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Books - भूत कैसे होते हैं—क्या करते हैं ?

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न स्वयं विक्षुब्ध हों न औरों को विक्षुब्ध करें

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अब से कोई 20 वर्ष पूर्व इंग्लैंड में एक ऐसी घटना प्रकाश में आई जिसने एक प्रकार से तहलका ही मचा दिया।

पोर्टस् साउथ रोड इशर कस्बे के पास से गुजरती है इस घने जंगलों से घिरे हुए क्षेत्र में लगातार ऐसी घटनायें होने लगीं कि कोई मोटर उधर से गुजरती तो बन्दूक की गोली की तरह सनसनाती हुई चीज आती और मोटर के शीशे, छत या दरवाजे से टकराकर उसमें छेद कर देती। छेद एक इंच का इतना साफ, सीधा, गोल और व्यवस्थित होता मानो किसी बहुत होशियार मिस्त्री ने सधी परखी हुई मशीन से किया है अन्यथा कांच भी किसी चीज की टक्कर से टूट सकता है, उसके टुकड़े बिखर सकते हैं पर चिकने किनारे वाला सही छेद होना तो सचमुच एक बड़े अचम्भे की बात है।

घटनायें लगातार होने लगीं। उधर से गुजरने वाली मोटरों को उस दुर्घटना का अक्सर सामना करना पड़ता। मोटर रुकती, आस पास का क्षेत्र खोजा-छाना जाता, पर आक्रमण कहां से होता है, कौन करता है इसका कुछ भी पता न चलता।

पुलिस ने भारी माथा-पच्ची की पर कुछ पता न चला। गुप्तचर विभाग के स्काटलैंड यार्ड ने आहत मोटर मोटरों को वैज्ञानिक जांच के लिए प्रस्तुत किया पर वहां भी सुराग न मिला। इशर कस्बे की नगरपालिका ने तो पुलिस के खिलाफ एक प्रस्ताव ही पास कर डाला कि वह इस क्षेत्र को आतंकित करने वाली इन वारदातों को न रोक पाती है न खोज करती है। पुलिस वाले लाचार थे, कुछ समझ ही काम नहीं करती थी कि किस आधार पर खोज आगे बढ़ाई जाय। कितने ही पत्रकार वस्तुस्थिति पर प्रकाश डालने के लिए उधर पहुंचे। मोटरों पर अदृश्य आक्रमण होने, केवल शीशे टूटने, गोल और सही छेद होने, कोई जन हानि न होने मोटर के इंजनों को कोई आघात न लगने की बात एक साथ मन पर बिठाने से ऐसा चित्र बन जाता था जिसका हल सूझ ही न पड़े। सुरक्षा के सारे प्रयत्न बेकार हो गये। घटनायें रुक नहीं रही थीं। कौतूहल और आतंक बढ़ने से उस क्षेत्र का आवागमन रुकने भी लगा था और हर तरह परेशानी अनुभव की जा रही थी।

कोई कहते थे कि इस घने जंगल में कोई मृत्यु किरण जैसा परीक्षण हो रहा है और वे किरणें छिटककर ऐसा छेद करती हैं। इन किम्वदन्तियों का विज्ञान विभाग ने स्पष्ट खण्डन किया। फिर कारण क्या हो सकता है यह रहस्य बीस वर्ष बाद भी अभी जहां का तहां बना हुआ है। कुछ समय बाद दुर्घटनायें बन्द हो गईं पर गुप्तचर विभाग के खोज कार्यों में वह तथ्य अभी भी जहां का तहां मौजूद है।

परोक्ष जीवन और अदृश्य जगत पर विश्वास करने वाले इस घटना क्रम का सम्बन्ध दो भूतकालीन तथ्यों के साथ जोड़ते हैं इनमें से एक तथ्य यह है कि यह क्लेयर माउण्ड स्टेट पहले एक जागीरदार ड्यूक आफ न्यू काउन्सिल के पास थी। उसने इस क्षेत्र में एक सुन्दर झील बनवाई। विलियम केन्ट नामक ठेकेदार ने इसे बहुत दिलचस्पी और खूबसूरती के साथ बनवाया। तैयार हो गयी तो ड्यूक ने उसका पैसा दबा लिया और अपने नौकरों से उसे उसी झील में फिंकवा दिया। बेचारा किसी प्रकार निकल तो आया पर दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। सुना जाता है कि उसकी क्षुब्ध आत्मा को मोटर स्वामी ड्यूक के प्रति द्वेष अभी भी विद्यमान होगा और वह ड्यूक के साथ-साथ मोटरों से भी घृणा करने लगी होगी और अब ड्यूक के न रहने पर उन्हीं से बदला लेती होगी।

दूसरी एक और घटना भी इस स्टेट से संबंधित है और उस आधार पर भी उद्विग्न मृतात्मा द्वारा इस प्रकार के उपद्रव की बात सोची जाती है। लार्ड क्लाइव ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से हिन्दुस्तान गया। वहां उसने छल बल से जहां अंग्रेजी राज्य बढ़ाया वहां अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साधन भी खूब किया। वह करोड़ों रुपये की पूंजी बना कर ले गया और जागीरी शान से रहने के लिए उसने क्लेयर माउण्ड का इलाका खरीद लिया। नवाबी ठाठ और वैसी ही विलासिता के साथ वहां रहने लगा। इंग्लैण्ड भर में उसके दुष्ट दुराचरण की चर्चा थी। हर कोई उससे घृणा करता था। कहीं उसे न सम्मान मिलता था, न स्वागत न सहयोग। इस जंगल में महल बना कर वह बहुत से खानसामा, रसोइया, नौकर, वेश्याएं साथ लेकर रहा करता था। किसी को वह सुहाता न था न उसे कोई। सुनसान जंगलों में मरघट के प्रेत की तरह विचरण करके वह अपना जी बहलाता था, अपने पुराने कुकृत्यों की याद करके वह जीवन के अन्तिम दिनों में अर्द्ध विक्षिप्त की तरह रहने लगा था। खूंखारों जैसी इसकी प्रकृति हो गई थी, मोटरों की आवाज उसे बहुत ही नापसन्द थी। उसने एक दिन सनक में आकर पास वाली सड़क को बन्द करा दिया और मोटरों के लिए बारह मील दूर रास्ता बना दिया ताकि उसके कान में उसकी द्वेष केन्द्र मोटर की न आवाज आये न उसकी सूरत दीखे।

क्लाइव भारत में किये गये अपने द्वारा कुकर्मों की लम्बी गाथा के पृष्ठ खोलता, कोई दूसरा सुनने वाला न होता तो अपने आप से ही बातें करता। एक दिन इसी असह्य मानसिक तड़पन में आत्महत्या करली और घिनौने कुत्ते की तरह ऐसे ही उधर कहीं दफना दिया गया।

क्लाइव की आत्मा संभव है अपना मोटर द्वेष अभी भी धारण किये हुए हो और सम्भव है इसी क्षेत्र में उनका आवागमन उसे सहन न होता हो और आक्रमण का ऐसा अनोखा शस्त्र उसी के द्वारा प्रयुक्त किया जाता हो।

मरने के बाद मनुष्य की काया ही नष्ट होती है। अन्तःकरण चतुष्टय मरने के बाद भी यथावत् बना रहता है। यदि मन आत्म-ग्लानि, आक्रोश आदि भावों से भरा रहे तो उससे ने केवल इस जीवन में भी वह मनःस्थिति बहुत अंशों में ज्यों की त्यों बनी रहती है और विश्राम के लिये मिले हुए उस अवकाश में भी प्राणी को चैन नहीं लेने देती। इस तथ्य पर उपरोक्त घटनाओं से प्रकाश पड़ता है। इस प्रकार का यही एक प्रमाण नहीं वरन् समय-समय पर ऐसी ही अनेक घटनायें घटित होती रहती हैं पर इन्हें महत्व नहीं मिलता। उपहास और अविश्वास के गर्त में वे घटनायें भी उपेक्षित हो जाती हैं जो वस्तुतः बहुत प्रामाणिक थीं; यदि उनका गहराई से विश्लेषण होता तो उस प्रत्यक्ष के आधार पर परोक्ष पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ सकता था।

उपरोक्त इशर कस्बे के समीप वाले जंगल की घटना को इसलिए महत्व मिला कि पुलिस पत्रकार आदि लोगों ने उसमें दिलचस्पी ली। यदि वे लोग उस खोज बीन में भाग न लेते तो मोटर वालों की ही सनक या शरारत कहकर उसे उपेक्षित कर दिया गया होता। यह ठीक है कि कितनी ही मनगढ़ंत ऊल जुलूल बातें भी होती रहती हैं पर उनमें से कुछ ऐसी भी होती हैं जिनकी खोज-बीन करने से उन तथ्यों पर प्रकाश पड़ सकता है जो अभी तक एक प्रकार से अपूर्ण, उपेक्षित और अविश्वस्त ही बने हुए हैं। इस घटना में ठेकेदार की आत्मा का प्रकोप सिद्ध नहीं होता। क्योंकि एक व्यक्ति के दुर्व्यवहार का क्षोभ प्रायः एक तक ही सीमित रहता है। दूसरी बात यह है कि अन्याय पीड़ित व्यक्ति की अन्तरात्मा कलुषित नहीं होती इसलिए वह उग्र स्तर के ऐसे विग्रह नहीं करती जो अन्य निर्दोष लोगों को कष्ट पहुंचाए।

जिसका जीवन स्वयं में कलुषित रहा हो, जिसने अनेकों को कष्ट पहुंचाने में रस लिया हो, स्वार्थ सिद्धि के लिए कितनों के साथ ही अनाचार विश्वासघात किया हो। ऐसे ही लोगों की आत्मायें इतनी हिंस्र हो सकती हैं जो अनायास लोगों को कष्ट पहुंचा कर अपनी पूर्व आकांक्षाओं की तृप्ति करें। इस दृष्टि से क्लाइव की आत्मा के द्वारा यह उपद्रव होता हो तो आश्चर्य की बात नहीं है।

घटना इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि एक शरीर छोड़ने और दूसरा प्राप्त करने के मध्यान्तर में आत्मा को सूक्ष्म शरीर धारण करके अन्तरिक्ष में विचरण करना पड़ता है। यह इसलिए भी होता होगा कि शरीर रहते किये हुए दुष्कृत्यों के परिणामों को वह अधिक विस्तार-पूर्वक देख समझ सके और भविष्य के लिए उस अवांछनीय नीति की अनुपयुक्तता को स्वीकार कर सके।

दूसरा तथ्य यह प्रकट होता है कि सूक्ष्म शरीर बिलकुल असमर्थ नहीं हो जाता, उसमें न केवल भावनात्मक क्षमता रहती है वरन् भौतिक वस्तुओं को प्रभावित करने जैसी सामर्थ्य भी रहती है। यदि ऐसा न होता तो मोटर के शीशों में ठीक गोल छेद करना कैसे बन पड़ता? उस क्षमता को प्रेत जीवन में भी भले और बुरे प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त करके पुण्य और पाप की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

मरणोत्तर जीवन में संस्कार क्षेत्र प्रौढ़ रहता है, विचार तन्त्र सो जाता है। जिस प्रकार के विचारों और कार्यों में मनुष्य जीवन भरा रहता है वहीं अन्तःचेतना मरणोत्तर स्थिति में प्रबल रहती है और अनायास ही उसी स्तर की गति विधियों का क्रम चलता रहता है।

मरणोत्तर जीवन, शान्त, सुखी, परोपकारी स्थिति का रहे, इसके लिए इसी जन्म में तैयारी करनी पड़ती है। उच्च विचार और शुद्ध जीवन रख कर जहां इहलौकिक जीवन सराहनीय और सम्मानित स्तर का रखा जा सकता है वहां उसका परिणाम मरणोत्तर काल में देवोपम हो सकता है। दुष्ट और दुरात्मा जीवन क्रम न इस लोक में सराहा जाता है न परलोक में शान्ति मिलने देता है। विक्षुब्ध, दुष्कर्म निरत लोग न इस लोक में शान्ति पाते हैं, न ही परलोक में।

अनीति का प्रतिशोध

जापान की जनश्रुतियों में सत्रहवीं सदी के महाप्रेत सोगोरो की कथा एक ऐतिहासिक तथ्य की तरह सम्मिलित हो गई है और अनाचार बरतने वालों को अक्सर वह घटना-क्रम इसलिए सुनाया जाता रहता है कि वे अनीति से बाज आयें।

जापान उन दिनों सामन्ती जागीरों में बंटा हुआ था। राजधानी तो यदो नगरी थी पर जागीरदार अपने-अपने छोटे ठिकानों से राज-काज चलाते थे। ऐसा ही एक ठिकाना था शिमोसा प्रान्त का साकूरागढ़। इसका एक सामन्त था—कोत्सुके। उसने प्रजा पर अत्यधिक कर लगाये और किसानों पर इतने जुल्म ढाये कि वे त्राहि-त्राहि कर उठे। अन्ततः 136 गांवों के किसानों ने मिल कर अपना दुखड़ा जागीरदार के कानों तक पहुंचाने का निश्चय किया। वे सोचते थे शायद छोटे कर्मचारी उन्हें सताते हैं। सामन्त को बात मालूम पड़ेगी तो वह उनकी पुकार सुनेगा। इस विचार से वे उनके प्रतिनिधि साकूरा चल पड़े। उनका जत्थेदार था 48 वर्षीय सोगोरो। उन लोगों ने एक लम्बी अर्जी लिखी और प्रयत्न किया कि उसे जागीरदार को दें। अधिकारियों ने उन्हें भेंट करने की इजाजत नहीं दी और अर्जी को पढ़कर वापिस लौटा दिया। इतने पर भी उनने हिम्मत नहीं छोड़ी और जब सामन्त अपने गढ़ में प्रवेश कर रहा था तो उसकी बग्घी रोक कर अर्जी हाथ में थमा ही दी। वहां भी उसे रद्द कर दिया गया। अन्य किसानों को तो वापिस लौटा दिया गया पर सोगोरो एक सराय में ठहरा ही रहा और उसने जापान सम्राट तक किसानों की दुख गाथा पहुंचाने का निश्चय किया। संयोगवश सम्राट् अपने पूर्वजों की समाधि पर पूजा करने के लिए वहां आने वाले थे। कृषक मुखिया ने यह अच्छा अवसर समझा और उस अर्जी की नकल सम्राट् का रास्ता रोक कर उनके हाथ में थमा दी। परिणाम तो कुछ नहीं निकला पर सामन्त ने सोगोरो को गिरफ्तार करा लिया। उस पर शासकों के विरुद्ध धृष्टता बरतने और षडयंत्र करने का मुकदमा चलाया गया। दण्ड में न केवल उसे वरन् उसके सारे परिवार को कत्ल कर देने का आदेश सुनाया गया। जन-समूह की उपस्थिति में 48 वर्षीय सोगोरो उसकी 38 वर्षीय पत्नी मिन, 13 वर्षीय पुत्र जेन्नोसूके, 10 वर्षीय पुत्र सोहैयी, 7 वर्षीय पुत्र किहावी का सिर धड़ से उड़ा दिया गया। दर्शक कलेजा थाम कर इस कुकृत्य को देखते रह गये।

लाशें दफना दी गईं पर वातावरण में न जाने कैसा भयंकर उभार आया कि सर्वत्र एक आग और घुटन अनुभव की जाने लगी। शासकों को विचित्र भयानकता ने घेर लिया। तीसरे ही दिन सुधार घोषणाएं हुईं। किसानों पर अत्याचार की जांच आरम्भ हुई और साकूरागढ़ के समस्त सलाहकार, चार जिलों के शासनाध्यक्ष, बाईस अफसर, सात न्यायाधीश तीन लेखा परीक्षक बर्खास्त कर दिये गये और किसानों पर से समस्त बढ़े हुए कर तथा लगे हुए प्रतिबन्ध उठा लिये गये।

ऐसा विचित्र परिवर्तन कैसे हुआ? सामन्त यकायक कैसे बदल गया? यह सब आश्चर्य का विषय था पर जानने वाले कहते थे सोगोरो का प्रेत इस बुरी तरह राज्य परिवार के पीछे पड़ा है कि अब उन्हें किसी प्रकार अपनी खैर दिखाई नहीं पड़ती। सामन्त कोत्सुके नोसूके और उसकी पत्नी सोते जागते भयंकर प्रेत छाया को अपने चारों ओर अट्टहास करते हुए देखते और अनुभव करते उन्हें अब तो मृत्यु का ग्रास बनना ही पड़ेगा। नंगी तलवार का पहरा बिठाया गया, ओझा-तान्त्रिक बुलाये गये पर किसी से कुछ रोकथाम न हुई। सामन्त की पत्नी बीमार पड़ी और चारपाई पर से उसकी लाश ही उठी। वह स्वयं विक्षिप्त सा रहने लगा। एक अवसर पर राजधानी याहीशी में सभी सामन्त सम्राट को वार्षिक भेंट देने के लिए उपस्थित हुए थे। इनमें से साकेयी के साथ कोत्सुके की झड़प हो गई उसने आव गिना न ताव झट तलवार चला दी और उसकी हत्या कर दी। इसके बाद वह जान बचा कर भागा और अपनी गढ़ी में आ छिपा। सम्राट् ने पांच हजार सैनिक भेजकर उसकी गढ़ी पर कब्जा कर लिया और कबूतर पकड़ने जैसे जाल में बंधवा कर राजधानी बुलाया। जहां उसका सिर उसी तरह उड़ाया गया जैसा कि सोगोरो का उड़ाया गया था।

अनीति पूर्वक सताने वालों को इस घटनाक्रम को सुनाकर यह शिक्षा दी जाती है कि दुर्बल को सताने वाला यह न समझे कि वह सर्व समर्थ है। अन्याय के प्रति विद्रोह की आग इतनी प्रचण्ड होती है कि प्रेत बनकर भी प्रतिशोध ले सकती है और अत्याचारी को उसके कुकृत्य का मजा चखा सकती है। दुर्बलों का विक्षोभ कभी भी प्रबल प्रचण्ड बनकर आततायी पर टूट पड़ सकता है।

विक्षुब्ध आत्मा का अभिशाप

ऐसी ही एक और घटना है। अफ्रीका के नाइजीरिया देश में एक समय अंग्रेजों का उपनिवेश था। अब यों वहां आजादी है, पर प्रभुत्व वहां स्थायी रूप से बसे हुए गोरों का ही है।

उस क्षेत्र के एक अंग्रेज अफसर फ्रेंक हाइब्स ने नाइजीरिया में आंखों देखा प्रेत विवरण प्रकाशित कराया था। वह अफसर किसी काम से ‘इसुइंगु’ गया। वहां एक पुराना टूटा-फूटा डाक बंगला था। उसने उसी में ठहरने का निश्चय किया। उस क्षेत्र के रहने वाले इसुओरगु कबीले के आदिवासी उसे समझाते रहे कि इस डाक बंगले में प्रेत रहते हैं, इसलिए वह वहां न रहे। उन्हीं के घरों में ठहर जायं।

अफसर उनकी अन्धमान्यताओं पर हंसता रहा और कहता रहा—‘‘उनके गन्दे घरों की अपेक्षा प्रेत के साथ खुले डाक बंगले में रहना अच्छा है।’’ मजदूरों ने उस खण्डहर की सफाई करदी। खाने, ठहरने के साधन जुटा दिये, पर रात को वहां रहने के लिए कोई तैयार न हुआ। निदान उसे अकेले ही उसमें रहकर रात बितानी पड़ी।

रात को बारह बजे तक वह सोता रहा किन्तु अर्धरात्रि होते ही किसी ने उसकी मच्छरदानी खींची। उठकर देखा तो कोई नजर नहीं आया किन्तु बदबू इतनी तेज फैल रही थी कि वहां ठहराना मुश्किल हो गया। इतने में एक तेज हवा के झोंके ने बंगले की खिड़कियां जोरों से खड़काना शुरू कर दीं और मेज पर रखी चाय की प्लेट जमीन पर पटक दीं। साथ ही किन्हीं भारी पैरों की आवाज उसे इस तरह सुनाई पड़ने लगी मानो कोई बड़ी आकृति का प्राणी इधर, टहल रहा हो, भरी पिस्तौल हाथ में लेकर हाइव्स बाहर निकला तो देखा कि अंधेरे में कोई छाया जैसी आकृति बरामदे में टहल रही है। अफसर ने आवाज दी, पर कोई उत्तर न मिला तो उसने दो गोलियां दाग दीं। पर इसका कोई प्रभाव उस आकृति पर न पड़ा। आकृति समीप बढ़ती आई और उसकी शकल आसानी से दीख पड़ने लगी। भयंकर चेहरा, नाक बैठी हुई, होठ खुले हुए, गंजा सिर, स्थिर पुतली, गड्ढों और झुर्रियों से भरे गाल—वह बड़ा भयानक लग रहा था। अफसर मूर्तिवत् सुन्न खड़ा रहा। वह सोच न सका कि यह कौन है और क्या कर रहा है। धीरे-धीरे आकृति पीछे हटी और खम्भे पर चढ़ने लगी। अफसर ने उसे निशाना बनाकर दो गोलियां और चलाईं, पर वह लगी किसी को नहीं। छाया भी गायब हो गई। डरा हुआ हाइव्स बेतहाशा भागा और कुछ दूर एक चीख के साथ बेहोश हो गया। आदिवासी यह जानने के लिए इर्द-गिर्द ही घूम रहे थे कि देखें क्या घटना घटित होती है। वे लोग चीख सुनकर दौड़े आये और अफसर को उठाकर अपनी चौपाल पर ले गये। जहां उसे कई घण्टे बाद होश आया।

दूसरे दिन अफसर ने आदिवासियों को बुलाकर उनके परिचित प्रेत की बाबत पूछताछ की तो इसुओरगु लोगों ने बताया कि जिस जगह डाक बंगला बना है पहले उस जगह एक टीला था जिस पर जूजू देवता की पूजा होती थी और जानवरों तथा मनुष्यों की बलि दी जाती थी। अंग्रेज जब आये तो उन्होंने उस स्थान की अनगढ़ मूर्तियों को उठवाकर एक ओर फिंकवा दिया—नरबलि बन्द करा दी और डाक बंगला बनवा दिया। इस पर उस क्षेत्र का देव पुरोहित बहुत बिगड़ा और अंग्रेजों के चले जाने पर गांव वालों को इकट्ठा करके बोला—डाक बंगले को जला दो और वहां फिर से देवता की पूजा आरम्भ करो। भयभीत ग्रामवासी इसके लिए तैयार नहीं हुए। निराश पुरोहित क्रोध में उन्मत्त स्थिति में पागलों की तरह बड़बड़ाता और मंत्र पढ़ता हुआ उस डाक बंगले के चारों ओर चक्कर लगाता रहा और अन्त में एक रस्सी से उसी के बरामदे में फांसी लगाकर मर गया, तब से अब तक उसी पुरोहित का प्रेत डाक बंगले में रहता है। कोई उधर जाने की हिम्मत नहीं करता। इससे पहले भी कोई अंग्रेज अफसर आया है और उसमें ठहरा है तो उसे भी प्रेत ने रहने नहीं दिया है।

उस बंगले में ठहरने वाले यह अनुभव करते रहे हैं कि विचित्र प्रकार की दुर्गन्ध उस बंगले के कमरों से आती है। उस भीषण उष्ण क्षेत्र में जहां रात को भी लोग हांफते रहते हैं। इस बंगले में कंपाने वाली ठण्डक रहती है। बाहर हवा बिलकुल ही बन्द क्यों न हो किन्तु भीतर आंधी-तूफान उठते रहते हैं।

फेंक हाइव्स ने इन सब बातों की जानकारी विस्तार पूर्वक प्राप्त की और जब उसे डाक बंगले के भुतहे होने का विश्वास हो गया तो भविष्य में किसी अफसर पर संकट न आये यह ध्यान में रखते हुए उसमें अपने सामने आग लगवा दी और वह जलकर धराशायी हो गया। कितने आश्चर्य की बात है कि इस अग्निकाण्ड के साथ भविष्यवाणी भी सिद्ध हुई। पुरोहित जब आदिवासियों को डाक बंगला जलाने के लिए तैयार न कर सका तो उसने इतना ही कहा—‘‘अच्छा तुम मत जलाओ—पर देखना एक दिन वह किसी न किसी के द्वारा जलकर ही नष्ट होगा।’’ सचमुच उस डाक बंगले का अन्त वैसा ही हुआ। विक्षोभ जब अन्तःकरण में आंधी की तरह बहता है, तो यह मृत्यु के बाद भी सक्रिय रहता है।

इसीलिए विक्षोभ, उद्वेग की मनःस्थिति से बचकर रहने का शिक्षण-परामर्श विवेकशील मनीषी सदैव देते रहते हैं। धार्मिक शिक्षण का प्रयोजन ही व्यक्ति को सुख शान्ति की जननी सुविकसित मनोभूमि का निर्माण स्वयं करने की प्रेरणा देना है। आक्रोश-आवेश की अधिकता सामाजिक और पारिवारिक जीवन को ही नहीं अस्त-व्यस्त कर देती, अपितु व्यक्ति-चेतना में संस्कार रूप में घुसकर उसका पारलौकिक जीवन तक कष्टकारक बना डालती है। घृणा और रोष की स्थिति में मरने वाले अक्सर प्रतिपक्षी को कष्ट देते हैं ऊपर की घटना में पुरोहित प्रेत लीला हटाने के कारण रुष्ट हुआ और उस आक्रोश में आत्महत्या कर बैठा। मरने के बाद भी वह शांत नहीं हुआ और उद्विग्न आत्मा उस टीले की जगह घने डाक बंगले को अपनी प्रतिहिंसा का केन्द्र बनाये रही। ऐसे ही विक्षुब्ध प्रेतों का वर्णन लन्दन के प्रसिद्ध टावर के संदर्भ में आता है।

सन् 1864 की ठण्ड की रात्रि की एक घटना है। राजा की शाही रायफल कोर्प्स का एक संतरी विलियम पहरा दे रहा था। उसने टावर के बन्द दरवाजे के मध्य से धुंधलके के मध्य एक सफेद आकृति को अपनी ओर आते देखा। उसने चेतावनी दी—‘‘हाल्ट’’। दो बार दोहराने पर भी वह रुकी नहीं और उसकी रायफल का वेयोनेट उस छाया के मध्य से निकल गया। यहीं विलियम बेहोश हो गया। जहां वह गिरा यह वही स्थान था, जहां रानी ‘एने बोलेन’ को हेनरी-7 के समय में फांसी दी गयी थी कुछ दिनों बाद उस पहरेदार की मृत्यु हो गई।

हेनरी—8 भी उसी महल में रहे थे एवं यहीं पास में उन्हें दफनाया गया था। उनकी भयंकर आकृति अक्सर टावर में वहां के अधिकारियों ने घूमती देखी। इस समय 30 लाख पर्यटक हर वर्ष इस ऐतिहासिक टावर को देखने आते हैं। सन् 1078 ईसवी से कई राजाओं व उनके परिवार का इतिहास इसी टावर से जुड़ा है। राजगद्दी के झगड़ों में इनमें से कई ने हत्यायें की व कुछ ने आत्महत्या। इन सभी के प्रेत यदाकदा किसी न किसी ने वहां देखे ही हैं। इन प्रेतों की शांति हेतु एक पादरी ने सन् 1854 में एक ईसाई कर्मकांड भी किया, जिसके बाद घटनाओं में कुछ कमी तो आई, पर सिलसिला अभी जारी है।

भारतीय दर्शन की इस मान्यता के समर्थन में ऐसी अनगिनत घटनायें हैं जो स्पष्ट करती हैं कि मनुष्य को इस जीवन में अपने आपको आकांक्षाओं, वासनाओं के अतिरेक आवेग से मुक्त करने का प्रयत्न करना ही चाहिये अन्यथा मरणोत्तर अवधि में भी ये कुसंस्कार और कुप्रवृत्तियां जीवन को भारभूत, निरानन्द बनाए रखेंगी तथा व्यर्थ के भटकाव का कारण बनेंगी।
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