्ट्रीट पर स्थित छोटे से मकान के पास जैसे ही प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री डा. जे.डी. विलियम्स पहुंचे घर के लोगों ने उनका स्वागत किया। इस घर में पति-पत्नी और उनके दो बच्चे कुल चार ही व्यक्ति रहते थे। चारों तब घर में ही उपस्थित थे।
घर की स्त्री श्री विलियम्स को एक अलमारी के पास ले गई। यहीं पर वह भूत था जो दिखाई तो नहीं दें रहा था पर पूछे गये किसी भी प्रश्न और अपनी उपस्थिति का प्रमाण एक विशेष प्रकार की खटपट के द्वारा दें रहा था। उसके संकेत बड़े ही शिक्षित व्यक्तियों जैसे थे। अंग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षर ‘‘ए’’ के लिये वह एक बार (खट् खट्) की आवाज करता था और ‘‘बी’’ के लिये दो बाद (खट् खट्) की आवाज करता था। इसके आगे जो अक्षर जितने नम्बर पर पड़ता है उस अक्षर के लिये उतने ही बात बिना रुके खट् खट्-खट् का उसने संकेत बना लिया था उसी के माध्यम से वह पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी देता था।
यह खेल सारे दिन चलता रहा। घर के दूसरी ओर ऐसी कोई वस्तु नहीं थी कि वहां से खट्-खट् की आवाज आ रही होती लोगों ने सारी सम्भावनायें पहले ही छानबीन ली थीं। श्री विलियम्स को तो बहुत देर के बाद बुलाया गया था। उनकी पराविद्या में रुचि होने के कारण ही उन्हें सूचना दी गई थी। उन्होंने सब जांच पड़ताल कर ली पर उन्हें कोई भौतिक कारण न मिला जिससे खट्-खट् का सूत्र समझ में आता।
स्त्री ने सर्वप्रथम श्री विलियम्स का परिचय कराया फिर पूछा—क्या तुम यहां उपस्थित हो तो भूत ने उत्तर में सर्वप्रथम बिना रुके 24 बार खट्-खट् की (इससे अंग्रेजी के वाई अक्षर की सूचना मिलती मिलती है।) फिर थोड़ा रुक कर 5 बार (ई) फिर रुककर 19 बार (एस) खट्-खट् की इस तरह उसने अंग्रेजी में ‘यस’ कहकर अपने वहां होने की सूचना दी।
इसके बाद श्री विलियम्स ने उससे अनेक प्रश्न पूछे—भूत ने उनमें से अनेक प्रश्नों के उत्तर दिये। पर ऐसे किसी भी प्रश्न से सहमति प्रकट नहीं की न उनके उत्तर ही बताये जो मनुष्य जाति के लिये हितकर नहीं होते। उदाहरण के लिये जुये, सट्टे, शराब सम्बन्धी प्रश्न उसने नहीं बताये। भूत का कहना था जिन बातों से वह स्वयं दुखी है वह बात नहीं बतायेगा। पर इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि मनुष्य को मृत्यु के बाद जीवन की अनेक घटनाओं की ही नहीं भाषा आदि की भी जानकारी रहती है और उससे भविष्य को भी जानने की क्षमता आ जाती है जो आत्मा के गुण का ही परिचायक है।
एकाएक श्री विलियम्स ने पूछा—‘‘आप कौन हैं क्यों उपस्थित हुये हैं’’ इस प्रश्न के उत्तर में उसी खट्-खट् वाली विधि से उसने बताया—मैं इसी मकान में रहता था, जब में वृद्ध था तभी मैंने अपने घर वालों से कह दिया था कि मुझे अमुक कब्रिस्तान में दफनाया जाये पर मेरी इच्छा के अनुसार मुझे नहीं दफनाया गया।’’
इसके बाद मैंने लोगों से पूंछ कर उस मकान में रहने वाले पहले किरायेदारों का पता लगाया तो उनसे मालूम हुआ कि सचमुच उनके पिता ने मृत्यु से पूर्व इस तरह की इच्छा व्यक्त की थी।
एक और विलक्षण बात थी कि यह भूत तभी तक यह खट्-खट् की आवाज करता था जब तक घर में सबसे छोटा वाला लड़का उपस्थित रहता था। पहले कई दिन जब-जब स्कूल या घर से बाहर रहा भूत ने उपस्थिति नहीं दर्शायी। उस दिन श्री विलियम्स और अधिक खोज-बीन के लिये एक मनोवैज्ञानिक और एक पादरी को भी लाये। इनकी उपस्थिति में भूत एक दो बातों के ही सामान्य उत्तर दे सका था कि लड़का जो आज कई दिन से छिपा-छिपा रहा था इतना भयभीत हो गया कि उसे तीव्र ज्वर हो आया। उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। इसके बाद उसके माता-पिता को भी बच्चे की ओर से बड़ी चिन्ता हो गई और उन्होंने दूसरा मकान ढूंढ़ कर उस मकान को ही बदल लिया। श्री विलियम्स ने भूत सम्बन्धी जिन तथ्यों का पता लगाया उनमें से कई जानकारी की दृष्टि से बड़े उपयोगी हो सकते हैं। भूत किसी का अहित नहीं कर सकता यदि कर सकता है तो वह कोमल और भीरु मस्तिष्क वालों को ही डरा सकता है या शरीर पर किसी तरह का नियन्त्रण कर सकता है। दूसरे भूत को जिस वस्तु में इच्छा होती है वह केवल उतना ही सोचता रहता और उसी का दुःख करता रहता है। जब तक उस अवस्था में भी उसकी यह इच्छा शिथिल नहीं पड़ जाती तब तक मृत्यु वाली निद्रा नहीं आती जीवात्मा दूसरे जन्म की तैयारी नहीं कर पाती।
लंदन में एक अंग्रेज-दम्पत्ति थे। पति-पत्नी दोनों शराबी। पत्नी की मृत्यु के बाद पति ने मकान का कुछ हिस्सा मार्टिन को किराये में दे दिया। एक दिन मार्टिन की स्त्री ने घर में एक काले वस्त्र धारण किये हुए स्त्री को देखा, उन्होंने समझा यह मेरी मां है, जैसे ही वह उससे मिलने के लिए आगे बढ़ी कि वह स्त्री सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गई और ऊपर के कमरे में जल रही मोमबत्ती बुझा दी। फिर उसके बाद कोई दिखाई न दिया। इसके कई दिन बार वैसी ही छाया फिर दिखाई दी, पर प्रयत्न करने पर भी न तो उससे कोई बात-चीत की जा सकी, न उससे मिला ही जा सका। आगे बढ़ते ही वह छाया अदृश्य हो जाती। इस घटना को बाद में पड़ोसियों ने भी देखा और यह माना कि यह पूर्व अंग्रेज स्त्री की भटकती हुई आत्मा है। आत्माओं के इस तरह के क्रिया-कलापों की घटनायें भारतवर्ष में बहुतायत से होती हैं।
प्रसिद्ध साहित्यकार लार्ड ब्रोह्म के जीवन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना आत्मा के अस्तित्व पर प्रकाश डालती है। उनके एक मित्र थे, उन्हें आत्माओं के अस्तित्व के सम्बन्ध में जानने का बड़ा चाव रहता था। दोनों ऐसे लेख जिनमें कोई ऐसी जानकारी होती थी, ढूंढ़-ढूंढ़कर पढ़ते थे। उन्होंने सुना था कि भारतवर्ष में कुछ ऐसे योगी हैं, जो मृतात्माओं के साथ साक्षात्कार कराते हैं। एक दिन इस पर दोनों मित्रों ने निश्चित किया—‘‘हम में से जिसकी मृत्यु हो, वह दूसरे से मिलने अवश्य आये।’’ यह बात मस्तिष्क में गहराई तक बैठ जाये, इसके लिये उन्होंने उंगली काट कर एक कागज में हस्ताक्षर भी किये।
कुछ दिन बाद मित्र सर्विस के लिये भारतवर्ष चला आया। इसके बाद 19 दिसम्बर 1799 की बात है, लार्ड ब्रोह्म अपने स्नानागार पहुंचे, कपड़े उतार कर कुर्सी में रखे और दरवाजा बन्द करके टब में स्नान करने लगे। ब्राह्म साहब लिखते हैं—‘‘जैसे ही मैंने टब से अपना सिर बाहर निकाला कि देखता हूं, मेरे मित्र महोदय सामने कुर्सी पर बैठे हैं। दरवाजे बिल्कुल बन्द थे, मैं घबरा गया कि वह कोई प्रेत तो नहीं है और उसके बाद मुझे जब होश आया तो कुर्सी में कोई नहीं था, दरवाजे पहले की तरह बन्द थे। उसके 8-10 दिन बाद भारत से आया एक पत्र मिला, जिसमें यह लिखा था कि 19 दिसम्बर के दिन मित्र की मृत्यु हो गई है। इस घटना से मुझे पूरा विश्वास हो गया कि मृत्यु के बाद भी आत्मा रहती है और जागृत जीवन की उसमें तमाम स्मृतियां भी रहती हैं।’’
ये घटनायें यही प्रकट करती हैं कि तीव्र आकांक्षा और राग-आसक्ति के बंधन जीवात्मा को मृत्यु के उपरान्त भी खींचते और तदनुकूल हलचल के लिए बाध्य करते रहते हैं। इसीलिए जीवन में मोहसक्ति के बंधन ढीले कर रखने की शिक्षा प्राचीन भारत में दी जाती थी तथा उसी के अनुरूप आश्रम-व्यवस्था भी की गई थी। वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम मोहासक्ति की समाप्ति के लिए तथा चेतना के विस्तार द्वारा आत्मविकास के पथ पर निरन्तर अग्रसर होने के लिए ही रखे गये थे।
मृत्यु के समय, मरणशील व्यक्ति से दान कराने की व्यवस्था भी इसी कारण थी कि व्यक्ति के सब मोह मिट जायें, आसक्ति के बंधन छूट जायें। अन्तिम समय व्यक्ति के भीतर वे ही संस्कार तथा वे ही आकांक्षाएं प्रबल होकर उभर आती हैं, जो जीवन भर आस्था के क्षेत्र में, व्यक्तित्व का मूल बनी फैल और घुली-मिली रहती हैं। अन्त समय में उभरी भावनाएं ही मरणोत्तर जीवन में भी सक्रिय रहती है। श्रीमद्भगवङ्गाता में भी कहा है—
‘‘यं यं वापि स्मरन्मानं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कोन्तेय सदा तद्भाव-भावितः ।।’’
अर्थात् हे अर्जुन! जो अन्त समय में जिन भावों का स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, उन्हीं भावों से अनुप्राणित होकर वैसा ही नया शरीर, नया व्यक्तित्व प्राप्त करता है। संन्यासी से इसीलिए संन्यास लेते समय उसके श्राद्ध-संस्कार भी उसी के द्वारा करा लिए जाते हैं कि उसकी कोई भी आकांक्षा-आसक्ति सूक्ष्म रूप में भी शेष न रहे। जो मनुष्य जितनी अधिक वासनाएं-आकांक्षाएं साथ लेकर मरता है, उसके भूत होने की सम्भावना उतनी ही अधिक रहती है। अतः इस दुर्दशा से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय ऐसी जीवन दृष्टि, चिन्तन पद्धति तथा आचरण-अभ्यास को विकसित करना है, जो वासनाओं-तृष्णाओं और आकांक्षाओं से निर्लिप्तता का भाव दृढ़ करे।
मनु संहिता में कहा है—
वान्ताश्त्यल्कामुाखः प्रेतो विप्रो धर्मात् स्वकाच्युतः । अमेध्य कुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ।। मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् । चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्म्मात्-स्वकाच्युतः ।।
अर्थात् ब्राह्मण कर्तव्य भ्रष्ट होने से दर्दिभक्षक ज्वालामुख प्रेत होता है। क्षत्रिय ऐसा होने से शव एव विष्ठाभक्षक कटपूतन नामक प्रेत होता है। वैश्य कर्मभ्रष्ट होने से पूयभक्षक मैत्राक्ष ज्योतिक नामक प्रेत होता है एवं शूद्र ऐसा होने से चैलाशक नामक प्रेत होता है।
तात्पर्य यही कि कर्तव्य भ्रष्टता और विवेक भ्रष्टता ही मरणोत्तर जीवन में प्रेतावस्था का कारण बनती है। साधारण मनुष्य के सूक्ष्म शरीर की स्थूल शरीर एवं इन्द्रियों के साथ विशेष आसक्ति होने से मनुष्य इच्छानुसार स्थूल शरीर धारण नहीं कर सकता। योगियों का सूक्ष्म शरीर वासना द्वारा आबद्ध नहीं होने से वे अपनी इच्छानुसार शरीर धारण कर सकते हैं। प्रेतों का स्थूल शरीर होता ही नहीं, केवल सूक्ष्म शरीर होता है। सूक्ष्म शरीर में असीम बल है, इस कारण प्रेत वासना के वेग को प्रबल बनाकर आवश्यकतानुसार स्थूल शरीर धारण कर सकता है। किन्तु योगी के स्थूल शरीर धारण एवं प्रेत के स्थूल शरीर धारण में अनेक अन्तर है। योगी का अन्तःकरण वासना रहित होने से वह योगसिद्धि की सहायता से अपनी इच्छानुकूल नाना प्रकार का शरीर धारण कर सकता है। प्रेत ऐसा नहीं कर सकता, वह केवल अपनी किसी तीव्र प्रबल वासना में अनुसार थोड़े समय के लिए स्थूल शरीर बना सकता है।
उदाहरणार्थ, यदि किसी माता का चित्त अपने पुत्र में आसक्त हो, वह उसी का ध्यान करते हुए शरीर त्याग करे एवं इसी कारण उसको प्रेस योनि की प्राप्ति हो तो, वह उस वासना के तीव्र वेग से अपने पूर्व स्थूल शरीर के अनुरूप ही स्थूल शरीर बनाकर पुत्र के निकट आ सकती है। ऐसे ही स्त्री पति के निकट या पति स्त्री के निकट आ सकता है। प्रेतों का शरीर सब समय एक जैसा नहीं होता, सूक्ष्म पंचतत्वों पर आधिपत्य होने से प्रेत आवश्यकतानुसार किसी न किसी तत्व का आकर्षण करके उसी के अनुसार शरीर धारण कर सकता है, यदि वह शक्तिशाली प्रेत हो। वायु तत्व का आकर्षण करके वह प्रबल आंधी का रूप धारण कर किसी को भयभीत कर सकता है। किस समय अग्नितत्व की सहायता से भयानक आग्नेय रूप धारण करके मनुष्य को डरा सकता है। कभी छाया रूप धारण करके मनुष्य के सामने आ सकता है एवं बातचीत भी कर सकता है। प्रेतों के छाया शरीर की ये बातों कान से नहीं सुनी जा सकतीं। प्रेत जिससे अपनी बात कहना चाहता है, उसके हृदय में ऐसी प्रेरणा उत्पन्न करता है, जिससे वह मनुष्य अपने मन में प्रेत की बात सुन सकता है एवं उसके साथ वार्तालाप भी कर सकता है। कुछ प्राणियों की ऐसी स्वाभाविक दृष्टि भी होती है कि वे प्रेत देख सकते हैं। कुछ मनुष्यों में भी प्रेत देखने की स्वाभाविक दृष्टि होती है। ऐसे मनुष्य प्रेत की छाया, प्रेत की मूर्ति या प्रेत ने किसी व्यक्ति पर आवेश किया हो तो उस व्यक्ति के अन्दर प्रेत को देख सकते हैं। इस सामर्थ्य को ही ‘साइकिक साइट’ कहते हैं।
स्वभाव के अनुसार प्रेत भी अच्छे-बुरे नाना प्रकार के हुआ करते हैं। सच्चरित्र निरीह व्यक्ति मोहादि के कारण प्रेतयोनि प्राप्त करके भी किसी का अनिष्ट अथवा हानि नहीं करते हैं, किन्तु जो मनुष्य स्त्री या पुरुष जीवित अवस्था में ही दुष्ट प्रकृति के होते हैं, वे मृत्यु के अनन्तर प्रेतयोनि प्राप्त करने पर अपनी दुष्टता से बाज नहीं आते हैं। इसी श्रेणी के प्रेत मनुष्य को भय दिखाते हैं, अत्याचार करते हैं, दूसरों पर आक्रमण करते हैं और नाना प्रकार के उपद्रव करते हैं। परन्तु ये सब उपद्रव दुर्बल हृदय मनुष्यों के ऊपर ही प्रभाव डाला करते हैं। आत्मबल सम्पन्न, उन्नत मन के सदाचारी एवं पवित्र स्त्री-पुरुषों को प्रेत कुछ भी हानि नहीं पहुंचा सकता है। प्रायः स्त्री या बालक पर ही प्रेतों का आक्रमण देखा-सुना जाता है। क्योंकि इन दोनों में मानसिक भावनाओं की स्वभावतः प्रधानता हुआ करती है, ज्ञान की प्रधानता नहीं रहती। नीच प्रकृति के दुष्ट प्रेत जिस पर आक्रमण करते हैं, उसको आत्महत्या कर डालने के लिए भी प्रेरणा करते हैं, जिससे वह मरने के बाद उन्हीं की योनि में आ जाए। आत्महत्या करके प्राण त्याग करने वाले प्रेतों में आत्महत्या करने की अन्तिम प्रवृत्ति प्रबल रूप में रहती है, इस कारण वह दूसरों को भी उसी के लिए प्रेरित करता है। विक्षुब्ध, अशान्त, उद्विग्न जीव अपने विक्षोभ और उद्विग्नता के ही विस्तार की धुन में रहते हैं। विक्षोभ प्रेरित प्रेतों का जीवन बड़ा ही दुःखमय होता है। क्योंकि जिन वासनाओं के कारण प्रेतयोनि की प्राप्ति होती है, प्रेतयोनि में उनकी कमी नहीं होती, किन्तु वे और भी प्रबल हो उठती हैं। अतः प्रेत अपनी उन वासनाओं की आधार वस्तुओं को पाने एवं भोग करने के लिए सदा लालायित रहता है। परन्तु उस योनि में उन वस्तुओं का वह यथेच्छ भोग नहीं कर सकता, इस कारण निराशा की अग्नि में वह दिन-रात जला करता है। मोह-मुग्ध प्रेत सदा पत्नी-सन्तति आदि के साथ मिलकर जीवित अवस्था की तरह रहना चाहता है, यह सुविधा न मिलने से वह बड़ी यन्त्रणा भोगा करता है। कभी-कभी प्रेत अपने प्रियपात्र उन व्यक्तियों को मारकर अपनी योनि में लाना चाहता है, एवं इसके लिये चेष्टा करता है। उस चेष्टा में कृतकार्य न होने से भी वह हताश होकर बड़ा दुःख पाता है। कभी कोई पुरुष अपनी प्रथम पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह करता है, ऐसी दशा में यदि उसकी प्रथम पत्नी को प्रेतत्व हुआ हो एवं उस मृत स्त्री की आसक्ति अपने जीवित प्रति पर हो जैसा होना स्वाभाविक है, तो वह अपनी सपत्नी की ईर्ष्या में दिन-रात जला करती है और वह अपने पति के पास स्वयं आना चाहती एवं सौत के साथ पति का विच्छेद कराने की यथासाध्य चेष्टा भी करती है। जिस घर में दम्पत्ति रहते हैं, उसी में वह प्रेतयोनि प्राप्त स्त्री भी रहने की चेष्टा करती है। इसी प्रकार आजीवन धन संचय करके जो कृपण धन के मोह से प्रेत होते हैं, वे भी घर के जिस स्थान में उनका धन रहता है, वहीं सदा रहने की चेष्टा करते हैं, वह धन ले जाने का भी प्रयत्न करते हैं एवं उस प्रयत्न में कृतकार्य न होने पर हताश होकर बड़ी वेदना भोगते हैं। ऐसे ही व्यभिचारी पुरुष प्रेतयोनि में जाकर अपनी व्यभिचार वासना को परित्याग नहीं कर सकते, इस कारण ऐसे प्रेत परस्त्री या ऐसी प्रेतिनी परपुरुष के साथ अपनी नीच वासना चरितार्थ करने की चेष्टा करती है। प्रेतों की इस प्रकार की कामासक्ति के अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण सुने गये हैं। प्रेत जिस पुरुष या स्त्री पर कामासक्त होता है, बहुत समय उसे मार डालने का भी प्रयत्न करता है और प्रेत निवारक मन्त्र-औषधि आदि के द्वारा परास्त एवं निराश होकर दुःख से मर्माहत होता है। प्रेत योनि अज्ञानमय होने के कारण बहुत समय प्रेत यह समझ भी नहीं पाता कि उसके अन्तःकरण में क्यों इतना दुःख का दावातुषानल जल रहा है और क्यों उसका दुःख शान्त नहीं होता। अज्ञान से विमोहित चित प्रेत यों ही दुःख से व्याकुल होकर पागल की तरह इधर-उधर दौड़ता रहता है। हृदय क्या चाहता है, यह भी वह नहीं समझ पाता, अन्तःकरण में इतनी अशान्ति क्यों है, यह भी वह निर्णय नहीं कर सकता, फिर भी दिन-रात उसका हृदय दुःख-दावानल से भस्मीभूत हुआ करता है। इस प्रकार प्रेतों की दशा बड़ी ही दुःखमय होती है। जो उनके जीवनकाल की अशान्ति, अविवेक और अनाचारमय जीवन की ही प्रतिध्वनि होती है।

