भूत से डरें नहीं वह तो बस भूत है
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काल के अनन्त प्रवाह में बह रही जीवनधारा का प्रेतयोनि एक नया मोड़ मात्र है। हमारे सीमित बोध जगत के लिए भले ही वह जीवनधारा खो गई प्रतीत होती हो, पर वह सर्वदा अविच्छिन्न रहती है और हमारा संस्कार-क्षेत्र मरणोत्तर जीवन में भी सक्रिय रहता है, अन्तःकरण चतुष्टय मृत्यु के उपरान्त भी यथावत् बना रहता है। अशान्त, विक्षुब्ध मनःस्थिति भी अपना स्वभाव उस रूप में ही बनाए रखती है। दुष्ट और दुरात्मा जीवन-क्रम की यह स्वाभाविक परिणति जीवात्मा को जिस अशांत दशा में रहने को बाध्य करती है, उसका ही नाम प्रेत दशा है। अपनी दुर्दशा से सामान्यतः प्रेतों को दुःख ही होता है, पर अत्यन्त कलुषित अनाचारी व्यक्तियों की हिंस्र मनोवृत्तियां प्रेत जीवन पाकर भी अपनी क्रूर आकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहती हैं और लोगों को अनायास सताती रहती हैं। पर अपना आतंक वे उन्हीं पर जमा पाती हैं, जिनका आत्मबल अविकसित हो।
प्यार का अभाव, असुरक्षा की आशंका, मूर्खतापूर्ण कठोरता से भरा नियन्त्रण, आत्यन्तिक चिन्ता, कुसंग से उत्पन्न विकृतियां व्यक्ति के विकासक्रम को जब बालकपन से ही तोड़ मरोड़ देती हैं, तो आत्मबल का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। ऐसी विघटित मनःस्थिति ही प्रेतात्माओं को अपना उपयुक्त क्रीड़ा-क्षेत्र लगा करती है। प्रेतात्माएं उसे अपना क्रीड़ा-क्षेत्र न भी बनाएं तो क्या, मनोविकृतियों का झुण्ड एकत्र होकर मानसिक रोगों का रूप ले लेता है या अन्य प्रकार से उन्मत्त आचरण के लिए प्रेरित व बाध्य करता है। उत्कृष्ट लक्ष्यों के लिए साहस, उल्लास और स्फूर्ति से भरपूर मनःस्थिति जहां मनुष्य की सामर्थ्य को अधिकाधिक विकसित एवं ऊर्ध्वगामी बनाते हुए उसे महामानवों-देवमानवों की कोटि में पहुंचा देती है, वही दुर्बल दूषित मनःस्थिति जीवन भर हताशा, आक्रोश और आत्मग्लानि के नरक में तो जलाती ही है, मरणोत्तर जीवन में भी अन्तश्चेतना की अविच्छिन्नता के कारण उसी स्तर की गतिविधियों का क्रम चलते रहने से प्राणी को क्षण भर भी चैन नहीं लेने देतीं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं ये अशान्त आत्माएं या मनोदशाएं उन्हीं लोगों पर अपना त्रासपूर्ण प्रभाव डाल सकने में समर्थ हो पाती हैं, जिनकी स्वयं की मनःस्थिति दुर्बल विश्रृंखल हो। सर्वप्रथम तो, भूत-बाधा के यथार्थ होते हुए भी यह तथ्य निरन्तर स्मरणीय है कि भूत-बाधाओं के किस्से कहानियों में लगभग तीन चौथाई तो निस्सार गप्पे होती हैं। शेष एक चौथाई में भी अधिकांश भ्रांति और अज्ञानता के आवरण में लिपटी होती है अंधविश्वासी शंकालु, लोग वास्तविक शारीरिक-मानसिक रोगों को भी भूत-बाधा मान बैठते हैं और उचित उपचार न कराकर इधर-उधर भटकते रहते हैं तथा सब कुछ गंवा बैठते हैं।
शंका डायन मनसा भूत संशय को स्वीकार कर लेने पर मस्तिष्क का पहिया उन्हीं आशंकाओं के समर्थन में चलने लगता है और चित्र विचित्र कल्पनाएं अवास्तविक को भी तथ्य जैसा मानने लगती हैं।
शंका डायन—मनसा भूत की उक्ति अक्षरशः सत्य है। किसी और निर्दोष महिला पर अपनी कुशंकाओं का आरोपण करके उसे डाकिन, चुड़ैल, जादूगरनी आदि के रूप में भयानक देखा जा सकता है। डायनों का अस्तित्व पूर्णतया संदिग्ध है, किन्तु कुशंकाओं के खेत में असंख्यों एक से एक भयानक डाकिनों का उत्पादन निरन्तर होता रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि यह मनगढ़न्त डाकिनें हानि उतनी ही पहुंचा देती हैं जितनी कि कोई वास्तविक डायन रही होती और उसने पूरे जोर-शोर से आक्रमण किया होता। ‘‘मनसा भूत’’ की उक्ति में संकेत है कि मन से भूत उत्पन्न होते हैं। पीपल के पेड़ पर, मरघट में, खण्डहरों में भूत-पलीतों के किले बने होने और वहां से उनके तीर चलते रहने की मान्यता असंख्यों अन्धविश्वासियों के मनों में जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। सभी जानते हैं कि जड़ों में दौड़ने वाला रस पत्र, पल्लव, पुष्प, फल आदि के रूप में विकसित होता रहता है। आशंकाजन्य भयभीरुता की जड़ें यदि अचेतन मन में घुस पड़ें तो उतने भर से भूतों की अपनी अनोखी दुनिया बन पड़ेगी और उस सेना के आक्रमण की अनुभूति घिग्घी बंधा देने वाला त्रास देती रहेगी। यह स्वनिर्मित भूत भी उतने ही डरावने और हानिकारक होते हैं जितने कि यदि वास्तविक भूत कहीं रहे होते और उनके द्वारा आक्रमण किये जाने पर कष्ट सहना पड़ता।
हिस्टेरिया का एक प्रकार है, ‘सामयिक उन्माद’ इसे भूत, पलीत या देवी देवताओं के आवेश के रूप में देखा जा सकता है। शिक्षितों में यह आवेश दूसरी कई तरह की सामयिक उमंगों के रूप में आता है और वे अपने आपको क्रोध आदि आवेशों से ग्रसित पाते हैं। कई बार तो ऐसी स्थिति अपने लिए तथा सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के लिए घातक बन जाती हैं। आवेश ग्रस्त स्थिति के साथ रोगी जब भूत-प्रेतों के या देवी देवताओं के आक्रमण के साथ संगति बिठा लेता है तब वह प्रवाह उसी दिशा में बहने लगता है और ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं जिनमें ऐसा प्रतीत होता है मानो सचमुच ही कोई भूत बेताल उन पर चढ़ दौड़ा हो।
‘ऐक्जाइटी न्यूरोसिस’ एवं हिस्टरिक न्यूरोसिस को हिस्टीरिया तो नहीं कहा जा सकता पर उसकी ‘सहेली’ या ‘छाया’ कहने में हर्ज नहीं है। कोई कल्पना जब मस्तिष्क पर असाधारण रूप से हावी हो जाती है तो उसे अनुभूतियां भी उसी प्रकार की होने लगती हैं। भूत-प्रेतों के आवेश प्रायः इसी स्थिति में आते हैं। मस्तिष्क में असंतुलन का दौरा पड़ता है रोगी के मस्तिष्क का एक बहुत छोटा अंश यह अनुमान लगाने की चेष्टा करता है कि इस आकस्मिक हलचल का कारण क्या हो सकता है। उसे दूसरे लोगों पर भूतों का आवेश आने की जानकारी देखने या सुनने से पहले ही मिल चुकी होती है। अस्तु क्षण भर में अपनी स्थिति उसी प्रकार की मान लेने का विश्वास जम जाता है। बस, इतनी भर मान्यता शरीर के हिलने, झूमने, गरदन डुलाने, लम्बी सांसें, उत्तेजना आदि भूतोन्माद के लक्षण प्रस्तुत कर देती है।
इसी श्रेणी में देवी-देवताओं के आवेशों की गणना की जा सकती है। भूतोन्माद अधिक अविकसित, अशिक्षित और असंस्कृत लोगों को आते हैं उनमें भय आक्रोश का बाहुल्य रहता है और हरकतों में तथा वचनों में निम्न स्तर की स्थिति टपकती है। जब कि देवोन्माद में अपेक्षाकृत सज्जनता एवं शिष्टता की मात्रा अधिक रहती है। आवेश एवं वार्तालाप भी ऐसा ही होता है मानो कोई देव स्तर का व्यक्ति कर रहा हो। जिन लोगों ने देवी देवताओं की चर्चा अधिक सुनी है, स्वयं उस पर विश्वास करते हैं उनका मस्तिष्क आवेश की स्थिति में अपनी कल्पना, साथ ही हरकतें भी उसी स्तर की बना लेता है। वस्तुतः इन आवेशों में देव स्तर सिद्ध करने वाली कोई प्रामाणिकता नहीं होती। स्तर के अनुरूप इनका वर्गीकरण भूतोन्माद या देवोन्माद के रूप में किया जा सकता है, पर उनके बीच कोई बड़ा भेद नहीं होता।
आयुर्वेद ग्रन्थों में भूतोन्माद की कितनी ही शाखा प्रशाखाओं का वर्णन है। उसे रोग की संज्ञा दी गई है और उपचार विधि बताई गई है। वस्तुतः उसे उन्माद का यदाकदा आने वाला दौरा ही कह सकते हैं। आवेश गहरा हो तो रोगी के अवयव ही उत्तेजित होते हैं और वह उन्मत्तों जैसी हरकतें करता है किन्तु यदि दौरा हलका हो तो एक प्रकार से नशे जैसी स्थिति बन जाती है। भूत का व्यक्तित्व अपने ऊपर थोप कर वह ऐसी ही बातें करता है, मानो वह सचमुच ही भूत की स्थिति में पहुंच गया हो। भूत को जो कहना चाहिए सो ही वह कह रहा हो। यह कथन क्रम बद्ध तो होता है, उसकी संगति बैठती है पर होता सर्वथा काल्पनिक है। भोले लोग उसे तथ्य मान बैठते हैं और उन्माद की स्थिति में जो कहा गया था उसी पर विश्वास करके वैसा ही करने या मानने लगते हैं।
कई मनुष्यों को ऐसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं मानो किसी ने उनसे कुछ बात जोर देकर कही है। लगता है उन्होंने वैसा सुना है। किसी किसी को ऐसा लगता है कोई भीतर से बोल रहा है। पेट में बैठकर या सिर पर चढ़ कर कुछ बता रहा है। इस बीमारी को ‘हैवीफ्रेनिक शिजोफ्रेनिया’ कहते हैं। भूत पलीतों के देवी-देवताओं के सन्देश, आह्वान, आदेश प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। प्रेमी और प्रेमिकाओं को इसी प्रकार की अनुभूतियां होती हैं मानो उनका प्रिय पात्र सामने खड़ा कुछ इशारे कर रहा है या कह रहा है। जिनके प्रियजन जल्दी ही मरे हैं, उनका वियोग निरन्तर छाया रहता उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा निकट आकर कुछ करती कहती दिखाई पड़ती है। भक्त लोगों को उनके इष्ट देव भी ऐसे ही कौतूहलवर्धक परिचय देते हैं।
मानसिक अस्त-व्यस्तता को दो भागों में विभाजित किया जाता है (1) न्यूरोसिस (2) साइकोसिस।
न्यूरोसिस वह स्थिति है जिसमें मनुष्य अन्ट-सन्ट सोचता और आंय-बांय बोलता है। बेकार की चिन्ताएं और बेसिर-पैर की कल्पनाएं उसे हैरान करती रहती हैं। चिन्ता में डूबा, आशंकाओं से ग्रसित, भयभीत एवं असंभव चिन्तन के घोड़े दौड़ाते हुए उसे आये दिन देखा जा सकता है। कभी कुछ कभी कुछ खब्त सवार रहता है।
साइकोसिस इससे आगे की और अधिक बिगड़ी हुई स्थिति है। उसमें व्यक्ति पूर्णरूप से तो नहीं पर किसी विशेष समय, परिस्थिति, घटना, वर्ग या व्यक्ति के सम्बन्ध में उसके कुछ ऐसे भले या बुरे आग्रह जम जाते हैं जिनका वास्तविकता के साथ बहुत कम संबंध होता है। उसकी अपनी कल्पना और मान्यता एक अलग से स्वप्न लोक रच लेती है और उन्हीं में वह खोया रहता है।
भूत-बाधाओं के अनेक किस्से वस्तुतः मानसिक रोगियों के बारे में फैली भ्रांति का परिणाम होते हैं। उनका सही सही उपचार करना चाहिए। अन्यथा रोग पीड़ित स्वजनों से असमय ही बिछुड़ना पड़ जाता है और दोष भूतों का लगता है।
भूतबाधाओं के वास्तविक स्वरूप को साधना चाहिए। साथ ही यह तथ्य ही हृदय में भली भांति अंकित कर लेना चाहिए कि वास्तविक भूत बाधाएं भी दुर्बल चित्त लोगों के सामने ही उपस्थित होती हैं।
प्रेतात्माएं हर किसी के सम्पर्क में नहीं आतीं। वे दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को चुनौती देती हैं और उन्हीं को अपना वाहन बनाती हैं। मनस्वी लोग सदा जागरूक रहते हैं। द्विजातीय तत्वों से लड़ने के लिए जिस प्रकार रक्त के श्वेत कण अपनी संघर्ष शीलता का परिचय देते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रतिभा और प्रखरता के धनी अपनी साहसिकता के बल पर प्रेतात्माओं को समीप नहीं आने देते, आती है तो उन्हें धकेल कर दूर फेंक देते हैं। दुर्बल मनोभूमि के, अथवा प्रेतात्माओं में विशेष रुचि लेने वाले ‘भूत भक्तों’ को उनका वाहन बनते देखा गया है। जिनके शिर पर आये दिन भूत झूमते रहते हैं उन्हें अंग्रेजी में ‘मीडियम’ कहा जाता है। साधारणतया उन्हें प्रेत वाहन नाम दिया जाय तो अनुपयुक्त न होगा।
प्रेतात्मा प्रमाणित व्यक्ति के भीतर से एक सूक्ष्म पदार्थ-प्रवाह निकलता है, जिसे ‘टेलीप्लाज्म’ नाम दिया गया है। यह ‘टेलीप्लाज्म’ व्यक्ति-चित्त में विद्यमान उस अतीत के व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष (जिसे प्रेत कहते हैं) की छवि के सम्वेदनात्मक प्रतिबिम्बों के अनुरूप आकार ग्रहण कर लेता है। यह माध्यम-व्यक्ति के शरीर से स्वयं को पृथक कर सकता है और इस प्रकार प्रेत की प्रतिच्छाया या छवि स्पष्ट दिखाई दे सकती है।
डा. सी.डी ब्रोड समेत अनेक वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिकों ने ‘मीडियम’ (प्रेत प्रभावित व्यक्ति) के बारे में एक अन्य सिद्धान्त प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि मस्तिष्क की संरचना जटिल है। वह शरीर के सम्मिलित संयोग का उत्पादन है, जिनमें एक अभौतिक तत्व भी सम्मिलित है, जिसे वे ‘साइकिक फैक्टर’ कहते हैं। जब व्यक्ति मरता है, तो उसका शरीर रूपी यह संयोग बिखर कर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार उस शरीर में अवस्थित मस्तिष्क का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है। किन्तु ‘साइकिक फैक्टर’ कोई भौतिक द्रव्य (मैटर) नहीं है, अतः वह विनष्ट नहीं हो सकता। यह अवशिष्ट ‘साइकिक फैक्टर’ इधर-उधर भ्रमण करता रहता है। फिर ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क को पाते ही वह प्रविष्ट हो जाता है जो इन परिव्राजक ‘साइकिक फैक्टर्स’ के प्रति तरण-शील हो। ऐसा ही व्यक्ति ‘मीडियम’ प्रेत वाहन बना करते हैं। ‘साइकिक फैक्टर’ कोई व्यक्ति तो होते नहीं, वे पूरे मस्तिष्क के भी प्रतिनिधि नहीं होते। अपितु मस्तिष्क का पदार्थ से परे अंश विशेष होते हैं। अतः ‘साइकिक फैक्टर’ एक पूर्ण मस्तिष्क की तरह काम नहीं कर सकते।
प्रेतात्मा के नाम पर घटित होने वाली अगणित घटनाओं में से प्रायः आधी ऐसी होती हैं, जिन्हें आवेशग्रस्त मस्तिष्कीय रोग की संज्ञा दी जा सकती है। उन्माद के—स्नायु, दुर्बलता के, भीरुताजन्य, आत्म-हीनता के दबे असन्तोष की प्रतिक्रिया के कितने ही कारण ऐसे होते हैं जिनसे मनुष्यों की मानसिक स्थिति गड़बड़ा जाती है। उस स्थिति में शरीरगत और मनोगत तनाव बढ़ता है। वह एक प्रकार के कम्पन, रोमांच, ज्वर एवं आवेश जैसा होता है। ऐसा विचित्र रोग पहले अनुभव में नहीं आया था। अस्तु उसकी सीधी तुक प्रेत आक्रमण से लगा ली जाती है। रोगी के मन में यही मान्यता दृढ़ होती है और दर्शकों, सम्बन्धियों में से अधिकांश प्रेत उपचार के सरंजाम इकट्ठे करके रोगी की भ्रम ग्रस्तता को पूरी तरह परिपुष्ट कर देते हैं। आमतौर से प्रेत आक्रमण इसी स्तर के होते हैं।
संस्कार-जगत में प्रेतात्माओं का आतंक अंकित रहा, तो आवेश-ग्रस्त, रुग्ण व्यक्ति अपनी स्थिति की संगति भूत-प्रेतों, देवी-देवताओं के आक्रमण के साथ बैठाकर उसी प्रवाह में स्वयं को बहाने लगता है। इससे ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं, मानो सचमुच ही कोई भूत बेताल उस व्यक्ति को दबोच बैठा हो। वस्तुतः यह ‘एक्जाइटी न्यूरोसिस’ तथा ‘हिस्टरिक न्यूरीसिस’ की स्थिति होती है। ‘हैवीफ्रेनिया’ की स्थिति भी ऐसी ही रुग्ण मनोदशा का परिणाम है। अपने इष्ट देवों का ‘दर्शन’ करने वाले अनेक भक्त जन भी इसी मनःस्थिति में विभिन्न कौतूहलवर्धक दृश्य देखा करते हैं। जिनके प्रियजन हाल ही में और असमय में मरे हों, उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा निकट आकर बात करती दिखाई पड़ती है। हैं ये सब मानसिक अस्त-व्यस्तता के ही परिणाम। सुचिन्तित सुनियोजित महत्वाकांक्षाएं व्यक्तित्व को ऊर्जस्वी, गतिशील प्रखर और प्रभावी बनाती हैं, तो आकाश-कुसुमवत आकांक्षाओं का अनपेक्षित विस्तार व्यक्तित्व को विभाजित कर देता है। विभाजित व्यक्तित्व मानसिक रोगों का सुरक्षित घर बनता जाता है। व्यक्तित्व का यह विभाजन अनेक बार प्रेतबाधाओं के रूप में भी सामने आता है। जब आकांक्षाएं शक्ति से सर्वथा विलग और विसंगत हो जाती हैं तब वे स्वाभाविक न रहकर अस्वाभाविक हो जाती हैं, उनकी पूर्ति सम्भव न होने से उनका दमन करना पड़ता है। दमित आकांक्षाएं पाप-पिशाच का रूप लेती जाती हैं। वे विकृत और वीभत्स रूप में त्रास एवं दण्ड देती हैं।
भूत बाधाएं दो तरह से व्यक्ति को अपनी चपेट में लेती हैं—इस प्रकार की बाधा में रोगी के सिर पर भूत आता है, वह अनर्गल प्रलाप और असंगत चेष्टाएं करता है। रोग की इस स्थिति में रोगी की सामान्य चेतना विशृंखलित हो जाती हैं और यह विशृंखलित चेतना ही उसके व्यक्तित्व को घेरे रहती है।
दूसरे प्रकार की बाधा में ‘भूत’ रोगी के शरीर में भीतर समा जाता है। वह निरन्तर ‘व्यग्र-त्रस्त’ विक्षिप्त सा रहने लगता है। कभी-कभी अंग-विशेष में पीड़ा भी होती है तथा यह पीड़ा अपना स्थान बदलती रहती है। ऐसे रोगों का शारीरिक कारण ढूंढ़ने पर भी मिल नहीं पाता।
भूत-बाधा-पीड़ित को आकस्मिक रूप से असह्य वेदना का अनुभव होता है, कभी हाथ पैर ठण्डे हो जाते हैं, दांत-बंध जाते हैं, और इस तरह की अन्य शारीरिक प्रतिक्रियाएं स्पष्ट दिखने लगती हैं।
ये सभी प्रभाव मन में बैठी भय और अपराध की ग्रन्थियों के हैं। इसलिए इनकी चिकित्सा किसी भी औषधि द्वारा नहीं हो पाती।
मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में प्रेत बाधा के अधिकांश मामले ‘हिस्टीरिया’ रोग का ही दूसरा नाम होते हैं। ऐसे रोगियों का व्यक्तित्व विभाजित होता है तथा उनके सामान्य व्यक्तित्व के साथ ही उनमें एक विशेष व्यक्तित्व भी समाहित हो जाता है। मनोवैज्ञानिकों का यह भी निष्कर्ष है कि मानसिक विभाजन की स्थिति संक्रामक होती है। इसलिए देखा यह गया है कि जब कोई भूत पीड़ित स्त्री झूमने लगती है तो उसके इर्द-गिर्द बैठी स्त्रियों के झुण्ड में से भी दस-पांच स्त्रियां झूमने लगती हैं।
विभिन्न आकृतियों-प्रकृतियों वाले अनेकानेक मानसिक विक्षोभ वस्तुतः मानसिक असन्तुलन के परिणाम हैं। इसके लिए आवश्यक है परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की सूझबूझ तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को और परिष्कृत दृष्टिकोण द्वारा ही यह सम्भव है।
प्रेत प्रभाव के दो कारणों की चर्चा ऊपर की जा चुकी है, एक मृतात्माओं की उद्विग्न एवं आक्रामक सत्ता। दूसरे मनोरोगों के सन्दर्भ में प्रेत कल्पना की प्रतिक्रिया। इन दो के अतिरिक्त एक तीसरा कारण और भी है किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों की निजी चेतना में ही ऐसे उभार उत्पन्न हो जाते हैं जो भूतों की करतूत जैसे विलक्षण परिचय देने लगते हैं। यह व्यक्तित्व में विशिष्ट ऊर्जा का आकस्मिक उदय होना कहा जा सकता है। वही अपने समीपवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करती है। इससे दर्शकों को लगता है यहां कोई प्रेतात्मा विद्यमान है और अपने अस्तित्व का परिचय देने के लिए उलट-पुलट कर रही है।
इन तथ्यों को समझते हुए अपनी मनोभूमि की परिष्कृत एवं उत्कृष्ट बनाने की आवश्यकता है।
भूत जो सचमुच भी होते हैं वे मात्र अपने अतीत की अनुगूंज होते हैं। अपनी वासना-तृष्णा एवं आकांक्षा की आग से वे स्वयं ही जल रहे होते हैं। वे वस्तुतः अतीत की भूलों का फल भुगत रहे होते हैं और उनसे मुक्त होने के लिए छटपटा रहे होते हैं। अभ्यास, कुतूहल या संस्कारवश वे अपनी गतिविधियों का प्रदर्शन करने को उद्यत होते भी हैं तो उसमें डरने जैसी क्या बात है? वे तो दया के ही पात्र होते हैं और मुक्ति की कामना करते रहते हैं। जो अपने वर्तमान में जी रहा है, ऐसे मनुष्य को किसी के ‘भूत’ से डरना शोभा नहीं देता। वे बस ‘भूत’ ही तो हैं।
अतृप्त आकांक्षाओं का उद्वेग मरने के बाद भी प्राणी को चैन नहीं लेने देता और वह सूक्ष्म शरीरधारी होते हुए भी यह प्रयत्न करता है कि अपने असन्तोष को दूर करने के लिए कोई उपाय, साधन एवं मार्ग प्राप्त करे। सांसारिक कृत्य या उपयोग शरीर द्वारा ही हो सकते हैं। मृत्यु के उपरान्त शरीर रहता नहीं। ऐसी दशा में उस अतृप्त प्राणी की उद्विग्नता उसे कोई शरीर गढ़ने की प्रेरणा करती है। अपने साथ लिपटे हुए सूक्ष्म साधनों से ही वह अपनी कुछ आकृति गढ़ पाता है जो पूर्व जन्म के शरीर से मिलती-जुलती किन्तु अनगढ़ होती है। अनगढ़ इसलिए कि भौतिक पदार्थों का अभीष्ट अनुदान प्राप्त कर लेना, मात्र उसकी अपनी इच्छा पर ही निर्भर नहीं रहता। उसके लिए प्रकृति का सहयोग और ईश्वरीय विधि-व्यवस्था का समर्थन भी चाहिये। तीनों तथ्य मिलने पर ही परिपूर्ण शरीर मिलता है। किन्तु मृतक को एकांकी प्रयत्नों तक ही सीमित रहना पड़ता है, अस्तु वह एक अपनी छोटी सामर्थ्य के अनुसार अनगढ़ शरीर ही रच सकता है। वह इतना ही बन पाता है कि बहुत प्रयत्न करने पर थोड़े समय के लिए दृश्य बन सके और कुछ हरकतें कर सके अन्यथा अदृश्य स्थिति में ही अपना निर्वाह करता रहे।
‘भूत’ अपनी इच्छा पूर्ति के लिए किसी दूसरे के शरीर को भी माध्यम बना सकते हैं। उसके शरीर से अपनी वासनाओं की पूर्ति कर सकते हैं अथवा जो स्वयं करना चाहते थे वह दूसरों के शरीर से करा सकते हैं। कुछ कहने या सुनने की इच्छा हो तो वह भी अपने वशवर्ती व्यक्ति द्वारा किसी कदर पूरी करते देखे गये हैं। इसके लिए उन्हें किसी को ‘माध्यम’ बनाना पड़ता है। हर व्यक्ति माध्यम नहीं बन सकता। उसके लिए दुर्बल मनःस्थिति का—आदेश पालने के लिए उपयुक्त मनोभूमि का व्यक्ति होना चाहिए। प्रेतों के लिए सवारी का काम ऐसे ही लोग दे सकते हैं। मनस्वी लोगों की तीक्ष्ण इच्छा शक्ति उनका आधिपत्य स्वीकार नहीं करती।
भूतों के अस्तित्व से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। वे भी मनुष्यों की तरह ही जीवनयापन करते हैं। मनुष्य धरती पर स्थूल शरीर समेत रहते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से उनकी सामर्थ्य और साधन जीवित मनुष्यों की तुलना में कम होते हैं इसलिए वे डराने के अतिरिक्त और कोई बड़ी हानि नहीं पहुंचा सकते। डर के कारण कई बार घबराहट, चिन्ता, असन्तुलन जैसी कठिनाइयां उत्पन्न हो जाती हैं। भूतोन्माद में यह भीरुता और मानसिक दुर्बलता ही रोग बनकर सामने आती है। वे जिससे कुछ अपेक्षा करते हैं उनसे सम्पर्क बनाते हैं और अपनी अतृप्तिजन्य उद्विग्नता के समाधान में सहायता चाहते हैं। सम्पर्क समय का अनभ्यस्त अजूबापन ही प्रायः डर जाने का मुख्य कारण होता है।
भूत मनुष्य से कम समर्थ और कम साधन-सम्पन्न होते हैं। बशर्ते, मनुष्य ने आत्म-विकास किया हो। दबे, अविकसित, अपरिष्कृत मनुष्य ही भूतों के प्रकोप और आतंक के शिकार बनते हैं। भूत तो अपने ही उन्माद से त्रस्त, आत्म प्रताड़ित प्राणी होते हैं। वे उस त्रास का, आत्म प्रताड़ना का परिचय भर ही दें सकते हैं। उनसे डरकर स्वयं भी भूतोन्माद-ग्रस्त हो जाने वाले व्यक्ति की दयनीय दुर्बलता मनुष्य की गरिमा के अनुरूप नहीं। भूत आत्म-सत्ता की अविनाशिता के प्रमाण भर हैं। उस प्रमाण से मनुष्य को भयभीत होने की भला क्या आवश्यकता? उल्टे, यह प्रमाण तो शक्ति ही देता है। जब जीवन अनन्त है और चेतना अविनाश तो उसका भूत क्या बिगाड़ेगा? उसे तो आत्म-सत्ता की सनातन विद्यमानता का संदेशवाहक भर समझना चाहिए।
प्यार का अभाव, असुरक्षा की आशंका, मूर्खतापूर्ण कठोरता से भरा नियन्त्रण, आत्यन्तिक चिन्ता, कुसंग से उत्पन्न विकृतियां व्यक्ति के विकासक्रम को जब बालकपन से ही तोड़ मरोड़ देती हैं, तो आत्मबल का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। ऐसी विघटित मनःस्थिति ही प्रेतात्माओं को अपना उपयुक्त क्रीड़ा-क्षेत्र लगा करती है। प्रेतात्माएं उसे अपना क्रीड़ा-क्षेत्र न भी बनाएं तो क्या, मनोविकृतियों का झुण्ड एकत्र होकर मानसिक रोगों का रूप ले लेता है या अन्य प्रकार से उन्मत्त आचरण के लिए प्रेरित व बाध्य करता है। उत्कृष्ट लक्ष्यों के लिए साहस, उल्लास और स्फूर्ति से भरपूर मनःस्थिति जहां मनुष्य की सामर्थ्य को अधिकाधिक विकसित एवं ऊर्ध्वगामी बनाते हुए उसे महामानवों-देवमानवों की कोटि में पहुंचा देती है, वही दुर्बल दूषित मनःस्थिति जीवन भर हताशा, आक्रोश और आत्मग्लानि के नरक में तो जलाती ही है, मरणोत्तर जीवन में भी अन्तश्चेतना की अविच्छिन्नता के कारण उसी स्तर की गतिविधियों का क्रम चलते रहने से प्राणी को क्षण भर भी चैन नहीं लेने देतीं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं ये अशान्त आत्माएं या मनोदशाएं उन्हीं लोगों पर अपना त्रासपूर्ण प्रभाव डाल सकने में समर्थ हो पाती हैं, जिनकी स्वयं की मनःस्थिति दुर्बल विश्रृंखल हो। सर्वप्रथम तो, भूत-बाधा के यथार्थ होते हुए भी यह तथ्य निरन्तर स्मरणीय है कि भूत-बाधाओं के किस्से कहानियों में लगभग तीन चौथाई तो निस्सार गप्पे होती हैं। शेष एक चौथाई में भी अधिकांश भ्रांति और अज्ञानता के आवरण में लिपटी होती है अंधविश्वासी शंकालु, लोग वास्तविक शारीरिक-मानसिक रोगों को भी भूत-बाधा मान बैठते हैं और उचित उपचार न कराकर इधर-उधर भटकते रहते हैं तथा सब कुछ गंवा बैठते हैं।
शंका डायन मनसा भूत संशय को स्वीकार कर लेने पर मस्तिष्क का पहिया उन्हीं आशंकाओं के समर्थन में चलने लगता है और चित्र विचित्र कल्पनाएं अवास्तविक को भी तथ्य जैसा मानने लगती हैं।
शंका डायन—मनसा भूत की उक्ति अक्षरशः सत्य है। किसी और निर्दोष महिला पर अपनी कुशंकाओं का आरोपण करके उसे डाकिन, चुड़ैल, जादूगरनी आदि के रूप में भयानक देखा जा सकता है। डायनों का अस्तित्व पूर्णतया संदिग्ध है, किन्तु कुशंकाओं के खेत में असंख्यों एक से एक भयानक डाकिनों का उत्पादन निरन्तर होता रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि यह मनगढ़न्त डाकिनें हानि उतनी ही पहुंचा देती हैं जितनी कि कोई वास्तविक डायन रही होती और उसने पूरे जोर-शोर से आक्रमण किया होता। ‘‘मनसा भूत’’ की उक्ति में संकेत है कि मन से भूत उत्पन्न होते हैं। पीपल के पेड़ पर, मरघट में, खण्डहरों में भूत-पलीतों के किले बने होने और वहां से उनके तीर चलते रहने की मान्यता असंख्यों अन्धविश्वासियों के मनों में जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। सभी जानते हैं कि जड़ों में दौड़ने वाला रस पत्र, पल्लव, पुष्प, फल आदि के रूप में विकसित होता रहता है। आशंकाजन्य भयभीरुता की जड़ें यदि अचेतन मन में घुस पड़ें तो उतने भर से भूतों की अपनी अनोखी दुनिया बन पड़ेगी और उस सेना के आक्रमण की अनुभूति घिग्घी बंधा देने वाला त्रास देती रहेगी। यह स्वनिर्मित भूत भी उतने ही डरावने और हानिकारक होते हैं जितने कि यदि वास्तविक भूत कहीं रहे होते और उनके द्वारा आक्रमण किये जाने पर कष्ट सहना पड़ता।
हिस्टेरिया का एक प्रकार है, ‘सामयिक उन्माद’ इसे भूत, पलीत या देवी देवताओं के आवेश के रूप में देखा जा सकता है। शिक्षितों में यह आवेश दूसरी कई तरह की सामयिक उमंगों के रूप में आता है और वे अपने आपको क्रोध आदि आवेशों से ग्रसित पाते हैं। कई बार तो ऐसी स्थिति अपने लिए तथा सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के लिए घातक बन जाती हैं। आवेश ग्रस्त स्थिति के साथ रोगी जब भूत-प्रेतों के या देवी देवताओं के आक्रमण के साथ संगति बिठा लेता है तब वह प्रवाह उसी दिशा में बहने लगता है और ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं जिनमें ऐसा प्रतीत होता है मानो सचमुच ही कोई भूत बेताल उन पर चढ़ दौड़ा हो।
‘ऐक्जाइटी न्यूरोसिस’ एवं हिस्टरिक न्यूरोसिस को हिस्टीरिया तो नहीं कहा जा सकता पर उसकी ‘सहेली’ या ‘छाया’ कहने में हर्ज नहीं है। कोई कल्पना जब मस्तिष्क पर असाधारण रूप से हावी हो जाती है तो उसे अनुभूतियां भी उसी प्रकार की होने लगती हैं। भूत-प्रेतों के आवेश प्रायः इसी स्थिति में आते हैं। मस्तिष्क में असंतुलन का दौरा पड़ता है रोगी के मस्तिष्क का एक बहुत छोटा अंश यह अनुमान लगाने की चेष्टा करता है कि इस आकस्मिक हलचल का कारण क्या हो सकता है। उसे दूसरे लोगों पर भूतों का आवेश आने की जानकारी देखने या सुनने से पहले ही मिल चुकी होती है। अस्तु क्षण भर में अपनी स्थिति उसी प्रकार की मान लेने का विश्वास जम जाता है। बस, इतनी भर मान्यता शरीर के हिलने, झूमने, गरदन डुलाने, लम्बी सांसें, उत्तेजना आदि भूतोन्माद के लक्षण प्रस्तुत कर देती है।
इसी श्रेणी में देवी-देवताओं के आवेशों की गणना की जा सकती है। भूतोन्माद अधिक अविकसित, अशिक्षित और असंस्कृत लोगों को आते हैं उनमें भय आक्रोश का बाहुल्य रहता है और हरकतों में तथा वचनों में निम्न स्तर की स्थिति टपकती है। जब कि देवोन्माद में अपेक्षाकृत सज्जनता एवं शिष्टता की मात्रा अधिक रहती है। आवेश एवं वार्तालाप भी ऐसा ही होता है मानो कोई देव स्तर का व्यक्ति कर रहा हो। जिन लोगों ने देवी देवताओं की चर्चा अधिक सुनी है, स्वयं उस पर विश्वास करते हैं उनका मस्तिष्क आवेश की स्थिति में अपनी कल्पना, साथ ही हरकतें भी उसी स्तर की बना लेता है। वस्तुतः इन आवेशों में देव स्तर सिद्ध करने वाली कोई प्रामाणिकता नहीं होती। स्तर के अनुरूप इनका वर्गीकरण भूतोन्माद या देवोन्माद के रूप में किया जा सकता है, पर उनके बीच कोई बड़ा भेद नहीं होता।
आयुर्वेद ग्रन्थों में भूतोन्माद की कितनी ही शाखा प्रशाखाओं का वर्णन है। उसे रोग की संज्ञा दी गई है और उपचार विधि बताई गई है। वस्तुतः उसे उन्माद का यदाकदा आने वाला दौरा ही कह सकते हैं। आवेश गहरा हो तो रोगी के अवयव ही उत्तेजित होते हैं और वह उन्मत्तों जैसी हरकतें करता है किन्तु यदि दौरा हलका हो तो एक प्रकार से नशे जैसी स्थिति बन जाती है। भूत का व्यक्तित्व अपने ऊपर थोप कर वह ऐसी ही बातें करता है, मानो वह सचमुच ही भूत की स्थिति में पहुंच गया हो। भूत को जो कहना चाहिए सो ही वह कह रहा हो। यह कथन क्रम बद्ध तो होता है, उसकी संगति बैठती है पर होता सर्वथा काल्पनिक है। भोले लोग उसे तथ्य मान बैठते हैं और उन्माद की स्थिति में जो कहा गया था उसी पर विश्वास करके वैसा ही करने या मानने लगते हैं।
कई मनुष्यों को ऐसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं मानो किसी ने उनसे कुछ बात जोर देकर कही है। लगता है उन्होंने वैसा सुना है। किसी किसी को ऐसा लगता है कोई भीतर से बोल रहा है। पेट में बैठकर या सिर पर चढ़ कर कुछ बता रहा है। इस बीमारी को ‘हैवीफ्रेनिक शिजोफ्रेनिया’ कहते हैं। भूत पलीतों के देवी-देवताओं के सन्देश, आह्वान, आदेश प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। प्रेमी और प्रेमिकाओं को इसी प्रकार की अनुभूतियां होती हैं मानो उनका प्रिय पात्र सामने खड़ा कुछ इशारे कर रहा है या कह रहा है। जिनके प्रियजन जल्दी ही मरे हैं, उनका वियोग निरन्तर छाया रहता उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा निकट आकर कुछ करती कहती दिखाई पड़ती है। भक्त लोगों को उनके इष्ट देव भी ऐसे ही कौतूहलवर्धक परिचय देते हैं।
मानसिक अस्त-व्यस्तता को दो भागों में विभाजित किया जाता है (1) न्यूरोसिस (2) साइकोसिस।
न्यूरोसिस वह स्थिति है जिसमें मनुष्य अन्ट-सन्ट सोचता और आंय-बांय बोलता है। बेकार की चिन्ताएं और बेसिर-पैर की कल्पनाएं उसे हैरान करती रहती हैं। चिन्ता में डूबा, आशंकाओं से ग्रसित, भयभीत एवं असंभव चिन्तन के घोड़े दौड़ाते हुए उसे आये दिन देखा जा सकता है। कभी कुछ कभी कुछ खब्त सवार रहता है।
साइकोसिस इससे आगे की और अधिक बिगड़ी हुई स्थिति है। उसमें व्यक्ति पूर्णरूप से तो नहीं पर किसी विशेष समय, परिस्थिति, घटना, वर्ग या व्यक्ति के सम्बन्ध में उसके कुछ ऐसे भले या बुरे आग्रह जम जाते हैं जिनका वास्तविकता के साथ बहुत कम संबंध होता है। उसकी अपनी कल्पना और मान्यता एक अलग से स्वप्न लोक रच लेती है और उन्हीं में वह खोया रहता है।
भूत-बाधाओं के अनेक किस्से वस्तुतः मानसिक रोगियों के बारे में फैली भ्रांति का परिणाम होते हैं। उनका सही सही उपचार करना चाहिए। अन्यथा रोग पीड़ित स्वजनों से असमय ही बिछुड़ना पड़ जाता है और दोष भूतों का लगता है।
भूतबाधाओं के वास्तविक स्वरूप को साधना चाहिए। साथ ही यह तथ्य ही हृदय में भली भांति अंकित कर लेना चाहिए कि वास्तविक भूत बाधाएं भी दुर्बल चित्त लोगों के सामने ही उपस्थित होती हैं।
प्रेतात्माएं हर किसी के सम्पर्क में नहीं आतीं। वे दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को चुनौती देती हैं और उन्हीं को अपना वाहन बनाती हैं। मनस्वी लोग सदा जागरूक रहते हैं। द्विजातीय तत्वों से लड़ने के लिए जिस प्रकार रक्त के श्वेत कण अपनी संघर्ष शीलता का परिचय देते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रतिभा और प्रखरता के धनी अपनी साहसिकता के बल पर प्रेतात्माओं को समीप नहीं आने देते, आती है तो उन्हें धकेल कर दूर फेंक देते हैं। दुर्बल मनोभूमि के, अथवा प्रेतात्माओं में विशेष रुचि लेने वाले ‘भूत भक्तों’ को उनका वाहन बनते देखा गया है। जिनके शिर पर आये दिन भूत झूमते रहते हैं उन्हें अंग्रेजी में ‘मीडियम’ कहा जाता है। साधारणतया उन्हें प्रेत वाहन नाम दिया जाय तो अनुपयुक्त न होगा।
प्रेतात्मा प्रमाणित व्यक्ति के भीतर से एक सूक्ष्म पदार्थ-प्रवाह निकलता है, जिसे ‘टेलीप्लाज्म’ नाम दिया गया है। यह ‘टेलीप्लाज्म’ व्यक्ति-चित्त में विद्यमान उस अतीत के व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष (जिसे प्रेत कहते हैं) की छवि के सम्वेदनात्मक प्रतिबिम्बों के अनुरूप आकार ग्रहण कर लेता है। यह माध्यम-व्यक्ति के शरीर से स्वयं को पृथक कर सकता है और इस प्रकार प्रेत की प्रतिच्छाया या छवि स्पष्ट दिखाई दे सकती है।
डा. सी.डी ब्रोड समेत अनेक वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिकों ने ‘मीडियम’ (प्रेत प्रभावित व्यक्ति) के बारे में एक अन्य सिद्धान्त प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि मस्तिष्क की संरचना जटिल है। वह शरीर के सम्मिलित संयोग का उत्पादन है, जिनमें एक अभौतिक तत्व भी सम्मिलित है, जिसे वे ‘साइकिक फैक्टर’ कहते हैं। जब व्यक्ति मरता है, तो उसका शरीर रूपी यह संयोग बिखर कर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार उस शरीर में अवस्थित मस्तिष्क का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है। किन्तु ‘साइकिक फैक्टर’ कोई भौतिक द्रव्य (मैटर) नहीं है, अतः वह विनष्ट नहीं हो सकता। यह अवशिष्ट ‘साइकिक फैक्टर’ इधर-उधर भ्रमण करता रहता है। फिर ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क को पाते ही वह प्रविष्ट हो जाता है जो इन परिव्राजक ‘साइकिक फैक्टर्स’ के प्रति तरण-शील हो। ऐसा ही व्यक्ति ‘मीडियम’ प्रेत वाहन बना करते हैं। ‘साइकिक फैक्टर’ कोई व्यक्ति तो होते नहीं, वे पूरे मस्तिष्क के भी प्रतिनिधि नहीं होते। अपितु मस्तिष्क का पदार्थ से परे अंश विशेष होते हैं। अतः ‘साइकिक फैक्टर’ एक पूर्ण मस्तिष्क की तरह काम नहीं कर सकते।
प्रेतात्मा के नाम पर घटित होने वाली अगणित घटनाओं में से प्रायः आधी ऐसी होती हैं, जिन्हें आवेशग्रस्त मस्तिष्कीय रोग की संज्ञा दी जा सकती है। उन्माद के—स्नायु, दुर्बलता के, भीरुताजन्य, आत्म-हीनता के दबे असन्तोष की प्रतिक्रिया के कितने ही कारण ऐसे होते हैं जिनसे मनुष्यों की मानसिक स्थिति गड़बड़ा जाती है। उस स्थिति में शरीरगत और मनोगत तनाव बढ़ता है। वह एक प्रकार के कम्पन, रोमांच, ज्वर एवं आवेश जैसा होता है। ऐसा विचित्र रोग पहले अनुभव में नहीं आया था। अस्तु उसकी सीधी तुक प्रेत आक्रमण से लगा ली जाती है। रोगी के मन में यही मान्यता दृढ़ होती है और दर्शकों, सम्बन्धियों में से अधिकांश प्रेत उपचार के सरंजाम इकट्ठे करके रोगी की भ्रम ग्रस्तता को पूरी तरह परिपुष्ट कर देते हैं। आमतौर से प्रेत आक्रमण इसी स्तर के होते हैं।
संस्कार-जगत में प्रेतात्माओं का आतंक अंकित रहा, तो आवेश-ग्रस्त, रुग्ण व्यक्ति अपनी स्थिति की संगति भूत-प्रेतों, देवी-देवताओं के आक्रमण के साथ बैठाकर उसी प्रवाह में स्वयं को बहाने लगता है। इससे ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं, मानो सचमुच ही कोई भूत बेताल उस व्यक्ति को दबोच बैठा हो। वस्तुतः यह ‘एक्जाइटी न्यूरोसिस’ तथा ‘हिस्टरिक न्यूरीसिस’ की स्थिति होती है। ‘हैवीफ्रेनिया’ की स्थिति भी ऐसी ही रुग्ण मनोदशा का परिणाम है। अपने इष्ट देवों का ‘दर्शन’ करने वाले अनेक भक्त जन भी इसी मनःस्थिति में विभिन्न कौतूहलवर्धक दृश्य देखा करते हैं। जिनके प्रियजन हाल ही में और असमय में मरे हों, उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा निकट आकर बात करती दिखाई पड़ती है। हैं ये सब मानसिक अस्त-व्यस्तता के ही परिणाम। सुचिन्तित सुनियोजित महत्वाकांक्षाएं व्यक्तित्व को ऊर्जस्वी, गतिशील प्रखर और प्रभावी बनाती हैं, तो आकाश-कुसुमवत आकांक्षाओं का अनपेक्षित विस्तार व्यक्तित्व को विभाजित कर देता है। विभाजित व्यक्तित्व मानसिक रोगों का सुरक्षित घर बनता जाता है। व्यक्तित्व का यह विभाजन अनेक बार प्रेतबाधाओं के रूप में भी सामने आता है। जब आकांक्षाएं शक्ति से सर्वथा विलग और विसंगत हो जाती हैं तब वे स्वाभाविक न रहकर अस्वाभाविक हो जाती हैं, उनकी पूर्ति सम्भव न होने से उनका दमन करना पड़ता है। दमित आकांक्षाएं पाप-पिशाच का रूप लेती जाती हैं। वे विकृत और वीभत्स रूप में त्रास एवं दण्ड देती हैं।
भूत बाधाएं दो तरह से व्यक्ति को अपनी चपेट में लेती हैं—इस प्रकार की बाधा में रोगी के सिर पर भूत आता है, वह अनर्गल प्रलाप और असंगत चेष्टाएं करता है। रोग की इस स्थिति में रोगी की सामान्य चेतना विशृंखलित हो जाती हैं और यह विशृंखलित चेतना ही उसके व्यक्तित्व को घेरे रहती है।
दूसरे प्रकार की बाधा में ‘भूत’ रोगी के शरीर में भीतर समा जाता है। वह निरन्तर ‘व्यग्र-त्रस्त’ विक्षिप्त सा रहने लगता है। कभी-कभी अंग-विशेष में पीड़ा भी होती है तथा यह पीड़ा अपना स्थान बदलती रहती है। ऐसे रोगों का शारीरिक कारण ढूंढ़ने पर भी मिल नहीं पाता।
भूत-बाधा-पीड़ित को आकस्मिक रूप से असह्य वेदना का अनुभव होता है, कभी हाथ पैर ठण्डे हो जाते हैं, दांत-बंध जाते हैं, और इस तरह की अन्य शारीरिक प्रतिक्रियाएं स्पष्ट दिखने लगती हैं।
ये सभी प्रभाव मन में बैठी भय और अपराध की ग्रन्थियों के हैं। इसलिए इनकी चिकित्सा किसी भी औषधि द्वारा नहीं हो पाती।
मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में प्रेत बाधा के अधिकांश मामले ‘हिस्टीरिया’ रोग का ही दूसरा नाम होते हैं। ऐसे रोगियों का व्यक्तित्व विभाजित होता है तथा उनके सामान्य व्यक्तित्व के साथ ही उनमें एक विशेष व्यक्तित्व भी समाहित हो जाता है। मनोवैज्ञानिकों का यह भी निष्कर्ष है कि मानसिक विभाजन की स्थिति संक्रामक होती है। इसलिए देखा यह गया है कि जब कोई भूत पीड़ित स्त्री झूमने लगती है तो उसके इर्द-गिर्द बैठी स्त्रियों के झुण्ड में से भी दस-पांच स्त्रियां झूमने लगती हैं।
विभिन्न आकृतियों-प्रकृतियों वाले अनेकानेक मानसिक विक्षोभ वस्तुतः मानसिक असन्तुलन के परिणाम हैं। इसके लिए आवश्यक है परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की सूझबूझ तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को और परिष्कृत दृष्टिकोण द्वारा ही यह सम्भव है।
प्रेत प्रभाव के दो कारणों की चर्चा ऊपर की जा चुकी है, एक मृतात्माओं की उद्विग्न एवं आक्रामक सत्ता। दूसरे मनोरोगों के सन्दर्भ में प्रेत कल्पना की प्रतिक्रिया। इन दो के अतिरिक्त एक तीसरा कारण और भी है किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों की निजी चेतना में ही ऐसे उभार उत्पन्न हो जाते हैं जो भूतों की करतूत जैसे विलक्षण परिचय देने लगते हैं। यह व्यक्तित्व में विशिष्ट ऊर्जा का आकस्मिक उदय होना कहा जा सकता है। वही अपने समीपवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करती है। इससे दर्शकों को लगता है यहां कोई प्रेतात्मा विद्यमान है और अपने अस्तित्व का परिचय देने के लिए उलट-पुलट कर रही है।
इन तथ्यों को समझते हुए अपनी मनोभूमि की परिष्कृत एवं उत्कृष्ट बनाने की आवश्यकता है।
भूत जो सचमुच भी होते हैं वे मात्र अपने अतीत की अनुगूंज होते हैं। अपनी वासना-तृष्णा एवं आकांक्षा की आग से वे स्वयं ही जल रहे होते हैं। वे वस्तुतः अतीत की भूलों का फल भुगत रहे होते हैं और उनसे मुक्त होने के लिए छटपटा रहे होते हैं। अभ्यास, कुतूहल या संस्कारवश वे अपनी गतिविधियों का प्रदर्शन करने को उद्यत होते भी हैं तो उसमें डरने जैसी क्या बात है? वे तो दया के ही पात्र होते हैं और मुक्ति की कामना करते रहते हैं। जो अपने वर्तमान में जी रहा है, ऐसे मनुष्य को किसी के ‘भूत’ से डरना शोभा नहीं देता। वे बस ‘भूत’ ही तो हैं।
अतृप्त आकांक्षाओं का उद्वेग मरने के बाद भी प्राणी को चैन नहीं लेने देता और वह सूक्ष्म शरीरधारी होते हुए भी यह प्रयत्न करता है कि अपने असन्तोष को दूर करने के लिए कोई उपाय, साधन एवं मार्ग प्राप्त करे। सांसारिक कृत्य या उपयोग शरीर द्वारा ही हो सकते हैं। मृत्यु के उपरान्त शरीर रहता नहीं। ऐसी दशा में उस अतृप्त प्राणी की उद्विग्नता उसे कोई शरीर गढ़ने की प्रेरणा करती है। अपने साथ लिपटे हुए सूक्ष्म साधनों से ही वह अपनी कुछ आकृति गढ़ पाता है जो पूर्व जन्म के शरीर से मिलती-जुलती किन्तु अनगढ़ होती है। अनगढ़ इसलिए कि भौतिक पदार्थों का अभीष्ट अनुदान प्राप्त कर लेना, मात्र उसकी अपनी इच्छा पर ही निर्भर नहीं रहता। उसके लिए प्रकृति का सहयोग और ईश्वरीय विधि-व्यवस्था का समर्थन भी चाहिये। तीनों तथ्य मिलने पर ही परिपूर्ण शरीर मिलता है। किन्तु मृतक को एकांकी प्रयत्नों तक ही सीमित रहना पड़ता है, अस्तु वह एक अपनी छोटी सामर्थ्य के अनुसार अनगढ़ शरीर ही रच सकता है। वह इतना ही बन पाता है कि बहुत प्रयत्न करने पर थोड़े समय के लिए दृश्य बन सके और कुछ हरकतें कर सके अन्यथा अदृश्य स्थिति में ही अपना निर्वाह करता रहे।
‘भूत’ अपनी इच्छा पूर्ति के लिए किसी दूसरे के शरीर को भी माध्यम बना सकते हैं। उसके शरीर से अपनी वासनाओं की पूर्ति कर सकते हैं अथवा जो स्वयं करना चाहते थे वह दूसरों के शरीर से करा सकते हैं। कुछ कहने या सुनने की इच्छा हो तो वह भी अपने वशवर्ती व्यक्ति द्वारा किसी कदर पूरी करते देखे गये हैं। इसके लिए उन्हें किसी को ‘माध्यम’ बनाना पड़ता है। हर व्यक्ति माध्यम नहीं बन सकता। उसके लिए दुर्बल मनःस्थिति का—आदेश पालने के लिए उपयुक्त मनोभूमि का व्यक्ति होना चाहिए। प्रेतों के लिए सवारी का काम ऐसे ही लोग दे सकते हैं। मनस्वी लोगों की तीक्ष्ण इच्छा शक्ति उनका आधिपत्य स्वीकार नहीं करती।
भूतों के अस्तित्व से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। वे भी मनुष्यों की तरह ही जीवनयापन करते हैं। मनुष्य धरती पर स्थूल शरीर समेत रहते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से उनकी सामर्थ्य और साधन जीवित मनुष्यों की तुलना में कम होते हैं इसलिए वे डराने के अतिरिक्त और कोई बड़ी हानि नहीं पहुंचा सकते। डर के कारण कई बार घबराहट, चिन्ता, असन्तुलन जैसी कठिनाइयां उत्पन्न हो जाती हैं। भूतोन्माद में यह भीरुता और मानसिक दुर्बलता ही रोग बनकर सामने आती है। वे जिससे कुछ अपेक्षा करते हैं उनसे सम्पर्क बनाते हैं और अपनी अतृप्तिजन्य उद्विग्नता के समाधान में सहायता चाहते हैं। सम्पर्क समय का अनभ्यस्त अजूबापन ही प्रायः डर जाने का मुख्य कारण होता है।
भूत मनुष्य से कम समर्थ और कम साधन-सम्पन्न होते हैं। बशर्ते, मनुष्य ने आत्म-विकास किया हो। दबे, अविकसित, अपरिष्कृत मनुष्य ही भूतों के प्रकोप और आतंक के शिकार बनते हैं। भूत तो अपने ही उन्माद से त्रस्त, आत्म प्रताड़ित प्राणी होते हैं। वे उस त्रास का, आत्म प्रताड़ना का परिचय भर ही दें सकते हैं। उनसे डरकर स्वयं भी भूतोन्माद-ग्रस्त हो जाने वाले व्यक्ति की दयनीय दुर्बलता मनुष्य की गरिमा के अनुरूप नहीं। भूत आत्म-सत्ता की अविनाशिता के प्रमाण भर हैं। उस प्रमाण से मनुष्य को भयभीत होने की भला क्या आवश्यकता? उल्टे, यह प्रमाण तो शक्ति ही देता है। जब जीवन अनन्त है और चेतना अविनाश तो उसका भूत क्या बिगाड़ेगा? उसे तो आत्म-सत्ता की सनातन विद्यमानता का संदेशवाहक भर समझना चाहिए।

