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Books - विपत्ति निवारिणी गायत्री

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Language: HINDI
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गायत्री के प्रथम पाद द्वारा पापों की निवृत्ति

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गायत्री के (ॐ भूर्भुवः स्वः) इस प्रथम पाद की शिक्षा है कि सर्वत्र तीनों लोकों में परमात्मा व्याप्त है। इसलिए उसको सर्वत्र तीनों लोकों में परमात्मा व्याप्त है। इसलिए उसको सर्वव्यापी एवं निष्पक्ष न्यायकारी समझ कर पापों से उसी प्रकार बचना चाहिए जैसे कि राजा को सामने खड़ा देखकर चोर को चोरी करने का साहस नहीं होता। इसके अतिरिक्त सब में जब अपना आत्मा, अपना प्रभु ही व्यापक है तो किसी के साथ अनुचित, अनीतिपूर्ण, अनिष्ट व्यवहार न करना चाहिए। हम अपने लिए जैसा व्यवहार दूसरों द्वारा होने की आशा करते हैं वैसा व्यवहार हमें दूसरों के साथ करना चाहिए। दूसरों के हितों को आघात पहुंचाकर अपना स्वार्थ साधन करने की नीति से हमें प्रयत्नपूर्वक बचना चाहिए।

यह प्रकट है कि संसार में अधिकांश दुःख हमारे पापों के परिणाम स्वरूप होते हैं। कई बार कर्म-फल तुरन्त मिल जाता है, जिसके साथ बुराई की गई उसके द्वारा, प्रत्याक्रमण द्वारा, सामाजिक अपकीर्ति द्वारा, लोगों के असन्तोष एवं असहयोग के कारण होने वाली हानि द्वारा, राजदंड द्वारा उस बुराई का दंड मिल जाता है। इनसे भी कोई व्यक्ति बच जाय तो ईश्वरीय निष्पक्ष न्याय द्वारा प्राप्त होने वाले दंड से कोई व्यक्ति बच नहीं सकता। अंग भंग, अपूर्ण, रोग ग्रस्त, हीन बुद्धि लोगों को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इनको दैवी दंड भुगतना पड़ रहा है। अपना कर्तव्य ठीक प्रकार पालन करते हुए भी कई बार अनायास कोई आकस्मिक दैवी विपत्ति आ जाती है या प्रयत्न करते हुए भी सफलता नहीं मिलती तो यही कहना पड़ता है कि हमारे पूर्व कृत कर्म का, प्रारब्ध का फल है।

यदि मनुष्य पाप कर्मों से बचा रहे तो निश्चय ही वह दुखों से बचा रहेगा। यद्यपि दुखों के अन्य कारण भी हैं। निर्दोष व्यक्ति भी कभी अत्याचारियों द्वारा सताये जाते हैं या सामूहिक दोषों का फल भी व्यक्ति को भोगना पड़ता है, परन्तु यह बात ध्रुव सत्य है कि पाप का परिणाम तो दुख ही हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति पाप न करे तो उसके प्रारब्ध में दुखों का विधान किस प्रकार हो सकता है?

कांटे में लिपटी हुई आटे की गोली खाते समय मछली अपने आपको बुद्धिमान समझ सकती है कि मुफ्त में ही मैंने इतना आटा पा लिया। जाल में फैले हुए दानों को खाते समय चिड़िया गर्व कर सकती है कि मैंने बिना परिश्रम के एक स्थान पर पड़ा हुआ इतना अन्न सहज ही पा लिया, पर उसे थोड़ी ही देर में अपनी भूल का पता चल जाता है। आटे की गोली के साथ पेट में पहुंचना हुआ कांटा जब मछली का पेट फाड़ता है, तब उसे मालूम पड़ता है कि मैं बुद्धिमान हूं या नहीं। चिड़िया जब जाल में फंसकर बहेलिये के हाथ में पहुंचती है तब उसे मालूम पड़ता है कि मैं चतुर एवं सौभाग्यशाली हूं या नहीं? पापी लोग जब जरा से प्रयत्न से बहुत सा लाभ कमा लेते हैं तो फूले नहीं समाते। धर्म अधर्म के पचड़े से बचकर अपना काम बना लेने की प्रचुरता पर उन्हें गर्व होता है पर अब उन कर्मों का प्रारब्ध भोग कराल काल दंड की तरह उनके पीछे पड़ता है तब उनकी समझ में आता है कि वे उस दिन कमा रहे थे या गवां रहे थे, वे चतुर थे या फूहड़, उनने बुद्धिमानी का मार्ग चुना या बेवकूफी का।

गायत्री खतरे की घंटी है, चौराहे पर खड़ी पुलिस है। वह बताती है कि—पाप की ओर मत चलो। ईश्वर सर्वव्यापक है, वह किसी का पक्षपात नहीं करता, उससे तुम्हारा कोई पाप छिपा नहीं रह सकता और तुम किसी पाप के प्रतिफल से बच नहीं सकते। ॐ भूर्भुवः स्वः के अक्षर हमें निरन्तर हमें यही शिक्षा देते हैं। रेल की पटरी के किनारे पर जो सिगनल खड़े होते हैं वे बताते हैं कि किधर जाना चाहिए और किधर नहीं। यदि सिगनल का आदेश न मानकर कोई ड्राइवर रेलगाड़ी को मनमानी रीति से दौड़ाया ले जाय तो परिणाम कितना भयंकर होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। वह रेल किसी से टकरा जायेगी या उलट जायेगी और ड्राइवर को अपनी हेकड़ी का नतीजा भुगतना पड़ेगा। गायत्री का सिगनल हमें सावधान करता है कि अपनी जीवन-नीति की रेल को सही मार्ग पर ले चलो अन्यथा अपने स्वाभाविक सुखों से हाथ धोना पड़ेगा और दुखों की यातनाओं से पीड़ित होना पड़ेगा।

गायत्री के प्रथम चरण में दूसरों के प्रति आत्मीयता, ममता, प्रेम, उदारता, ईमानदारी, सेवा एवं मधुरता का व्यवहार करने की शिक्षा है। यह शिक्षा जिसके अन्तःकरण में विराज गई होगी, माता ने जिसको अपने प्रथम चरण का स्पर्श कर दिया होगा, वह अनेक सामाजिक कष्टों से अनायास ही छूट गया होगा।

अपने कुटुम्बियों, पड़ौसियों, समीपवर्ती लोगों के साथ यदि विरोध, मनोमालिन्य, द्वेष, संघर्ष, कलह चलता हो तो वे हमें उतना सहयोग नहीं देंगे जितना कि देना चाहिये। जबकि उनकी सद्भावना की आशा की जाती है तब भी वह प्राप्त नहीं होगी। इसके अतिरिक्त वे विरोधी होने के कारण तरह-तरह की बाधाएं उत्पन्न करते रहेंगे और हानि पहुंचाने वाले आयोजन, षड़यन्त्र या आकर्षण करने का जब भी उन्हें अवसर मिलेगा, न चूकेंगे। मुकदमा, फौजदारी, चोरी, डकैती, कत्ल, बहिष्कार, अपमान, शिकायत, चुगली, निन्दा, दोष, प्रदर्शन आदि हानियां अकस्मात् तो कभी-कभी ही होती हैं, अधिकांश उनके पीछे पुरानी शत्रुता या किसी विरोधी का गहरा मनोमालिन्य काम करता रहता है। जो व्यक्ति अपने से असन्तुष्ट या द्वेष रखते हैं बहुधा उन्हीं का ऐसे कार्यों में विशेष हाथ रहता है।

यदि शत्रुता न हो तो इस प्रकार की आपत्तियों की संख्या अत्यन्त ही न्यून हो जाय। अपनी उन्नति में सबसे बड़ी बाधा यह होती है कि जो लोग हमारी सहायता कर सकते हैं वे अपना हाथ खींच लेते हैं। यदि थोड़े से व्यक्ति किसी की पीठ पर सहायक होते हैं तो वह उनके थोड़े थोड़े सहयोग का सहारा पाकर आशाजनक उन्नति कर सकता है। संसार में जितने भी सफल और समुन्नत व्यक्ति हुए हैं उनकी सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण उनके सहयोगी भी हैं। कोई व्यक्ति चाहे कितना ही विद्वान्, बुद्धिमान, चतुर, शक्तिमान क्यों न हो पर सहयोग के अभाव में लुंज पुंज ही रहेगा, उससे कोई महत्वपूर्ण कार्य न बन सकेगा। असहयोग भले ही द्वेष के बराबर हानिकारक न हो पर वह भी जीवन की प्रगति रोक देने में एक विशाल पर्वत की तरह अड़ कर खड़ा हो जाता है। द्वेष तीव्र रोग है, असहयोग मन्द रोग। दोनों एक ही जाति के हैं। अन्तर केवल तापमान का है परिमाण दोनों का ही अनिष्टकारक होता है।

द्वेष और असहयोग जन्य विपत्तियां, बाधायें, अकारण नहीं आतीं। संसार में बुरे आदमी भी कम नहीं हैं पर उनको बुराई तभी उग्र रूप में प्रकट होती है जब सामने से उसके प्रकट होने का कोई अवसर हो। सिंह खूंखार जानवर है पर उसका खूंखारपन प्रकट तभी होता है जब उसका आहार सामने आवे। पेड़, पत्थर, नदी, तालाब के प्रति वह खूनी नहीं होता। अग्नि में जलने का गुण है पर वह जलाती उन्हीं चीजों को हैं जो जलने लायक हों। यदि ईंधन न हो तो प्रचण्ड अग्नि को भी हार माननी पड़ेगी, वह बुझकर ठंडी हो जायेगी। इस प्रकार दुष्ट प्रकृति के मनुष्य भी अपनी दुष्टता का पूर्ण प्रकाशन करने में तभी सफल होते हैं जब सामने वाले के स्वभाव में पर्याप्त त्रुटियां मौजूद हों। यदि गायत्री के प्रथम चरण की आराधना करके हमने अपने स्वभाव को आत्मीयता पूर्ण एवं मधुर बना लिया है तो बुरे आदमियों की उग्रता देर तक नहीं ठहर सकती वे भी सद् व्यवहार से पिघलाये जा सकते हैं और उनके अन्दर जो थोड़ी भलमनसाहत है उससे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।

कुछ नरपिशाच अत्यन्त ही दुष्ट होते हैं। ऐसे लोगों को काबू में रखने, डराने, दंड देने या दुष्टता छोड़ने के लिए विवश करने की आवश्यकता होती है। पर ऐसी शक्ति एक आदमी में पर्याप्त नहीं होती। इसे लोक मत से ही दबाया जा सकता है। अपने पक्ष में अनुकूल लोकमत एवं सहयोग प्राप्त करने के लिए जिस जन शक्ति की आवश्यकता है वह हमारे उत्तम स्वभाव के बिना प्राप्त नहीं हो सकती। गवाही के अभाव में सच्चे मुकदमे खारिज हो जाते हैं और झूठे मुकदमे में सजा होती है। दुष्टों के विरुद्ध यदि हम अपने सद्गुणों से आवश्यक मित्रों का संगठन कर लें तो उसे राजदंड दिलाया जा सकता है तथा अन्य अनेक तरीकों से रगड़ दिया जा सकता है। परन्तु यदि अपने पक्ष में जल-बल, लोक-मत, संगठन न हो तो कोई तुच्छ सा मनुष्य हमें नाकों चने चबाने के लिए विवश कर सकता है।

आत्मीयता का अर्थ है—दूसरों के प्रति हार्दिक रूप से सद् व्यवहार करना। यह सम्मोहन अस्त्र है जिसके द्वारा अनेक व्यक्तियों को वशवर्ती बनाया जा सकता है। कई धूर्त इस स्वभाव से अनुचित लाभ भी उठा लेते हैं और कई बार अपने को ठगा जाना पड़ता है, पर इस हानि से कुछ बहुत बिगाड़ नहीं होता। इस प्रकार ठग जाने से भी अपन कीर्ति, साधुता एवं प्रतिष्ठा बढ़ती है जो पीछे जाकर उस हानि से कई गुना लाभ दे जाती है।

जिसके अधिक मित्र हैं, अधिक सहयोगी और स्वजन हैं, उसके प्रारब्ध भोग भी हलके हो जाते हैं और सुनिश्चित भवतव्यता का जो कष्ट होना चाहिए उससे कही कम होता है। कल्पना कीजिए कि दो व्यक्तियों को प्रारब्धवश एक साथ रोग होता है, इसमें से एक को सब घृणा और द्वेष करते हैं। बीमारी की हालात में उसे कोई सहायता नहीं मिलती। वह भूखा, प्यासा, मल-मूत्र से सना हुआ, सर्दी, गर्मी के दुख सहता हुआ, बिना दवादारू अकेला पड़ा रहता है ऐसी दशा में उसका शारीरिक और मानसिक कष्ट अनेक गुना बढ़ जायेगा। प्रारब्धवश उसे एक सप्ताह रोगी रहना था तो एक सप्ताह में ही उसे रौरव नरक के दर्शन हो जाते हैं। इसके विपरीत दूसरा वह रोगी जिसे प्रारब्धवश इतना ही रोगी रहना था अपने स्वजन सहयोगियों से घिरा हुआ है। उसे उचित परिचर्या, चिकित्सा, सेवा, मनोरंजन आदि मिलता रहता है, उसका दुख हंसते बोलते बातों ही बातों में कट जाता है। दूसरों की सेवा सहानुभूति में अपने कष्टों को भूला रहता है। अब इन दोनों रोगियों के एक समान प्रारब्ध की तुलना की जाय तो पता चलता है एक ने बहुत अधिक और दूसरे ने बहुत कम कष्ट सहकर अपना भोग पूरा किया। दैवी आपत्तियां जो अनिवार्य हैं आती हैं परन्तु गायत्री के प्रथम चरण से अपने उच्च स्वभाव के कारण वे भी कष्ट देकर भुगत जाती हैं।

स्वजनों के मृत्यु या वियोग के समय कितने ही व्यक्तियों को असाधारण दुख होता है वे उनके विछोह में दिन रात घुलते रहते हैं। इस शोक-भावना का कारण आत्मीयता की भावना का परित्याग करके मोह ममता के बौद्धिक मनोविकार में उलझ जाना ही है। आत्मीयता एक व्यापक एवं उदार तत्व है उसमें कुटुम्बियों को ईश्वर की अमानत और अपनी सेवा-वृत्ति को चरितार्थ करने का माध्यम समझने का भाव रहता है। जो ऐसा समझेगा उसे ईश्वर के अंश किसी जीव द्वारा अपना शरीर बदलने की साधारण क्रिया करने पर दुख क्यों होगा? ईश्वर ने सेवा करने का एक माध्यम उठा लिया तो और किसी के पुत्र की सेवा करने में लगाया जा सकता है। इसमें शोक की क्या बात हुई? शोक की भूल में मृत व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति समझने और उसके चले जाने से अपने विनोद, स्वार्थ, आशा आदि में हानि हुई समझना ही दुखी होने का प्रधान कारण होता है। जिसके प्रति अपना मोह ममता जितनी ही कम होगी उसकी मृत्यु या वियोग का उतना ही दुःख कम होगा। आत्मीयता के अभाव में ममता का विकार मन में जम जाता है। जिसका दृष्टिकोण उदार है, विस्तृत है, व्यापक आत्मा को सब में देखता है, उस ‘उदार चरितानांतु वसुधैव कुटुम्बकम्’ मानने वाले के लिए सभी अपने हैं, जब प्रतिक्षण अनेक ‘अपने’ मरते रहते हैं और उनकी मृत्यु का कोई कष्ट नहीं होता तो किसी विशेष ‘अपने’ की मृत्यु में ही दुःख क्यों होगा?

आत्मीयता को एक विशेष स्थान पर केन्द्रित कर देने से प्रेम का लोप होकर मोह उत्पन्न हो जाता है। मोह ही शोक का कारण है। जिस मनुष्य के हृदय में सबके प्रति व्यापक एवं विस्तृत सहानुभूति होती है, सबकी आत्माओं में उसे अपनेपन की आत्मीयता परिलक्षित होती है। ऐसी दशा में अपने बच्चे की मृत्यु का उतना ही शोक हो सकता है जितना कि पड़ौसी के बच्चे के मरने का। यदि उस व्यापक आत्मीयता को दूसरों पर से हटा कर किसी एक ही व्यक्ति तक सीमित कर लिया जाय तो ही ऐसा हो सकता है कि दूसरों के मरने पर जरा भी दुख न हो और अपने सम्बन्धी के मरने पर शोक से विह्वल हो जाया जाय। गायत्री का प्रथम चरण हमें व्यापक आत्मीयता प्रदान करता है और बताता है कि कोई भी प्राणी किसी दूसरे की सम्पत्ति नहीं, सब ईश्वर के अंश हैं और अपने स्वतंत्र कर्म भोग के आधार पर जन्म मरण के चक्र में घूम रहे हैं। हम उस चक्र को रोक नहीं सकते, केवल सामयिक कर्तव्य का पालन कर सकते हैं। यदि हम अपने कर्तव्य को ठीक प्रकार पालन नहीं करते तो ही शोक की बात है अन्यथा प्रभु के विशाल विधान चक्र में अपनी टांग अड़ाकर व्यर्थ ही दुखी होने की समझ को बाल-बुद्धि ही कहा जा सकता है।

गायत्री का प्रथम चरण जब हृदय में आता है तो मनुष्य इस प्रकार की अनेक कुबुद्धियों से बच जाता है जो समय समय पर दुःखों के पर्वत सिर पर पटकती हैं। आस्तिकता और आत्मीयता के कारण वह पाप करने से बच जाता है। जो पापों से बचा होगा, वह दुःखों से बचा रहेगा। माता का प्रथम आशीर्वाद वह सद्बुद्धि देता है जिससे हमारे सामाजिक दुःख दूर होते हैं। दूसरे व्यक्तियों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले, व्यवहार की भूल से मिलने वाले, दुःखों की जड़ गायत्री के प्रथम प्रकाश से ही कट जाती है।
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