परकाया-प्रवेश की शक्ति-सामर्थ्य
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अब विज्ञान क्रमशः प्रौढ़ होता चला जाता है। पचास वर्ष पूर्व आत्मा और ईश्वर के अस्तित्व में इन्कार करने का जो उत्साह था वह अब ठण्डा हो चला है। यह माना जाने लगा है कि आत्मा है और मरणोत्तर जीवन के उपरांत भी उसकी सत्ता पूर्णतया समाप्त नहीं हो जाती वरन् किसी न किसी रूप में बनी ही रहती है।
यह सत्ता शरीर छोड़कर जब अन्तरिक्ष में भ्रमण करती है तो उसका परिचय प्रेतात्माओं के रूप में मिलता है स्वर्ग-नरक की अनुभूति उसे इसी अवधि में होती है। इसके बाद पुनर्जन्म का चक्र चल पड़ता है। प्रेतों का आकार-प्रकार और उनके कर्म, स्वभाव का ठीक से पता नहीं चल सका है पर जो प्रमाण मिलते हैं उनसे उनका अस्तित्व अवश्य सिद्ध होता है। सत्य ही अनुकूल परिस्थितियां पाकर अर्थात् दुर्बल मनोभूमि वाले लोगों के भीतर प्रविष्ट होकर उनकी मूल सत्ता को परे धकेल कर अपना वर्चस्व स्थापित कर बैठने के भी प्रमाण मिले हैं।
आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता के भी ऐसे ही प्रतिपादन के प्रमाण में परकाया प्रवेश के सिद्धान्त का समर्थन करने वाले कुछ आधुनिकतम एवं परखे, पहचाने उदाहरण हैं जिन्हें किसी अन्ध-विश्वासी की भावुकता अथवा सनक नहीं कही जा सकती है। अमेरिका के हारवर्ड और कैलीफोर्निया विश्व-विद्यालय के दो प्रोफेसरों ने मिलकर ‘‘बीसवीं सदी में अचेतन मनोविज्ञान की नई खोज’’ विषय पर सुविस्तृत खोज की है। अपने विषय के अब उन्होंने अनेकों प्रमाण संग्रह किये हैं। उन्हें पुस्तक रूप में भी छपाया है और पत्र-पत्रिकाओं में भी उन प्रमाणित घटना क्रमों को छपाया है। प्रस्तुत विवरणों में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता है और वह एक शरीर से दूसरे में परिवर्तन करते रहने में समर्थ है।
डा. आसवन ने अपनी शोध में एक ऐसे बर्तन विक्रेता का उल्लेख किया है जो घर से टहलने के लिए निकला था किन्तु अचानक गायब हो गया। कहीं अन्यत्र जाकर कुछ काम करने लगा। घर वालों ने तलाश किया पर कहीं कुछ पता न चला। दो वर्ष ऐसे ही बीत गये। इसके बाद अचानक उस बर्तन विक्रेता को पूर्व जन्म की स्मृति जगी और आश्चर्य के साथ अपनी नई स्थिति और पुरानी स्थिति की तुलना करने लगा और स्तब्ध रह गया कि उसका नाम घर, व्यवसाय सब कुछ कैसे बदल गया और पुरानी स्थिति से इस नई स्थिति में उसे किसने कैसे डाल दिया?
जिस नये व्यक्ति के रूप में वह दो वर्ष से रह रहा था वह भी कोई अवास्तविकता न थी। कुछ समय पूर्व वह नया आदमी भी जीवित था जिसके स्थानापन्न बनकर उसे रहना पड़ा। वह मशीनों की मरम्मत का काम करता था और घूम-फिर कर अपनी रोटी कमाता था। वही कार्य उसे भी नई स्थिति में मिल गया और दो वर्ष मजे की रोजी-रोटी कमाते गुजार लिए। जिस सराय में वह ठहरता था, जिस नानबाई के यहां वे रोटी खाता था उन्हीं के यहां उसने अपनी व्यवस्था ऐसे जमाली मानो उन स्थानों से वह पुराना परिचित चला आता है। उन दुकानों के नये पुराने सभी कर्मचारियों के नाम और व्यवहार उसे याद थे। इसी प्रकार मरम्मत का काम जहां मिलता था वह भी सब कुछ उसका जाना पहचाना था।
दो वर्ष बाद मानो वह गहरी निद्रा में से उठा। अपने घर की याद आई और वापिस चला गया। कुछ दिन उसे स्थानापन्न जन्म की स्मृति भी रही, पीछे वह धुंधली पड़ती चली गई और पीछे उसे उन दिनों की बातें लगभग पूरी तरह विस्मृत हो गई और पहले की तरह अपना कसेरे का धन्धा करने लगा।
शोधकर्त्ताओं ने इस घटना को बहुत गम्भीरता से लिया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हो न हो यह किसी प्रबल आत्मा का एक सामान्य आत्मा को वशवर्ती करके उसके शरीर पर अपना कब्जा कर लेने की घटना है। जब उसने कब्जा छोड़ा तो पुरानी आत्मा अपनी जागृत एवं स्वतन्त्र सत्ता का परिचय देने की स्थिति में आ गई। इस घटना को डा. आसवन ने अपने अनुमानित निष्कर्ष के साथ कई प्रसिद्ध समाचार पत्रों में छपाया।
एक दूसरी घटना रोडस नगर निवासी ऐसेलवर्न की है। वह बैंक से दस हजार का चैक भुना कर बाहर निकला और अचानक गायब हो गया। घर वाले तलाश करते रहे पर कुछ पता न चला। सोचा डाकुओं ने उसका अपहरण करके मार डाला और धन छीन लिया है। पर ऐसा हुआ नहीं। गायब होने के बाद वह सैकड़ों मील दूर एक अन्य नगर में जा पहुंचा और वहां उसने चीनी का व्यापार इस कुशलता से किया मानो वह उस व्यवसाय का माहिर रहा हो। चीनी के व्यापारी उसकी वार्ता से बहुत प्रभावित थे और उसे निष्णात अनुभवी मानने लगे। नाम भी उसका बदल गया। इस व्यापारी को ए.जे. ब्राउन कहा जाने लगा। दो महीने में—उसने बहुत रुपया कमाया और अपने क्षेत्र में अच्छी धाक जमा ली। किन्तु इसके बाद अचानक उसे याद आई कि वह तो रोडस निवासी ऐसेलवर्न है यहां कैसे आ गया और जिस चीनी के व्यवसाय से उसका दूर का भी वास्ता नहीं था उसे वह क्यों कर करने लगा? इस अपरिचित जगह में इतनी दूर उसे कौन कैसे ले आया। इस प्रश्नों का कोई उत्तर उसके पास नहीं था। वह डर गया। तुरन्त ही चीनी का व्यवसाय समेटा और वापिस अपने नगर को चल दिया।
इस घटना का भी लगभग वैसा ही निष्कर्ष था। और यही अनुमान लगाया गया कि कोई मृत आत्मा किसी जीवित शरीर पर कब्जा करके उससे अपनी रुचि का काम करा सकती है।
साइकालाजीकल रिव्यू पत्रिका में एक घटना डॉक्टर डामा ने प्रकाशित कराई थी। डॉक्टर की चिकित्सा में एक मूर्छित रोगी आया। वह अच्छा तो हो गया पर प्रौढ़ता खोकर पांच वर्ष के बालक जैसी मनःस्थिति में आ गया। छोटे बच्चे जिस तरह सोचते और करते हैं उसका सारा शारीरिक, मानसिक व्यवहार उसी तरह का था। वह सुशिक्षित था पर पढ़ना-लिखना बिलकुल भूल गया था। कई महीने उसकी यही स्थिति रही। इसके बाद उसे पुरानी स्थिति याद आई और पुनः प्रौढ़ता वाले व्यक्तित्व में जागृत हो गया। उपरोक्त घटना से मिलती-जुलती एक अन्य घटना इंग्लैंड के पादरी हाना की है। 15 अप्रैल सन् 1897 में वे मोटर दुर्घटना में घायल हुए। अचेत अवस्था में अस्पताल पहुंचाये गये। होश में आये तो वे बिलकुल छोटे बालक की तरह थे, और अपना नाम पता व्यवसाय आदि पूरी तरह भूल चुके थे, यहां तक कि जो कुछ उनने पढ़ा-लिखा था वह भी विस्मृत हो गया। इसके बाद वे उस पुरानी यहूदी भाषा में बात करने लगे जिससे वे कभी परिचित न रहे। इस विचित्र परिवर्तन से डॉक्टर तथा दूसरे परिचित बहुत हैरान थे। आखिर उन्हें न्यूयार्क विशेष चिकित्सा के लिए भेजा गया। परिवर्तन धीरे-धीरे हुआ। कुछ समय उनके मस्तिष्क पर बालक का कब्जा रहता कुछ समय वे पादरी होना के रूप में बात करते। इस तरह उलट-पलट बहुत समय चली तब कहीं वे अपने असली व्यक्तित्व में रह सकने योग्य बने।
इंग्लैण्ड के डा. मौर्टन प्रिन्स ने मिस बोचैम्प नामक लड़की की परीक्षा करके के बाद अपना यह मत व्यक्त किया कि भूत जैसी कोई वस्तु सम्भव है, जो गतिशील हो सकती है। इस लड़की की दशा कभी-कभी बड़ी विचित्र हो जाती थी। कई बार उसे दर्द होता था और कुछ देर उसकी विचित्र स्थिति रहती, फिर वह भली-सी हो जाती थी, किन्तु उसके सब क्रिया-कलाप बदल जाते थे। उस समय वह अपना नाम बोचैम्प न कहकर सैली बताती थी और परिवार वालों को बहुत तंग करती थी। कई ऐसे पत्र लिख देती थी, जिसके विषय बोचैम्प से सम्बन्धित होते ही नहीं थे, बाद में उस लड़की की परेशानी बढ़ जाती थी। इसके बाद जब सैली चली जाती थी तो बोचैम्प का व्यवहार फिर पूर्ववत् हो जाता था।
इसी प्रकार रेवरेन्ड एन्सिल बोर्न नामक एक ईसाई प्रचारक ने एक हलवाई के यहां नौकरी करके एकाएक लोगों को हैरत में डाल दिया। कई सम्बन्धी उसके पास गये और कहा आप पादरी होकर यह काम करते हैं—चलिये अपने निवास-स्थान में अपना काम करिये तो वह बिगड़कर बोला—‘‘मेरा नाम एन्सिल वोर्न नहीं, ए.जे. ब्रोन है, मैं तो हमेशा से नौकरी करता हूं।’’ कुछ दिन बाद ब्रोन फिर ईसाई प्रचारक का काम करने के लिये आ गया पर उसने बताया कि इस बीच उसने क्या किया, इसका बिल्कुल स्मरण नहीं है, क्योंकि मेरा अस्तित्व ही न जाने कहां खो गया था। यह तो बाद में पता चला कि ए.जे. ब्रोन नामक एक व्यक्ति पहले किसी हलवाई की दुकान पर काम करता था पर उसकी कुछ दिन पूर्व मृत्यु हो गई थी।
पादरी महोदय उस अवधि में जो कुछ बोलते, खाते-पीते रहे वह पूर्व ब्रोन के स्वभाव से बिल्कुल मिलते-जुलते थे, जिसका कि उन्हें बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था। समझा जाता है कि इस अवधि में उनके शरीर पर उसकी प्रेतात्मा ने अधिकार कर लिया था। दोनों अवस्थाओं में वे पूर्ण स्वस्थ थे, मस्तिष्क भी ठीक था, वे एक विश्वसनीय व्यक्ति थे तो भी इस तरह के असामान्य परिवर्तन का कारण क्या था, इसका कोई उत्तर विज्ञान देने में असमर्थ है। वह स्थूल वस्तुओं को जान सकता है सूक्ष्म तत्वों को नहीं।
कविवर गजानन मुक्तिबोध के सम्बन्ध में उनके अनेक मित्रों का और धर्म-पत्नी का यह ख्याल नहीं था कि वे प्रेत बाधा के शिकार हो गये हैं वरन् दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक डा. विग ने भी यह स्वीकार किया कि उस पर तीव्र-से-तीव्र औषधियों का कोई प्रभाव ही नहीं परिलक्षित होता, यह सर्वथा समझ से परे बात है। काशी निवासी शव-साधक तान्त्रिक श्री अरुणकुमार शर्मा, जिन्होंने कठिन प्रेत साधनायें सिद्ध कीं, तिब्बत में रहकर लामाओं से गुह्य-तन्त्र सीखे, श्रीलंका से बौद्ध-दर्शन में एम.ए. तथा जवासिद्धि उपलब्ध किया—श्री गजानन माधव मुक्तिबोध के सम्बन्ध में पहले ही बता दिया था कि—‘‘उन पर भूत व्याधि है और सन् 1964 उनके जीवन का अन्तिम वर्ष है।’’
वही हुआ भी, हमीदिया अस्पताल भोपाल में उनकी अच्छी से अच्छी चिकित्सा की गई, किन्तु वे अच्छे न हुए मरणासन्न स्थिति में वे ‘राम-राम’ और आई, य (ओ माँ) ऐसे शब्द बोलते थे, जबकि उन्होंने जीवन में कभी उपासना न की थी। उनकी स्थिति देखने वाले सभी समीपवर्ती लोगों ने जो अधिकांश सभी शिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे हैं, यह माना कि उनकी मृत्यु प्रेत बाधा से ही हुई। उनके निधन और दाह-कर्म की सूचना रेडियो से बड़े दुःख के साथ दी गई थी।
कोई मृतात्मा किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर सकती है और उस पर इच्छित समय तक अधिकार बनाये रह सकती है। इसके भी कितने ही उदाहरण मिले हैं। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि आत्मा मात्र शरीर की परिधि में ही बंधा हुआ है। वह इस सीमा का उल्लंघन करके अन्य शरीरों में भी प्रवेश कर सकता है। इच्छित समय तक अधिकार बनाये रह सकता है और उसे छोड़ सकता है। ऐसा किस स्थिति में होना सम्भव है किस स्थिति में नहीं इसका ठीक से निर्णय तो नहीं हो सकता पर इतना कहा जा सकता है ऐसा होना असम्भव या अविश्वस्त नहीं है। यद्यपि ऐसा झूठा प्रदर्शन कई बार ढोंग बनाकर भी किया जाता रहता है।
‘दि अदर वर्ल्ड’ ‘जर्नीज आउट आफ दि बाडी’ आदि ग्रन्थों में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का वर्णन है—जिसमें आत्माओं ने अपने शरीर को छोड़कर सूक्ष्म शरीर के सहारे बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ किया है। इन घटनाओं से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि अशरीरी आत्माओं का किन्हीं दूसरों के शरीर में प्रवेश करके उनसे कुछ विशेष कार्य करा लेना सम्भव है। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि सूक्ष्म शरीर स्वयं इतना परिपुष्ट हो जाय कि शरीरधारी की तरह स्वयं ही अपने क्रिया कलाप का परिचय दे सके। अरविन्द आश्रम की संचालिका माता जी के बारे में कहा जाता है कि वे अपने बाल्यकाल में देह से आत्मा को बाहर निकाल कर सूक्ष्म शरीर से दूर-दूर की यात्राएं करती थीं। परा मनोविज्ञान वेता प्रो. मुलडोन ने अपने ग्रन्थ ‘दि प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रल वाडी’ में परकाया प्रवेश के सिद्धान्तों पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि एक ‘रजत तन्तु’ से आत्मा अपने स्थूल शरीर से सम्बन्ध बनाये रख कर भी अन्यत्र किस प्रकार जा सकता है और क्या कर सकता है?
जगद्गुरु शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि उनकी आत्मा कुछ समय के लिए अपना शरीर छोड़कर किसी राजा के शरीर में रहने लगी थी और वहां उन्होंने कामकला के रहस्य सीखकर विदूषी भारती के प्रश्नों का उत्तर देते हुए शास्त्रार्थ जीता है।
यह एक भिन्न प्रकार का उदाहरण है जिससे एक नये तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि कोई जीवित आत्मा भी किसी मृत शरीर पर अपना कब्जा करके उससे जीवितों जैसा प्रयोजन सिद्ध कर सकता है।
इस प्रकार की अनेकानेक घटनायें सामने आती रहती हैं और यह सिद्ध करती रहती हैं कि मरने के साथ जीवन का अन्त नहीं हो जाता वरन् उसके उपरान्त भी बना रहता है। इससे आत्मा का स्वतन्त्र और अनन्त अस्तित्त्व सिद्ध होता है।
जन्म और मृत्यु इस स्वतन्त्र आत्मा की अविराम यात्रा के दो पड़ाव मात्र हैं। उसकी क्रीड़ा-कल्लोल की दो विशिष्ट भंगिमायें हैं। परकाया प्रवेश भी उस आत्मा की ऐसी ही एक नई गतिविधि, एक नया खेल, एक नयी भूमिका है। परकाया प्रवेश के ये प्रमाण जहां आत्मा की अकूत सामर्थ्य को प्रतिपादित करते हैं, वहीं यह भी कि इस देह के नाश से चेतना का कुछ भी नहीं बनता-बिगड़ता। जन्म और मृत्यु शरीर का होता है आत्मा का नहीं। जन्म का अर्थ आत्मा का नयी भूमिका में प्रकट होना और मृत्यु का अर्थ उस भूमिका का पटाक्षेप मात्र है। जन्म-मृत्यु दोनों ही जीवन के अविच्छिन्न प्रवाह के दो मध्यवर्ती पड़ाव मात्र हैं।
‘जन्म’ शब्द संस्कृति के ‘जनि प्रादूर्भावे’ शब्द से बना है जिस का अर्थ होता है—व्यक्त होना अर्थात् संसार में नया कुछ नहीं बनता सब अव्यक्त प्रकृति में से व्यक्त होता रहता है उसी का नाम जन्म लेना, या उत्पत्ति है। उत्पत्ति शब्द भी ‘उतपूर्वकपद’ धातु से बना है उसका अर्थ भी यही होता है कि वह अब तक अप्रकट था अब प्रकट हो गया। संसार में जो कुछ बनता-बिगड़ता है—दिखाई दे रहा है—वह सब पंच महाभूतों की विलक्षण रचना मात्र है। पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल रूपान्तर होता है। यह विज्ञान भी मानता है।
इस सिद्धान्त से स्वतः सिद्ध होता है कि जीव की चेतना का सम्बन्ध केवल इस शरीर से नहीं है वह इस शरीर में केवल मात्र प्रकट हुई है जब यह शरीर नहीं बना था तब भी वह चेतना थी। विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य शरीर का निर्माण जिन कोशों (सेल्स) से होता है वह मुख्यतः दो भागों में विभक्त हैं एक नाभिक (न्यूक्लियस) यह चेतन अंश है। सुनना देखना, सूंघना, व्यक्त होना यह उसी के गुण हैं (2) साइटोप्लाज्म अर्थात् पंच भौतिक प्राकृतिक पदार्थ—जल, अग्नि, आकाश, हवा और पार्थिव तत्वों का सम्मिश्रण। इनमें से प्रकृति परिवर्तनशील है मनुष्य शरीर के प्राकृतिक कोश बदलते हैं उसके अनुरूप चेतना के गुण कर्म स्वभाव में तो अन्तर आता है पर मूल चेतना में कोई अन्तर नहीं आता इसी चेतन वाले अंश में पाये जाने वाले संस्कार सूत्र (जीन्स) अमर हैं यह वैज्ञानिक भी मानते हैं इससे प्रकट होता है कि प्रजनन कोश में ‘जीन्स’ एक कोश से सैकड़ों कोशों में विकसित तो होता है, तरुण अवस्था तक वह 60,00,00,00,00,00,00,00,00,00, 00 कोश तैयार तो कर लेता है पर वह कभी न रहा हो, चेतना कभी नष्ट होकर नई बनी हो, ऐसा नहीं होता। जिस प्रकार भाप एक ही है पर हवा के संयोग से उससे सैकड़ों तरह की आकृतियां बनती बिगड़ती रहती हैं उसी प्रकार सैकड़ों प्रकार के शरीर बनते-बिगड़ते रहने के बावजूद चेतना का प्रवाह अनन्त और अखण्ड है जिस प्रकार जल में भंवर उठते रहते हैं उसी प्रकार चेतना भ्रमवश नाना स्वरूपों में विभक्त होते रहने के कारण अपने आपको जन्म और मृत्यु का घटक मान लेती है।
जन्म के पहले जिस प्रकार हम थे उसी प्रकार मृत्यु भी कोई ऐसी घटना नहीं है जिससे जीवन का नाश सिद्ध होता हो। नाश शब्द भी जन्म की तरह ‘नश अदर्शने’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है जो अभी तक दिखाई दे रहा था वह अब अव्यक्त हो गया। वह अपनी सूक्ष्म अवस्था में चला गया। शरीर स्थूल था उसके प्रविष्ट होने के कारण संरचना दिखाई दे रही थी चेतना व्यक्त थी पर शरीर के बाद वह नष्ट हो गई हो, ऐसा नहीं। अब इस तथ्य को विज्ञान भी मानने लगा है अलबत्ता विज्ञान प्रकट का सम्बन्ध अभी तक मनोमय विज्ञान से जोड़ नहीं पाया इसीलिये वह परलोक पुनर्जन्म, लोकोत्तर जीवन, भूत-प्रेत, देव-योनि, यक्ष, किन्नर, पिशाच, बैताल आदि अतीन्द्रिय अवस्थाओं का विश्लेषण नहीं कर पाता। पर मृत्यु के बाद जीवन नष्ट नहीं हो जाता है यह एक अकाट्य तथ्य है और इसी आधारभूत सिद्धान्त के कारण भारतीय जीवन पद्धति का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि वह मृत्यु के बाद भी अपने जीवन के अनन्त प्रवाह को अपने यथार्थ लक्ष्य स्वर्ग मुक्ति और ईश्वर दर्शन की ओर मोड़े रह सके।
परकाय-प्रवेश की शक्ति-सामर्थ्य भी आत्मा की एक सहज शक्ति मात्र है लक्ष्य नहीं। दुष्ट प्रेतात्मायें उस सामर्थ्य का दुरुपयोग करती हैं, जबकि दयालु पितर उसका उपयोग कर दूसरों को उपकृत करती हैं। शंकराचार्य जैसे योगी इसी सामर्थ्य का प्रयोग समाज कल्याण के लिये करते हैं।
यह सत्ता शरीर छोड़कर जब अन्तरिक्ष में भ्रमण करती है तो उसका परिचय प्रेतात्माओं के रूप में मिलता है स्वर्ग-नरक की अनुभूति उसे इसी अवधि में होती है। इसके बाद पुनर्जन्म का चक्र चल पड़ता है। प्रेतों का आकार-प्रकार और उनके कर्म, स्वभाव का ठीक से पता नहीं चल सका है पर जो प्रमाण मिलते हैं उनसे उनका अस्तित्व अवश्य सिद्ध होता है। सत्य ही अनुकूल परिस्थितियां पाकर अर्थात् दुर्बल मनोभूमि वाले लोगों के भीतर प्रविष्ट होकर उनकी मूल सत्ता को परे धकेल कर अपना वर्चस्व स्थापित कर बैठने के भी प्रमाण मिले हैं।
आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता के भी ऐसे ही प्रतिपादन के प्रमाण में परकाया प्रवेश के सिद्धान्त का समर्थन करने वाले कुछ आधुनिकतम एवं परखे, पहचाने उदाहरण हैं जिन्हें किसी अन्ध-विश्वासी की भावुकता अथवा सनक नहीं कही जा सकती है। अमेरिका के हारवर्ड और कैलीफोर्निया विश्व-विद्यालय के दो प्रोफेसरों ने मिलकर ‘‘बीसवीं सदी में अचेतन मनोविज्ञान की नई खोज’’ विषय पर सुविस्तृत खोज की है। अपने विषय के अब उन्होंने अनेकों प्रमाण संग्रह किये हैं। उन्हें पुस्तक रूप में भी छपाया है और पत्र-पत्रिकाओं में भी उन प्रमाणित घटना क्रमों को छपाया है। प्रस्तुत विवरणों में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता है और वह एक शरीर से दूसरे में परिवर्तन करते रहने में समर्थ है।
डा. आसवन ने अपनी शोध में एक ऐसे बर्तन विक्रेता का उल्लेख किया है जो घर से टहलने के लिए निकला था किन्तु अचानक गायब हो गया। कहीं अन्यत्र जाकर कुछ काम करने लगा। घर वालों ने तलाश किया पर कहीं कुछ पता न चला। दो वर्ष ऐसे ही बीत गये। इसके बाद अचानक उस बर्तन विक्रेता को पूर्व जन्म की स्मृति जगी और आश्चर्य के साथ अपनी नई स्थिति और पुरानी स्थिति की तुलना करने लगा और स्तब्ध रह गया कि उसका नाम घर, व्यवसाय सब कुछ कैसे बदल गया और पुरानी स्थिति से इस नई स्थिति में उसे किसने कैसे डाल दिया?
जिस नये व्यक्ति के रूप में वह दो वर्ष से रह रहा था वह भी कोई अवास्तविकता न थी। कुछ समय पूर्व वह नया आदमी भी जीवित था जिसके स्थानापन्न बनकर उसे रहना पड़ा। वह मशीनों की मरम्मत का काम करता था और घूम-फिर कर अपनी रोटी कमाता था। वही कार्य उसे भी नई स्थिति में मिल गया और दो वर्ष मजे की रोजी-रोटी कमाते गुजार लिए। जिस सराय में वह ठहरता था, जिस नानबाई के यहां वे रोटी खाता था उन्हीं के यहां उसने अपनी व्यवस्था ऐसे जमाली मानो उन स्थानों से वह पुराना परिचित चला आता है। उन दुकानों के नये पुराने सभी कर्मचारियों के नाम और व्यवहार उसे याद थे। इसी प्रकार मरम्मत का काम जहां मिलता था वह भी सब कुछ उसका जाना पहचाना था।
दो वर्ष बाद मानो वह गहरी निद्रा में से उठा। अपने घर की याद आई और वापिस चला गया। कुछ दिन उसे स्थानापन्न जन्म की स्मृति भी रही, पीछे वह धुंधली पड़ती चली गई और पीछे उसे उन दिनों की बातें लगभग पूरी तरह विस्मृत हो गई और पहले की तरह अपना कसेरे का धन्धा करने लगा।
शोधकर्त्ताओं ने इस घटना को बहुत गम्भीरता से लिया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हो न हो यह किसी प्रबल आत्मा का एक सामान्य आत्मा को वशवर्ती करके उसके शरीर पर अपना कब्जा कर लेने की घटना है। जब उसने कब्जा छोड़ा तो पुरानी आत्मा अपनी जागृत एवं स्वतन्त्र सत्ता का परिचय देने की स्थिति में आ गई। इस घटना को डा. आसवन ने अपने अनुमानित निष्कर्ष के साथ कई प्रसिद्ध समाचार पत्रों में छपाया।
एक दूसरी घटना रोडस नगर निवासी ऐसेलवर्न की है। वह बैंक से दस हजार का चैक भुना कर बाहर निकला और अचानक गायब हो गया। घर वाले तलाश करते रहे पर कुछ पता न चला। सोचा डाकुओं ने उसका अपहरण करके मार डाला और धन छीन लिया है। पर ऐसा हुआ नहीं। गायब होने के बाद वह सैकड़ों मील दूर एक अन्य नगर में जा पहुंचा और वहां उसने चीनी का व्यापार इस कुशलता से किया मानो वह उस व्यवसाय का माहिर रहा हो। चीनी के व्यापारी उसकी वार्ता से बहुत प्रभावित थे और उसे निष्णात अनुभवी मानने लगे। नाम भी उसका बदल गया। इस व्यापारी को ए.जे. ब्राउन कहा जाने लगा। दो महीने में—उसने बहुत रुपया कमाया और अपने क्षेत्र में अच्छी धाक जमा ली। किन्तु इसके बाद अचानक उसे याद आई कि वह तो रोडस निवासी ऐसेलवर्न है यहां कैसे आ गया और जिस चीनी के व्यवसाय से उसका दूर का भी वास्ता नहीं था उसे वह क्यों कर करने लगा? इस अपरिचित जगह में इतनी दूर उसे कौन कैसे ले आया। इस प्रश्नों का कोई उत्तर उसके पास नहीं था। वह डर गया। तुरन्त ही चीनी का व्यवसाय समेटा और वापिस अपने नगर को चल दिया।
इस घटना का भी लगभग वैसा ही निष्कर्ष था। और यही अनुमान लगाया गया कि कोई मृत आत्मा किसी जीवित शरीर पर कब्जा करके उससे अपनी रुचि का काम करा सकती है।
साइकालाजीकल रिव्यू पत्रिका में एक घटना डॉक्टर डामा ने प्रकाशित कराई थी। डॉक्टर की चिकित्सा में एक मूर्छित रोगी आया। वह अच्छा तो हो गया पर प्रौढ़ता खोकर पांच वर्ष के बालक जैसी मनःस्थिति में आ गया। छोटे बच्चे जिस तरह सोचते और करते हैं उसका सारा शारीरिक, मानसिक व्यवहार उसी तरह का था। वह सुशिक्षित था पर पढ़ना-लिखना बिलकुल भूल गया था। कई महीने उसकी यही स्थिति रही। इसके बाद उसे पुरानी स्थिति याद आई और पुनः प्रौढ़ता वाले व्यक्तित्व में जागृत हो गया। उपरोक्त घटना से मिलती-जुलती एक अन्य घटना इंग्लैंड के पादरी हाना की है। 15 अप्रैल सन् 1897 में वे मोटर दुर्घटना में घायल हुए। अचेत अवस्था में अस्पताल पहुंचाये गये। होश में आये तो वे बिलकुल छोटे बालक की तरह थे, और अपना नाम पता व्यवसाय आदि पूरी तरह भूल चुके थे, यहां तक कि जो कुछ उनने पढ़ा-लिखा था वह भी विस्मृत हो गया। इसके बाद वे उस पुरानी यहूदी भाषा में बात करने लगे जिससे वे कभी परिचित न रहे। इस विचित्र परिवर्तन से डॉक्टर तथा दूसरे परिचित बहुत हैरान थे। आखिर उन्हें न्यूयार्क विशेष चिकित्सा के लिए भेजा गया। परिवर्तन धीरे-धीरे हुआ। कुछ समय उनके मस्तिष्क पर बालक का कब्जा रहता कुछ समय वे पादरी होना के रूप में बात करते। इस तरह उलट-पलट बहुत समय चली तब कहीं वे अपने असली व्यक्तित्व में रह सकने योग्य बने।
इंग्लैण्ड के डा. मौर्टन प्रिन्स ने मिस बोचैम्प नामक लड़की की परीक्षा करके के बाद अपना यह मत व्यक्त किया कि भूत जैसी कोई वस्तु सम्भव है, जो गतिशील हो सकती है। इस लड़की की दशा कभी-कभी बड़ी विचित्र हो जाती थी। कई बार उसे दर्द होता था और कुछ देर उसकी विचित्र स्थिति रहती, फिर वह भली-सी हो जाती थी, किन्तु उसके सब क्रिया-कलाप बदल जाते थे। उस समय वह अपना नाम बोचैम्प न कहकर सैली बताती थी और परिवार वालों को बहुत तंग करती थी। कई ऐसे पत्र लिख देती थी, जिसके विषय बोचैम्प से सम्बन्धित होते ही नहीं थे, बाद में उस लड़की की परेशानी बढ़ जाती थी। इसके बाद जब सैली चली जाती थी तो बोचैम्प का व्यवहार फिर पूर्ववत् हो जाता था।
इसी प्रकार रेवरेन्ड एन्सिल बोर्न नामक एक ईसाई प्रचारक ने एक हलवाई के यहां नौकरी करके एकाएक लोगों को हैरत में डाल दिया। कई सम्बन्धी उसके पास गये और कहा आप पादरी होकर यह काम करते हैं—चलिये अपने निवास-स्थान में अपना काम करिये तो वह बिगड़कर बोला—‘‘मेरा नाम एन्सिल वोर्न नहीं, ए.जे. ब्रोन है, मैं तो हमेशा से नौकरी करता हूं।’’ कुछ दिन बाद ब्रोन फिर ईसाई प्रचारक का काम करने के लिये आ गया पर उसने बताया कि इस बीच उसने क्या किया, इसका बिल्कुल स्मरण नहीं है, क्योंकि मेरा अस्तित्व ही न जाने कहां खो गया था। यह तो बाद में पता चला कि ए.जे. ब्रोन नामक एक व्यक्ति पहले किसी हलवाई की दुकान पर काम करता था पर उसकी कुछ दिन पूर्व मृत्यु हो गई थी।
पादरी महोदय उस अवधि में जो कुछ बोलते, खाते-पीते रहे वह पूर्व ब्रोन के स्वभाव से बिल्कुल मिलते-जुलते थे, जिसका कि उन्हें बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था। समझा जाता है कि इस अवधि में उनके शरीर पर उसकी प्रेतात्मा ने अधिकार कर लिया था। दोनों अवस्थाओं में वे पूर्ण स्वस्थ थे, मस्तिष्क भी ठीक था, वे एक विश्वसनीय व्यक्ति थे तो भी इस तरह के असामान्य परिवर्तन का कारण क्या था, इसका कोई उत्तर विज्ञान देने में असमर्थ है। वह स्थूल वस्तुओं को जान सकता है सूक्ष्म तत्वों को नहीं।
कविवर गजानन मुक्तिबोध के सम्बन्ध में उनके अनेक मित्रों का और धर्म-पत्नी का यह ख्याल नहीं था कि वे प्रेत बाधा के शिकार हो गये हैं वरन् दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक डा. विग ने भी यह स्वीकार किया कि उस पर तीव्र-से-तीव्र औषधियों का कोई प्रभाव ही नहीं परिलक्षित होता, यह सर्वथा समझ से परे बात है। काशी निवासी शव-साधक तान्त्रिक श्री अरुणकुमार शर्मा, जिन्होंने कठिन प्रेत साधनायें सिद्ध कीं, तिब्बत में रहकर लामाओं से गुह्य-तन्त्र सीखे, श्रीलंका से बौद्ध-दर्शन में एम.ए. तथा जवासिद्धि उपलब्ध किया—श्री गजानन माधव मुक्तिबोध के सम्बन्ध में पहले ही बता दिया था कि—‘‘उन पर भूत व्याधि है और सन् 1964 उनके जीवन का अन्तिम वर्ष है।’’
वही हुआ भी, हमीदिया अस्पताल भोपाल में उनकी अच्छी से अच्छी चिकित्सा की गई, किन्तु वे अच्छे न हुए मरणासन्न स्थिति में वे ‘राम-राम’ और आई, य (ओ माँ) ऐसे शब्द बोलते थे, जबकि उन्होंने जीवन में कभी उपासना न की थी। उनकी स्थिति देखने वाले सभी समीपवर्ती लोगों ने जो अधिकांश सभी शिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे हैं, यह माना कि उनकी मृत्यु प्रेत बाधा से ही हुई। उनके निधन और दाह-कर्म की सूचना रेडियो से बड़े दुःख के साथ दी गई थी।
कोई मृतात्मा किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर सकती है और उस पर इच्छित समय तक अधिकार बनाये रह सकती है। इसके भी कितने ही उदाहरण मिले हैं। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि आत्मा मात्र शरीर की परिधि में ही बंधा हुआ है। वह इस सीमा का उल्लंघन करके अन्य शरीरों में भी प्रवेश कर सकता है। इच्छित समय तक अधिकार बनाये रह सकता है और उसे छोड़ सकता है। ऐसा किस स्थिति में होना सम्भव है किस स्थिति में नहीं इसका ठीक से निर्णय तो नहीं हो सकता पर इतना कहा जा सकता है ऐसा होना असम्भव या अविश्वस्त नहीं है। यद्यपि ऐसा झूठा प्रदर्शन कई बार ढोंग बनाकर भी किया जाता रहता है।
‘दि अदर वर्ल्ड’ ‘जर्नीज आउट आफ दि बाडी’ आदि ग्रन्थों में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का वर्णन है—जिसमें आत्माओं ने अपने शरीर को छोड़कर सूक्ष्म शरीर के सहारे बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ किया है। इन घटनाओं से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि अशरीरी आत्माओं का किन्हीं दूसरों के शरीर में प्रवेश करके उनसे कुछ विशेष कार्य करा लेना सम्भव है। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि सूक्ष्म शरीर स्वयं इतना परिपुष्ट हो जाय कि शरीरधारी की तरह स्वयं ही अपने क्रिया कलाप का परिचय दे सके। अरविन्द आश्रम की संचालिका माता जी के बारे में कहा जाता है कि वे अपने बाल्यकाल में देह से आत्मा को बाहर निकाल कर सूक्ष्म शरीर से दूर-दूर की यात्राएं करती थीं। परा मनोविज्ञान वेता प्रो. मुलडोन ने अपने ग्रन्थ ‘दि प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रल वाडी’ में परकाया प्रवेश के सिद्धान्तों पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि एक ‘रजत तन्तु’ से आत्मा अपने स्थूल शरीर से सम्बन्ध बनाये रख कर भी अन्यत्र किस प्रकार जा सकता है और क्या कर सकता है?
जगद्गुरु शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि उनकी आत्मा कुछ समय के लिए अपना शरीर छोड़कर किसी राजा के शरीर में रहने लगी थी और वहां उन्होंने कामकला के रहस्य सीखकर विदूषी भारती के प्रश्नों का उत्तर देते हुए शास्त्रार्थ जीता है।
यह एक भिन्न प्रकार का उदाहरण है जिससे एक नये तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि कोई जीवित आत्मा भी किसी मृत शरीर पर अपना कब्जा करके उससे जीवितों जैसा प्रयोजन सिद्ध कर सकता है।
इस प्रकार की अनेकानेक घटनायें सामने आती रहती हैं और यह सिद्ध करती रहती हैं कि मरने के साथ जीवन का अन्त नहीं हो जाता वरन् उसके उपरान्त भी बना रहता है। इससे आत्मा का स्वतन्त्र और अनन्त अस्तित्त्व सिद्ध होता है।
जन्म और मृत्यु इस स्वतन्त्र आत्मा की अविराम यात्रा के दो पड़ाव मात्र हैं। उसकी क्रीड़ा-कल्लोल की दो विशिष्ट भंगिमायें हैं। परकाया प्रवेश भी उस आत्मा की ऐसी ही एक नई गतिविधि, एक नया खेल, एक नयी भूमिका है। परकाया प्रवेश के ये प्रमाण जहां आत्मा की अकूत सामर्थ्य को प्रतिपादित करते हैं, वहीं यह भी कि इस देह के नाश से चेतना का कुछ भी नहीं बनता-बिगड़ता। जन्म और मृत्यु शरीर का होता है आत्मा का नहीं। जन्म का अर्थ आत्मा का नयी भूमिका में प्रकट होना और मृत्यु का अर्थ उस भूमिका का पटाक्षेप मात्र है। जन्म-मृत्यु दोनों ही जीवन के अविच्छिन्न प्रवाह के दो मध्यवर्ती पड़ाव मात्र हैं।
‘जन्म’ शब्द संस्कृति के ‘जनि प्रादूर्भावे’ शब्द से बना है जिस का अर्थ होता है—व्यक्त होना अर्थात् संसार में नया कुछ नहीं बनता सब अव्यक्त प्रकृति में से व्यक्त होता रहता है उसी का नाम जन्म लेना, या उत्पत्ति है। उत्पत्ति शब्द भी ‘उतपूर्वकपद’ धातु से बना है उसका अर्थ भी यही होता है कि वह अब तक अप्रकट था अब प्रकट हो गया। संसार में जो कुछ बनता-बिगड़ता है—दिखाई दे रहा है—वह सब पंच महाभूतों की विलक्षण रचना मात्र है। पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल रूपान्तर होता है। यह विज्ञान भी मानता है।
इस सिद्धान्त से स्वतः सिद्ध होता है कि जीव की चेतना का सम्बन्ध केवल इस शरीर से नहीं है वह इस शरीर में केवल मात्र प्रकट हुई है जब यह शरीर नहीं बना था तब भी वह चेतना थी। विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य शरीर का निर्माण जिन कोशों (सेल्स) से होता है वह मुख्यतः दो भागों में विभक्त हैं एक नाभिक (न्यूक्लियस) यह चेतन अंश है। सुनना देखना, सूंघना, व्यक्त होना यह उसी के गुण हैं (2) साइटोप्लाज्म अर्थात् पंच भौतिक प्राकृतिक पदार्थ—जल, अग्नि, आकाश, हवा और पार्थिव तत्वों का सम्मिश्रण। इनमें से प्रकृति परिवर्तनशील है मनुष्य शरीर के प्राकृतिक कोश बदलते हैं उसके अनुरूप चेतना के गुण कर्म स्वभाव में तो अन्तर आता है पर मूल चेतना में कोई अन्तर नहीं आता इसी चेतन वाले अंश में पाये जाने वाले संस्कार सूत्र (जीन्स) अमर हैं यह वैज्ञानिक भी मानते हैं इससे प्रकट होता है कि प्रजनन कोश में ‘जीन्स’ एक कोश से सैकड़ों कोशों में विकसित तो होता है, तरुण अवस्था तक वह 60,00,00,00,00,00,00,00,00,00, 00 कोश तैयार तो कर लेता है पर वह कभी न रहा हो, चेतना कभी नष्ट होकर नई बनी हो, ऐसा नहीं होता। जिस प्रकार भाप एक ही है पर हवा के संयोग से उससे सैकड़ों तरह की आकृतियां बनती बिगड़ती रहती हैं उसी प्रकार सैकड़ों प्रकार के शरीर बनते-बिगड़ते रहने के बावजूद चेतना का प्रवाह अनन्त और अखण्ड है जिस प्रकार जल में भंवर उठते रहते हैं उसी प्रकार चेतना भ्रमवश नाना स्वरूपों में विभक्त होते रहने के कारण अपने आपको जन्म और मृत्यु का घटक मान लेती है।
जन्म के पहले जिस प्रकार हम थे उसी प्रकार मृत्यु भी कोई ऐसी घटना नहीं है जिससे जीवन का नाश सिद्ध होता हो। नाश शब्द भी जन्म की तरह ‘नश अदर्शने’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है जो अभी तक दिखाई दे रहा था वह अब अव्यक्त हो गया। वह अपनी सूक्ष्म अवस्था में चला गया। शरीर स्थूल था उसके प्रविष्ट होने के कारण संरचना दिखाई दे रही थी चेतना व्यक्त थी पर शरीर के बाद वह नष्ट हो गई हो, ऐसा नहीं। अब इस तथ्य को विज्ञान भी मानने लगा है अलबत्ता विज्ञान प्रकट का सम्बन्ध अभी तक मनोमय विज्ञान से जोड़ नहीं पाया इसीलिये वह परलोक पुनर्जन्म, लोकोत्तर जीवन, भूत-प्रेत, देव-योनि, यक्ष, किन्नर, पिशाच, बैताल आदि अतीन्द्रिय अवस्थाओं का विश्लेषण नहीं कर पाता। पर मृत्यु के बाद जीवन नष्ट नहीं हो जाता है यह एक अकाट्य तथ्य है और इसी आधारभूत सिद्धान्त के कारण भारतीय जीवन पद्धति का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि वह मृत्यु के बाद भी अपने जीवन के अनन्त प्रवाह को अपने यथार्थ लक्ष्य स्वर्ग मुक्ति और ईश्वर दर्शन की ओर मोड़े रह सके।
परकाय-प्रवेश की शक्ति-सामर्थ्य भी आत्मा की एक सहज शक्ति मात्र है लक्ष्य नहीं। दुष्ट प्रेतात्मायें उस सामर्थ्य का दुरुपयोग करती हैं, जबकि दयालु पितर उसका उपयोग कर दूसरों को उपकृत करती हैं। शंकराचार्य जैसे योगी इसी सामर्थ्य का प्रयोग समाज कल्याण के लिये करते हैं।

