अत्यधिक मोह के कष्टकर परिणाम
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भूत-प्रेतों के अस्तित्व सम्बन्धी प्रचलित कथा-गाथाओं के सन्दर्भ में एक तथ्य सदा ही सामने आया है कि जिन व्यक्तियों को मरते समय अत्यधिक आवेश रहे हैं उन्होंने उसी मनःस्थिति का परिचय अपने प्रेत कलेवर में दिया है। जैसे धन या मकान से अत्यधिक प्यार करने वाले मरते समय उन वस्तुओं से अत्यधिक मोह प्रकट करते हुए विलग हुए हैं तो उनका प्रेत उन्हीं स्थानों के इर्द-गिर्द मंडराता रहा है। जमीन में गढ़े हुए धन की उन्होंने चौकीदारी की है और यदि किसी ने उसे निकाल भोगा है तो उसको तरह तरह के त्रास दिये हैं। वस्तुओं का मोह उन्हें मरणोत्तर जीवन में कष्टकारक पहरेदारी के लिए विवश कर कैदी जैसा बनाए रखता है और उन वस्तुओं से मोह करने वाले अन्य देहधारी लोगों को भी इन अशरीरी प्रेमियों का कोप भोजन बनना पड़ता है।
प्राण चेतना अपनी सम्बन्धित वस्तुओं के साथ चिरकाल तक जुड़ी रहती है और उनका मोह उन पर छाया रहता है इसका प्रमाण मिश्र के पिरामिडों एवं कब्रों की उखाड़-पछाड़ करने वालों पर बीती घटनाओं से मिलता है। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार प्राणी के अन्यत्र जन्म लेने या अन्य लोक को चले जाने पर भी उसकी विद्युत शक्ति उन वस्तुओं का घेरा डालकर चिरकाल तक अपना आधिपत्य जमाये रहती है जिनके साथ उसका मोह अहंकार जुड़ा हो। भूत, प्रेतों का आस्तित्व प्रायः इसी स्तर का होता है। जीव के जन्म ले लेने के बाद भी लम्बे समय उसकी छाया का प्रेत रूप में बने रहना सम्भव है।।
अठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के बहुत बड़े भाग पर योरोपियन लोगों का अधिकार था। उन देशों के पुरातत्व वेत्ता इस बात के बहुत उत्सुक थे कि मिश्र के परिामिडों तथा दूसरे मृतक स्मारकों के पीछे छिपे रहस्यों पर से पर्दा उठाया जाय। इसलिए उन्होंने इस सन्दर्भ में काफी ढूंढ़ कुरेद की—खुदाई की और कितनी ही पुरानी कब्रों को उखाड़ा। इस कार्य में शोध कर्त्ताओं का एक उत्साही दल डा. ब्रेस्टेड के नेतृत्व में काम कर रहा था उनके सहायक हार्वर्ड काटर—आर्थर बीगल लार्ड कारनवर्ग आदि कितने ही मूर्धन्य पुरातत्व वेत्ता अपने-अपने ढंग से काम कर रहे थे। इन लोगों ने बहुत धन खर्च करके प्राचीन काल के अवशेषों को प्राप्त किया था और उस आधार पर प्राचीन काल की परिस्थितियों तथा मान्यताओं का पता लगाया था।।
इसी सन्दर्भ में सन् 1922 में ‘तूतन खामेन’ नामक स्थान से एक ऐसे वृद्ध फकीर की कब्र खोदी गई जिसके सम्बन्ध में कितनी ही चमत्कारी दन्त कथाएं प्रचलित थीं। खुदाई का एक उद्देश्य उस क्षेत्र में फैले हुए अन्धविश्वासों का निरस्त करना भी था।।
कब्र खोद ली गई और उसके अवशेष भी प्राप्त कर लिये गये। अब उनका रासायनिक विश्लेषण होना आरम्भ हुआ। इस बीच एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक और भयानक घटनाएं घटित होना आरम्भ हो गयी। डा. ब्रेस्टेड अपनी प्रयोगशाला में अवशेषों लकड़ी के टुकड़े का विश्लेषण करने के लिए एक बर्तन में कुछ रासायनिक पदार्थों के साथ उबाल रहे थे कि इतना भयंकर विस्फोट हुआ कि प्रयोगशाला की छत उड़ गई और दीवारें हिल गईं। इसी बीच एक काला सर्प शोधकर्त्ता कार्टर के घर जा धमका वे स्वयं तो किसी प्रकार बच गये पर उनकी पत्नी को उसने डस ही लिया और वह देखते-देखते मर गई। एक महीना बीता होगा कि लार्ड कारनवर्ग को नन्हें से मच्छर ने काटा और दो दिन के भीतर ही वे मर गये। मच्छर काटने का स्थान बिलकुल सांप के काटने जैसी स्थिति का बन गया था। इतना ही नहीं कारन वर्ग महोदय का हट्टा-कट्टा भाई भी उन्हीं दिनों दो दिन की मामूली बीमारी से चल बसा।।
दल के प्रमुख ब्रेस्टेड कब्र खुदाने के दो सप्ताह के भीतर ही मर गये। अपनी पत्नी को गंवा कर भी कार्टर साहस पूर्वक अन्ध विश्वासों का खण्डन करते रहते थे और शोध कार्य को शिथिल नहीं पड़ने दिया था, पर न जाने क्या कुयोग उत्पन्न हुआ कि वे एक छोटी सी तलैया में जा फंसे और उस कीचड़ में ही फंसे हुए असहाय स्थिति में मरे पाये गये इस प्रकार वह पूरा शोधकर्त्ता दल ही समाप्त हो गया।।
यह घटनाएं मरणोत्तर जीवन के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती हैं और उनके लिए चुनौती देती हैं जो शरीर के साथ ही जीवन का अन्त होने की बात करते रहते हैं। साथ ही वस्तुओं से अत्यधिक मोह होने पर मृत्यु के बाद भी जीवात्मा के उन्हीं जड़ वस्तुओं के इर्द-गिर्द मोहाविष्ट होकर मंडराते रहने की दयनीय स्थिति को भी स्पष्ट करती हैं। अमेरिका और अंग्रेज मिलकर मिश्र की समाधियों की खोज कर रहे थे उस खोज के पीछे मात्र पुरातत्व विषयक रहस्यों का जानना ही नहीं था, पर उनमें दबी हुई विपुल स्वर्ण सम्पदा एवं रत्न राशि से लाभांवित होना भी था। इसके अतिरिक्त एक और भी बात थी—उन किम्वदन्तियों की वास्तविकता जानना जिनमें कहा जाता था कि इन समाधियों की रक्षा प्रेतात्मा करती हैं जो उन्हें छेड़ेगा वह खतरा उठायेगा। एक समाधि पर तो स्पष्ट शब्दों में शिलालेख लगा था—‘‘जो फराऊनी कब्रों को छेड़छाड़ कर मृतात्माओं की शान्ति भंग करेगा उसे अकाल मृत्यु खा जायेगी।’’।
कब्रों की खुदाई का काम सबसे पहले लार्ड कार्नार्वल ने अपने हाथ में लिया था। उनका परिवार भी उस कार्य में दिलचस्पी ले रहा था और सहयोग दे रहा था। इसका भयंकर परिणाम सामने आया। एक-एक करके उस अभियान से सम्बन्धित बाईस व्यक्ति कुछ ही समय के अन्दर काल के गाल में बड़े विचित्र घटना-क्रम के साथ चले गये। लार्ड वेस्टवरी अनायास ही छत पर से कूद पड़े और मर गये। उनका बेटा जो खुदाई का इंचार्ज था। रात को अच्छा खासा सोया सुबह मरा हुआ पड़ा मिला। डा. अर्चिवाल्ड डगलस रीड एक ममी का एक्सरे कर रहे थे कि उनका हार्टफेल हो गया। आर्थर बाइगाल को मामूली सा बुखार ही खा गया। आब्रेहर्वर्टन सहसा पगला गये और आत्महत्या कर बैठे। लार्ड कार्नार्वल की पत्नी लेडी एलिजाबेथ एक तुच्छ से कीड़े के काटने के बहाने से ही ढेर हो गई। इस प्रकार उनका पूरा कुटुम्ब ही नहीं सहकारी मण्डल भी देखते-देखते अकाल मृत्यु का ग्रास हो गया।।
यह प्रख्यात था कि नील नदी की घाटी में अवस्थित तूतनखामन की समाधि सबसे अधिक रहस्यमय साथ ही सर्वाधिक सम्पत्ति से भरी-पूरी है। इसका लोभ खोजी लोग छोड़ नहीं पा रहे थे। यों इतनी मौतें देखते-देखते हो जाने के कारण सारे इंग्लैंड में आतंक छाया हुआ था और प्रेतात्माओं की बात का मखौल उड़ाने वाले लोग भी आश्चर्यचकित होकर इस प्रकार मृत्युएं होने की बात को ‘‘संयोग मात्र नहीं कह पा रहे थे। वे भी इच्छा न रहते हुए भी उन किम्वदन्तियों के आगे सिर झुका रहे थे जिनमें समाधियों के साथ छेड़खानी करने वालों को जोखिम उठाने की चेतावनी दी जाती रही थी।।
यह खुदाई मिश्र में पुरातत्त्ववेत्ता विभाग सम्भालने वाले विद्वान हावर्ड कारटर ने इंग्लैंड के उतसही धनपति लार्ड कानर्विन की साझेदारी में आरम्भ कराई थी। इसका परिणाम कुछ अच्छा नहीं निकला। दोनों ही साझीदार समान रूप से क्षतिग्रस्त हुए कारटर को भी जानमाल की भारी क्षति उठानी पड़ी।।
नगाड़े की चोट और पैसे की थाप ।
रायल सोसाइटी के फैलो जोसेफ ग्लैनविल इंग्लैण्ड के प्रामाणिक और सम्मानित नागरिक थे। उनने अपने संस्मरणों में सन् 1662 में घटित हुई एक प्रेत अस्तित्व की घटना का उल्लेख किया है। उनके कथानुसार इंग्लैण्ड के विल्ट शायर स्थान में नियुक्त एक न्यायाधीश की अदालत में आये एक विचित्र केस का वर्णन है। एक अर्ध विक्षिप्त सा व्यक्ति कहीं से पुराना नगाड़ा खरीद लाया। वह उसे सड़क पर खड़ा होकर विचित्र ढंग से बजाता-भीड़ इकट्ठी करता और पैसे बटोरता। पुलिस ने उसे रास्ता रोकने और अवांछनीय भीड़ जमा करने के अपराध में पकड़ कर नगाड़े समेत अदालत में पेश किया। अदालत ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया और नगाड़े को जब्त का हुक्म दिया। कुछ दिन बाद बेकार पड़े नगाड़े को पुलिस ने उस मजिस्ट्रेट के घर ही पहुंचा दिया। वहां उसे घर के एक कोने में पटक दिया गया।।
जिस दिन से नगाड़ा उनके घर में पहुंचा उसी दिन से वहां प्रेतों के उपद्रव शुरू हो गये। किवाड़ों को खटखटाने की—छप्पर पर धमा चौकड़ी और आंगन में उछल-कूद होने की घटनाएं निरन्तर होने लगीं। बहुत तलाश करने पर भी कोई दिखाई न पड़ता था, पर घटनाएं बराबर होती थीं। स्वयं प्रयत्न करने और नौकरों, पड़ौसियों की सहायता लेने के बाद भी जब उस उपद्रव का समाधान न हो सका तो पुलिस की सहायता ली गई, पर वे लोग भी देखते, सुनते, समझते हुए भी कुछ कर न सके। जो दिखाई ही नहीं देता उसको रोका या पकड़ा कैसे जाय?।
एक दिन मजिस्ट्रेट ने देखा कि किसी मजबूत आदमी ने जोर का धक्का देकर किवाड़ें खोल लीं, चटखनी टूट गई और वह व्यक्ति ओवरकोट पहने हुए घर में भीतर घुसता चला आया और आंगन में होता हुआ जीने के रास्ते छत पर चढ़ गया। आश्चर्य यह था कि ओवरकोट तो आंखों से दीख रहा था, पर पहनने वाले के हाथ-पैर, चेहरा आदि सभी नदारत था। लगता था अकेला कोट ही यह सब हरकतें कर रहा है। इस घटना के बाद तो एक प्रकार से इन उपद्रवों को प्रेतात्मा की करतूत ही मान लिया गया। अब यह तलाश किया जाना था कि आखिर थोड़े ही दिनों से यह उपद्रव क्यों खड़े हुए इससे पहले क्यों नहीं थे? घर में कुछ अजनबीपन तो नहीं हुआ। इस ढूंढ़-खोज में जब्त किया गया वह नगाड़ा ही नजर आया जो एक पगले से छीना गया था और उसने भी किसी कबाड़खाने से खरीदा था। नगाड़ा हटाया गया—साथ ही उन उपद्रवों का भी अन्त हो गया। इतना ही नहीं उस पगले का भी पता लगाया गया तो पता चला कि वह सदा से ही विक्षिप्त नहीं था। सस्ता माल देखकर कबाड़खाने से वह उस नगाड़े को खरीद लाया था। जिस दिन से उसे लाया वह पगला गया और शोर मचाने, भीड़ इकट्ठा करने की करतूतों करने लगा। जिस दिन से नगाड़ा जब्त हुआ उसी दिन से वह सामान्य स्वाभाविक स्थिति में पहुंच गया, जिस दिन नगाड़ा हटाया गया उसी दिन से मोक्सन के घर में भी शान्ति आ गई।।
समझा गया कि उस नगाड़े के असली मालिक की प्रेतात्मा अपनी प्रिय वस्तु के साथ चिपकी रही है और वह वस्तु जहां कहीं भी पहुंची है वहीं उस आत्मा ने भी प्रवेश पदार्पण किया है।।
सत्रहवीं सदी के पादरी जेरेन्सी टेलर ने अपनी स्मरण पुस्तक में एक प्रेतात्मा का आंखों देखा विवरण लिखा है। जब पादरी घोड़े पर सवार होकर वेटफास्ट से डिल्सगेरो जा रहा था तो कोई अजनबी व्यक्ति सहसा उसके पीछे घोड़े की पीठ पर सवार हो गया। चकित पादरी ने उसका परिचय एवं उद्देश्य पूछा तो उसने अपना नाम हैडकजेम्स बताया और कहा आप मेरी विधवा पत्नी तक यह सन्देश पहुंचा दें कि उसका नया पति जल्दी ही उसके साथ धोखा करने वाला है। वह बचे। पादरी ने बताये हुए नाम पते पर वह सन्देश पहुंचा दिया। पर स्त्री ने उस बात पर न तो ध्यान दिया और न विश्वास किया।।
कुछ दिनों बात उस स्त्री का खून हो गया। हत्या का मुकदमा कैरिकफोरेन्स की अदालत में चला। पुलिस को सन्देह था कि यह हत्या उसके नये पति ने पत्नी की सम्पत्ति हड़पने के लिए की है इस संदर्भ में पादरी जेरेंसी टेलर ने भी अपनी प्रेत वार्ता की साक्षी प्रस्तुत की।।
पादरी की गवाही प्रामाणिक नहीं समझी गई और अदालत द्वारा कहा गया कि यदि ऐसी बात है तो मृतात्मा को अदालत में उपस्थित होकर अपनी बात कहनी चाहिए। सर्वत्र सन्नाटा था। अचानक जोर से बिजली कड़कने जैसे आवाज हुई। अदृश्य से एक हाथ निकला और उसने अदालत की मेज पर तीन बार जोर-जोर से थपकी दी। इस दृश्य को देखकर न्यायाधीश एवं सभी आतंकित हो गये। अदालत ने दूसरे पति डेवीज को अपराधी घोषित करते हुए उसे समुचित दण्ड दिया।।
मृतात्मा के प्रिय पदार्थों को दान कर देने अथवा अन्यत्र कहीं स्थानांतरित कर देने का प्रचलन इसी दृष्टि से है कि उसे अन्यत्र जन्म लेने या विकास-क्रम के अनुरूप आगे बढ़ने में अड़चन न पड़े। प्रिय वस्तुओं में उलझा रहने के कारण आत्मा अशान्त और उद्विग्न ही रह सकता है जिस प्रकार घर के सम्बन्धी मृतक का अभाव अनुभव करके दुखी रहते हैं उसी प्रकार वह जीव भी बार-बार अपनी प्रिय वस्तुओं एवं परिस्थितियों के इर्द-गिर्द मंडराते रहकर दुःखी हो सकता है। वहीं डेरा डालकर बैठा रह सकता है और उस उपस्थिति से घर-परिवार के लोगों को असुविधा अनुभव हो सकती है। इसलिए अच्छा यही समझा गया कि उन वस्तुओं को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया जाय। दान में देकर आत्मा को यह विश्वास दिला दिया जाय कि वे पदार्थ अब परिवार के आधिपत्य में नहीं रहे, वरन् किसी धर्म सत्ता के अधिकार में चले जाने के कारण पराये हो गये। मृतक की वस्तुओं का दान करने का एक कारण यह भी है कि घर के लोग उन्हें देख-देखकर शोक-सन्तप्त रहने की कठिनाई से बच जायें और विस्मृति अपनाकर अपना मन जल्दी हलका कर सकें।।
जो हो, इतना निश्चित है कि शरीर के साथ आत्मा का अन्त नहीं हो जाता। यदि आत्मा अधिक भावुक या मोहग्रस्त है तो उसे प्रेतात्माओं के रूप में सम्बन्धित पदार्थों तथा व्यक्तियों से मोह बना रह सकता है। यह मोह मृतात्मा की प्रगति और कुटुम्बियों की सुविधा की दृष्टि से अवांछनीय है। इसलिए अन्त्येष्टि संस्कार के साथ इस प्रकार के धर्मोपचार जोड़े गये हैं जिससे आत्मा का मोह एवं शोक शान्त हो सके उसे अन्यत्र जन्म लेने का अवसर मिल सके।।
संपत्ति का मोह सदा विपत्तियां लाता है ।
सम्पत्ति संचय का व्यसन सबसे बुरे और सबसे घिनौने किस्म का है। कुछ सनकी लोग यह सोचते रहते हैं कि उनके पास जितनी अधिक सम्पदा संग्रहीत होगी उसी हिसाब से उनका गौरव और वर्चस्व बढ़ेगा। लोग उनके भाग्य और पुरुषार्थ का लोहा मानेंगे और बड़प्पन का गौरव प्रदान करेंगे। इसी सनक ने अनेकों को बढ़-चढ़कर बहुमूल्य सम्पदा का स्वामी बनने के लिए प्रोत्साहन दिया। वे उस संचय का उद्धत प्रदर्शन करके लोगों की आंखों को चौंधियाने का प्रयास करते भी रहे। संभव है उनके आस-पास घिरे चापलूसों ने इस सनक का समर्थन भी किया हो और प्रशंसा के पुल भी बांधें हों, पर अन्ततः इसका क्या परिणाम हो सकता है इसे वे न देख सके और न समझ सके। सम्पत्ति का उद्धत प्रदर्शन ईर्ष्या को जन्म देता है। उसे अपने अधिकार में करने के लिए अनेकों के मुंह में से लार टपकती है और जैसे भी बने वैसे उसे हथियाने के दावघातों में से हर एक का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के आक्रमणों को आमन्त्रित करने का श्रेय या दोष उस अनावश्यक सम्पत्ति के संग्रह और उसके उद्धत प्रदर्शन को ही दिया जा सकता है।।
कोहनूर हीरे का इतिहास इसी प्रकार का है। वह जहां भी गया, जहां भी रहा अपने साथ विपत्ति भी लेकर गया और उसे रखने वाले के लिए प्राणघात की विपत्ति संजोये रहा। शाहजहां ने ‘तख्त ताऊस’ इसलिए बनवाया था कि वह संसार के सबसे वैभवशाली लोगों में गिना जा सके। उसकी पीढ़ियां उस पर बैठ कर पुरखों के पुरुषार्थ के गीत गाते रहें, पर वैसा हो न सका जैसा कि चाहा गया था। वैभव का सम्पादन करने वालों की दुर्भाग्य से एक आंख कानी होती है। वे एक पक्षी—एकांगी विचार कर पाते हैं यह नहीं देख सोच पाते कि सम्पत्ति संग्रह का एक विपरीत पक्ष भी है और वह इतना घातक है कि महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति को अत्यन्त कष्टकारक परिस्थितियों में बदल देता है। कोहनूर हीरे का इतिहास भी बड़ा विचित्र और विलक्षण है। भागवत पुराण में उसका उल्लेख स्यमंतक मणि के रूप में मिलता है। द्वारिका के एक नागरिक सत्राजित के पास वह था। कृष्ण ने उससे कहा यह मणि राजा के योग्य है। उसे महाराज उग्रसेन के पास पहुंचाना चाहिये। सत्राजित इस पर तैयार न हुआ तो घटना-क्रम ने दूसरा ही मोड़ ले लिया। सत्राजित का भाई प्रसेनजित उसे सदा छाती से लगाये फिरता था। एक दिन सिंह ने प्रसेनजित को मार कर वह मणि छीनी, सिंह को रीछ ने मारकर उस पर कब्जा जमाया। रीछ की भी खैर नहीं रही। श्रीकृष्ण ने रीछ को परास्त किया उसने न केवल मणि को वरन् उसकी बेटी को भी हथिया लिया। श्रीकृष्ण भी उसे पाकर चैन से न बैठ सके और बहेलिये के हाथों मारे गये। इसके बाद वह पाण्डु वंशियों के पास पहुंचा। परीक्षित, जन्मेजत, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिम्वसार, अशोक, ब्रहद्रथ, पुष्य मित्र—एक के बाद एक के पास पहुंचने की कथाएं भी बड़ी कष्टकर हैं। उसका हस्तान्तरण शान्ति और सद्भावना पूर्ण नहीं हुआ वरन् दुरभि संधियां और हत्याएं ही उसे इधर-उधर लिये फिरी।।
कनिष्क, चन्द्रगुप्त, हर्षवर्धन के बाद वह मालव नरेश यशोवर्मा के पास पहुंचा। उनके वंशज राजा राम व पर अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया और मालव देश को पद-दलित करके उस हीरे को हथिया लिया। इसके बाद दिल्ली के बादशाहों के अधिकार में वह देर तक बना रहा। इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद उसकी बेगम दिल्ली छोड़कर आगरा आ गई थी। उस पर हुमायूं ने हमला कर दिया। इज्जत बचाने के लिए बेगम को हीरा हुमायूं की भेंट करना पड़ा।।
हुमायूं की मौत सीढ़ी पर से फिसलने के कारण हो गई वह कई पीढ़ियों तक उसके वंशजों के पास बना रहा। मुहम्मदशाह पर ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने हमला कर दिया और उसकी पगड़ी में छिपा हीरा झटक कर अपने कब्जे में कर लिया। नादिरशाह के मुंह से उसे देखते ही शब्द निकला—कोह-ए-नूर—अर्थात् प्रकाश का पर्वत। इसे लेकर प्रचुर सम्पदा के साथ वह वापिस लौटा तो रास्ते में भयानक तूफान में उसकी सेना तथा सम्पदा का बड़ा भाग नष्ट हो गया। दादिरशाह चैन से न बैठ सका। उसके भतीजे अलीकुली खां ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उसका यह लाभ अफ़गान सेनापति अहमदशाह अब्दाली से न देखा गया उसने अलीकुली खां को मौत के घाट उतारा और कोहनूर अपने कब्जे में कर लिया।।
अहमद शाह अब्दाली के बाद उसका पुत्र तैमूर शाह इस हीरे का अधिकारी बना। वह जब मरा तो अपने पीछे 23 बेटे छोड़ गया। उनमें सत्ता के लिए तुमुल युद्ध हुआ। उसमें जमान शाह जीता। उससे हीरा छीनने के लिये उसके विश्वासी भाई महमूदशाह ने ही उसे कैद में डाल दिया और यन्त्रणा देकर आंखों निकलवालीं। महमूद को कुचल कर शाहशुजा ने उसे पाया। शाहशुजा कैद में पड़ा हुआ था। उसने अपनी मुक्ति के लिए पंजाब के महाराज रणजीतसिंह से अपनी बेगम के द्वारा प्रार्थना कराई और बदले में कोहनूर देने का वायदा किया। महाराज ने काबुल के वजीर फतह खां को साथ लेकर शाहशुजा को छुड़ाया। शाहशुजा ने छूटने पर हीरा देने में आनाकानी की तो उसे महाराज ने यन्त्रणा देकर विवश कर दिया। उसे देना तो पड़ा पर वह अन्य हीरों के साथ भाग खड़ा हुआ और अंग्रेजों से जा मिला।।
महाराज रणजीत सिंह के मरने के बाद उनका राज्य अंग्रेजों के हाथों में चला गया और साथ ही वह बहुमूल्य हीरा भी। महारानी विक्टोरिया के ताज में उसे और भी खूबसूरत बनाकर जड़ा गया। इसे तराशने और चमकाने में योरोप के कुशलतम रत्न—शिल्पी 38 दिन तक लगे रहे और उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बनाया।।
कोहनूर प्रख्यात है—बड़ा है इसलिए उसकी चर्चा भी बड़ी है। छोटी-मोटी रत्न राशियां भी ऐसी ही विपत्ति संजोये हुए मिलेंगी। चूंकि छोटी सम्पदाएं छोटे लोगों के पास होती हैं और उनकी प्रतिक्रिया एवं विपत्ति भी ऐसी होती है जो सम्बद्ध लोगों को तो पूरी तरह संत्रस्त करे पर ऐतिहासिक घटनाओं में अपना स्थान न पा सके। हस्र छोटे और बड़े अनावश्यक संग्रह का प्रायः एक जैसा ही होता है।।
ऐसी ही दुर्गति शाहजहां के उन अरमानों की हुई जिनमें वह विपुल सम्पदा का स्वामी बनकर गौरवशाली बनने के स्वप्न देखता रहता था। तख्त ताऊस (मयूर सिंहासन शाहजहां ने बनवाया था, उसमें 12 करोड़ रुपये के रत्न जड़े थे उसके निर्माण में सात वर्ष लगे और तत्कालीन श्रेष्ठतम रत्न शिल्पियों ने उसे बनाने में अपना पूरा श्रम, समय एवं मनोयोग लगाया। इसमें पन्ने से बने पांच खम्भों पर मीनाकारी का छत्र बना हुआ था। पाये ठोस सोने के बने थे। खम्भों पर दो-दो मोर नृत्य करते हुए बनाये गये थे। प्रत्येक जोड़े के बीच में हीरे—लाल, मोती, पन्ने आदि रत्नों से जड़ा एक-एक पेड़ था। बैठने के स्थान तक पहुंचने के लिए तीन रत्न जटित सीढ़ियां थीं। उसमें कुल मिलाकर ग्यारह चौखटें थीं। मीनाकारी का स्वर्ण छत्र देखते ही बनता था। तख्त ताऊस को अपने समय की अद्भुत और बहुमूल्य कलाकृति माना जाता था।।
जिन अरमानों के साथ शाहजहां ने उसे बनाया था वे पूरे न हुए। वह कुछ ही दिन उस पर बैठ पाया था कि उसके बेटे औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हुआ। मुहम्मद शाह राज्याधिकारी था। उस पर ईरान का नादिरशाह चढ़ दौड़ा और भारी लूट-खसोट के अतिरिक्त तख्त ताऊस भी फारस उठा ले गया। उसी के कुटुम्बी कुर्दा ने नादिरशाह की हत्या कर दी और उसका सारा माल असवाब छीन लिया और जिसमें यह मयूर जड़ित सिंहासन भी सम्मिलित था। लुटेरों ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और उन्हें आपस में बांट दिया। बटवारे में उस शानदार शामियाने का भी कतरव्योंत कर लिया जो उस सिंहासन के ऊपर ताना जाता था और रत्नों की झिलमिलाहट से आकाश में चमकने वाले सितारों की बहार देता था।।
इसके कुछ समय बाद ईरान की सत्ता आगा मुहम्मद शाह ने संभाली। उसने नादिरशाह के लुटेरे वंशजों को पकड़ कर भारी यातनाएं दीं और लूट का सारा माल उगलवा लिया। इस वापसी में तख्त ताऊस के टुकड़े भी शामिल थे। जौहरियों ने उन टुकड़ों को जोड़-तोड़कर एक नया तख्त ताऊस बनाया। इसके बाद भी वहां अराजकता और गृह युद्ध का सिलसिला चलता रहा और उसे फिर लूट लिया गया। रत्नों को उखाड़ लिया और कीमती पत्थरों को भविष्य में फिर कभी काम में लाने की दृष्टि से समुद्र में किसी खास जगह छिपा दिया गया। छिपाने वाले उस स्थान को बता नहीं सके और वे अवशेष अभी भी ईरान के समुद्र तट के निकट उथली जल राशि में छिपे पड़े हैं। ढूंढ़-खोज से अभी तक उनका पता नहीं चल सका।।
अहंकारी मनुष्य न जाने कब तक सम्पत्तिवान होने पर बड़ा आदमी बनने की साध संजोये रहेगा। रावण, हिरण्यकश्यपु से लेकर नेपोलियन, सिकन्दर तक इसी मूर्खता में अपनी प्रतिमा को नष्ट कर चुके और सुखदायी अन्त देख चुके। हमारी आंखें यदि उन अनुभवों से खुल सकें और संग्रह की अपेक्षा सदुपयोग के लिए अपना उपार्जन प्रयुक्त कर सकें तो कितना अच्छा हो।
प्राण चेतना अपनी सम्बन्धित वस्तुओं के साथ चिरकाल तक जुड़ी रहती है और उनका मोह उन पर छाया रहता है इसका प्रमाण मिश्र के पिरामिडों एवं कब्रों की उखाड़-पछाड़ करने वालों पर बीती घटनाओं से मिलता है। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार प्राणी के अन्यत्र जन्म लेने या अन्य लोक को चले जाने पर भी उसकी विद्युत शक्ति उन वस्तुओं का घेरा डालकर चिरकाल तक अपना आधिपत्य जमाये रहती है जिनके साथ उसका मोह अहंकार जुड़ा हो। भूत, प्रेतों का आस्तित्व प्रायः इसी स्तर का होता है। जीव के जन्म ले लेने के बाद भी लम्बे समय उसकी छाया का प्रेत रूप में बने रहना सम्भव है।।
अठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के बहुत बड़े भाग पर योरोपियन लोगों का अधिकार था। उन देशों के पुरातत्व वेत्ता इस बात के बहुत उत्सुक थे कि मिश्र के परिामिडों तथा दूसरे मृतक स्मारकों के पीछे छिपे रहस्यों पर से पर्दा उठाया जाय। इसलिए उन्होंने इस सन्दर्भ में काफी ढूंढ़ कुरेद की—खुदाई की और कितनी ही पुरानी कब्रों को उखाड़ा। इस कार्य में शोध कर्त्ताओं का एक उत्साही दल डा. ब्रेस्टेड के नेतृत्व में काम कर रहा था उनके सहायक हार्वर्ड काटर—आर्थर बीगल लार्ड कारनवर्ग आदि कितने ही मूर्धन्य पुरातत्व वेत्ता अपने-अपने ढंग से काम कर रहे थे। इन लोगों ने बहुत धन खर्च करके प्राचीन काल के अवशेषों को प्राप्त किया था और उस आधार पर प्राचीन काल की परिस्थितियों तथा मान्यताओं का पता लगाया था।।
इसी सन्दर्भ में सन् 1922 में ‘तूतन खामेन’ नामक स्थान से एक ऐसे वृद्ध फकीर की कब्र खोदी गई जिसके सम्बन्ध में कितनी ही चमत्कारी दन्त कथाएं प्रचलित थीं। खुदाई का एक उद्देश्य उस क्षेत्र में फैले हुए अन्धविश्वासों का निरस्त करना भी था।।
कब्र खोद ली गई और उसके अवशेष भी प्राप्त कर लिये गये। अब उनका रासायनिक विश्लेषण होना आरम्भ हुआ। इस बीच एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक और भयानक घटनाएं घटित होना आरम्भ हो गयी। डा. ब्रेस्टेड अपनी प्रयोगशाला में अवशेषों लकड़ी के टुकड़े का विश्लेषण करने के लिए एक बर्तन में कुछ रासायनिक पदार्थों के साथ उबाल रहे थे कि इतना भयंकर विस्फोट हुआ कि प्रयोगशाला की छत उड़ गई और दीवारें हिल गईं। इसी बीच एक काला सर्प शोधकर्त्ता कार्टर के घर जा धमका वे स्वयं तो किसी प्रकार बच गये पर उनकी पत्नी को उसने डस ही लिया और वह देखते-देखते मर गई। एक महीना बीता होगा कि लार्ड कारनवर्ग को नन्हें से मच्छर ने काटा और दो दिन के भीतर ही वे मर गये। मच्छर काटने का स्थान बिलकुल सांप के काटने जैसी स्थिति का बन गया था। इतना ही नहीं कारन वर्ग महोदय का हट्टा-कट्टा भाई भी उन्हीं दिनों दो दिन की मामूली बीमारी से चल बसा।।
दल के प्रमुख ब्रेस्टेड कब्र खुदाने के दो सप्ताह के भीतर ही मर गये। अपनी पत्नी को गंवा कर भी कार्टर साहस पूर्वक अन्ध विश्वासों का खण्डन करते रहते थे और शोध कार्य को शिथिल नहीं पड़ने दिया था, पर न जाने क्या कुयोग उत्पन्न हुआ कि वे एक छोटी सी तलैया में जा फंसे और उस कीचड़ में ही फंसे हुए असहाय स्थिति में मरे पाये गये इस प्रकार वह पूरा शोधकर्त्ता दल ही समाप्त हो गया।।
यह घटनाएं मरणोत्तर जीवन के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती हैं और उनके लिए चुनौती देती हैं जो शरीर के साथ ही जीवन का अन्त होने की बात करते रहते हैं। साथ ही वस्तुओं से अत्यधिक मोह होने पर मृत्यु के बाद भी जीवात्मा के उन्हीं जड़ वस्तुओं के इर्द-गिर्द मोहाविष्ट होकर मंडराते रहने की दयनीय स्थिति को भी स्पष्ट करती हैं। अमेरिका और अंग्रेज मिलकर मिश्र की समाधियों की खोज कर रहे थे उस खोज के पीछे मात्र पुरातत्व विषयक रहस्यों का जानना ही नहीं था, पर उनमें दबी हुई विपुल स्वर्ण सम्पदा एवं रत्न राशि से लाभांवित होना भी था। इसके अतिरिक्त एक और भी बात थी—उन किम्वदन्तियों की वास्तविकता जानना जिनमें कहा जाता था कि इन समाधियों की रक्षा प्रेतात्मा करती हैं जो उन्हें छेड़ेगा वह खतरा उठायेगा। एक समाधि पर तो स्पष्ट शब्दों में शिलालेख लगा था—‘‘जो फराऊनी कब्रों को छेड़छाड़ कर मृतात्माओं की शान्ति भंग करेगा उसे अकाल मृत्यु खा जायेगी।’’।
कब्रों की खुदाई का काम सबसे पहले लार्ड कार्नार्वल ने अपने हाथ में लिया था। उनका परिवार भी उस कार्य में दिलचस्पी ले रहा था और सहयोग दे रहा था। इसका भयंकर परिणाम सामने आया। एक-एक करके उस अभियान से सम्बन्धित बाईस व्यक्ति कुछ ही समय के अन्दर काल के गाल में बड़े विचित्र घटना-क्रम के साथ चले गये। लार्ड वेस्टवरी अनायास ही छत पर से कूद पड़े और मर गये। उनका बेटा जो खुदाई का इंचार्ज था। रात को अच्छा खासा सोया सुबह मरा हुआ पड़ा मिला। डा. अर्चिवाल्ड डगलस रीड एक ममी का एक्सरे कर रहे थे कि उनका हार्टफेल हो गया। आर्थर बाइगाल को मामूली सा बुखार ही खा गया। आब्रेहर्वर्टन सहसा पगला गये और आत्महत्या कर बैठे। लार्ड कार्नार्वल की पत्नी लेडी एलिजाबेथ एक तुच्छ से कीड़े के काटने के बहाने से ही ढेर हो गई। इस प्रकार उनका पूरा कुटुम्ब ही नहीं सहकारी मण्डल भी देखते-देखते अकाल मृत्यु का ग्रास हो गया।।
यह प्रख्यात था कि नील नदी की घाटी में अवस्थित तूतनखामन की समाधि सबसे अधिक रहस्यमय साथ ही सर्वाधिक सम्पत्ति से भरी-पूरी है। इसका लोभ खोजी लोग छोड़ नहीं पा रहे थे। यों इतनी मौतें देखते-देखते हो जाने के कारण सारे इंग्लैंड में आतंक छाया हुआ था और प्रेतात्माओं की बात का मखौल उड़ाने वाले लोग भी आश्चर्यचकित होकर इस प्रकार मृत्युएं होने की बात को ‘‘संयोग मात्र नहीं कह पा रहे थे। वे भी इच्छा न रहते हुए भी उन किम्वदन्तियों के आगे सिर झुका रहे थे जिनमें समाधियों के साथ छेड़खानी करने वालों को जोखिम उठाने की चेतावनी दी जाती रही थी।।
यह खुदाई मिश्र में पुरातत्त्ववेत्ता विभाग सम्भालने वाले विद्वान हावर्ड कारटर ने इंग्लैंड के उतसही धनपति लार्ड कानर्विन की साझेदारी में आरम्भ कराई थी। इसका परिणाम कुछ अच्छा नहीं निकला। दोनों ही साझीदार समान रूप से क्षतिग्रस्त हुए कारटर को भी जानमाल की भारी क्षति उठानी पड़ी।।
नगाड़े की चोट और पैसे की थाप ।
रायल सोसाइटी के फैलो जोसेफ ग्लैनविल इंग्लैण्ड के प्रामाणिक और सम्मानित नागरिक थे। उनने अपने संस्मरणों में सन् 1662 में घटित हुई एक प्रेत अस्तित्व की घटना का उल्लेख किया है। उनके कथानुसार इंग्लैण्ड के विल्ट शायर स्थान में नियुक्त एक न्यायाधीश की अदालत में आये एक विचित्र केस का वर्णन है। एक अर्ध विक्षिप्त सा व्यक्ति कहीं से पुराना नगाड़ा खरीद लाया। वह उसे सड़क पर खड़ा होकर विचित्र ढंग से बजाता-भीड़ इकट्ठी करता और पैसे बटोरता। पुलिस ने उसे रास्ता रोकने और अवांछनीय भीड़ जमा करने के अपराध में पकड़ कर नगाड़े समेत अदालत में पेश किया। अदालत ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया और नगाड़े को जब्त का हुक्म दिया। कुछ दिन बाद बेकार पड़े नगाड़े को पुलिस ने उस मजिस्ट्रेट के घर ही पहुंचा दिया। वहां उसे घर के एक कोने में पटक दिया गया।।
जिस दिन से नगाड़ा उनके घर में पहुंचा उसी दिन से वहां प्रेतों के उपद्रव शुरू हो गये। किवाड़ों को खटखटाने की—छप्पर पर धमा चौकड़ी और आंगन में उछल-कूद होने की घटनाएं निरन्तर होने लगीं। बहुत तलाश करने पर भी कोई दिखाई न पड़ता था, पर घटनाएं बराबर होती थीं। स्वयं प्रयत्न करने और नौकरों, पड़ौसियों की सहायता लेने के बाद भी जब उस उपद्रव का समाधान न हो सका तो पुलिस की सहायता ली गई, पर वे लोग भी देखते, सुनते, समझते हुए भी कुछ कर न सके। जो दिखाई ही नहीं देता उसको रोका या पकड़ा कैसे जाय?।
एक दिन मजिस्ट्रेट ने देखा कि किसी मजबूत आदमी ने जोर का धक्का देकर किवाड़ें खोल लीं, चटखनी टूट गई और वह व्यक्ति ओवरकोट पहने हुए घर में भीतर घुसता चला आया और आंगन में होता हुआ जीने के रास्ते छत पर चढ़ गया। आश्चर्य यह था कि ओवरकोट तो आंखों से दीख रहा था, पर पहनने वाले के हाथ-पैर, चेहरा आदि सभी नदारत था। लगता था अकेला कोट ही यह सब हरकतें कर रहा है। इस घटना के बाद तो एक प्रकार से इन उपद्रवों को प्रेतात्मा की करतूत ही मान लिया गया। अब यह तलाश किया जाना था कि आखिर थोड़े ही दिनों से यह उपद्रव क्यों खड़े हुए इससे पहले क्यों नहीं थे? घर में कुछ अजनबीपन तो नहीं हुआ। इस ढूंढ़-खोज में जब्त किया गया वह नगाड़ा ही नजर आया जो एक पगले से छीना गया था और उसने भी किसी कबाड़खाने से खरीदा था। नगाड़ा हटाया गया—साथ ही उन उपद्रवों का भी अन्त हो गया। इतना ही नहीं उस पगले का भी पता लगाया गया तो पता चला कि वह सदा से ही विक्षिप्त नहीं था। सस्ता माल देखकर कबाड़खाने से वह उस नगाड़े को खरीद लाया था। जिस दिन से उसे लाया वह पगला गया और शोर मचाने, भीड़ इकट्ठा करने की करतूतों करने लगा। जिस दिन से नगाड़ा जब्त हुआ उसी दिन से वह सामान्य स्वाभाविक स्थिति में पहुंच गया, जिस दिन नगाड़ा हटाया गया उसी दिन से मोक्सन के घर में भी शान्ति आ गई।।
समझा गया कि उस नगाड़े के असली मालिक की प्रेतात्मा अपनी प्रिय वस्तु के साथ चिपकी रही है और वह वस्तु जहां कहीं भी पहुंची है वहीं उस आत्मा ने भी प्रवेश पदार्पण किया है।।
सत्रहवीं सदी के पादरी जेरेन्सी टेलर ने अपनी स्मरण पुस्तक में एक प्रेतात्मा का आंखों देखा विवरण लिखा है। जब पादरी घोड़े पर सवार होकर वेटफास्ट से डिल्सगेरो जा रहा था तो कोई अजनबी व्यक्ति सहसा उसके पीछे घोड़े की पीठ पर सवार हो गया। चकित पादरी ने उसका परिचय एवं उद्देश्य पूछा तो उसने अपना नाम हैडकजेम्स बताया और कहा आप मेरी विधवा पत्नी तक यह सन्देश पहुंचा दें कि उसका नया पति जल्दी ही उसके साथ धोखा करने वाला है। वह बचे। पादरी ने बताये हुए नाम पते पर वह सन्देश पहुंचा दिया। पर स्त्री ने उस बात पर न तो ध्यान दिया और न विश्वास किया।।
कुछ दिनों बात उस स्त्री का खून हो गया। हत्या का मुकदमा कैरिकफोरेन्स की अदालत में चला। पुलिस को सन्देह था कि यह हत्या उसके नये पति ने पत्नी की सम्पत्ति हड़पने के लिए की है इस संदर्भ में पादरी जेरेंसी टेलर ने भी अपनी प्रेत वार्ता की साक्षी प्रस्तुत की।।
पादरी की गवाही प्रामाणिक नहीं समझी गई और अदालत द्वारा कहा गया कि यदि ऐसी बात है तो मृतात्मा को अदालत में उपस्थित होकर अपनी बात कहनी चाहिए। सर्वत्र सन्नाटा था। अचानक जोर से बिजली कड़कने जैसे आवाज हुई। अदृश्य से एक हाथ निकला और उसने अदालत की मेज पर तीन बार जोर-जोर से थपकी दी। इस दृश्य को देखकर न्यायाधीश एवं सभी आतंकित हो गये। अदालत ने दूसरे पति डेवीज को अपराधी घोषित करते हुए उसे समुचित दण्ड दिया।।
मृतात्मा के प्रिय पदार्थों को दान कर देने अथवा अन्यत्र कहीं स्थानांतरित कर देने का प्रचलन इसी दृष्टि से है कि उसे अन्यत्र जन्म लेने या विकास-क्रम के अनुरूप आगे बढ़ने में अड़चन न पड़े। प्रिय वस्तुओं में उलझा रहने के कारण आत्मा अशान्त और उद्विग्न ही रह सकता है जिस प्रकार घर के सम्बन्धी मृतक का अभाव अनुभव करके दुखी रहते हैं उसी प्रकार वह जीव भी बार-बार अपनी प्रिय वस्तुओं एवं परिस्थितियों के इर्द-गिर्द मंडराते रहकर दुःखी हो सकता है। वहीं डेरा डालकर बैठा रह सकता है और उस उपस्थिति से घर-परिवार के लोगों को असुविधा अनुभव हो सकती है। इसलिए अच्छा यही समझा गया कि उन वस्तुओं को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया जाय। दान में देकर आत्मा को यह विश्वास दिला दिया जाय कि वे पदार्थ अब परिवार के आधिपत्य में नहीं रहे, वरन् किसी धर्म सत्ता के अधिकार में चले जाने के कारण पराये हो गये। मृतक की वस्तुओं का दान करने का एक कारण यह भी है कि घर के लोग उन्हें देख-देखकर शोक-सन्तप्त रहने की कठिनाई से बच जायें और विस्मृति अपनाकर अपना मन जल्दी हलका कर सकें।।
जो हो, इतना निश्चित है कि शरीर के साथ आत्मा का अन्त नहीं हो जाता। यदि आत्मा अधिक भावुक या मोहग्रस्त है तो उसे प्रेतात्माओं के रूप में सम्बन्धित पदार्थों तथा व्यक्तियों से मोह बना रह सकता है। यह मोह मृतात्मा की प्रगति और कुटुम्बियों की सुविधा की दृष्टि से अवांछनीय है। इसलिए अन्त्येष्टि संस्कार के साथ इस प्रकार के धर्मोपचार जोड़े गये हैं जिससे आत्मा का मोह एवं शोक शान्त हो सके उसे अन्यत्र जन्म लेने का अवसर मिल सके।।
संपत्ति का मोह सदा विपत्तियां लाता है ।
सम्पत्ति संचय का व्यसन सबसे बुरे और सबसे घिनौने किस्म का है। कुछ सनकी लोग यह सोचते रहते हैं कि उनके पास जितनी अधिक सम्पदा संग्रहीत होगी उसी हिसाब से उनका गौरव और वर्चस्व बढ़ेगा। लोग उनके भाग्य और पुरुषार्थ का लोहा मानेंगे और बड़प्पन का गौरव प्रदान करेंगे। इसी सनक ने अनेकों को बढ़-चढ़कर बहुमूल्य सम्पदा का स्वामी बनने के लिए प्रोत्साहन दिया। वे उस संचय का उद्धत प्रदर्शन करके लोगों की आंखों को चौंधियाने का प्रयास करते भी रहे। संभव है उनके आस-पास घिरे चापलूसों ने इस सनक का समर्थन भी किया हो और प्रशंसा के पुल भी बांधें हों, पर अन्ततः इसका क्या परिणाम हो सकता है इसे वे न देख सके और न समझ सके। सम्पत्ति का उद्धत प्रदर्शन ईर्ष्या को जन्म देता है। उसे अपने अधिकार में करने के लिए अनेकों के मुंह में से लार टपकती है और जैसे भी बने वैसे उसे हथियाने के दावघातों में से हर एक का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के आक्रमणों को आमन्त्रित करने का श्रेय या दोष उस अनावश्यक सम्पत्ति के संग्रह और उसके उद्धत प्रदर्शन को ही दिया जा सकता है।।
कोहनूर हीरे का इतिहास इसी प्रकार का है। वह जहां भी गया, जहां भी रहा अपने साथ विपत्ति भी लेकर गया और उसे रखने वाले के लिए प्राणघात की विपत्ति संजोये रहा। शाहजहां ने ‘तख्त ताऊस’ इसलिए बनवाया था कि वह संसार के सबसे वैभवशाली लोगों में गिना जा सके। उसकी पीढ़ियां उस पर बैठ कर पुरखों के पुरुषार्थ के गीत गाते रहें, पर वैसा हो न सका जैसा कि चाहा गया था। वैभव का सम्पादन करने वालों की दुर्भाग्य से एक आंख कानी होती है। वे एक पक्षी—एकांगी विचार कर पाते हैं यह नहीं देख सोच पाते कि सम्पत्ति संग्रह का एक विपरीत पक्ष भी है और वह इतना घातक है कि महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति को अत्यन्त कष्टकारक परिस्थितियों में बदल देता है। कोहनूर हीरे का इतिहास भी बड़ा विचित्र और विलक्षण है। भागवत पुराण में उसका उल्लेख स्यमंतक मणि के रूप में मिलता है। द्वारिका के एक नागरिक सत्राजित के पास वह था। कृष्ण ने उससे कहा यह मणि राजा के योग्य है। उसे महाराज उग्रसेन के पास पहुंचाना चाहिये। सत्राजित इस पर तैयार न हुआ तो घटना-क्रम ने दूसरा ही मोड़ ले लिया। सत्राजित का भाई प्रसेनजित उसे सदा छाती से लगाये फिरता था। एक दिन सिंह ने प्रसेनजित को मार कर वह मणि छीनी, सिंह को रीछ ने मारकर उस पर कब्जा जमाया। रीछ की भी खैर नहीं रही। श्रीकृष्ण ने रीछ को परास्त किया उसने न केवल मणि को वरन् उसकी बेटी को भी हथिया लिया। श्रीकृष्ण भी उसे पाकर चैन से न बैठ सके और बहेलिये के हाथों मारे गये। इसके बाद वह पाण्डु वंशियों के पास पहुंचा। परीक्षित, जन्मेजत, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिम्वसार, अशोक, ब्रहद्रथ, पुष्य मित्र—एक के बाद एक के पास पहुंचने की कथाएं भी बड़ी कष्टकर हैं। उसका हस्तान्तरण शान्ति और सद्भावना पूर्ण नहीं हुआ वरन् दुरभि संधियां और हत्याएं ही उसे इधर-उधर लिये फिरी।।
कनिष्क, चन्द्रगुप्त, हर्षवर्धन के बाद वह मालव नरेश यशोवर्मा के पास पहुंचा। उनके वंशज राजा राम व पर अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया और मालव देश को पद-दलित करके उस हीरे को हथिया लिया। इसके बाद दिल्ली के बादशाहों के अधिकार में वह देर तक बना रहा। इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद उसकी बेगम दिल्ली छोड़कर आगरा आ गई थी। उस पर हुमायूं ने हमला कर दिया। इज्जत बचाने के लिए बेगम को हीरा हुमायूं की भेंट करना पड़ा।।
हुमायूं की मौत सीढ़ी पर से फिसलने के कारण हो गई वह कई पीढ़ियों तक उसके वंशजों के पास बना रहा। मुहम्मदशाह पर ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने हमला कर दिया और उसकी पगड़ी में छिपा हीरा झटक कर अपने कब्जे में कर लिया। नादिरशाह के मुंह से उसे देखते ही शब्द निकला—कोह-ए-नूर—अर्थात् प्रकाश का पर्वत। इसे लेकर प्रचुर सम्पदा के साथ वह वापिस लौटा तो रास्ते में भयानक तूफान में उसकी सेना तथा सम्पदा का बड़ा भाग नष्ट हो गया। दादिरशाह चैन से न बैठ सका। उसके भतीजे अलीकुली खां ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उसका यह लाभ अफ़गान सेनापति अहमदशाह अब्दाली से न देखा गया उसने अलीकुली खां को मौत के घाट उतारा और कोहनूर अपने कब्जे में कर लिया।।
अहमद शाह अब्दाली के बाद उसका पुत्र तैमूर शाह इस हीरे का अधिकारी बना। वह जब मरा तो अपने पीछे 23 बेटे छोड़ गया। उनमें सत्ता के लिए तुमुल युद्ध हुआ। उसमें जमान शाह जीता। उससे हीरा छीनने के लिये उसके विश्वासी भाई महमूदशाह ने ही उसे कैद में डाल दिया और यन्त्रणा देकर आंखों निकलवालीं। महमूद को कुचल कर शाहशुजा ने उसे पाया। शाहशुजा कैद में पड़ा हुआ था। उसने अपनी मुक्ति के लिए पंजाब के महाराज रणजीतसिंह से अपनी बेगम के द्वारा प्रार्थना कराई और बदले में कोहनूर देने का वायदा किया। महाराज ने काबुल के वजीर फतह खां को साथ लेकर शाहशुजा को छुड़ाया। शाहशुजा ने छूटने पर हीरा देने में आनाकानी की तो उसे महाराज ने यन्त्रणा देकर विवश कर दिया। उसे देना तो पड़ा पर वह अन्य हीरों के साथ भाग खड़ा हुआ और अंग्रेजों से जा मिला।।
महाराज रणजीत सिंह के मरने के बाद उनका राज्य अंग्रेजों के हाथों में चला गया और साथ ही वह बहुमूल्य हीरा भी। महारानी विक्टोरिया के ताज में उसे और भी खूबसूरत बनाकर जड़ा गया। इसे तराशने और चमकाने में योरोप के कुशलतम रत्न—शिल्पी 38 दिन तक लगे रहे और उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बनाया।।
कोहनूर प्रख्यात है—बड़ा है इसलिए उसकी चर्चा भी बड़ी है। छोटी-मोटी रत्न राशियां भी ऐसी ही विपत्ति संजोये हुए मिलेंगी। चूंकि छोटी सम्पदाएं छोटे लोगों के पास होती हैं और उनकी प्रतिक्रिया एवं विपत्ति भी ऐसी होती है जो सम्बद्ध लोगों को तो पूरी तरह संत्रस्त करे पर ऐतिहासिक घटनाओं में अपना स्थान न पा सके। हस्र छोटे और बड़े अनावश्यक संग्रह का प्रायः एक जैसा ही होता है।।
ऐसी ही दुर्गति शाहजहां के उन अरमानों की हुई जिनमें वह विपुल सम्पदा का स्वामी बनकर गौरवशाली बनने के स्वप्न देखता रहता था। तख्त ताऊस (मयूर सिंहासन शाहजहां ने बनवाया था, उसमें 12 करोड़ रुपये के रत्न जड़े थे उसके निर्माण में सात वर्ष लगे और तत्कालीन श्रेष्ठतम रत्न शिल्पियों ने उसे बनाने में अपना पूरा श्रम, समय एवं मनोयोग लगाया। इसमें पन्ने से बने पांच खम्भों पर मीनाकारी का छत्र बना हुआ था। पाये ठोस सोने के बने थे। खम्भों पर दो-दो मोर नृत्य करते हुए बनाये गये थे। प्रत्येक जोड़े के बीच में हीरे—लाल, मोती, पन्ने आदि रत्नों से जड़ा एक-एक पेड़ था। बैठने के स्थान तक पहुंचने के लिए तीन रत्न जटित सीढ़ियां थीं। उसमें कुल मिलाकर ग्यारह चौखटें थीं। मीनाकारी का स्वर्ण छत्र देखते ही बनता था। तख्त ताऊस को अपने समय की अद्भुत और बहुमूल्य कलाकृति माना जाता था।।
जिन अरमानों के साथ शाहजहां ने उसे बनाया था वे पूरे न हुए। वह कुछ ही दिन उस पर बैठ पाया था कि उसके बेटे औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हुआ। मुहम्मद शाह राज्याधिकारी था। उस पर ईरान का नादिरशाह चढ़ दौड़ा और भारी लूट-खसोट के अतिरिक्त तख्त ताऊस भी फारस उठा ले गया। उसी के कुटुम्बी कुर्दा ने नादिरशाह की हत्या कर दी और उसका सारा माल असवाब छीन लिया और जिसमें यह मयूर जड़ित सिंहासन भी सम्मिलित था। लुटेरों ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और उन्हें आपस में बांट दिया। बटवारे में उस शानदार शामियाने का भी कतरव्योंत कर लिया जो उस सिंहासन के ऊपर ताना जाता था और रत्नों की झिलमिलाहट से आकाश में चमकने वाले सितारों की बहार देता था।।
इसके कुछ समय बाद ईरान की सत्ता आगा मुहम्मद शाह ने संभाली। उसने नादिरशाह के लुटेरे वंशजों को पकड़ कर भारी यातनाएं दीं और लूट का सारा माल उगलवा लिया। इस वापसी में तख्त ताऊस के टुकड़े भी शामिल थे। जौहरियों ने उन टुकड़ों को जोड़-तोड़कर एक नया तख्त ताऊस बनाया। इसके बाद भी वहां अराजकता और गृह युद्ध का सिलसिला चलता रहा और उसे फिर लूट लिया गया। रत्नों को उखाड़ लिया और कीमती पत्थरों को भविष्य में फिर कभी काम में लाने की दृष्टि से समुद्र में किसी खास जगह छिपा दिया गया। छिपाने वाले उस स्थान को बता नहीं सके और वे अवशेष अभी भी ईरान के समुद्र तट के निकट उथली जल राशि में छिपे पड़े हैं। ढूंढ़-खोज से अभी तक उनका पता नहीं चल सका।।
अहंकारी मनुष्य न जाने कब तक सम्पत्तिवान होने पर बड़ा आदमी बनने की साध संजोये रहेगा। रावण, हिरण्यकश्यपु से लेकर नेपोलियन, सिकन्दर तक इसी मूर्खता में अपनी प्रतिमा को नष्ट कर चुके और सुखदायी अन्त देख चुके। हमारी आंखें यदि उन अनुभवों से खुल सकें और संग्रह की अपेक्षा सदुपयोग के लिए अपना उपार्जन प्रयुक्त कर सकें तो कितना अच्छा हो।

