आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण भूत
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यदि उसे अन्ध-विश्वास न बनाया जाये तो भूत और प्रेतों का अस्तित्व यह साबित करेगा कि आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व है, एक अवस्था विशेष होती है, जब आत्मा अपनी नितान्त शुद्ध अवस्था प्राप्त कर परमात्मा स्वरूप हो जाती हैं, किन्तु जब तक पाप, इच्छायें, ममता, वासनायें आदि विकारों की परत उस पर चढ़ी रहती हैं, उसका स्वतन्त्र अस्तित्व बराबर कायम रहता है।
विज्ञान और प्रत्यक्ष-दर्शी इन उक्तियों को मानने के लिए तैयार नहीं। उनका कहना है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। शरीर के सभी रासायनिक पदार्थ रूपान्तरित होकर शारीरिक सत्ता को बिगाड़ देते हैं, फिर कुछ नहीं रहता।
किन्तु उनके लिए भूत एक चुनौती है, भूत का लेकर माना अन्ध-विश्वास भी खूब फैला है तो भी वह सब इसी चिर सत्य की नकल भर है। ऐसे प्रामाणिक उदाहरण भी हैं, जिन्होंने भूत पर कभी विश्वास नहीं किया तो भी उन्हें उस सम्पर्क में आना पड़ा। कुछ घटनायें ऐसी भी घटित हुईं, जिनमें न कोई अन्ध मान्यता थी न भ्रम, उन घटनाओं ने पाश्चात्य जीवन में भी भूत की मान्यता को जीवित कर दिया।
1945 में द्वितीय महायुद्ध के समय केन्टोर नामक व्यक्ति को एक बार अमरीका से लन्दन जाना पड़ा। रास्ते में एक रात वे केसिंगटन में रुके। उन्हें बोर्डिंग हाउस का एक कमरा सोने के लिए दिया गया। रात्रि में उन्हें जो अनुभव हुआ उसका वर्णन उन्होंने स्वयं इन शब्दों में लिखा है—
‘‘भोजन करने के बाद मैं सो गया। पहली नींद 3 बजे टूटी। मैं उठा और लघुशंका के लिए कमरे से बाहर गया और फिर लौट कर आया और बिस्तर पर लेट गया। लेटते देर नहीं हुई थी कि ऐसा लगा कि नीचे से कोई मेरे कम्बल को घसीट रहा है। पहले तो मैंने सोचा कपड़े अपने आप खिसक रहे होंगे इसलिए उन्हें ऊपर को खींच लिया किन्तु वही क्रिया दुबारा हुई। मेरा मुंह फिर खुल गया इस बार थोड़ी ताकत लगाकर कपड़े फिर ऊपर उठाये। जितनी देर कपड़े ऊपर उठाये रहा कपड़े ठीक रहते पर छोड़ते ही उन्हें फिर कोई खींच लेता। बाहर उठकर देखा, कोई नहीं था। कमरे की बत्ती जलाकर कोना-कोना देखा, कोई नहीं था। दरवाजे बन्द करके कपड़े चारों ओर से लपेट कर फिर लेट गया। लेटना था कि कमरे में एक विचित्र प्रकाश दिखाई दिया। उसमें अजीब तरह की हलचलें हो रही थीं। हंसने और रोने की विचित्र आवाजें भी आती रहीं। मैंने शेष रात बड़ी बेचैनी से काटी।’’
इस घटना का नायक केन्टोर कोई साधारण और अविश्वस्त आदमी नहीं अमेरिका का प्रसिद्ध लेखक है जिन्हें कुछ दिन पहले ही ‘पुलित्जर पुरस्कार’ प्रदान किया गया है। अब्राहम क्यूमिंग्ज 18वीं सदी के अन्तिम चरण में उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक क्रियाशील एक पादरी थे। सन् 1826 में उन्होंने एक किताब छपवाई। 77 पृष्ठीय इस पुस्तिका का नाम है, ‘इम्मार्टलिटी प्रूव्ड बाइ द टेस्टीमोनी आफ साइन्स’। इसमें एक कप्तान बटलर की मृत पत्नी की प्रेत छाया के बारे में प्रामाणिक विवरण है। इस ग्रन्थ की मूलप्रति ‘न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी’ में सुरक्षित है। पादरी क्यूमिंग्ज ने इस पुस्तिका में 30 व्यक्तियों की शपथपूर्वक की गई घोषणा छापी है कि उन्होंने उस मृतात्मा को देखा व सुना था। स्वयं पादरी ने उसे कई बार देखा व सुना है।
अमरीका के कैलीफोर्निया शहर के इण्डावरी मुहल्ले में एक भुतहा मकान था। वहां कोई भी रहने को तैयार न होता। चार साहसी छात्रों ने एक बार उसे किराये पर लिया। वे भूतों-प्रेतों की मान्यता को निरी भ्रांति मानते थे। पर एक दिन सहसा आंगन में कुर्सियों पर बैठे-बैठे उन्होंने पाया कि उनकी कुर्सियां वायु में ऊपर उठकर 7-8 फुट की ऊंचाई पर स्थिर हो रहीं। फिर एक रात सहसा पत्थर वर्षा होने लगी। खोजबीन से मालूम हुआ, वहां एक डॉक्टर 4-5 वर्ष पूर्व आत्महत्या कर चुका था, उसी की प्रेतात्मा का करिश्मा है। छात्रों ने मकान छोड़ दिया।
धर्मयुग में श्री दामोदर अग्रवाल ने भी ऐसी ही एक आपबीती ही सुनाई। उनके घर में सफाई के बावजूद दुर्गन्ध आने, अल्मारी में ताले में बन्द पूरियां रात को गायब हो जाने और ताला ज्यों का त्यों बन्द रहने, धुले बर्तन सुबह जूठे मिलने, आंगन में रखे लड्डुओं की जगह गीली मिट्टी बच रहना, मिठाइयों के रात भर में सड़ जाने, रसोईघर में अजनबी पंजों के निशान अंकित होने और दीवारों आदि पर उंगलियों के चिन्ह दिखने तथा दूध का भरा गिलास पल भर में गायब होने की घटनायें घटती थीं।
नवनीत (हिन्दी डाइजेस्ट) में भी एक घटना छपी थी। अमरीका के श्री रोजेनहीम एडवोकेट के घर में सहसा टेलीफोन की घण्टियां टनटना उठतीं, ट्यूबलाइट बिना स्विच दबाये जल उठतीं, बल्ब जलकर फट जाते, टेलीफोन उठाने पर गालियों की बौछार सुनाई पड़ती। लगातार छानबीन व चौकसी के बावजूद शरारती व्यक्ति का पता न चला। ‘फ्रीवर्ग इन्स्टीट्यूट आफ पैरासाइकोलॉजी’ के अध्यक्ष परामनोवैज्ञानिक प्रो. हांस बेण्डर ने मामले की पड़ताल की और पाया कि मामला ‘साइकोकाइनेसिस’ यानी मनोगति क्रम का है। मनोगति क्रम का अर्थ है, ऐसी सूक्ष्म मानसिक शक्तियां, जो भौतिक पदार्थों को नियन्त्रित-निर्देशित कर सकें। प्रो. बोण्डर के अनुसार भूत-प्रेत के रूप में भी ऐसी मानसिक अवस्था सम्भव है।
एकबार एक फोटोग्राफर ने ‘डा. थयोव वरहाजमान’ का एक फोटो खींचा। जब फोटो खींच लिया गया तो डा. वरहाजमान ने कहा—मुझे ऐसा लगा जैसे फोटो खींचते समय कोई मेरे साथ हो, जबकि उनके साथ कोई भी दृश्य प्राणी खड़ा हुआ न था। लेकिन दूसरे दिन जब फिल्म धुलकर आई तो लोग यह देखकर दंग रह गये कि इस फोटो के साथ ही स्वर्गीय ग्लेडस्टो का भी फोटो आ गया था।
किरायेदार ने सोचा मकान बहुत बढ़िया है यहां बहुत अच्छा रहेगा और नहीं तो यह मकान मोल ही ले लूंगा। इन्हीं कल्पनाओं में खोया हुआ किरायेदार विलियम फ्रांक गहरी निद्रा में सो गया। किन्तु अभी उसे सोये हुए एक घण्टा भी नहीं हुआ था कि किसी ने हाथ के इशारे से उसे जगा दिया। फ्रांक ने चद्दर हटाया देखा एक बहुत ही भयंकर हरी आंखों वाली आकृति उसके सामने खड़ी है। उसने पूछा—कौन है? किन्तु जैसे यह प्रश्न हवा में खो गया उसी प्रकार पता नहीं चला वह छायाकृति एकाएक कहां अन्तर्धान हो गई।
फ्रांस उठे बत्तियां जलाकर सभी दरवाजे खिड़कियों की जांच की, सब बिलकुल बन्द थे। बाहर से चिड़िया तो आ सकती थी किन्तु बिल्ली नहीं घुस सकती थी फिर यह पूरी दानवाकृति कहां से आई, कौन थी वह, कहां चली गई। उन्होंने निश्चय किया यह मेरे अवचेतन मन की कल्पना थी, जिसने स्वप्न में विधिवत् एक मनुष्य की आकृति खड़ी कर दी। मन को आश्वस्त कर फ्रांक फिर सो गये किन्तु जैसे ही आधी रात नियराई एक बार फिर वही पहले जैसी स्थिति। ठीक वह शकल फिर सिरहाने खड़ी थी और फ्रांक को झकझोर कर जगा रही थी। फ्रांक के मुंह से कौन तो निकला—उस कौन के साथ एक कराह-सी मालूम पड़ी उन्होंने स्पष्ट खड़े हुये एक आदमी को देखा किन्तु जैसे ही उन्होंने फिर बत्ती जलाई वहां न राम न रहीम। फ्रांक बुरी तरह घबड़ा गये। रात जागते बिताई। जहां उस मकान को वे खरीदने की सोच रहे थे। दूसरे दिन भी छोड़कर भाग गये।
यह कोई गल्प-कथा नहीं लिखी जा रही वरन् एक सच्ची घटना है जो सिडनी (आस्ट्रेलिया) शहर के हेयर फोर्ड स्ट्रीट के एक मकान में घटित हुई। जिसकी जांच मनो-वैज्ञानिकों ने भी की और सच पाया। उन्होंने माना कि अदृश्य जगत में यक्ष-गन्धर्व, ब्रह्म राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, बेताल, किन्नर आदि होने की भारतीय मान्यता निराधार नहीं है।
फ्रांक के जाने के बाद एक अन्य सज्जन पधारे। मकान किराये पर ले लिया। उस समय मुहल्ले वालों ने बताया—श्रीमान् जी इस मकान में एक किरायेदार पहले भी आये थे पर वह इन-इन परिस्थितियों में मकान छोड़ गये। कह नहीं सकते आपका मकान लेना हितकर होगा अथवा नहीं पर सुना यह जाता है कि इस मकान का मालिक जो चाय पीने का बेहद शौकीन था शराब और मांस तो उसके लिये जल पीने की तरह थे। सदैव दुर्गन्धित शरीर वाले उस दानवाकृति मकान मालिक ने शरीर छोड़ा तब से इस मकान में कोई टिका नहीं। कहते हैं उसकी आत्मा इसी मकान में चक्कर काटती है कोई और मनुष्य उस घर में रहे यह उससे बर्दाश्त नहीं होता। उसके रिश्तेदार चाहते हैं कि मकान का कुछ किराया मिले पर यह अदृश्य भटकती हुई आत्मा किरायेदारों को रहने नहीं देती।
मकान उन्होंने ले लिया और उसी दिन सामान लाकर जम भी गये। इसे अन्तर्चेतना की कमजोरी कहा जाये अथवा एक प्रकट सत्य कि उन सज्जन की पहली और दूसरी दो रातें तो अच्छी तरह गुजर गईं किन्तु तीसरी रात जैसे ही कोई एक बजने को हुआ कि उन्हें किसी ने कन्धे झकझोर कर जगा दिया। इतनी तेजी से जगाया गया था कि नींद तड़फड़ा कर टूट गई। उन्होंने देखा एक कोई बहुत ही भारी भरकम शरीर का व्यक्ति सामने खड़ा है उसकी आंखें हरी थीं और शरीर काली छाया जैसा। देखते ही पहला हाथ बिजली बत्ती के स्विच पर गया। बत्ती जलने पर उन्होंने चारों तरफ दृष्टि दौड़ाई दिखाई तो कोई नहीं दिया पर उनका अविश्वासी मन इतना डर गया कि अच्छी तरह बोलना भी कठिन था। जिन्हें पहले से ही अतीन्द्रिय अस्तित्व पर विश्वास होता है वे यह भी जानते हैं कि ऐसी उच्छिष्ट आत्मायें अपने आप अभिशाप होती हैं वे दूसरों का कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं? जिनमें कुछ ऐसी क्षमता होती भी है वह देव श्रेणियां होती हैं और अहित सोचने की अपेक्षा मनुष्य का हित ही करती हैं। शंकालु मन उक्त सज्जन को इन सब बातों का कोई पता न था सो उस रौद्र-कल्पना ने उन्हें इतना डरा दिया कि वे भी शेष रात सो नहीं सके। दूसरे दिन वे भी वहां से सादर विदा होकर दूसरे घर में चले गये।
घटना सिडनी पुलिस हैड क्वार्टर के रिकार्ड से उद्धृत की जा रही है। जिसको यह विलक्षण रिपोर्ट इस तीसरी घटना से प्राप्त हुई। इस बार माइकेल बुक्स नामक एक अन्य सज्जन आये और यही मकान किराये पर लेकर रहने लगे। उनसे किसी ने कुछ कहा भी नहीं। उन्हें या उनके परिवार को कभी इस बात की कल्पना भी नहीं थी, उनका अपना कोई विश्वास भी नहीं था। किन्तु एक रात की बात है कि कोई आहट पाकर उनकी कन्या जग गई और नेत्र खोलते ही जो भयंकरता, उसने देखी सो आंखें खुली की खुली रह गईं। अच्छी स्वस्थ सुन्दर कन्या की आंखों ने झपकना बन्द कर दिया और कोई भी चिकित्सक उसे ठीक नहीं कर सका। उस आकृति का जो भी दृश्य इस कन्या ने बताया वह पहले दो किरायेदारों के विवरण से सौ-फीसदी मिलता-जुलता था।
इसके बाद एक दिन श्रीमान कुक के साथ भी ठीक वैसी ही घटना घटित हुई। श्री कुक उसे देखकर न केवल चीख उठे वरन् रोने भी लगे। उन्होंने उसे बिस्तर उठा कर फेंकते हुये देखा। एक दिन उन्होंने पूरी केतली चाय बनाकर रखी थी। किसी काम से वे थोड़ा बाहर निकल कर आये दुबारा जब फिर चाय पीने के लिये आये तो यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि वही आंखों वाला वीभत्स छाया पुरुष केतली में ही मुंह लगाये चाय पी रहा है। कहीं एक बूंद चाय गिरी नहीं फिर चाय का इस प्रकार देखते-देखते वायुभूत हो जाना एक बहुत रोमांचक घटना थी। उन्होंने कई बार उसे सेवकों की तरह काम करते भी देखा और कई बार स्वयं बाहर खुला हुआ रखा सामान उठाकर खाते हुये भी देखा। श्री कुक ने भी अन्ततः सपरिवार मकान छोड़ दिया पर चलते-चलते उसकी रिपोर्ट भी पुलिस हैड-क्वार्टर में लिखा गये ताकि पीछे और कोई उसमें आकर तंग न हो।
पुलिस ने जांच का निश्चय किया। एक पुलिस कांस्टेबल जांच के लिये भेजा गया। सिपाही ने घूम-घूम कर पूरा बंगला देखा पर वहां उसे न कोई आकृति दिखी न छाया। सिपाही ने कुक को कई बार कोसा और कहा—लोगों को पुलिस को तंग करते मजा सा आता है। उसने मकान में ताला बन्द किया और थाने लौटकर पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट को बताया वहां कुछ भी तो नहीं है दूसरे दिन ऑफिसर ने उसी सिपाही को फिर भेजा इस बार सिपाही ताला खोलकर घर में प्रविष्ट हुआ तो उसने जो कुछ देखा उससे उसके रोंगटे खड़े हो गये। कमरों का सारा सामान अस्त-व्यस्त पटका पड़ा था। करीने से लगी कुर्सी मेजें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। रसोई घर में उसे केतली में चाय मिली जिसे देखने से लगता था किसी ने उसे अभी हाल चाय बनाकर पी है। मकान में चारों तरफ ताला बन्दी थी। कोई आने जाने का रास्ता नहीं फिर अन्दर कौन आया किसने चाय बनाई। अभी वह इन्हीं विचारों में खोया पीछे को मुड़ा ही था कि ठीक वही आकृति उसके सामने खड़ी थी। पुलिस कांस्टेबल के शरीर से पसीना फूट पड़ा। बड़ी मुश्किल से बेचारे ने भाग कर दरवाजे बन्द किये, ताला लगाया और थाने लौट आया। थाने में सही घटना लिखा कर घर लौटा तो डर के मारे उसे बुखार ही आ गया और वह पन्द्रह दिन बाद ठीक हुआ। इसके बाद सीनियर पुलिस अफसरों तथा सी.आई.डी. कर्मचारियों ने भी छान-बीन की। कई ने तो वह आकृति ज्यों की त्यों देखी भी। पर जिन्होंने उसे देखा भी नहीं उन्होंने भी मकान का सामान कई बार अदल-बदल कर रखकर जांच की बाहर पहरा होने के बावजूद सामान किस प्रकार तीतर-बितर हो जाता है यह रहस्य कोई भी सुलझा नहीं सका। मनो-वैज्ञानिक तथा पत्रकारों ने भी न्यू कैसल में रह रहे माइकेल कुक से बातचीत की तथा मौके पर जाकर जांच भी की। सारे तथ्य सही पाये और सबने एक स्वर से यह माना कि कोई ऐसी सत्ता सचमुच है जो नितान्त स्थूल न होकर भी समर्थ मनुष्य जैसे काम कर सकने में सक्षम है। यदि यह सत्य है तो आत्मा के अस्तित्व की, मानवेत्तर जीवन, परलोक और पुनर्जन्म की भारतीय मान्यतायें निराधार नहीं कही जानी चाहिये वरन् उस मान्यता के महत्वपूर्ण पहलुओं का वैज्ञानिक और मनो-वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिये। जब तक विज्ञान इस तरह के रहस्यों का उत्तर नहीं देता तब तक अतीन्द्रिय अस्तित्व से इनकार करने का कोई कारण नहीं होना चाहिये।
कहते हैं इस मकान में पहले एक वृद्धा रहती थी। जो घर के अन्दर किसी से जोर-जोर से बात-चीत किया करती थी। कभी-कभी उसका स्वर इतना रोबीला और आदेश पूर्ण होता था मानो वह अपने किसी नौकर से काम करा रही हो। इतना होने पर भी उस व्यक्ति को किसी ने कभी देखा नहीं। कभी किसी ने वृद्धा से पूछा—अजी आप किससे बातें किया करती हैं? तो वह हंसकर इतना ही उत्तर देती—बेटा! जिससे मैं बात कर सकती हूं तुम्हें तो उसको देखने की हिम्मत भी नहीं हो सकती। वृद्धा के आत्म-बल पर लोग आश्चर्य करते और कहा करते कि जिसके कारण दूसरे लोग मकान में रह भी नहीं पाते उसे बुढ़िया कैसे नाच नचाती है वह इन दिनों बीमारी के कारण अस्पताल में भी थी तब अन्य किराये दार आये और यह बात असली रूप में सामने आई। घटना सामने आ जाने पर भी अव्यक्त सी है और उसके गर्भ में सैकड़ों यथार्थ सिद्धान्त छिपे हुये हैं जिन्हें जाने समझे बिना मनुष्य जीवन की यथार्थता को समझ पाना कठिन है।
ह्वाइट हाउस में मरणोत्तर जीवन
टेलिविजन सेट आन (चालू) हुआ और राष्ट्रपति ट्रूमैन अपनी पुत्री मार्गरेट से बातचीत करने लगे—अनुमान से सर्वथा भिन्न दिशा का सन्दर्भ—ट्रूमैन कहने लगे—एक दिन रात के लगभग तीन बज रहे थे जिस कमरे में हम सो रहे थे किसी ने दस्तक दी। बिस्तर से उठकर द्वार खोले तो जो दृश्य दिखाई दिया उससे तो मैं विस्मित और अवाक् ही रह गया। मैंने देखा—भूतपूर्व राष्ट्रपति लिंकन का भूत सामने टहल रहा है। आगे बढ़ने का साहस नहीं हुआ द्वार बन्द किये और बिस्तर पर आ लेटा।’’
घटना उनके राष्ट्रपति काल की ही है और है भी ह्वाइट हाउस की ही। प्रायः सभी अमरीकी राष्ट्रपति अपनी सम्वेदनशीलता, परिश्रम शीलता, साहस और उद्यमशीलता के लिये सदैव सारे संसार के आकर्षण बिन्दु रहे हैं हजारों लोगों ने उनसे अपनी-अपनी तरह की प्रेरणायें ग्रहण की हैं पर बहुत कम लोग होंगे जो 18 एकड़ में बने इस भव्य प्रासाद, ‘ह्वाइट हाउस’ जिसमें अमरीका का हर राष्ट्रपति निवास करता है, के सम्बन्ध में कुछ ऐसे कथ्य व तथ्यों से परिचित होंगे जो मनुष्य की चिन्तन की दिशाओं को बलात् एक अन्तरंग मरणोत्तर जीवन की ओर खींच ले जाते हैं। यह भी एक विलक्षण बात है कि सारे अमरीका में ह्वाइट हाउस को मरणोत्तर अस्तित्व का प्रमाण माना जाता है जबकि वहां की सभ्यता से प्रभावित अन्य देशों में लोगों का विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात् जीवन का कुछ भी अस्तित्व शेष नहीं रहता है।
मन में दुर्बलता न आये, भय पैदा न हो इस दृष्टि से भूत-प्रेत का चिन्तन न करें यह किसी हद तक ठीक भी है किन्तु अधिकतम सौ वर्ष के जीवन के भौतिक सुख चिन्तन में पड़कर करोड़ों अरबों वर्षों से भी अधिक शाश्वत एवं अनन्त अन्तरंग जीवन की अपेक्षा आत्मा के लिये कभी भी हितकारक नहीं कहीं जा सकती? भूत है तो क्यों? उसका स्वरूप क्या है? यदि ह्वाइट हाउस के ऐसे प्रभावशाली और विशिष्ट व्यक्ति मानते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है तो यह जानना ही चाहिये कि वह क्यों बना रहता है और क्या उस स्थिति में भी आत्मा सुख-शान्ति की अनुभूति कर पाती होगी जो कि मनुष्य जीवन का यथार्थ लक्ष्य है।
ह्वाइट हाउस की यह घटनायें दिलचस्प ही नहीं गम्भीर भी हैं एक बार हालैण्ड की महारानी विल्हेल्मिना ने अमेरिका का भ्रमण किया तब वे विशिष्ट सम्मानित अतिथि के रूप में ह्वाइट हाउस में ही ठहराई गईं। एक दिन उनके कमरे के दरवाजे को किसी ने खटखटाया। उन्होंने दरवाजा खोला तो देखा सामने काली छाया के समान अब्राहम लिंकन का भूत खड़ा है। अब्राहम लिंकन की हत्या की गई थी। वे महान् व्यक्ति थे जब वे राष्ट्रपति थे तब भोग विलास और ऐश्वर्य की उन्हें कोई कमी क्यों रही होगी। फिर उनका भूत क्यों? भारतीय दर्शन के अनुसार उनमें आसक्ति का भाव रहा होगा उसी से उनकी आत्मा ह्वाइट हाउस को छोड़ना नहीं चाहती होगी। ठीक इसी समय भौतिक विज्ञान की इस मान्यता का भी खण्डन हो जाता है कि जीवन की चेतना रासायनिक है। यदि जीवन विद्युत, चुम्बक आदि के समान कोई स्थूल और रासायनिक चेतना होती है तो लिंकन की मृत्यु के बाद उनका अस्तित्व क्यों बना रहता?
राष्ट्रपति क्वीवलैण्ड की पत्नी ने राष्ट्रपति भवन में एक बच्चे को जन्म दिया था। बच्चा कुछ ही दिन में चल बसा था। उस बच्चे से सम्भवतः उनका मोह मृत्यु के बाद भी नहीं छूटा था इसी कारण उनकी आत्मा भी ह्वाइट हाउस में लिंकन की तरह ही भटकती है। उनकी विचित्र प्रकार की चीख कई बार सुनी गई। राष्ट्रपति निक्सन की पत्नी के मन में एक बार ऐसा हुआ कि गुलाब के बगीचे का स्थान बदल दिया जाय तो उससे राष्ट्रपति भवन की सुन्दरता और भी बढ़ जायेगी। एतदर्थ उन्होंने माली को बुलाकर कहा इस बगीचे का स्थान बदल दो। गुलाब का यह बाग राष्ट्रपति मैडीसन की धर्म-पत्नी ने लगवाया था। व्हाइट हाउस में किसी परिवर्तन या नई व्यवस्था का अधिकार राष्ट्रपति की पत्नी को ही होता है। जब माली बगीचे के पास आया तो वह वहां खड़े हुए श्रीमती मैडीसन के भूत को देखकर घबरा उठा। लौटकर उसने सारी बात श्रीमती विल्सन से कहीं। विल्सन भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करती थीं पर उन्होंने स्वीकार किया जब मैं बगीचे के पास स्वयं गई तो श्रीमती मैडीसन का भूत वहां था, मुझे ऐसा लगा कि वह कह रही हैं कि यदि यह बगीचा बदला तो भला न होगा डरकर श्रीमती विल्सन ने अपनी सारी योजना रद्द कर दी।
वहां के सभी लोग यह मानते हैं कि कुछ एक राष्ट्रपतियों को छोड़कर प्रायः सभी की रूहें अब भी वहां विद्यमान हैं और यही कारण है कि जब भी कोई नया राष्ट्रपति चुनकर आता है और परम्परा के अनुसार निवर्तमान राष्ट्रपति की पत्नी उसकी पत्नी को राष्ट्रपति भवन (ह्वाइट हाउस) का परिचय कराती हैं, तब वह भूतों के अस्तित्व और स्थानों की भी पूरी जानकारी अवश्य दे देती है।
फिर भी ऐसी घटनायें वहां आये दिन होती ही रहती हैं। राष्ट्रपति एडम्स की पत्नी को वहां कपड़े सुखाते देखा गया, लिंकन को जूतों के फीते खोलते देखा गया। क्वीवलैण्ड की श्रीमती को हंसते और चिल्लाते सुना गया। इस अतीन्द्रिय अस्तित्व और अनुभूति का कारण क्या हो सकता है, यह शोध व अध्ययन का लम्बा विषय है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मनुष्य का मृत्यु के बाद भी अस्तित्व बना रहता है। भारतीय दर्शन की इस मान्यता को निराधार कहने वालों को पहले अमरीकी राष्ट्रपतियों, उनकी पत्नियों और सहकर्मियों को अन उत्तरदायी और झूठा कहना होगा। पर यदि उनकी विशिष्टता पर विश्वास हो तो हमें भारतीय दर्शन के इन आधारभूत तथ्यों पर भी विश्वास करना और अपने जीवन को आध्यात्मिक पद्धति से ढालने का अभ्यास करना ही होगा।
भूत बड़े बड़ों ने देखा
टेलीफोन की घंटी बजी, वकील साहब ने उसे उठाकर कान से लगाया और कहा—हलो! हलो!! कौन बोल रहा है? पर उधर से कुछ आवाज न आई चोगा नीचे रख दिया। लेकिन अभी वे उठने को ही थे कि घंटी फिर टनटनाई फिर रिसीवर उठाकर कान से लगाया तो कोई भद्दी गाली बकने लगा। कई दिन तक ऐसे ही कभी गालियां, कभी धोखा खाने के बाद भी उन्हें पता न चला पाया कौन तंग कर रहा है?
फिर—स्विच दबाया नहीं ट्यूब लाइट तेजी से चमकने लगा। बल्ब जला और फटाक से फूट पड़ा। कमरे में उनके अतिरिक्त एक चिड़िया भी नहीं तो भी यह ऊधम मच रहा है। वकील साहब बड़े तंग हुए अन्त में हारकर बिजली विभाग को लिखा—कहीं कोई बिजली की गड़बड़ी है उसे ठीक किया जाये। बिजली विभाग के इंजीनियर तक आये, सारे सर्किट को ओवर हालिंग कर गये पर न तो कोई गड़बड़ी मिली और न बन्द ही हुआ ऊधम। ऐडवोकेट साहब का बुरा हाल था।
यह प्रसंग कोई कथा नहीं वरन् एक सत्य घटना है जो रोजेनहीम के एक वकील के साथ जून 1968 में घटी। इस समाचार का विवरण नवनीत (हिन्दी डाइजेस्ट) में भी छपा है। लगभग 8-9 महीने की लगातार जांच के बाद बिजली विशेषज्ञों ने जवाब दे दिया और स्थिति नियन्त्रण में नहीं आई। इसके बाद परा मनोविज्ञान वेत्ता प्रो. हांस बेन्डर, जो कि ‘‘फ्रीवर्ग इन्स्टीट्यूट ऑफ पैरासाइकोलाजी’’ के अध्यक्ष हैं, ने इन परिस्थितियों की जांच की और बताया कि—सब कुछ देखने के बाद मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि यह मामला मनोगति क्रम (साइको काइनेसिस) का है। मनोगति क्रम का अर्थ ही है कि सूक्ष्म मानसिक शक्तियां हैं जो भौतिक पदार्थों पर नियन्त्रण और हस्तक्षेप कर सकती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि मानसिक अवस्था किसी भूत प्रेत के रूप में स्थित रह सकती है।
ब्राजील के अति प्रतिष्ठित दैनिक पत्र ‘‘ओ क्रूजीरो’’ के प्रतिनिधियों ने आंखों देखा और जांचा हुआ समाचार छापा था कि साओपाअलो राज्य के इटापिका नगर के एक किसान ‘सिडकान्टो’ के घर पर न जाने कहां से पत्थर बरसते थे और घर में रहने वालों को घायल करते थे। भूत उपचारकों से लेकर अन्य सभी प्रकार के उपाय जब इसकी रोकथाम में असफल हो गये तो पुलिस को सूचना दी गई। वे लोग भी रहस्य पर से पर्दा न उठा सके तो विषय सर्वसाधारण की चर्चा का बन गया और ब्राजील ही नहीं योरोप के अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी तथ्य का हर दृष्टि से पता लगाने के लिए पहुंचे, पर न तो घटना क्रम को झुठलाया जा सका और न उसका रहस्योद्घाटन किया जा सका। इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध मनो-विज्ञानी और दार्शनिक सी.ई. एम जोड़ ने बी.बी.सी पर एक परिसम्वाद में भाग लेते हुए कहा था—‘‘मैं भूतों पर विश्वास नहीं करता था, पर एक दिन जब मेरे ऊपर प्रयोगशाला में बैठे-बैठे चारों ओर से साबुन की टिकिया बरसनी आरम्भ हो गईं और खोज करने पर उसका कोई आधार नहीं सूझ पड़ा तो मेरा विश्वास बदल गया और मैं अब भूतों के अस्तित्व को मानता हूं।’’
केम्ब्रिज विश्व-विद्यालय में प्रेतात्माओं सम्बन्धी शोध कार्य करने के लिए एक विशेष विभाग ही खुला हुआ है। अमेरिका की ‘साइकिकल रिसर्च फाउण्डेशन’ द्वारा अनेक वैज्ञानिकों और बुद्धि जीवियों के सहयोग से सुनियोजित शोध कार्य चल रहा है।
प्रेत बाधाओं के स्वरूप को भी वैज्ञानिकों ने समझने का प्रयास किया है। ऐसे स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि किसी घर या स्थान विशेष में आकस्मिक रूप से घंटियां बज उठेंगी, चीजें इधर-उधर बिखरने लगेंगी, पत्थर, धूलिकण आदि बरसने लगेंगे, किवाड़ खिड़कियां स्वयं ही खुलने बन्द होने लगेंगी और ऐसा बिना किसी भी व्यक्ति या यन्त्र की गतिविधि के होगा। ऐसी घटनाएं अब भली-भांति परखी जा चुकी हैं और वैज्ञानिकों द्वारा सत्य पाई गई हैं। इसका अभी तक वैज्ञानिक यही स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर सके हैं कि प्रेत बाधा सम्बन्धी समस्त घटनाएं उस क्षेत्र के आस-पास किसी जीवित देहधारी की ही उपस्थिति में घटित होती हैं। इसका अर्थ है कि उपस्थित व्यक्ति के भीतर प्रविष्ट ‘‘साइकिक फैक्टर’’ या कि उसी व्यक्ति का अवचेतन अपनी आन्तरिक ऊर्जा को वहां प्रक्षिप्त करता है, भले ही वह स्वयं सचेतन रूप में इस क्रिया से अवगत नहीं रहता। पर जीवित व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा के उपयोग से ही ये घटनायें घटित हो पाती हैं यह सिद्धान्त व्यक्ति में निहित असीम सम्भावनाओं तथा अपाप मानसिक ऊर्जा की धारणा की ही पुष्टि करता है। इस मानसिक ऊर्जा को ही मनोबल, आत्मबल आदि कहा गया है।
वस्तुओं तथा व्यक्तियों के सहसा हवा में ऊपर उठ जाने तथा तैरने, व्यक्ति का थोड़े समय के लिए अत्यधिक लम्बा-ऊंचा हो जाने अन्तर्धान होने, आकाश-संचरण आदि की घटनाएं भी वैज्ञानिकों द्वारा नियन्त्रित वातावरण में स्पष्टतः देखी-परखी गई हैं। सर डगलस ने अनेक वैज्ञानिकों के सामने कुर्सी समेत हवा में ऊपर उठ जाने, कई फुट लम्बे हो जाने, मेज आदि को ऊपर उठा देने के अनेक प्रदर्शन किये थे और भी कई प्रयोगकर्ता ऐसे प्रदर्शन कर चुके व कर रहे हैं। इनकी कैसी भी व्याख्या अभी तक वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं।
प्रेतात्मा के अस्तित्व सम्बन्धी जो घटनायें सामने आती हैं उनके अधिक गम्भीर अन्वेषण किये जाने की आवश्यकता है। इन शोधों से मानव तत्व की कितनी ही विशेषताओं पर प्रकाश पड़ेगा और यह जाना जा सकेगा कि मरणोत्तर जीवन में मनुष्य को किन परिस्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है? इस तथ्य का जितना ही रहस्योद्घाटन होगा उतना ही यह स्पष्ट होता जायगा कि जीवन अनन्त है और उसकी सम्भावनाएं असीम हैं। वर्तमान दृश्य जीवन तो उसका एक छोटा-सा अंग मात्र है।
जड़ वस्तुओं के भी प्रेत ?
इस सिलसिले में एक और भी इससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह सामने आई है कि जड़-पदार्थों से बने ऐसे माध्यम जिनके साथ जीवित मनुष्यों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा हो, अपना प्रेत अस्तित्व बना लेते हैं और मूल पदार्थ के नष्ट हो जाने पर भी अपने अस्तित्व का वैसा ही परिचय देते रहते हैं, जैसा कि मरने के बाद मनुष्य अपना परिचय प्रेत रूप में प्रस्तुत करता रहता है।
समुद्री इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है, जिसमें सामने से आते हुए जहाज के साथ सम्भावित टक्कर से बचाने के लिए मल्लाहों ने अपना जहाज तेजी से मोड़ा और उस प्रयास में उनका अपना जहाज उलट कर नष्ट हो गया। यह जहाज जो सामने से आ रहा था और जिसकी टक्कर बचाने के लिए मल्लाह आतुरतापूर्वक प्रयत्न कर रहे थे, यहां यह कौन था, कहां का था—ठीक सामने टकराने जैसी स्थिति में क्यों हो रहा था—उसके चालक उसे बचा क्यों नहीं रहे थे—वह पीछे वहां से कहां चला गया? आदि प्रश्नों के उत्तर सन्तोषजनक नहीं मिले और यह मान लिया गया कि सम्भवतः वह मल्लाहों की आंखों का भ्रम था, वस्तुतः उस प्रकार के जहाज का अस्तित्व सिद्ध नहीं हुआ।
जांच कमेटियों की रिपोर्ट में डूबने वाले और न डूबने वाले जहाजों तथा मल्लाहों की ऐसी अनेकों गवाहियां हैं जिन्होंने समुद्र की सतह पर ऐसे जहाज देखे जिनका अस्तित्व प्रमाणित नहीं किया जा सका। रिपोर्टों में उसे भ्रम बता कर जांच पर पर्दा डाल दिया, पर उन मल्लाहों और यात्रियों का समाधान न हो सका, जिनने अपनी आंखों से सब कुछ देखा था। भ्रम तो एक दो को हो सकता था, सारे मल्लाह और परियात्री एक ही तरह का दृश्य देखें यह कैसे हो सकता है। रिपोर्ट अपनी जगह कायम रही और दर्शकों की मान्यतायें अपनी जगह। पीछे यह अनुमान लगाया गया कि डूबे हुए जहाजों के प्रेत अपने जीवनकाल की आवृति में समुद्र तल पर भ्रमण करते रहते हैं। यह उनका सूक्ष्म शरीर होता है, जिसमें सघन ठोस तत्व तो नहीं होते पर छाया आकृति ठीक वैसी ही होती है जैसी कि उनके जीवित काल में थी। डूबे हुए जलयानों के प्रेत होते हैं, यह अनुमान आरम्भ में उपहासास्पद ही माना गया था पीछे उनके प्रमाण इतने ज्यादा मिलते गये कि उस मान्यता को एक विचारणीय शोध विषय माना गया। अभी भी मृत जलयानों का प्रेत रूप में जीवित रहना किसी प्रामाणिक कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं हुआ है। इसलिए उस मान्यता को भ्रम स्तर पर ही रखा गया है। फिर भी शोधकर्त्ताओं को स्वयं इस निष्कर्ष से सन्तोष नहीं हुआ है। वे यह कहते रहते हैं कि उपलब्ध प्रमाण साधन अपर्याप्त हो सकते हैं और भविष्य में कई ऐसे उपकरण या सिद्धान्त निकल सकते हैं जो इन बहुचर्चित प्रेतों के सम्बन्ध में कुछ अधिक सन्तोषजनक तथ्य प्रस्तुत कर सकें।
निर्जीव पदार्थों के भी प्रेत होते हैं, इस संदर्भ में समुद्री इतिहास के बाद स्थल-इतिहास की भी एक कड़ी आकर और भी जुड़ जाती है। रेल दुर्घटनाओं में ड्राइवरों के अनेकों बयान ऐसे हैं जिनमें उनने सामने से धड़धड़ाती हुई एक रेल आती देखी और उसकी टक्कर बचाने का प्रयास करते हुए कड़ा ब्रेक लगाने में उनका इंजन उलट गया; अथवा वे हतप्रभ होकर अपना संचालन-सन्तुलन खो बैठे। सामने से रेल क्या थी, कहां से आई थी, इसका कोई प्रमाण न मिला तो इसे ड्राइवरों की मनगढ़न्त कहानी अथवा मनोविकृति भर कहकर उपेक्षित कर दिया गया। पर ऐसे घटनाक्रम अनेकों थे। जिनमें टक्कर से दुर्घटना अथवा बचाव के लिए किये गये खतरनाक प्रयासों का पता चलता था। प्रमाणहीन बात को माना कैसे जाय और इतने लोग अकारण भ्रम फैलाते हैं, यह भी कैसे गले उतारा जाय? अन्ततः अनुमानों की शृंखला इस तरह भी जुड़ी कि जिस तरह डूबे हुए जलयानों के प्रेत समुद्र की सतह पर घूमते पाये जाते हैं, उसी प्रकार दुर्घटना में ग्रसित रेलों के भी प्रेत हो सकते हैं और उनके दृश्य देखकर सामान्य बुद्धि का ड्राइवर उन्हें एक यथार्थता मान सकता है।
‘पदार्थ’ का प्रेत ‘प्रति पदार्थ’ विश्व का प्रेत ‘प्रतिविश्व’ छाया पुरुष की तरह साथ-साथ विद्यमान रहता है उनकी चर्चा विज्ञान जगत में इन दिनों प्रमुख चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का प्रेत होता है, यह भी जाना और माना जाता रहा है। अब यह नया तथ्य सामने आया है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के—महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प-सत्ताओं के भी प्रेत हो सकते हैं। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म का अस्तित्व बना रहता है। इस सूक्ष्म का गहन अन्वेषण हो सके तो हमारे ज्ञान-विज्ञान में एक नई किन्तु अति महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ सकती है।
विज्ञान और प्रत्यक्ष-दर्शी इन उक्तियों को मानने के लिए तैयार नहीं। उनका कहना है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। शरीर के सभी रासायनिक पदार्थ रूपान्तरित होकर शारीरिक सत्ता को बिगाड़ देते हैं, फिर कुछ नहीं रहता।
किन्तु उनके लिए भूत एक चुनौती है, भूत का लेकर माना अन्ध-विश्वास भी खूब फैला है तो भी वह सब इसी चिर सत्य की नकल भर है। ऐसे प्रामाणिक उदाहरण भी हैं, जिन्होंने भूत पर कभी विश्वास नहीं किया तो भी उन्हें उस सम्पर्क में आना पड़ा। कुछ घटनायें ऐसी भी घटित हुईं, जिनमें न कोई अन्ध मान्यता थी न भ्रम, उन घटनाओं ने पाश्चात्य जीवन में भी भूत की मान्यता को जीवित कर दिया।
1945 में द्वितीय महायुद्ध के समय केन्टोर नामक व्यक्ति को एक बार अमरीका से लन्दन जाना पड़ा। रास्ते में एक रात वे केसिंगटन में रुके। उन्हें बोर्डिंग हाउस का एक कमरा सोने के लिए दिया गया। रात्रि में उन्हें जो अनुभव हुआ उसका वर्णन उन्होंने स्वयं इन शब्दों में लिखा है—
‘‘भोजन करने के बाद मैं सो गया। पहली नींद 3 बजे टूटी। मैं उठा और लघुशंका के लिए कमरे से बाहर गया और फिर लौट कर आया और बिस्तर पर लेट गया। लेटते देर नहीं हुई थी कि ऐसा लगा कि नीचे से कोई मेरे कम्बल को घसीट रहा है। पहले तो मैंने सोचा कपड़े अपने आप खिसक रहे होंगे इसलिए उन्हें ऊपर को खींच लिया किन्तु वही क्रिया दुबारा हुई। मेरा मुंह फिर खुल गया इस बार थोड़ी ताकत लगाकर कपड़े फिर ऊपर उठाये। जितनी देर कपड़े ऊपर उठाये रहा कपड़े ठीक रहते पर छोड़ते ही उन्हें फिर कोई खींच लेता। बाहर उठकर देखा, कोई नहीं था। कमरे की बत्ती जलाकर कोना-कोना देखा, कोई नहीं था। दरवाजे बन्द करके कपड़े चारों ओर से लपेट कर फिर लेट गया। लेटना था कि कमरे में एक विचित्र प्रकाश दिखाई दिया। उसमें अजीब तरह की हलचलें हो रही थीं। हंसने और रोने की विचित्र आवाजें भी आती रहीं। मैंने शेष रात बड़ी बेचैनी से काटी।’’
इस घटना का नायक केन्टोर कोई साधारण और अविश्वस्त आदमी नहीं अमेरिका का प्रसिद्ध लेखक है जिन्हें कुछ दिन पहले ही ‘पुलित्जर पुरस्कार’ प्रदान किया गया है। अब्राहम क्यूमिंग्ज 18वीं सदी के अन्तिम चरण में उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक क्रियाशील एक पादरी थे। सन् 1826 में उन्होंने एक किताब छपवाई। 77 पृष्ठीय इस पुस्तिका का नाम है, ‘इम्मार्टलिटी प्रूव्ड बाइ द टेस्टीमोनी आफ साइन्स’। इसमें एक कप्तान बटलर की मृत पत्नी की प्रेत छाया के बारे में प्रामाणिक विवरण है। इस ग्रन्थ की मूलप्रति ‘न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी’ में सुरक्षित है। पादरी क्यूमिंग्ज ने इस पुस्तिका में 30 व्यक्तियों की शपथपूर्वक की गई घोषणा छापी है कि उन्होंने उस मृतात्मा को देखा व सुना था। स्वयं पादरी ने उसे कई बार देखा व सुना है।
अमरीका के कैलीफोर्निया शहर के इण्डावरी मुहल्ले में एक भुतहा मकान था। वहां कोई भी रहने को तैयार न होता। चार साहसी छात्रों ने एक बार उसे किराये पर लिया। वे भूतों-प्रेतों की मान्यता को निरी भ्रांति मानते थे। पर एक दिन सहसा आंगन में कुर्सियों पर बैठे-बैठे उन्होंने पाया कि उनकी कुर्सियां वायु में ऊपर उठकर 7-8 फुट की ऊंचाई पर स्थिर हो रहीं। फिर एक रात सहसा पत्थर वर्षा होने लगी। खोजबीन से मालूम हुआ, वहां एक डॉक्टर 4-5 वर्ष पूर्व आत्महत्या कर चुका था, उसी की प्रेतात्मा का करिश्मा है। छात्रों ने मकान छोड़ दिया।
धर्मयुग में श्री दामोदर अग्रवाल ने भी ऐसी ही एक आपबीती ही सुनाई। उनके घर में सफाई के बावजूद दुर्गन्ध आने, अल्मारी में ताले में बन्द पूरियां रात को गायब हो जाने और ताला ज्यों का त्यों बन्द रहने, धुले बर्तन सुबह जूठे मिलने, आंगन में रखे लड्डुओं की जगह गीली मिट्टी बच रहना, मिठाइयों के रात भर में सड़ जाने, रसोईघर में अजनबी पंजों के निशान अंकित होने और दीवारों आदि पर उंगलियों के चिन्ह दिखने तथा दूध का भरा गिलास पल भर में गायब होने की घटनायें घटती थीं।
नवनीत (हिन्दी डाइजेस्ट) में भी एक घटना छपी थी। अमरीका के श्री रोजेनहीम एडवोकेट के घर में सहसा टेलीफोन की घण्टियां टनटना उठतीं, ट्यूबलाइट बिना स्विच दबाये जल उठतीं, बल्ब जलकर फट जाते, टेलीफोन उठाने पर गालियों की बौछार सुनाई पड़ती। लगातार छानबीन व चौकसी के बावजूद शरारती व्यक्ति का पता न चला। ‘फ्रीवर्ग इन्स्टीट्यूट आफ पैरासाइकोलॉजी’ के अध्यक्ष परामनोवैज्ञानिक प्रो. हांस बेण्डर ने मामले की पड़ताल की और पाया कि मामला ‘साइकोकाइनेसिस’ यानी मनोगति क्रम का है। मनोगति क्रम का अर्थ है, ऐसी सूक्ष्म मानसिक शक्तियां, जो भौतिक पदार्थों को नियन्त्रित-निर्देशित कर सकें। प्रो. बोण्डर के अनुसार भूत-प्रेत के रूप में भी ऐसी मानसिक अवस्था सम्भव है।
एकबार एक फोटोग्राफर ने ‘डा. थयोव वरहाजमान’ का एक फोटो खींचा। जब फोटो खींच लिया गया तो डा. वरहाजमान ने कहा—मुझे ऐसा लगा जैसे फोटो खींचते समय कोई मेरे साथ हो, जबकि उनके साथ कोई भी दृश्य प्राणी खड़ा हुआ न था। लेकिन दूसरे दिन जब फिल्म धुलकर आई तो लोग यह देखकर दंग रह गये कि इस फोटो के साथ ही स्वर्गीय ग्लेडस्टो का भी फोटो आ गया था।
किरायेदार ने सोचा मकान बहुत बढ़िया है यहां बहुत अच्छा रहेगा और नहीं तो यह मकान मोल ही ले लूंगा। इन्हीं कल्पनाओं में खोया हुआ किरायेदार विलियम फ्रांक गहरी निद्रा में सो गया। किन्तु अभी उसे सोये हुए एक घण्टा भी नहीं हुआ था कि किसी ने हाथ के इशारे से उसे जगा दिया। फ्रांक ने चद्दर हटाया देखा एक बहुत ही भयंकर हरी आंखों वाली आकृति उसके सामने खड़ी है। उसने पूछा—कौन है? किन्तु जैसे यह प्रश्न हवा में खो गया उसी प्रकार पता नहीं चला वह छायाकृति एकाएक कहां अन्तर्धान हो गई।
फ्रांस उठे बत्तियां जलाकर सभी दरवाजे खिड़कियों की जांच की, सब बिलकुल बन्द थे। बाहर से चिड़िया तो आ सकती थी किन्तु बिल्ली नहीं घुस सकती थी फिर यह पूरी दानवाकृति कहां से आई, कौन थी वह, कहां चली गई। उन्होंने निश्चय किया यह मेरे अवचेतन मन की कल्पना थी, जिसने स्वप्न में विधिवत् एक मनुष्य की आकृति खड़ी कर दी। मन को आश्वस्त कर फ्रांक फिर सो गये किन्तु जैसे ही आधी रात नियराई एक बार फिर वही पहले जैसी स्थिति। ठीक वह शकल फिर सिरहाने खड़ी थी और फ्रांक को झकझोर कर जगा रही थी। फ्रांक के मुंह से कौन तो निकला—उस कौन के साथ एक कराह-सी मालूम पड़ी उन्होंने स्पष्ट खड़े हुये एक आदमी को देखा किन्तु जैसे ही उन्होंने फिर बत्ती जलाई वहां न राम न रहीम। फ्रांक बुरी तरह घबड़ा गये। रात जागते बिताई। जहां उस मकान को वे खरीदने की सोच रहे थे। दूसरे दिन भी छोड़कर भाग गये।
यह कोई गल्प-कथा नहीं लिखी जा रही वरन् एक सच्ची घटना है जो सिडनी (आस्ट्रेलिया) शहर के हेयर फोर्ड स्ट्रीट के एक मकान में घटित हुई। जिसकी जांच मनो-वैज्ञानिकों ने भी की और सच पाया। उन्होंने माना कि अदृश्य जगत में यक्ष-गन्धर्व, ब्रह्म राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, बेताल, किन्नर आदि होने की भारतीय मान्यता निराधार नहीं है।
फ्रांक के जाने के बाद एक अन्य सज्जन पधारे। मकान किराये पर ले लिया। उस समय मुहल्ले वालों ने बताया—श्रीमान् जी इस मकान में एक किरायेदार पहले भी आये थे पर वह इन-इन परिस्थितियों में मकान छोड़ गये। कह नहीं सकते आपका मकान लेना हितकर होगा अथवा नहीं पर सुना यह जाता है कि इस मकान का मालिक जो चाय पीने का बेहद शौकीन था शराब और मांस तो उसके लिये जल पीने की तरह थे। सदैव दुर्गन्धित शरीर वाले उस दानवाकृति मकान मालिक ने शरीर छोड़ा तब से इस मकान में कोई टिका नहीं। कहते हैं उसकी आत्मा इसी मकान में चक्कर काटती है कोई और मनुष्य उस घर में रहे यह उससे बर्दाश्त नहीं होता। उसके रिश्तेदार चाहते हैं कि मकान का कुछ किराया मिले पर यह अदृश्य भटकती हुई आत्मा किरायेदारों को रहने नहीं देती।
मकान उन्होंने ले लिया और उसी दिन सामान लाकर जम भी गये। इसे अन्तर्चेतना की कमजोरी कहा जाये अथवा एक प्रकट सत्य कि उन सज्जन की पहली और दूसरी दो रातें तो अच्छी तरह गुजर गईं किन्तु तीसरी रात जैसे ही कोई एक बजने को हुआ कि उन्हें किसी ने कन्धे झकझोर कर जगा दिया। इतनी तेजी से जगाया गया था कि नींद तड़फड़ा कर टूट गई। उन्होंने देखा एक कोई बहुत ही भारी भरकम शरीर का व्यक्ति सामने खड़ा है उसकी आंखें हरी थीं और शरीर काली छाया जैसा। देखते ही पहला हाथ बिजली बत्ती के स्विच पर गया। बत्ती जलने पर उन्होंने चारों तरफ दृष्टि दौड़ाई दिखाई तो कोई नहीं दिया पर उनका अविश्वासी मन इतना डर गया कि अच्छी तरह बोलना भी कठिन था। जिन्हें पहले से ही अतीन्द्रिय अस्तित्व पर विश्वास होता है वे यह भी जानते हैं कि ऐसी उच्छिष्ट आत्मायें अपने आप अभिशाप होती हैं वे दूसरों का कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं? जिनमें कुछ ऐसी क्षमता होती भी है वह देव श्रेणियां होती हैं और अहित सोचने की अपेक्षा मनुष्य का हित ही करती हैं। शंकालु मन उक्त सज्जन को इन सब बातों का कोई पता न था सो उस रौद्र-कल्पना ने उन्हें इतना डरा दिया कि वे भी शेष रात सो नहीं सके। दूसरे दिन वे भी वहां से सादर विदा होकर दूसरे घर में चले गये।
घटना सिडनी पुलिस हैड क्वार्टर के रिकार्ड से उद्धृत की जा रही है। जिसको यह विलक्षण रिपोर्ट इस तीसरी घटना से प्राप्त हुई। इस बार माइकेल बुक्स नामक एक अन्य सज्जन आये और यही मकान किराये पर लेकर रहने लगे। उनसे किसी ने कुछ कहा भी नहीं। उन्हें या उनके परिवार को कभी इस बात की कल्पना भी नहीं थी, उनका अपना कोई विश्वास भी नहीं था। किन्तु एक रात की बात है कि कोई आहट पाकर उनकी कन्या जग गई और नेत्र खोलते ही जो भयंकरता, उसने देखी सो आंखें खुली की खुली रह गईं। अच्छी स्वस्थ सुन्दर कन्या की आंखों ने झपकना बन्द कर दिया और कोई भी चिकित्सक उसे ठीक नहीं कर सका। उस आकृति का जो भी दृश्य इस कन्या ने बताया वह पहले दो किरायेदारों के विवरण से सौ-फीसदी मिलता-जुलता था।
इसके बाद एक दिन श्रीमान कुक के साथ भी ठीक वैसी ही घटना घटित हुई। श्री कुक उसे देखकर न केवल चीख उठे वरन् रोने भी लगे। उन्होंने उसे बिस्तर उठा कर फेंकते हुये देखा। एक दिन उन्होंने पूरी केतली चाय बनाकर रखी थी। किसी काम से वे थोड़ा बाहर निकल कर आये दुबारा जब फिर चाय पीने के लिये आये तो यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि वही आंखों वाला वीभत्स छाया पुरुष केतली में ही मुंह लगाये चाय पी रहा है। कहीं एक बूंद चाय गिरी नहीं फिर चाय का इस प्रकार देखते-देखते वायुभूत हो जाना एक बहुत रोमांचक घटना थी। उन्होंने कई बार उसे सेवकों की तरह काम करते भी देखा और कई बार स्वयं बाहर खुला हुआ रखा सामान उठाकर खाते हुये भी देखा। श्री कुक ने भी अन्ततः सपरिवार मकान छोड़ दिया पर चलते-चलते उसकी रिपोर्ट भी पुलिस हैड-क्वार्टर में लिखा गये ताकि पीछे और कोई उसमें आकर तंग न हो।
पुलिस ने जांच का निश्चय किया। एक पुलिस कांस्टेबल जांच के लिये भेजा गया। सिपाही ने घूम-घूम कर पूरा बंगला देखा पर वहां उसे न कोई आकृति दिखी न छाया। सिपाही ने कुक को कई बार कोसा और कहा—लोगों को पुलिस को तंग करते मजा सा आता है। उसने मकान में ताला बन्द किया और थाने लौटकर पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट को बताया वहां कुछ भी तो नहीं है दूसरे दिन ऑफिसर ने उसी सिपाही को फिर भेजा इस बार सिपाही ताला खोलकर घर में प्रविष्ट हुआ तो उसने जो कुछ देखा उससे उसके रोंगटे खड़े हो गये। कमरों का सारा सामान अस्त-व्यस्त पटका पड़ा था। करीने से लगी कुर्सी मेजें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। रसोई घर में उसे केतली में चाय मिली जिसे देखने से लगता था किसी ने उसे अभी हाल चाय बनाकर पी है। मकान में चारों तरफ ताला बन्दी थी। कोई आने जाने का रास्ता नहीं फिर अन्दर कौन आया किसने चाय बनाई। अभी वह इन्हीं विचारों में खोया पीछे को मुड़ा ही था कि ठीक वही आकृति उसके सामने खड़ी थी। पुलिस कांस्टेबल के शरीर से पसीना फूट पड़ा। बड़ी मुश्किल से बेचारे ने भाग कर दरवाजे बन्द किये, ताला लगाया और थाने लौट आया। थाने में सही घटना लिखा कर घर लौटा तो डर के मारे उसे बुखार ही आ गया और वह पन्द्रह दिन बाद ठीक हुआ। इसके बाद सीनियर पुलिस अफसरों तथा सी.आई.डी. कर्मचारियों ने भी छान-बीन की। कई ने तो वह आकृति ज्यों की त्यों देखी भी। पर जिन्होंने उसे देखा भी नहीं उन्होंने भी मकान का सामान कई बार अदल-बदल कर रखकर जांच की बाहर पहरा होने के बावजूद सामान किस प्रकार तीतर-बितर हो जाता है यह रहस्य कोई भी सुलझा नहीं सका। मनो-वैज्ञानिक तथा पत्रकारों ने भी न्यू कैसल में रह रहे माइकेल कुक से बातचीत की तथा मौके पर जाकर जांच भी की। सारे तथ्य सही पाये और सबने एक स्वर से यह माना कि कोई ऐसी सत्ता सचमुच है जो नितान्त स्थूल न होकर भी समर्थ मनुष्य जैसे काम कर सकने में सक्षम है। यदि यह सत्य है तो आत्मा के अस्तित्व की, मानवेत्तर जीवन, परलोक और पुनर्जन्म की भारतीय मान्यतायें निराधार नहीं कही जानी चाहिये वरन् उस मान्यता के महत्वपूर्ण पहलुओं का वैज्ञानिक और मनो-वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिये। जब तक विज्ञान इस तरह के रहस्यों का उत्तर नहीं देता तब तक अतीन्द्रिय अस्तित्व से इनकार करने का कोई कारण नहीं होना चाहिये।
कहते हैं इस मकान में पहले एक वृद्धा रहती थी। जो घर के अन्दर किसी से जोर-जोर से बात-चीत किया करती थी। कभी-कभी उसका स्वर इतना रोबीला और आदेश पूर्ण होता था मानो वह अपने किसी नौकर से काम करा रही हो। इतना होने पर भी उस व्यक्ति को किसी ने कभी देखा नहीं। कभी किसी ने वृद्धा से पूछा—अजी आप किससे बातें किया करती हैं? तो वह हंसकर इतना ही उत्तर देती—बेटा! जिससे मैं बात कर सकती हूं तुम्हें तो उसको देखने की हिम्मत भी नहीं हो सकती। वृद्धा के आत्म-बल पर लोग आश्चर्य करते और कहा करते कि जिसके कारण दूसरे लोग मकान में रह भी नहीं पाते उसे बुढ़िया कैसे नाच नचाती है वह इन दिनों बीमारी के कारण अस्पताल में भी थी तब अन्य किराये दार आये और यह बात असली रूप में सामने आई। घटना सामने आ जाने पर भी अव्यक्त सी है और उसके गर्भ में सैकड़ों यथार्थ सिद्धान्त छिपे हुये हैं जिन्हें जाने समझे बिना मनुष्य जीवन की यथार्थता को समझ पाना कठिन है।
ह्वाइट हाउस में मरणोत्तर जीवन
टेलिविजन सेट आन (चालू) हुआ और राष्ट्रपति ट्रूमैन अपनी पुत्री मार्गरेट से बातचीत करने लगे—अनुमान से सर्वथा भिन्न दिशा का सन्दर्भ—ट्रूमैन कहने लगे—एक दिन रात के लगभग तीन बज रहे थे जिस कमरे में हम सो रहे थे किसी ने दस्तक दी। बिस्तर से उठकर द्वार खोले तो जो दृश्य दिखाई दिया उससे तो मैं विस्मित और अवाक् ही रह गया। मैंने देखा—भूतपूर्व राष्ट्रपति लिंकन का भूत सामने टहल रहा है। आगे बढ़ने का साहस नहीं हुआ द्वार बन्द किये और बिस्तर पर आ लेटा।’’
घटना उनके राष्ट्रपति काल की ही है और है भी ह्वाइट हाउस की ही। प्रायः सभी अमरीकी राष्ट्रपति अपनी सम्वेदनशीलता, परिश्रम शीलता, साहस और उद्यमशीलता के लिये सदैव सारे संसार के आकर्षण बिन्दु रहे हैं हजारों लोगों ने उनसे अपनी-अपनी तरह की प्रेरणायें ग्रहण की हैं पर बहुत कम लोग होंगे जो 18 एकड़ में बने इस भव्य प्रासाद, ‘ह्वाइट हाउस’ जिसमें अमरीका का हर राष्ट्रपति निवास करता है, के सम्बन्ध में कुछ ऐसे कथ्य व तथ्यों से परिचित होंगे जो मनुष्य की चिन्तन की दिशाओं को बलात् एक अन्तरंग मरणोत्तर जीवन की ओर खींच ले जाते हैं। यह भी एक विलक्षण बात है कि सारे अमरीका में ह्वाइट हाउस को मरणोत्तर अस्तित्व का प्रमाण माना जाता है जबकि वहां की सभ्यता से प्रभावित अन्य देशों में लोगों का विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात् जीवन का कुछ भी अस्तित्व शेष नहीं रहता है।
मन में दुर्बलता न आये, भय पैदा न हो इस दृष्टि से भूत-प्रेत का चिन्तन न करें यह किसी हद तक ठीक भी है किन्तु अधिकतम सौ वर्ष के जीवन के भौतिक सुख चिन्तन में पड़कर करोड़ों अरबों वर्षों से भी अधिक शाश्वत एवं अनन्त अन्तरंग जीवन की अपेक्षा आत्मा के लिये कभी भी हितकारक नहीं कहीं जा सकती? भूत है तो क्यों? उसका स्वरूप क्या है? यदि ह्वाइट हाउस के ऐसे प्रभावशाली और विशिष्ट व्यक्ति मानते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है तो यह जानना ही चाहिये कि वह क्यों बना रहता है और क्या उस स्थिति में भी आत्मा सुख-शान्ति की अनुभूति कर पाती होगी जो कि मनुष्य जीवन का यथार्थ लक्ष्य है।
ह्वाइट हाउस की यह घटनायें दिलचस्प ही नहीं गम्भीर भी हैं एक बार हालैण्ड की महारानी विल्हेल्मिना ने अमेरिका का भ्रमण किया तब वे विशिष्ट सम्मानित अतिथि के रूप में ह्वाइट हाउस में ही ठहराई गईं। एक दिन उनके कमरे के दरवाजे को किसी ने खटखटाया। उन्होंने दरवाजा खोला तो देखा सामने काली छाया के समान अब्राहम लिंकन का भूत खड़ा है। अब्राहम लिंकन की हत्या की गई थी। वे महान् व्यक्ति थे जब वे राष्ट्रपति थे तब भोग विलास और ऐश्वर्य की उन्हें कोई कमी क्यों रही होगी। फिर उनका भूत क्यों? भारतीय दर्शन के अनुसार उनमें आसक्ति का भाव रहा होगा उसी से उनकी आत्मा ह्वाइट हाउस को छोड़ना नहीं चाहती होगी। ठीक इसी समय भौतिक विज्ञान की इस मान्यता का भी खण्डन हो जाता है कि जीवन की चेतना रासायनिक है। यदि जीवन विद्युत, चुम्बक आदि के समान कोई स्थूल और रासायनिक चेतना होती है तो लिंकन की मृत्यु के बाद उनका अस्तित्व क्यों बना रहता?
राष्ट्रपति क्वीवलैण्ड की पत्नी ने राष्ट्रपति भवन में एक बच्चे को जन्म दिया था। बच्चा कुछ ही दिन में चल बसा था। उस बच्चे से सम्भवतः उनका मोह मृत्यु के बाद भी नहीं छूटा था इसी कारण उनकी आत्मा भी ह्वाइट हाउस में लिंकन की तरह ही भटकती है। उनकी विचित्र प्रकार की चीख कई बार सुनी गई। राष्ट्रपति निक्सन की पत्नी के मन में एक बार ऐसा हुआ कि गुलाब के बगीचे का स्थान बदल दिया जाय तो उससे राष्ट्रपति भवन की सुन्दरता और भी बढ़ जायेगी। एतदर्थ उन्होंने माली को बुलाकर कहा इस बगीचे का स्थान बदल दो। गुलाब का यह बाग राष्ट्रपति मैडीसन की धर्म-पत्नी ने लगवाया था। व्हाइट हाउस में किसी परिवर्तन या नई व्यवस्था का अधिकार राष्ट्रपति की पत्नी को ही होता है। जब माली बगीचे के पास आया तो वह वहां खड़े हुए श्रीमती मैडीसन के भूत को देखकर घबरा उठा। लौटकर उसने सारी बात श्रीमती विल्सन से कहीं। विल्सन भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करती थीं पर उन्होंने स्वीकार किया जब मैं बगीचे के पास स्वयं गई तो श्रीमती मैडीसन का भूत वहां था, मुझे ऐसा लगा कि वह कह रही हैं कि यदि यह बगीचा बदला तो भला न होगा डरकर श्रीमती विल्सन ने अपनी सारी योजना रद्द कर दी।
वहां के सभी लोग यह मानते हैं कि कुछ एक राष्ट्रपतियों को छोड़कर प्रायः सभी की रूहें अब भी वहां विद्यमान हैं और यही कारण है कि जब भी कोई नया राष्ट्रपति चुनकर आता है और परम्परा के अनुसार निवर्तमान राष्ट्रपति की पत्नी उसकी पत्नी को राष्ट्रपति भवन (ह्वाइट हाउस) का परिचय कराती हैं, तब वह भूतों के अस्तित्व और स्थानों की भी पूरी जानकारी अवश्य दे देती है।
फिर भी ऐसी घटनायें वहां आये दिन होती ही रहती हैं। राष्ट्रपति एडम्स की पत्नी को वहां कपड़े सुखाते देखा गया, लिंकन को जूतों के फीते खोलते देखा गया। क्वीवलैण्ड की श्रीमती को हंसते और चिल्लाते सुना गया। इस अतीन्द्रिय अस्तित्व और अनुभूति का कारण क्या हो सकता है, यह शोध व अध्ययन का लम्बा विषय है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मनुष्य का मृत्यु के बाद भी अस्तित्व बना रहता है। भारतीय दर्शन की इस मान्यता को निराधार कहने वालों को पहले अमरीकी राष्ट्रपतियों, उनकी पत्नियों और सहकर्मियों को अन उत्तरदायी और झूठा कहना होगा। पर यदि उनकी विशिष्टता पर विश्वास हो तो हमें भारतीय दर्शन के इन आधारभूत तथ्यों पर भी विश्वास करना और अपने जीवन को आध्यात्मिक पद्धति से ढालने का अभ्यास करना ही होगा।
भूत बड़े बड़ों ने देखा
टेलीफोन की घंटी बजी, वकील साहब ने उसे उठाकर कान से लगाया और कहा—हलो! हलो!! कौन बोल रहा है? पर उधर से कुछ आवाज न आई चोगा नीचे रख दिया। लेकिन अभी वे उठने को ही थे कि घंटी फिर टनटनाई फिर रिसीवर उठाकर कान से लगाया तो कोई भद्दी गाली बकने लगा। कई दिन तक ऐसे ही कभी गालियां, कभी धोखा खाने के बाद भी उन्हें पता न चला पाया कौन तंग कर रहा है?
फिर—स्विच दबाया नहीं ट्यूब लाइट तेजी से चमकने लगा। बल्ब जला और फटाक से फूट पड़ा। कमरे में उनके अतिरिक्त एक चिड़िया भी नहीं तो भी यह ऊधम मच रहा है। वकील साहब बड़े तंग हुए अन्त में हारकर बिजली विभाग को लिखा—कहीं कोई बिजली की गड़बड़ी है उसे ठीक किया जाये। बिजली विभाग के इंजीनियर तक आये, सारे सर्किट को ओवर हालिंग कर गये पर न तो कोई गड़बड़ी मिली और न बन्द ही हुआ ऊधम। ऐडवोकेट साहब का बुरा हाल था।
यह प्रसंग कोई कथा नहीं वरन् एक सत्य घटना है जो रोजेनहीम के एक वकील के साथ जून 1968 में घटी। इस समाचार का विवरण नवनीत (हिन्दी डाइजेस्ट) में भी छपा है। लगभग 8-9 महीने की लगातार जांच के बाद बिजली विशेषज्ञों ने जवाब दे दिया और स्थिति नियन्त्रण में नहीं आई। इसके बाद परा मनोविज्ञान वेत्ता प्रो. हांस बेन्डर, जो कि ‘‘फ्रीवर्ग इन्स्टीट्यूट ऑफ पैरासाइकोलाजी’’ के अध्यक्ष हैं, ने इन परिस्थितियों की जांच की और बताया कि—सब कुछ देखने के बाद मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि यह मामला मनोगति क्रम (साइको काइनेसिस) का है। मनोगति क्रम का अर्थ ही है कि सूक्ष्म मानसिक शक्तियां हैं जो भौतिक पदार्थों पर नियन्त्रण और हस्तक्षेप कर सकती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि मानसिक अवस्था किसी भूत प्रेत के रूप में स्थित रह सकती है।
ब्राजील के अति प्रतिष्ठित दैनिक पत्र ‘‘ओ क्रूजीरो’’ के प्रतिनिधियों ने आंखों देखा और जांचा हुआ समाचार छापा था कि साओपाअलो राज्य के इटापिका नगर के एक किसान ‘सिडकान्टो’ के घर पर न जाने कहां से पत्थर बरसते थे और घर में रहने वालों को घायल करते थे। भूत उपचारकों से लेकर अन्य सभी प्रकार के उपाय जब इसकी रोकथाम में असफल हो गये तो पुलिस को सूचना दी गई। वे लोग भी रहस्य पर से पर्दा न उठा सके तो विषय सर्वसाधारण की चर्चा का बन गया और ब्राजील ही नहीं योरोप के अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी तथ्य का हर दृष्टि से पता लगाने के लिए पहुंचे, पर न तो घटना क्रम को झुठलाया जा सका और न उसका रहस्योद्घाटन किया जा सका। इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध मनो-विज्ञानी और दार्शनिक सी.ई. एम जोड़ ने बी.बी.सी पर एक परिसम्वाद में भाग लेते हुए कहा था—‘‘मैं भूतों पर विश्वास नहीं करता था, पर एक दिन जब मेरे ऊपर प्रयोगशाला में बैठे-बैठे चारों ओर से साबुन की टिकिया बरसनी आरम्भ हो गईं और खोज करने पर उसका कोई आधार नहीं सूझ पड़ा तो मेरा विश्वास बदल गया और मैं अब भूतों के अस्तित्व को मानता हूं।’’
केम्ब्रिज विश्व-विद्यालय में प्रेतात्माओं सम्बन्धी शोध कार्य करने के लिए एक विशेष विभाग ही खुला हुआ है। अमेरिका की ‘साइकिकल रिसर्च फाउण्डेशन’ द्वारा अनेक वैज्ञानिकों और बुद्धि जीवियों के सहयोग से सुनियोजित शोध कार्य चल रहा है।
प्रेत बाधाओं के स्वरूप को भी वैज्ञानिकों ने समझने का प्रयास किया है। ऐसे स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि किसी घर या स्थान विशेष में आकस्मिक रूप से घंटियां बज उठेंगी, चीजें इधर-उधर बिखरने लगेंगी, पत्थर, धूलिकण आदि बरसने लगेंगे, किवाड़ खिड़कियां स्वयं ही खुलने बन्द होने लगेंगी और ऐसा बिना किसी भी व्यक्ति या यन्त्र की गतिविधि के होगा। ऐसी घटनाएं अब भली-भांति परखी जा चुकी हैं और वैज्ञानिकों द्वारा सत्य पाई गई हैं। इसका अभी तक वैज्ञानिक यही स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर सके हैं कि प्रेत बाधा सम्बन्धी समस्त घटनाएं उस क्षेत्र के आस-पास किसी जीवित देहधारी की ही उपस्थिति में घटित होती हैं। इसका अर्थ है कि उपस्थित व्यक्ति के भीतर प्रविष्ट ‘‘साइकिक फैक्टर’’ या कि उसी व्यक्ति का अवचेतन अपनी आन्तरिक ऊर्जा को वहां प्रक्षिप्त करता है, भले ही वह स्वयं सचेतन रूप में इस क्रिया से अवगत नहीं रहता। पर जीवित व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा के उपयोग से ही ये घटनायें घटित हो पाती हैं यह सिद्धान्त व्यक्ति में निहित असीम सम्भावनाओं तथा अपाप मानसिक ऊर्जा की धारणा की ही पुष्टि करता है। इस मानसिक ऊर्जा को ही मनोबल, आत्मबल आदि कहा गया है।
वस्तुओं तथा व्यक्तियों के सहसा हवा में ऊपर उठ जाने तथा तैरने, व्यक्ति का थोड़े समय के लिए अत्यधिक लम्बा-ऊंचा हो जाने अन्तर्धान होने, आकाश-संचरण आदि की घटनाएं भी वैज्ञानिकों द्वारा नियन्त्रित वातावरण में स्पष्टतः देखी-परखी गई हैं। सर डगलस ने अनेक वैज्ञानिकों के सामने कुर्सी समेत हवा में ऊपर उठ जाने, कई फुट लम्बे हो जाने, मेज आदि को ऊपर उठा देने के अनेक प्रदर्शन किये थे और भी कई प्रयोगकर्ता ऐसे प्रदर्शन कर चुके व कर रहे हैं। इनकी कैसी भी व्याख्या अभी तक वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं।
प्रेतात्मा के अस्तित्व सम्बन्धी जो घटनायें सामने आती हैं उनके अधिक गम्भीर अन्वेषण किये जाने की आवश्यकता है। इन शोधों से मानव तत्व की कितनी ही विशेषताओं पर प्रकाश पड़ेगा और यह जाना जा सकेगा कि मरणोत्तर जीवन में मनुष्य को किन परिस्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है? इस तथ्य का जितना ही रहस्योद्घाटन होगा उतना ही यह स्पष्ट होता जायगा कि जीवन अनन्त है और उसकी सम्भावनाएं असीम हैं। वर्तमान दृश्य जीवन तो उसका एक छोटा-सा अंग मात्र है।
जड़ वस्तुओं के भी प्रेत ?
इस सिलसिले में एक और भी इससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह सामने आई है कि जड़-पदार्थों से बने ऐसे माध्यम जिनके साथ जीवित मनुष्यों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा हो, अपना प्रेत अस्तित्व बना लेते हैं और मूल पदार्थ के नष्ट हो जाने पर भी अपने अस्तित्व का वैसा ही परिचय देते रहते हैं, जैसा कि मरने के बाद मनुष्य अपना परिचय प्रेत रूप में प्रस्तुत करता रहता है।
समुद्री इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है, जिसमें सामने से आते हुए जहाज के साथ सम्भावित टक्कर से बचाने के लिए मल्लाहों ने अपना जहाज तेजी से मोड़ा और उस प्रयास में उनका अपना जहाज उलट कर नष्ट हो गया। यह जहाज जो सामने से आ रहा था और जिसकी टक्कर बचाने के लिए मल्लाह आतुरतापूर्वक प्रयत्न कर रहे थे, यहां यह कौन था, कहां का था—ठीक सामने टकराने जैसी स्थिति में क्यों हो रहा था—उसके चालक उसे बचा क्यों नहीं रहे थे—वह पीछे वहां से कहां चला गया? आदि प्रश्नों के उत्तर सन्तोषजनक नहीं मिले और यह मान लिया गया कि सम्भवतः वह मल्लाहों की आंखों का भ्रम था, वस्तुतः उस प्रकार के जहाज का अस्तित्व सिद्ध नहीं हुआ।
जांच कमेटियों की रिपोर्ट में डूबने वाले और न डूबने वाले जहाजों तथा मल्लाहों की ऐसी अनेकों गवाहियां हैं जिन्होंने समुद्र की सतह पर ऐसे जहाज देखे जिनका अस्तित्व प्रमाणित नहीं किया जा सका। रिपोर्टों में उसे भ्रम बता कर जांच पर पर्दा डाल दिया, पर उन मल्लाहों और यात्रियों का समाधान न हो सका, जिनने अपनी आंखों से सब कुछ देखा था। भ्रम तो एक दो को हो सकता था, सारे मल्लाह और परियात्री एक ही तरह का दृश्य देखें यह कैसे हो सकता है। रिपोर्ट अपनी जगह कायम रही और दर्शकों की मान्यतायें अपनी जगह। पीछे यह अनुमान लगाया गया कि डूबे हुए जहाजों के प्रेत अपने जीवनकाल की आवृति में समुद्र तल पर भ्रमण करते रहते हैं। यह उनका सूक्ष्म शरीर होता है, जिसमें सघन ठोस तत्व तो नहीं होते पर छाया आकृति ठीक वैसी ही होती है जैसी कि उनके जीवित काल में थी। डूबे हुए जलयानों के प्रेत होते हैं, यह अनुमान आरम्भ में उपहासास्पद ही माना गया था पीछे उनके प्रमाण इतने ज्यादा मिलते गये कि उस मान्यता को एक विचारणीय शोध विषय माना गया। अभी भी मृत जलयानों का प्रेत रूप में जीवित रहना किसी प्रामाणिक कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं हुआ है। इसलिए उस मान्यता को भ्रम स्तर पर ही रखा गया है। फिर भी शोधकर्त्ताओं को स्वयं इस निष्कर्ष से सन्तोष नहीं हुआ है। वे यह कहते रहते हैं कि उपलब्ध प्रमाण साधन अपर्याप्त हो सकते हैं और भविष्य में कई ऐसे उपकरण या सिद्धान्त निकल सकते हैं जो इन बहुचर्चित प्रेतों के सम्बन्ध में कुछ अधिक सन्तोषजनक तथ्य प्रस्तुत कर सकें।
निर्जीव पदार्थों के भी प्रेत होते हैं, इस संदर्भ में समुद्री इतिहास के बाद स्थल-इतिहास की भी एक कड़ी आकर और भी जुड़ जाती है। रेल दुर्घटनाओं में ड्राइवरों के अनेकों बयान ऐसे हैं जिनमें उनने सामने से धड़धड़ाती हुई एक रेल आती देखी और उसकी टक्कर बचाने का प्रयास करते हुए कड़ा ब्रेक लगाने में उनका इंजन उलट गया; अथवा वे हतप्रभ होकर अपना संचालन-सन्तुलन खो बैठे। सामने से रेल क्या थी, कहां से आई थी, इसका कोई प्रमाण न मिला तो इसे ड्राइवरों की मनगढ़न्त कहानी अथवा मनोविकृति भर कहकर उपेक्षित कर दिया गया। पर ऐसे घटनाक्रम अनेकों थे। जिनमें टक्कर से दुर्घटना अथवा बचाव के लिए किये गये खतरनाक प्रयासों का पता चलता था। प्रमाणहीन बात को माना कैसे जाय और इतने लोग अकारण भ्रम फैलाते हैं, यह भी कैसे गले उतारा जाय? अन्ततः अनुमानों की शृंखला इस तरह भी जुड़ी कि जिस तरह डूबे हुए जलयानों के प्रेत समुद्र की सतह पर घूमते पाये जाते हैं, उसी प्रकार दुर्घटना में ग्रसित रेलों के भी प्रेत हो सकते हैं और उनके दृश्य देखकर सामान्य बुद्धि का ड्राइवर उन्हें एक यथार्थता मान सकता है।
‘पदार्थ’ का प्रेत ‘प्रति पदार्थ’ विश्व का प्रेत ‘प्रतिविश्व’ छाया पुरुष की तरह साथ-साथ विद्यमान रहता है उनकी चर्चा विज्ञान जगत में इन दिनों प्रमुख चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का प्रेत होता है, यह भी जाना और माना जाता रहा है। अब यह नया तथ्य सामने आया है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के—महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प-सत्ताओं के भी प्रेत हो सकते हैं। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म का अस्तित्व बना रहता है। इस सूक्ष्म का गहन अन्वेषण हो सके तो हमारे ज्ञान-विज्ञान में एक नई किन्तु अति महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ सकती है।

