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Books - विपत्ति निवारिणी गायत्री

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


गायत्री द्वारा सम्पूर्ण दुःख का निवारण

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मनुष्य ईश्वर का उत्तराधिकारी एवं राजकुमार है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। अपने पिता के सम्पूर्ण गुण और वैभव बीज रूप से उसमें मौजूद हैं। जलते हुए अंगार में जो शक्ति है वही छोटी चिनगारी में भी मौजूद है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य बड़ी निम्नकोटि का जीवन बिता रहा है। दिव्य होते हुए भी दैवी सम्पदाओं से वंचित हो रहा है।

परमात्मा सत है, परन्तु उसके पुत्र हम असत् में निमग्न हो रहे हैं। परमात्मा चित्त है हम अन्धकार में डूबे हुए हैं। परमात्मा आनन्द स्वरूप है हम दुखों से संतप्त हो रहे हैं। ऐसी उल्टी परिस्थिति उत्पन्न हो जाने के कारण क्या है यह विचारणीय प्रश्न है। जब कि ईश्वर का अविनाशी राजकुमार अपने पिता इस के सुरम्य उपवन संसार में विनोद क्रीड़ा करने के लिए के आया हुआ है तो उसकी जीवन यात्रा आनन्दमयी न रहकर दुख दरिद्र से भरी हुई क्यों बन गई है? यह एक विचारणीय पहेली है।

अग्नि स्वभावतः उष्ण और प्रकाशवान् होती है, परन्तु जब जलता हुआ अंगार बुझने लगता है तो उसका ऊपरी भाग राख से ढक जाता है। तब उस राख से ढके हुए अंगार में वे दोनों की गुण दृष्टिगोचर नहीं होते जो अग्नि में स्वभावतः होते हैं। बुझा हुआ, राख से ढका हुआ अंगार न तो गरम होता है और न प्रकाशवान। वह काली कलूटी कुरूप भस्म का ढेर मात्र बना हुआ पड़ा रहता है। जलते हुए अंगार को इस दुर्दशा में ले पहुंचने का कारण वह भस्म है जिसने उसे चारों ओर से घेर लिया है। यदि यह राख की परत ऊपर से हटा दिया जाय तो भीतरी भाग में फिर वैसी ही अग्नि मिल सकती है जो अपने उष्णता और प्रकाश के गुण से सुसम्पन्न है।

परमात्मा सच्चिदानन्द है। वह आनन्द से ओत प्रोत है। उनका पुत्र आत्मा भी आनन्दमय ही होना चाहिए। जीवन को विनोद क्रीड़ा करते हुए इस भूलोक के नन्दनवन में उसे आनन्द ही आनन्द अनुभव होना चाहिए। इस वास्तविकता को छिपा कर जो उसके बिलकुल उलटी दुःख दरिद्र और क्लेश कलह की स्थिति उत्पन्न कर देती है वह कुबुद्धि रूप राख है। जैसे राख अंगार को ढक कर उसको अपनी स्वाभाविक स्थिति से वंचित कर देती है वैसे ही आत्मा की परम सात्विक, परम आनन्दमयी स्थिति को यह कुबुद्धि ढक लेती है और मनुष्य निष्कृष्ट कोटि का दीन हीन जीवन व्यतीत करने लगता है।

‘कुबुद्धि’ को ही माया, असुरता, अंधतमिस्रा, अविद्या आदि नामों से पुकारते हैं। यह आवरण मनुष्य की मनोभूमि पर जितना मोटा चढ़ा होता है वह उतना ही दुखी पाया जाता है। शरीर पर मैल की जितनी मोटी तह जम रही होगी उतनी ही खुजली मचेगी और दुर्गन्ध उठेगी, यह तह जितनी ही कम होगी उतनी ही खुजली और दुर्गन्ध कम होगी। शरीर में दूषित, विजातीय विष एकत्रित न हो तो किसी प्रकार का कोई रोग न होगा। पर यह विकृतियां जितनी अधिक जमा होती जायेंगी शरीर उतना ही रोग ग्रस्त होता जायेगा। ‘‘कुबुद्धि’’ एक प्रकार से शरीर पर जमी हुई मैल की तरह या रक्त में भरी हुई विषैली विकृति है जिसके कारण खुजली, दुर्गन्ध, बीमारी तथा अनेक प्रकार की अन्य असुविधाओं के समान जीवन में नाना प्रकार की पीड़ा, चिन्ता, बेचैनी और परेशानी उत्पन्न होती रहती है।

लोग नाना प्रकार के कष्टों से दुखी हैं। कोई बीमारी से कराह रहा है, कोई गरीबों से दुखी है, किसी का दाम्पत्ति जीवन कष्टमय है, किसी को सन्तान की चिन्ता है, व्यापार में घाटा, उन्नति में अड़चन, असफलता की आशंका, मुकदमा, शत्रु के आक्रमण का भय, अन्याय का उत्पीड़न, मित्रों का विश्वासघात, दहेज की चिन्ता, प्रियजनों का विछोह आदि का दुख आये दिन दुखी बनाये रहता है। व्यक्तिगत जीवन की भांति धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी अशान्ति कम नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अपने आपको बहुत सम्हाल कर रखे, तो भी व्यापक बुराइयों एवं कुव्यवस्थाओं के कारण उसकी शान्ति नष्ट हो जाती है और जीवन का आनन्दमय उद्देश्य प्राप्त करने में बाधा पड़ती है।

दुख चाहे व्यक्तिगत हों या सामूहिक उनका कारण केवल मात्र एक ही है और वह है कुबुद्धि। संसार में इतने प्रचुर परिमाण में सुख साधन भरे पड़े हैं कि इन खिलौनों में खेलते खेलते सारा जीवन हंसी खुशी में बीत सकता है। मनुष्य को ऐसा अमूल्य शरीर, मस्तिष्क एवं इन्द्रिय समूह मिला हुआ है कि उसके द्वारा साधारण वस्तुओं एवं परिस्थितियों में भी इतना आनन्द किया जा सकता है कि स्वर्ग भी उसकी तुलना में तुच्छ सिद्ध हो। इतना सब होते हुए भी लोग बेतरह दुखी हैं, जिन्दगी में कोई रस नहीं, मौत के दिन पूरे करने के लिए समय को एक बोझ की तरह काटा जा रहा है। मन में चिन्ता, बेबसी, भय, दीनता और बेचैनी की अग्नि दिन भर जलती रहती है। जिसके कारण पुराणों में वर्णित नारकीय यातनाओं जैसी व्यवस्थायें सहनी पड़ती हैं।

यह संसार चित्र सा सुन्दर है इसमें कुरूपता का एक कण भी नहीं, यह विश्व विनोद मय क्रीड़ा का प्रांगण है इसमें चिन्ता और भय के लिए कोई स्थान नहीं, यह जीवन आनन्द का निर्बाध निर्झर है इसमें दुखी रहने का कोई कारण नहीं। स्वर्गादपि गरीयसी इस जननी जन्मभूमि में वे सभी तत्व मौजूद हैं जो मानस की कली को खिलाते हैं। इस सुर दुर्लभ नर तन की रचना ऐसे सुन्दर ढंग से हुई है कि साधारण वस्तुओं को वह अपने स्पर्श मात्र से ही सरस बना लेता है। परमात्मा का राजकुमार आत्मा इस संसार में क्रीड़ा कल्लोल करने आता है। उसे शरीर रूपी रथ, इन्द्रियों रूपी सेवक, मस्तिष्क रूपी मंत्री देकर परमात्मा ने यहां इसलिए भेजा है कि इस नन्दन वन जैसे संसार की शोभा को देखे, इसमें सर्वत्र बिखरी हुई सरसता का स्पर्श और आस्वादन करें। प्रभु के इस महान उद्देश्य में बाधा उपस्थित करने वाली, जीवन के महान प्रयोजन को नष्ट करने वाली, स्वर्ग को नरक बना देने वाली कोई वस्तु है तो वह केवल ‘कुबुद्धि’ ही है।

स्वस्थता हमारी स्वाभाविक स्थिति है, बीमारी अस्वाभाविक एवं अपनी भूल से पैदा हुई वस्तु है। पशु पक्षी जो प्रकृति का स्वाभाविक अनुसरण करते हैं, बीमार नहीं पड़ते, वे सदा स्वास्थ्य का सुख भोगते हैं पर मनुष्य नाना प्रकार के मिथ्या आहार व्यवहारों द्वारा बीमारी को न्योत बुलाता है। यदि वह भी अपना आहार बिहार प्रकृति के अनुकूल रखे तो कभी बीमार न पड़े। इसी प्रकार ‘सद्बुद्धि’ स्वाभाविक है। वह ईश्वर प्रदत्त है, दैवी है, जन्म जात है, जीवन संगिनी है। संसार में भेजते समय प्रभु हमें सद्बुद्धि रूपी कामधेनु भी देते हैं। ताकि वह हमारे सम्पूर्ण सुख साधन जुटाती रहे, परन्तु हम भूल वश, भ्रम वश, अज्ञान वश मायाग्रस्त होकर सद्बुद्धि को त्यागकर कुबुद्धि को अपना लेते हैं और जैसे मिथ्याचार से बीमारी न्योत बुलाई जाती है वैसे ही मानसिक अव्यवस्था के कारण कुबुद्धि को आमन्त्रित किया जाता है। यह पिशाचिनी जहां नहीं कि जीवन का सारा क्रम उलटा हुआ नहीं, दुर्बुद्धि के साथ शान्ति का कोई सम्बन्ध नहीं, दोनों एक साथ नहीं रह सकतीं, जहां कुबुद्धि होगी, वहां तो अशांति, चिन्ता, तृष्णा, दीनता, नीचता, भय, कायरता आदि की कष्टकारक स्थितियों का ही निवास होगा।

गायत्री, सद्बुद्धि ही है। इस महामंत्र में सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई है। इसके चौबीस अक्षरों में 24 अमूल्य शिक्षा संदेश भरे हुए हैं वे सद्बुद्धि के मूर्तिमान प्रतीक हैं। उन शिक्षाओं में वे सभी आधार मौजूद हैं जिन्हें हृदयंगम करने वाले का सम्पूर्ण दृष्टिकोण शुद्ध हो जाता है और उस भ्रम जन्य अविद्या का नाश हो जाता है जो आये दिन कोई न कोई कष्ट उत्पन्न करती रहती है। गायत्री महामंत्र की रचना ऐसे वैज्ञानिक आधार पर हुई है कि उसकी साधना से अपने भीतर छिपे हुए अनेकों गुप्त शक्ति केन्द्र खुल जाते हैं और अन्तराल में सात्विकता की निर्झरिणी बहने लगती है। विश्व व्यापी अपनी प्रबल चुम्बक शक्ति से खींच कर अन्तःप्रदेश में जमा कर देने की अद्भुत शक्ति गायत्री में मौजूद है। इन सब कारणों से कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्र की तरह प्रभावशाली सिद्ध होती है। इस शमन के साथ साथ अनेकों दुखों का समाप्त हो जाना भी पूर्णतया निश्चित है। गायत्री दैवी प्रकाश की वह अखण्ड ज्योति है जिसके द्वारा कुबुद्धि का अज्ञानान्धकार दूर होता है और अपनी वह स्वाभाविक स्थिति प्राप्त हो जाती है जिसको लेकर आत्मा इस पुण्यमयी धरती माता की परम शान्तिदायक गोदी में किलोल करने आया है।

रंगीन कांच का चश्मा आंखों पर पहन लेने पर सब चीजें उसी रंग की दीखती हैं जिस रंग का कि वह कांच होता है। कुबुद्धि का चश्मा लगा लेने से सीधी-साधी साधारण सी परिस्थितियां और घटनायें भी दुखदायी दिखाई देने लगती हैं। जिस मनुष्य को भौंरी रोग हो जाता है सिर घूमता है, मस्तिष्क में चक्कर आते हैं, उसे दिखाई पड़ता है कि सारी पृथ्वी, मकान, वृक्ष आदि घूम रहे हैं। डरपोक आदमी को झाड़ी में भूत दिखाई देने लगता है। जिसके भीतर दोष है उसे बाहर के सुधार से कोई लाभ नहीं हो सकता, उसका रोग मिटेगा तभी बाहरी बुरी अनुभूतियों का निवारण होगा। पीला चश्मा पहनने वाले के सामने चाहे कितनी ही चीजें बदल बदल कर रखी जांय पर पीलेपन के अतिरिक्त और कुछ दिखाई न देगा। बुखार में मुंह कड़ुआ हो रहा है उसे स्वादिष्ट पदार्थ भी कड़ुए लगेंगे। कुबुद्धि ने जिसके दृष्टिकोण को, विचार प्रवाह को दूषित बना दिया है वह चाहे स्वर्ग में रखा जाय, कुबेर सा धनपति या इन्द्र सा सत्ता सम्पन्न बना दिया जाय, तो भी दुखों से छूट न सकेगा।

कुबुद्धि एक ध्वंसक तत्व है वह जहां जितनी मात्रा में रहेगा वहां उतना ही अनिष्ट करेगा। कुबुद्धि के चार सिद्धान्त हैं। (1) दूसरों के हित के लिए अपना स्वार्थ सिद्ध करना, (2) भविष्य की उपेक्षा करके तात्कालिक लाभ देखना, (3) गुणों की तुलना में वस्तुओं को महत्व देना, (4) समस्याओं का फल अन्दर न ढूंढ़ कर बाहर ढूंढ़ना। इन चार कुबुद्धियों के निवारण के लिए ब्रह्मा के चार मुख, चार वेद, विष्णु भगवान की चार भुजा, चार वर्ण, चार आश्रम विनिर्मित हुए हैं। गायत्री रूपी सद्बुद्धि भी चार खंडों में बंटी हुई है। (1) ॐ भूर्भुवः स्वः (2) तत्सवितुर्वरेण्यं (3) भर्गो देवस्य धीमहि (4) धियो यो नः प्रचोदयात्। इन चार खण्डों की चार शिक्षाएं हैं—(1) परमार्थ (2) दूर दृष्टि (3) दैवी सम्पदा (4) आत्मावलम्बन। यह चार बातें जहां होंगी, वहां सदा, सब घड़ी आनन्द ही आनन्द रहेगा। यज्ञोपवीत में चार गांठें लगाकर इन चार बातों को सदैव याद रखने की शिक्षा दी जाती है।

गायत्री महामंत्र का प्रधान कार्य कुबुद्धि का निवारण है। जो व्यक्ति कुबुद्धि से बचने और सद्बुद्धि की ओर अग्रसर होने का व्रत लेता है वही गायत्री का उपासक है। इस उपासना का फल तत्काल मिलता है जो अपने अन्तःकरण में सद्बुद्धि को जितना स्थान देता है उसे उतनी ही मात्रा में तत्काल आनन्दमयी स्थिति का लाभ प्राप्त होता है।
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