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Books - भूत कैसे होते हैं—क्या करते हैं ?

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स्वजनों सुहृदों से सम्बन्ध के इच्छुक—भूत

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मृत्यु के उपरान्त मनुष्य के सूक्ष्म शरीर से प्रेतयोनि में बने रहने के प्रमाण भी मिलते हैं। मरने के बाद भी आत्मा अपने सम्बन्धियों से सम्पर्क बनाने का इच्छुक रहता है। आव्हान करने की पद्धति मालूम होने पर वह सम्पर्क घनिष्ठ भी हो जाता है और उसमें ऐसे तथ्य जुड़े रहते हैं जिनके कारण इस सम्पर्क की वास्तविकता में कोई सन्देह नहीं रह जाता। प्रेतयोनि का अस्तित्व भी मरणोत्तर जीवन की पुष्टि करता है। स्थूल शरीर न सही, सूक्ष्म शरीर सही आत्मा का अस्तित्व तो विद्यमान रहा ही। कब्र में कैद रहने वाली—अस्तित्व प्रकट न कर सकने वाली बात—शरीर के साथ आत्मा की समाप्ति हो जाने वाली बात तो एक प्रकार से मिथ्या ही सिद्ध हो गई।

मरने के बाद पुनर्जन्म मिलता है। इसके मध्यवर्ती समय में कुछ अवधि विश्राम के लिये मिलती है। आमतौर से आत्मायें इस काल में लम्बी जिन्दगी में अनवरत रूप से किये गये श्रम की थकान उतारती रहती हैं और गहरी निद्रा में सोई पड़ी रहती हैं। जैसे दिन भर काम करने के उपरान्त रात्रि में सो लेने के उपरान्त प्रातःकाल ताजगी आती है और नई शक्ति के साथ नये सिरे से उत्साहपूर्ण मनःस्थिति में काम करना सम्भव हो जाता है उसी प्रकार इस मध्यावधि विश्राम के बाद मृतात्मा नवीन जन्म धारण करके नये सिरे से पुनर्जन्म का क्रियाकलाप आरम्भ करता है।

इस निद्राकाल में तरह-तरह के स्वप्न आते रहते हैं। सूक्ष्म शरीर का सचेतन मस्तिष्क समाप्त हो जाता है और अचेतन का ही जीवसत्ता पर आधिपत्य रहता है। अचेतन में जैसे भले-बुरे संस्कार दबे पड़े होते हैं वे उभर कर दृश्य रूप धारण करते हुए सामने उपस्थित होते हैं। जिसने जीवन का अधिकांश भाग दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों में गुजारा है उसे उसकी प्रतिक्रिया ही भयावह दृश्यावली के रूप में दिखाई पड़ेगी। इसी अनुभूति का नाम नरक है। जिन्होंने श्रेष्ठ जीवन जिया, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाते हुए जिन्दगी का अधिकांश समय बिताया उनके अचेतन में दिव्य संस्कार जगे रहते हैं और वे उस मरणोत्तर निद्राकाल में दिव्य स्वप्न बनकर उभरते हैं उस सुखद स्वप्न शृंखला को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग नरक के सुहावने, डरावने सपने यह छाया डालने आते हैं कि भविष्य में किस दिशा में चलना उपयुक्त और किस ओर चलना अनुपयुक्त रहेगा।

इसी अवधि में जिन्हें नींद नहीं आती—बेचैनी बनी रहती हैं उन्हें प्रेत स्तर का समय गुजारना पड़ता है। मरने के बाद स्थूल शरीर का अन्त हो जाता है, किन्तु सूक्ष्म शरीर यथावत् बना रहता है। प्राणी अपने आपको लगभग उसी स्थिति में उसी शरीर कलेवर में अनुभव करता है जिसमें जीवित स्थिति में था। अन्तर इतना ही होता है कि इन्द्रियों की सहायता से जो प्रत्यक्ष स्पर्श का सुख मिल सकता था वह नहीं मिलता। तरह-तरह के स्वाद सूक्ष्म इंद्रियां अनुभव कर सकती हैं पर वे पदार्थ को उदरस्थ करने और उपभोग करने का वैसा रसास्वादन नहीं कर पातीं, जैसा कि स्थूल शरीर के रहते करती थी।

संसार के पदार्थों को वह देखता है पर वह दूसरों को वायु भूत होने के कारण दीखना नहीं। पैर या पंख न होते हुए भी वह उड़ या चल सकता है। दूसरों के मस्तिष्क या शरीर में अपना प्रवेश कर सकता है और उसे अपने अस्तित्व का अनुभव आवेश के रूप में घटना या दृश्य के रूप में दें सकता है। बात-चीत, वाणी या शब्दावली के द्वारा तो नहीं कर सकता पर किन्हीं व्यक्तियों या पदार्थों के माध्यम से अपनी बात प्रकट कर सकता है। प्रेत अवस्था में जीवित स्थिति की अपेक्षा कुछ कमियां आ जाती हैं तो कुछ विशेषतायें बढ़ जाती हैं। इन सब बातों का प्रमाण प्रेतों के अस्तित्व अथवा क्रिया-कलापों के ऐसे आधारों से मिलता है जिनकी यथार्थता तथ्यों की कसौटी पर कसे जाने से सर्वथा सत्य सिद्ध होती है।

विश्व विख्यात ‘लायफ’ पत्रिका के सम्पादक जार्ज लेथम की वह लेख माला पढ़ने ही योग्य है जो उन्होंने ‘मैं परलोकवादी क्यों हूं’ शीर्षक से कई पत्रों में प्रकाशित कराई थी। उनका पुत्र जान भी फैलडर्स के मोर्च पर महायुद्ध में मारा गया था। तोप के गोले ने उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े उड़ा दिए थे। फिर भी उसकी आत्मा बनी रही और अपने पिता के साथ सम्पर्क बनाये रही। लेथम ने लिखा है—मेरा पुत्र जौन स्वर्गीय माना जाता है पर मेरे लिए वह अभी भी उसी प्रकार जीवित है जैसे वह किसी अनय नगर में रहते हुए भी पत्र, फोन आदि के माध्यम से सन्देशों का आदान-प्रदान करता हो। उनने अपनी मान्यता को भ्रम अथवा भावावेश जैसा समझ लिया जाय इस आशंका का खण्डन करने वाले ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिनके आधार पर मरणोत्तर जीवन पर सन्देह करने वालों को भी इस सन्दर्भ में प्रामाणिक जानकारियां प्राप्त करने और तथ्य तक पहुंचने में सहायता मिल सके।

सर ओलिवर लाज, सर विलियम क्रुक्स की तरह ही विज्ञान क्षेत्र के अन्य प्रामाणिक विद्वान भी मरणोत्तर जीवन और आत्मा के अस्तित्व पर अन्वेषण करते रहे हैं इनमें से डा. ए. रसल वालेस और सर विलियम बैरेट के नाम भी हैं, जिन्होंने आत्मा का अस्तित्व किन्हीं किम्वदंतियों अथवा पूर्व प्रचलित मान्यताओं के आधार पर नहीं वरन् उपलब्ध ठोस प्रमाणों के आधार पर ही स्वीकार किया था। इन प्रमाणों की चर्चा उन्होंने अपनी पुस्तकों में की है।

स्काटलैण्ड के सेन्ट कुर्री नामक गांव में एक बालक जन्मा डेनियल डगलस होम। पिता दरिद्र और बालक रोगी। बच्चे को चाची ने पाला। चौदह वर्ष की उम्र तक वह ऐसे ही तरह-तरह की बीमारियों में ग्रसित रह कर ऐसे ही दिन काटता रहा। इसी बीच उसे यह अनुभव होता रहा कोई प्रेतात्मा उसके साथ सम्बन्ध बनाती है और तरह-तरह के सन्देश पहुंचाती है। डरते-डरते उसने वे संकेत अपने घर वालों और पड़ोसियों को बताये। पूर्व सूचनायें जब सही निकलीं तो उनका विश्वास बढ़ता गया और अमुक समस्या का हल प्रेतात्माओं से पूछकर बताने के लिए उसका उपयोग किया जाने लगा। जो परामर्श मिलते उनमें से अधिकांश बहुत ही उपयोगी महत्वपूर्ण और अप्रत्याशित होते थे। सन् 1850 का वर्ष और जुलाई का महीना था। उसकी चाची ने मेज पर भोजन की प्लेटें सजाई हुई थीं। अचानक प्लेटों के आपस में टकराने की आवाज आई। बाहर निकल कर उनने देखा तो पाया कि प्लेटें टूटी हुई जमीन पर पड़ी हैं। उनने इसका कारण होम की किसी हरकत को समझा और उस पर बुरी तरह झल्लाईं पर वह निर्दोष था। सिर झुकाये एक कोने में खड़ा था। उसने इतना ही कहा इसमें मेरा दोष नहीं है। चाची ने दूसरी घटना यह देखी कि टूटे हुए टुकड़े अपने आप इकट्ठे हो रहे हैं और जहां-तहां बिखरे न रहकर एक कोने में जमा हो रहे हैं। यह और भी अधिक आश्चर्य जनक था। समेटने वाला दिखाई कोई नहीं पड़ता। तोड़ने वाला कोई नहीं फिर प्लेटों में यह हलचल कैसे हो रही है। होम का प्रेतात्माओं से सम्बन्ध होने की बात और भी अधिक अच्छी तरह पुष्ट हो गई।

जब भूत-प्रेत की बात अधिक फैली तो चाची डर गई और उसने झंझट भरे होम को घर से निकाल दिया। वहां से वह इंग्लैंड चला गया। अपनी शारीरिक रुग्णता की चिकित्सा कराने के सिलसिले में उसका सम्पर्क डा. काक्स से हुआ। वे अध्यात्मवादी थे उनने न केवल रुचिपूर्वक इलाज ही किया वरन् लड़के की आत्मिक शक्ति को बढ़ाने में भी सहायता की ताकि वह परलोक की आत्माओं से अधिक अच्छा सम्बन्ध बना सकने में समर्थ हो सके। इस साधना से उसे आश्चर्यजनक सफलता मिली। उसे प्रेतात्माओं का प्रामाणिक सन्देश वाहक माना जाने लगा। इस सन्दर्भ में इंग्लैण्ड के उच्चकोटि के व्यक्ति उससे अपना समाधान कराने के लिए मिलने आये और सन्तुष्ट होकर लौटे। इन ख्याति नामा लोगों में ईविनिंग पोस्ट के सम्पादक विलियम कुलेन ब्रामेट, प्रख्यात उपन्यासकार विलियम थेकर, प्रसिद्ध रसायन विज्ञानी सर क्रुक्स जैसे मूर्धन्य लोगों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसकी विलक्षण प्रतिभा के सम्बन्ध में पत्र-पत्रिकाओं में कितने ही लेख घटनाक्रम के विवरणों सहित प्रकाशित हुए।

स्वर्गीय सम्राट् नेपोलियन का एक सन्देश लेकर वह 27 फरवरी 1890 को सम्राट से मिला। सम्राज्ञी युजीन तो उन अद्भुत किन्तु यथार्थ सन्देशों से इतनी अधिक प्रभावित हुई कि पुरस्कार में होम को लाखों रुपये के बहुमूल्य उपहार दे डाले।

होम के पूर्व जन्म की पत्नी रूस में जन्मी थी वह उसी से विवाह करना चाहता था। यह कठिन था क्योंकि वह लड़की रूस के शाही जनरल क्रोल की इकलौती पुत्री थी। इतने प्रतिष्ठित और सम्पन्न पिता की सुशिक्षित पुत्री एक बीमार और प्रेत व्यवसाय का उपहासास्पद धन्धा करने वाले के साथ कैसे ब्याही जा सकती थी विशेषतया ऐसी दशा में जबकि दोनों एक दूसरे से परिचित भी न थे और सुदूर देशों में रहते थे। यह कठिन कार्य काउण्ट आफ मांट क्रिसी के प्रसिद्ध उपन्यासकार ड्यूमा ने अपने कन्धों पर लिया। उनने सन्देह वाहक की सफल भूमिका निवाही और अन्ततः 8 अगस्त 1860 को दोनों का विवाह हो गया। दोनों ने मिलकर प्रेतात्मा विद्या के शोध कार्य को और भी आगे बढ़ाया।

होम 21 जून 1889 को मरा। इससे पूर्व वह अपने प्रेतात्माओं के अनुभव सन्दर्भ में एक खोजपूर्ण पुस्तक प्रकाशित करा चुका था—‘लाइट्स एण्ड शैडोज आफ स्प्रिचुअलिज्म’ इस पुस्तक की भारी खपत हुई थी और होम को अच्छी कमाई हुई थी।

मृत्यु के समय उसकी पत्नी हिरहाने बैठी रो रही थी। होम ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा—पगली, मैं मर कहां रहा हूं, शरीर छूट जाने पर भी मैं तेरे साथ बराबर सम्पर्क बनाये रहूंगा। आत्मा और कला कहीं मरा करती हैं।

कुछ समय पूर्व इंग्लैण्ड के ख्यातिनामा कप्तान डेविड के ऊपर प्रेतात्मा के प्रकोप और उससे छुटकारे का घटना समाचार इंग्लैण्ड के प्रायः सभी प्रमुख पत्रों में छपा था। डेविड की गणना उस देश के मूर्धन्य सेनाध्यक्षों में की जाती थी, उनका विक्षिप्त हो जाना और हर घड़ी भयंकर प्रेत की छाया को अपने आस पास उपद्रव करते देखना एक असाधारण कौतूहल की बात थी। चिकित्सकों ने तरह-तरह के परीक्षण किए यहां तक कि मानसिक विकृति की आशंका को भी बारीकी से परखा, पर न तो उन्हें कोई शारीरिक रोग था और न मानसिक। इतने पर भी इस कदर भयभीत होना उन जैसे दुस्साहसी के लिए सर्वथा अप्रत्याशित था। वे धीरे-धीरे मरणासन्न स्थिति में जा पहुंचे थे। एक प्रेत विद्याविज्ञ बुढ़िया को डेविड की पत्नी बुला कर लाई। वह आंखें बंद करके ध्यान करती रही। पीछे उसने डेविड का चीन से खरीदा हुआ वह बहुमूल्य कोट मंगाया जो उन्हें अत्यधिक प्रिय था। बुढ़िया ने उसके अस्तर में लगे खून के धब्बे दिखाये और बताया कि एक व्यक्ति की हत्या इसी कोट को पहने हुए हुई थी। उसी आत्मा की छाया इस कोट के साथ रहती है। उसे भी यह अत्यधिक प्रिय है। वह किसी दूसरे का कब्जा इस पर नहीं देखना चाहती। जब तक कोट घर में रहेगा तब तक उसे प्रेतात्मा का आतंक भी बना रहेगा।

बुढ़िया के परामर्श के अनुसार कोट उसी समय जला दिया गया और डेविड को उसी क्षण प्रेत के आतंक से मुक्ति मिल गई।

विश्व विख्यात नर्तकी अन्नापावलोवना की मृत्यु-स्मृति में उसकी शिष्या ने एक नृत्य समारोह आयोजित किया तो उसकी मृतात्मा भी साथ-साथ नृत्य कर रही थी। दर्शकों ने उसे अपनी आंखों से देखा।

इटली के प्रसिद्ध वायलिन वादक पागगिनी की मृत्यु स्मृति में आयोजित समारोह में मृतात्मा का प्रिय वायलिन स्वयं ही बज उठा और आवाजें आई कि मैं पागगिनी हूं—मैं पागगिनी हूं। दर्शकों ने इसे प्रेतात्मा समझा।

इटली की विश्व प्रसिद्ध नायिका जूलियट की मृत्यु के बाद भी उसके पास आने वाले हजारों पत्रों के उत्तर लोगों के पास पहुंचते रहे। जिनके पास पत्र पहुंचे उनके पत्र पूर्व पत्रों की बिल्कुल संगति में थे। कई में पूर्व पत्रों का उल्लेख भी होता था। यह कहानी भी बड़ी विचित्र है कहते हैं, जूलियट की जहां समाधि थी वहीं पर दो लैटर बक्स टांगे गये थे, एक में पत्र आते थे, दूसरे में डाले जाते थे, जिन्हें डाकिया नियमित रूप से ले जाता था, पत्र यद्यपि समाधि का रक्षक इटोरे सोलोमिनी लिखता था पर वह जो कुछ लिखता था, स्वयं भी नहीं जानता था। वह सारी बातें उसे निद्रावस्था में मालूम होती थीं। वह बताता था कि जूलियट की आत्मा आती है और प्रत्येक पत्र का उत्तर उसे बता देती है। वह तो लेखनभर करती जाती है। बतलाने वाली है— स्वर्गीय जूलियट। यह क्रम इहोरे की मृत्यु के साथ ही टूट गया। इससे स्पष्ट है कि प्रेतात्मा पूर्व की आकांक्षाओं से लिपटी रहती हैं और उनकी पूर्ति के लिए उचित माध्यम की तलाश में रहती है।

‘फेट’ नामक पत्रिका में पेज नं. 43 में श्रीमती सेना सरंजेस्की का संस्मरण ‘सिसकते भूत का सन्देश’ छपा है। वे लिखती हैं कि वे जिस मकान में रहती थीं, उसमें कभी-कभी सीढ़ियों पर और कमरों में किसी के टहलने की आवाज आया करती थी। एक दिन उन्हें लगा कि पास ही कोई छाया खड़ी है। उन्हें स्मरण हो आया कि इस मकान में टेड अलिशन नामक व्यक्ति ने आत्म-हत्या की थी। यही सबको मालूम भी था। वे लिखती हैं—मैंने साहस करके पूछा—‘‘आप टेड तो नहीं हैं तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मैंने यह स्पष्ट सुना—‘यस’। मैंने पूछा आप कुछ बताना चाहते हैं? पर इससे पूर्व कि कोई उत्तर सुनूं, वह छाया गायब हो गई और फिर कई दिन बाद आई। मुझे लगा कि वह कुर्सी पर बैठ गया है। मैंने फिर साहस करके पूछा—‘‘आप सिसकते क्यों हैं, क्या आप कुछ कहना चाहते हैं।’’ इस बार उसने बताया—‘‘मैंने आत्म-हत्या नहीं की थी, किसी जहरीली औषधि के भूल से सेवन से यह दुर्घटना हुई। आप मेरी धर्मपत्नी को कहना, मैं अपनी बच्चियों को बहुत प्यार करता हूं।’’ इसके साथ ही वह आत्मा वहां से चली गई। बाद में मैंने श्रीमती टेड से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि निःसन्देह वे अपने साथ इन्सूलिन की शीशी रखते थे और उसी के द्वारा उनकी मृत्यु हुई थी। उस दिन के बाद वहां कोई आत्मा नहीं आई।

शाही परिवार के लोगों का भूत सम्पर्क

इंग्लैण्ड के राज परिवार में अशरीरी प्रेतात्माओं के अस्तित्व का चिरकाल तक अनुभव किया जाता रहा। इस सम्बन्ध में डा. लीज की लिखी पुस्तकें न केवल मरणोत्तर जीवन पर प्रकाश डालती हैं—वरन् राज परिवार को इस प्रकार की क्या अनुभूतियां होती रहीं इसकी भी चर्चा करती हैं।

उन दिनों राज्य सिंहासन पर पंचम जार्ज अवस्थित थे। उनकी बहिन राजकुमारी ‘लुईस’ सुहाग के बहुत थोड़े दिन देख पाई और विधवा हो गई। लुईस को अपने पति ‘ड्यूक आफ लिफ’ के प्रति गहरी अनुरक्ति थी। वह उनके दिवंगत हो जाने के उपरान्त भी बनी रही और यह सम्बन्ध सूत्र बनाये रखना दिवंगत आत्मा ने भी स्वीकार कर लिया। वे प्रेत रूप में लुईस के पास बराबर आते रहे और उससे सम्पर्क बनाये रहे। लुईस भी बहुत दिन जीवित नहीं रही। उसकी मृत्यु के उपरान्त राजकुमारी की सचिव एलिजाबेथ गोर्डन ने विस्तार पूर्वक प्रकट किया—जिससे उस घटना क्रम पर प्रकाश पड़ता है जिसके अनुसार लुईस और उनके स्वर्गीय पति का मिलन—संभाषण, सान्निध्य का क्रम कितनी घनिष्ठता पूर्वक चलता रहा मानो शरीर न रहने पर भी ड्यूक का अस्तित्व यथावत् बना रहा हो।

इससे पूर्व की एक और घटना है जो प्रेतात्माओं के अस्तित्व को और भी अच्छी तरह प्रमाणित करती है। सम्राट एडवर्ड सप्तम की पत्नी महारानी ऐलेग्जेण्ड्रा प्रेत विद्या पर विश्वास करती थी और जब तब मृतात्माओं के आह्वान का प्रयोग किया करती थी। एक बार ऐसे ही प्रयोग—सेयांस से इन्हें ऐसा सन्देश मिला, जिसे एक तरह का विस्फोट ही कहना चाहिए। उन्हें प्रेत द्वारा सूचना दी गई कि—‘सम्राट एडवर्ड अब कुछ ही दिन जीवित रह सकेंगे, उनकी उसी कोव में मृत्यु होगी जिसमें कि वे जन्मे थे।’ महारानी उन दिनों विंडसर प्रासाद में थीं। उन्हें समाचार मिला कि सम्राट कुछ साधारण से अस्वस्थ हैं पर चिन्ता जैसी कोई बात जरा भी नहीं है। तो भी महारानी का समाधान न हुआ। वे दौड़ती हुई पहुंची और देखा कि एडवर्ड बेहोश पड़े हैं। रानी को देखने के लिए उन्होंने आंखें खोलीं और प्राण त्याग दिये।

एडवर्ड की आत्मा का अस्तित्व मृत्यु के बाद भी अनुभव किया जाता रहा। उनकी एक अन्तरंग मित्र थी—लेडी वारविक। कुछ दिन प्रेत विद्या विशारद ‘एटाराइट’ के माध्यम से वे लेडी वारविक पर अपना अस्तित्व प्रकट करते रहे। इसके बाद उनने सीधा सम्पर्क स्थापित कर लिया। वे अक्सर अपनी प्रेयसी के पास आते और जर्मन भाषा में वारविक के साथ अपनी अतृप्त प्रणय आकांक्षायें व्यक्त करते।

‘स्प्रिच्युअलिस्ट एलायन्स’ में अभी भी एक ऐसी घड़ी ऐतिहासिक सुरक्षा के साथ रखी हुई जो मरणोत्तर जीवन के अस्तित्व की मान्यता पर राज्य परिवार की स्वीकृति का प्रमाण देती है। यह घड़ी महारानी विक्टोरिया ने इस चक्र की सदस्या कुमारी जार्जियाना ईगल को—उनके प्रेत आह्वान की यथार्थता अनुभव करके भेंट में दी थी। कुमारी ईगल ने महारानी विक्टोरिया के सम्मुख प्रेतों के अस्तित्व और आह्वान की प्रामाणिकता के ऐसे अनेक सबूत पेश किये थे, जिनके कारण विक्टोरिया को इस तथ्य पर पूरी तरह विश्वास जम गया था सन् 1901 में महारानी विक्टोरिया की भी मृत्यु हो गई। प्रेत आह्वान संस्थान ने उनके साथ भी सम्पर्क बनाया। संस्थान की संचालिका ऐटा राइट ने एक दिन स्वर्गीय महारानी की आवाज प्रत्यक्ष सुनवाई तो सभी सुनने वाले अवाक् रह गये।

महारानी विक्टोरिया का मरणोत्तर जीवन पर प्रगाढ़ विश्वास प्रख्यात है। वे 1819 में जन्मीं। 18 वर्ष की आयु में सन् 1837 में राजगद्दी पर बैठीं। तीन वर्ष बाद 1840 में उनका विवाह हुआ और कुछ वर्ष बाद ही वे विधवा हो गईं। महारानी ने अपने स्वर्गीय पात प्रिंस अलबर्ट से सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली। इस कार्य में उन्हें आर.डी. लीज और जान ब्राउन नामक दो प्रेत विद्या विशारदों से बड़ी सहायता मिली। स्वर्गीय अलबर्ट जीवन काल की तरह मरने के उपरांत भी महारानी को प्रत्येक कार्य में परामर्श और सहयोग प्रदान करते रहे। विधवा रहते हुए भी उन्हें सर्वथा एकाकीपन अनुभव न होने देने के लिए स्वर्गीय आत्मा उनके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बनाये रही।

अलबर्ट अपनी सूक्ष्म सत्ता को स्थूल रूप से प्रकट करने के लिए डी. ब्राउन के शरीर का सहारा लेते थे। जो कहना होता वे उन्हीं के शरीर में प्रवेश करके कहते। महारानी मि. लीज के प्रति बहुत कृतज्ञ थीं। जिनने ब्राउन के रूप में एक अधिकारी माध्यम लाकर उन्हें दिया था। प्रेतात्माएं हर शरीर के माध्यम से अपना अस्तित्व प्रकट नहीं कर सकतीं। उसके लिए उन्हें अधिकारी व्यक्ति चाहिए। इसके लिए मि. ब्राउन सर्वथा उपयुक्त प्रामाणित हुए। लीज द्वारा उपयुक्त माध्यम की व्यवस्था की थी। सो इस सहायता के बदले में उच्च राज्य पद देने का प्रस्ताव कई बार किया पर लीज ने उसे सदा यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि—‘‘आत्मिक जिम्मेदारियों का बोझ इतना अधिक होता है कि उसे वहन करते हुए लौकिक कार्यों को ठीक प्रकार नहीं किया जा सकता है। दोनों में से एक कार्य ही प्रमुख रह सकता है।’’ राज्य पद न लेने के इस तर्क को महारानी ने उचित समझा और उसने इसी स्तर का सहयोग लेती रहीं।

महारानी विक्टोरिया को अपने स्वर्गीय पति का सहयोग हर कार्य में अभीष्ट प्रतीत होता था, उनके परामर्श की उन्हें निरन्तर आवश्यकता अनुभव होने लगी। परोक्ष सन्देशों के अधूरेपन और सन्देह की आशंका रहती थी। अस्तु ब्राउन के शरीर माध्यम से प्रत्यक्ष सन्देशों के आदान-प्रदान की आवश्यकता अनुभव की गई। इसके लिए ब्राउन के शरीर और अलबर्ट की आत्मा का समन्वय ऐसा उपयुक्त सिद्ध हुआ कि महारानी के दुःखी जीवन में उपयुक्त सहारा मिल गया और वे इतने से भी बहुत हद तक अपने भार में हलकापन अनुभव करने लगीं।

ईश्वर की इच्छा प्रबल ठहरी जान ब्राउन का भी स्वर्गवास हो गया। महारानी विक्टोरिया को इससे बड़ा आघात लगा मानो उनका दाहिना हाथ ही टूट गया हो। जान ब्राउन की सुन्दर सी कब्र पर महारानी विक्टोरिया के यह उदगार लिखे हुए हैं—

मुझ वियोगिनी और व्यथिता के लिए—वरदान स्वरूप एक विलक्षण व्यक्ति की स्मृति।’ महारानी ने उनके प्रति अपनी कथित भावनाएं व्यक्त करते हुए स्वामिभक्त साथी और विश्वस्त मित्र के रूप में सम्बोधित करते हुए सम्वेदना व्यक्त की।

ब्राउन के स्वर्गवास से महारानी को आघात लगा। उसे व्यक्त करते हुए उनके निजी सचिव सर हेनरी पौन सोनवी का एक वक्तव्य ‘टाइम्स’ पत्र में प्रकाशित हुआ। उन्होंने कहा—स्वर्गीय ब्राउन की सहायता महारानी को निरन्तर रहती थी। उनके स्वर्गवास पर साम्राज्ञी को भारी पीड़ा हुई है। इस आघात से इन दिनों वे बहुत दुर्बल हो गई हैं। जगद् विख्यात सामुद्रिक शास्त्र ज्ञाता कीरो के पिता का जिस समय देहान्त हुआ, उस समय उनकी शक्ति बहुत क्षीण हो गई थी और इसलिए वे कुछ आवश्यक बातें बताना चाहते हुए न बता सके और उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई। कुछ महीने कीरो संयोगवश एक प्रेत आवाहन की बैठक में जा पहुंचे और वहां पिता की प्रेतात्मा ने आकर उनको बतलाया कि हमारे परिवार से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज लन्दन के ‘डेविस एण्ड सन सालिसिटर’ के यहां रखे हैं। उनका दफ्तर स्ट्रेण्ड में गिरजाघर के पास एक तंग सड़क पर है, जिसका नाम मैं भूल गया हूं। तुम उनके यहां जाकर उन कागजातों को ले आना।’’

‘‘दूसरे दिन कीरो उस सड़क पर पहुंचे और बहुत देर परिश्रम करने के बाद वह कार्यालय मिल गया। उसके पुराने मालिक तो मर चुके थे, पर उस कारोबार को किसी अन्य वकील ने खरीद लिया था। नये मालिक ने पहले तो इतने पुराने कागजात को जल्दी ढूंढ़ सकने में असमर्थता प्रकट की, पर जब कीरो ने उसके क्लर्क को पुरस्कार देने की बात कही तो उसने पुराने बण्डलों में से आधा घण्टा मेहनत करके उन दस्तावेजों को निकाल दिया।’’

शरीर त्याग के बाद भी आत्माओं का अस्तित्व बना रहता है। यदि सम्पर्क का उपयुक्त माध्यम बन सके तो उनके साथ घनिष्ठ सम्पर्क ही नहीं वरन् आशाजनक सहयोग भी प्राप्त किया जा सकता है। इस तथ्य को प्रामाणिकता में असंख्य उदाहरण उपलब्ध हैं। आवश्यकता उस विधि एवं उन तथ्यों को जानने की है। मृत्युपूर्व की आकांक्षायें स्वयं प्रेतों को इस सम्पर्क के लिए आकुल रखती हैं उचित तालमेल बैठ जाने पर प्रेतात्मा तथा सम्बन्धित व्यक्ति दोनों ही लाभान्वित होते हैं। दोनों की आकांक्षा तृप्त होती है।
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  • विक्षुब्ध जीवात्मा की दयनीय स्थिति प्रेत-दशा
  • न स्वयं विक्षुब्ध हों न औरों को विक्षुब्ध करें
  • अत्यधिक मोह के कष्टकर परिणाम
  • आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण भूत
  • परकाया-प्रवेश की शक्ति-सामर्थ्य
  • स्वजनों सुहृदों से सम्बन्ध के इच्छुक—भूत
  • भूत से डरें नहीं वह तो बस भूत है
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Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

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