गायत्री के द्वितीय पद द्वारा दिव्य दृष्टि की प्राप्ति
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पिछले पृष्ठों पर कुबुद्धि का पहला लक्षण और उसके कारण उत्पन्न होने वाले दुःखों को बताया जा चुका है। कुबुद्धि का दूसरा लक्षण ‘‘अदूरदर्शिता’’ है। आज का, इसी समय का, तुरन्त लाभ देखना और भविष्य के परिणामों पर विचार न करना इसे अदूरदर्शिता कहते हैं। इसके चंगुल में फंस कर अनेक व्यक्ति विविध विधि कष्ट भोगते हैं।
स्वास्थ्य को नष्ट करने में अदूरदर्शिता सबसे बड़ा कारण है। इन्द्रियों के भोग भोगने की लिप्सा में लोग इतने निमग्न हो जाते हैं कि यह नहीं देखते कि आगे इसका परिणाम क्या होगा। जीभ के स्वाद में पेट की मर्यादा से अधिक भोजन किया जाता है। मसाले और चीनी मिलाकर अनुपयुक्त पदार्थों को पेट में ठूंसा जाता है। जब तक पहला भोजन पचने नहीं पाया कि और नया बोझ पेट पर लाद दिया। इन अत्याचारों से पेट की पाचन-शक्ति खराब हो जाती है, कब्ज रहने लगता है, भूख लगती नहीं, दस्त साफ नहीं होता, आंतों में मल इकट्ठा होकर सड़ने लगता है, उस सड़न से उत्पन्न हुआ विष खून में मिलकर विविध प्रकार के रोग उत्पन्न करता है।
काम-सेवन की मर्यादा यह है कि जब सन्तानोत्पन्न करने की आवश्यकता अनुभव हो तब पति-पत्नी का संयोग हो। इस प्राकृतिक मर्यादा का अदूरदर्शी लोग बेतरह उल्लंघन करते हैं। क्षणिक खुजली को शान्त करने के लिए अपने जीवन-रस को निचोड़ते रहते हैं और अन्त में स्वास्थ्य को खोखला बनाकर सिर धुनते पछताते हैं।
रात्रि का तेज रोशनी में सिनेमा, नाच रंग देखने या अन्य काम करने से आंखें खराब हो जाती हैं। तात्कालिक लोभ या मनोरंजन के वशीभूत होकर लोग आंखों से अधिक काम लेते हैं और उनकी रोशनी से हाथ धो बैठते हैं। यदि नेत्रों से उनकी सामर्थ्यानुसार काम लिया जाय तो वे वृद्धावस्था तक ठीक काम करते रह सकते हैं। इसी प्रकार शरीर के अन्य अवयव हैं यदि उनका ठीक उपयोग हो, तात्कालिक स्वाद, लोभ या मनोरंजन के लिए उनकी शक्ति को अनुचित रूप से नष्ट न किया जाय तो बीमार पड़ने का, असमय शक्तिहीन होने का, अकाल मृत्यु का अवसर न आवे। पशु, पक्षी प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। स्वाद के लिए नहीं, वरन् शरीर की स्वाभाविक आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करते हैं। फलतः न वे बीमार पड़ते हैं और न उन्हें वैद्य डाक्टरों की आवश्यकता पड़ती है।
गायत्री के दूसरे चरण (तत्सवितुर्वरेण्यं) में उस तेजस्वी एवं वरण करने योग्य श्रेष्ठ भविष्य की ओर संकेत किया गया है जो वर्तमान काल का दूरदर्शितापूर्ण उपयोग करने से ही प्राप्त हो सकता है। आज हमें जो साधन प्राप्त हैं, जो शक्तियां, सहयोग, सामर्थ्यों, योग्यताएं एवं सुविधाएं उपलब्ध हैं यदि उनका संयम एवं समझदारी से उपयोग किया जाय तो निश्चय ही आशाजनक भविष्य की आधार शिला रखी जा सकती है।
किसान धैर्यपूर्वक अपनी खेती में श्रम करता रहता है। घर से अन्न ले जाकर उसमें बीज बो देता है। अदूरदर्शिता की दृष्टि से देखा जाय तो उसका यह सब कार्य बेवकूफी से भरा हुआ प्रतीत होगा। रोज रोज कठिन परिश्रम करना और शाम को खाली हाथ वापिस लौट आना, साथ ही घर में रखा हुआ अन्न भी मिट्टी में बखेर आना, कोई समझदारी की बात नहीं मालूम होती। पर दूरदर्शी किसान यह जानता है कि मेरा परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जा सकता। इसका समुचित परिणाम मुझे मिलकर रहेगा। वह मिलता भी है। समयानुसार खेती पकती है और किसान का घर धन धान्य से पूरा कर देती है, उसका परिश्रम सफल हो जाता है।
किसान जैसी दूरदृष्टि को अपनाकर हम भी अपने जीवन को सुख-शान्ति की राशि से भर सकते हैं। विद्यार्थी जानता है कि मुझे आगामी जीवन में सफलता और प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है तो आरम्भ में कठिन परिश्रम पूर्वक विद्याध्ययन करना पड़ेगा। विद्याध्ययन के समय, उसका समय, श्रम और पैसा सभी लगता है, तत्काल उसे कुछ लाभ नहीं होता वरन् हानि ही रहती है परन्तु यह निश्चित है कि इस हानि की आगे चलकर ब्याज समेत भरपाई हो जाती है। विद्यार्थी और किसान का दृष्टिकोण अपनाकर जो लोग आशाजनक भविष्य के लिए आज कठिनाई उठाने को तैयार हैं, उन्हें गायत्री का सच्चा आज्ञाकारी पुत्र कहा जा सकता है। माता अपने आज्ञाकारी बालकों को दुलारने में कमी नहीं रखती, पर अवज्ञाकारी को दुत्कारने में उसे संकोच नहीं होता।
ब्रह्मचारी संचय पूर्वक वीर्य-रक्षा करता है। उस समय उसे अपना मन मारना पड़ता है। दूसरे उच्छृंखल युवक कामुकता की इन्द्रिय लिप्सा में अपना शरीर निचोड़ते हैं। आरंभ में वह उच्छृंखल लड़के अपने आपको बड़ा चतुर समझते हैं और ब्रह्मचारी को मूर्ख मानते हैं। पर कुछ दिन बाद जब कि उनका शरीर खोखला होकर अनेक रोगों का घर बन जाता है और उधर वह ब्रह्मचारी दिन-दिन स्वस्थ, सुदृढ़, बलवान और सुन्दर बनता जाता है तब तुम्हें पता चलता है कि वस्तुतः कौन मूर्ख और कौन बुद्धिमान था। जीभ के चटोरेपन में वशीभूत होकर जो लोग चटपटे, मसालेदार और मीठे जायकेदार पदार्थ दिन भर चाटते रहते हैं वे आरंभ में उसी संयमी पुरुष को मूर्ख कह सकते हैं जो स्वाद के लिए नहीं वरन् शरीर पोषण के लिए औषधि रूपी आहार लेता है। औषधि में स्वाद कौन देखता है, उसके गुण ही देखे जाते हैं। यही बात आहार के सम्बन्ध में होनी चाहिए शरीर की आवश्यकता पूर्ण करने वाला आहार उतनी मात्रा में, उस समय लिया जाना चाहिये जब कि पेट को जितनी मात्रा में आवश्यकता हो। जीभ के स्वाद के मारे असमय, अनावश्यक, अनुचित मात्रा में जो लोग भोजन करते हैं वे अपनी पाचन-शक्ति से हाथ धो बैठते हैं। पेट खराब होने से आवश्यक मात्रा में शुद्ध रक्त नहीं बन पाता, फलतः अनेक प्रकार के रोग सामने आ खड़े होते हैं। परन्तु जिसने जीभ पर काबू रखा है, तात्कालिक स्वाद लोलुपता को ठुकरा कर भविष्य के स्थिर स्वास्थ्य का ध्यान रखा है, वह निरोग दीर्घ जीवन का आनन्द लेता है।
आज ‘निकट दृष्टि’ की बीमारी बुरी तरह फैली हुई है। लोग आज का, अभी का, इसी समय का, लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि जल्दी की हविस में जो अनुचित कार्य प्रणाली अपनाई जा रही है उसका परिणाम कल क्या होगा। जैसे बने वैसे, जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी, जितना अधिक प्राप्त किया जा सके उतना अधिक धन प्राप्त करने के लालच में अन्धा होकर मनुष्य बुरे बुरे काम करता है। चोरी, डकैती, लूट, ठगी, धोखाधड़ी की सारी योजनाऐं इसी मनोभावना से बनती हैं। जिसके नेत्रों में ‘दूर दृष्टि’ का रोग होता है उसे पास की चीजें तो साफ दिखाई पड़ती हैं पर दूर की वस्तुयें दिखाई नहीं पड़ती। इसी प्रकार का बौद्धिक रोग ‘अदूरदर्शिता’ है। इससे ग्रसित रोगी तात्कालिक लाभ को देखता है। उसे यह नहीं सूझ पड़ता कि उसका परिणाम आगे चलकर क्या होगा। इसके कारण मनुष्य चिरस्थायी, सुस्थिर, प्रतिष्ठा-युक्त, शान्तिदायी बड़े लाभ से वंचित हो जाता है।
चोर मनोवृत्ति के धोखेबाज व्यापारी सस्ती, खराब, नकली वस्तुऐं लोगों को उलटा सीधा समझा कर भेड़ देते है तात्कालिक लाभ उठा लेने पर बड़े प्रसन्न होते हैं। परन्तु उनसे एक बार जो व्यवहार कर लेता है वह सदा के लिए उनका विरोधी हो जाता है। ऐसी दशा में उनका व्यापार चमक नहीं पाता। इसके विपरीत जो लोग अच्छी, असली वस्तुओं का व्यापार प्रमाणिकता के आधार पर करते हैं, आरम्भ में उनकी दुकान कम चलती है पर अन्त में अपनी प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता के आधार पर वे मालामाल हो जाते हैं। वेस्ट एण्ड वाच कम्पनी की घड़ियां और फोर्ड मोटरें यद्यपि महंगी होती हैं तो भी अपनी प्रामाणिकता के कारण वे खूब बिकती हैं और उनके मालिक मालामाल हो गये हैं। इसके विपरीत ऐसे अनेक चोर व्यापारी हैं जो सस्ती और खराब चीजें अनुचित रीति से ग्राहक को भेड़ने में बड़े चतुर हैं परन्तु से सदा कंगाल ही रहते हैं। उनको कभी स्थिर प्रतिष्ठा या सम्पत्ति प्राप्त नहीं हो सकती। अदूरदर्शी लोग अपने को चतुर समझते हैं, तत्कालिक लाभ कमाने में अपनी बड़ी सफलता समझते हैं पर समय बतला देता है कि उनकी वह चतुरता और सफलता कितनी पोली, कितनी अवास्तविक और कितनी अस्थिर है।
‘लोभ’ की शास्त्रों में निन्दा की गई है। वह निन्दा न्यायोचित रीति से परिश्रमपूर्वक कमाने और मितव्ययिता पूर्वक सत्कार्यों के लिए बचाने की नहीं है। उसके लिए तो कहा गया है कि ‘‘सौ हाथों से कमा और हजार हाथों से दान कर।’’ लोभ वह है जिसमें ललचाकर अनुचित रीति से धन, भोग या यश का अपहरण किया जाता है। लोभ को पाप का मूल बताया गया है। तात्कालिक प्रलोभन के आकर्षण में अन्धे होकर घुस पड़ना और भविष्य के दुष्परिणाम को भूल जाना इसी का नाम लोभ है। इस लोभ की मनोवृत्ति से प्रेरित होकर ही लोग नाना प्रकार के दुष्कर्म करते हैं और अन्त में जब उन दुष्कर्मों का दुखदायी परिणाम सामने उपस्थित हो जाता है तो उसकी दारुण वेदनाओं से चीत्कार करते हैं।
यदि जीभ और ज्ञानेंद्रिय पर काबू रखा जाय, इनको चटोरी न बनाया जाय तो यह निश्चित है कि शरीर को बीमारियों का दुख न भोगना पड़ेगा और न अकाल में काल का चबेना बनना पड़ेगा। यदि इन इन्द्रियों को बेलगाम छोड़ दिया गया है तो किसी भी अन्य प्रयत्न से शरीर को स्वस्थ और दीर्घजीवी नहीं बनाया जा सकता। यदि लोभ के वशीभूत होकर आज अनुचित रीति से धन कमाते रहने का कार्यक्रम बना हुआ है तो निश्चित है कि कल यह सम्पदा तो ओस के मोतियों की तरह झड़ जायेगी पर पापों का इतना बड़ा बोझ सिर पर लदा छोड़ जायेगी कि इसे ढोते ढोते अनेक जन्मों तक दुख भोगना पड़ेगा। व्यभिचार के मनोविनोद में फंसकर जिन्होंने ‘आतशाक’ खरीदी है वे जानते हैं कि उनने कितना कम मजा लूटा और उसके बदले में कितना बड़ा संकट मोल लिया।
मनुष्य-जीवन जैसी सुरदुर्लभ सम्पदा को पाकर लोग तांबे पीतल या सोने चांदी के टुकड़े जमा करने में चिपटे हुये हैं और उस बाल-क्रीड़ा की पूर्ति के लिए उचित अनुचित का भी विचार नहीं करते, ऐसे लोग अपने को चतुर कहते हैं तो कहें, किसी दूरदर्शी की दृष्टि में वे परले सिरे के मूर्ख ही हैं। इन्द्रिय-भोगों को आनन्द तब है जब उन्हें अपनी मर्जी के अनुसार चलाया जाय। जब इन्द्रियों के वश में स्वयं हो गये, वे हमें बन्दर की तरह नचाने लगीं तो उसमें क्या आनन्द रह गया? आनन्द की वस्तु लोभ नहीं हो सकता। जीवन उन्हीं विचारों, गुणों और कार्यों को अपनाने के लिए है जो आत्मा के महान् गौरव के अनुकूल हैं, जिनके लिए उन्हें मनुष्य शरीर मिला है।
क्षणिक सुख बड़े आकर्षक, मोहक एवं ललचाने वाले होते हैं। मन्द दृष्टि वाला व्यक्ति उनमें लुभा जाता है और आटे के लोभ में जान देने वाली मछली तथा दाने के लोभ में जाल में फंसने वाले पक्षी की तरह दुख भोगते हैं। इस प्रलोभन की माया से गायत्री हमें सावधान करती है और सिखाती है— पुत्र! तुम शरीर नहीं आत्मा हो। लोभ और भोग के लालच में पड़कर आत्म-कल्याण का मार्ग कुंठित मत करो। अपना स्थायी लाभ देखे, अपने स्थिर स्वार्थ को देखो और छोटे-छोटे प्रलोभनों को उन पर निछावर कर दो। इन्द्रिय-भोग क्षण भर रहते हैं पर उनकी हानि देर तक ठहरती है। धनी बनने की खुशी थोड़ी देर रहती है पर अनीति का धन जो बुराइयां सिखा जाता है और भविष्य के लिए जो कांटे बो जाता है उसका दुष्परिणाम देर तक ठहरता है। अदूरदर्शी लोग अनेक प्रकार के व्यसनों में फंस जाते हैं। शौक-मौज में नशेबाजी आदि की कुटेवें सीख लेते हैं और पीछे उनके द्वारा तबाह होते रहते हैं। शरीर को सजाने में, सांसारिक आकर्षणों के माया मोह में जीवन बीत जाता है और जब सत्य का समय आता है तब दुख होता है कि ऐसी अमूल्य सम्पत्ति को हर प्रकार गंवा दिया गया। भविष्य को उत्तम बनाना तो दूर, पापों का नारकीय त्रास आगे के लिए जमा कर लिया गया। आरम्भ में कोई भूल मालूम नहीं पड़ती पर जब अन्त में आंखें खुलती हैं तो हाथ मलकर पछताना ही शेष रह जाता है।
अदूरदर्शी लोग थोड़ी सी बात पर उत्तेजित हो जाते हैं और न करने योग्य कार्य कर बैठते हैं। यदि वे भविष्य के दुष्परिणाम का विचार कर लिया करें तो आवेश में जो उपद्रव किये जाते हैं वे न हों। शेखीखोरी के प्रदर्शन में, वाहवाही लूटने में, दूसरों के बढ़ावे में आकर कई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से बाहर पैर फैला देते हैं और पीछे पछताते हैं। गायत्री पर जिसकी श्रद्धा है, वह माता की दूसरी आज्ञा को मानकर दूरदर्शी बनता है। वह दुर्व्यसनों को अपना प्राण-घातक शत्रु समझ कर उनके परिणामों के लिए तुरन्त कटिबद्ध हो जाता है। वह नशेबाजों की आदत का विरोधी बन जाता है। अपने में कोई ऐसी लत पड़ गयी हो तो उसे साहस पूर्वक छोड़ता है और दूसरों को उससे सावधान करता है। कामेन्द्रिय और स्वादेन्द्रिय को काबू में करके उन्हें विचार और बुद्धिमत्ता पूर्वक प्रयोग करता है। देर तक ब्रह्मचर्य रखना और नियत समय पर सात्विक आहार करना उसकी नीति बन जाती है। उपवास की सहायता लेकर वह इन्द्रियों पर काबू करता है। समय का एक एक क्षण काम में आवे, एक क्षण भी निरर्थक व्यतीत न हो, इसका ध्यान रखकर वह अपना व्यस्त कार्यक्रम बनाता है। परिश्रम उसे प्राणप्रिय होता है, अपने हाथ से काम करते हुए उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। बिना काम के क्षण भी उससे कहां बैठा जाता। यह माता की द्वितीय चरण प्राप्त होने का प्रत्यक्ष चिह्न है। जिसका झुकाव इन गुणों की ओर न हो, वह गायत्री उपासक नहीं कहा जा सकता। माता का द्वितीय चरण पकड़ने का अर्थ इन गुणों को हृदयंगम करना है।
व्यसन, आलस्य और असंयम से जो बचता है वह अस्वस्थता के दुख को नहीं भोगता। पिछला कोई रोग बना होता तो वह शीघ्र ही दूर हो जायेगा या हलका पड़ जायेगा। संयमी पुरुषों की जीवन-शक्ति व्यर्थ नष्ट होती इसलिए वे दीर्घजीवी होते हैं। आलस्य छूट जाने से इन्द्रियां अन्तिम समय तक काम करती रहती हैं। स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ धन-उपार्जन, सुसन्तति, शत्रुओं से प्रतिरक्षा, सौन्दर्य की स्थिरता, मनोविनोद की स्थिति आदि सुख अत्यन्त दृढ़ता पूर्वक जुड़े हैं। बीमार आदमी को इस सबसे वंचित रहना पड़ता है परंतु पुरुष अनायास ही अनेक दिशाओं में उन्नति करते और आनन्द भोगते हैं। अस्वास्थ्य जन्य विपत्तियों को, विपत्ति निवारिणी गायत्री का द्वितीय चरण बात ही बात में दूर कर देता है।
जैसे माता उंगली के इशारे से बालक को चन्द्रमा दिखाती है, वैसे ही गायत्री अपने द्वितीय चरण की शिक्षा द्वारा हमें बनाती है कि—‘‘पुत्र! दूर तक देखो, अपनी दृष्टि लम्बी फेंको, मृत्यु की घड़ी को निकट समझकर उसके लिए समुचित तैयारी करो, इसी क्षण की लिप्साओं में इतने बेखबर न हो जाओ कि भविष्य का कुछ ध्यान न रहे। किसान और विद्यार्थी से शिक्षा लो, वे भविष्य-निर्माण के लिए आज तप करते हैं तुम भी अपने दूरवर्ती भविष्य को आनन्दमय बनाने के लिए आज के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करो।’’
माता की इस शिक्षा को मान कर यदि हम दूरदर्शी बनने का प्रयत्न करें तो निश्चय ही हम उन बाल-क्रीड़ाओं को छोड़ देंगे जो आरंभ में बड़ी लुभावनी मालूम पड़ती हैं पर अन्त में दुखों के पर्वत पटक देती हैं। अदूरदर्शिता की मूर्खता से बचा कर गायत्री का दूसरा चरण हमें उस स्थिति तक ले पहुंचता है जिसमें जीव अपने जन्म जात अधिकार आनन्द का शान्त चित्त से आस्वादन करता है।
काम-सेवन की मर्यादा यह है कि जब सन्तानोत्पन्न करने की आवश्यकता अनुभव हो तब पति-पत्नी का संयोग हो। इस प्राकृतिक मर्यादा का अदूरदर्शी लोग बेतरह उल्लंघन करते हैं। क्षणिक खुजली को शान्त करने के लिए अपने जीवन-रस को निचोड़ते रहते हैं और अन्त में स्वास्थ्य को खोखला बनाकर सिर धुनते पछताते हैं।
रात्रि का तेज रोशनी में सिनेमा, नाच रंग देखने या अन्य काम करने से आंखें खराब हो जाती हैं। तात्कालिक लोभ या मनोरंजन के वशीभूत होकर लोग आंखों से अधिक काम लेते हैं और उनकी रोशनी से हाथ धो बैठते हैं। यदि नेत्रों से उनकी सामर्थ्यानुसार काम लिया जाय तो वे वृद्धावस्था तक ठीक काम करते रह सकते हैं। इसी प्रकार शरीर के अन्य अवयव हैं यदि उनका ठीक उपयोग हो, तात्कालिक स्वाद, लोभ या मनोरंजन के लिए उनकी शक्ति को अनुचित रूप से नष्ट न किया जाय तो बीमार पड़ने का, असमय शक्तिहीन होने का, अकाल मृत्यु का अवसर न आवे। पशु, पक्षी प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। स्वाद के लिए नहीं, वरन् शरीर की स्वाभाविक आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करते हैं। फलतः न वे बीमार पड़ते हैं और न उन्हें वैद्य डाक्टरों की आवश्यकता पड़ती है।
गायत्री के दूसरे चरण (तत्सवितुर्वरेण्यं) में उस तेजस्वी एवं वरण करने योग्य श्रेष्ठ भविष्य की ओर संकेत किया गया है जो वर्तमान काल का दूरदर्शितापूर्ण उपयोग करने से ही प्राप्त हो सकता है। आज हमें जो साधन प्राप्त हैं, जो शक्तियां, सहयोग, सामर्थ्यों, योग्यताएं एवं सुविधाएं उपलब्ध हैं यदि उनका संयम एवं समझदारी से उपयोग किया जाय तो निश्चय ही आशाजनक भविष्य की आधार शिला रखी जा सकती है।
किसान धैर्यपूर्वक अपनी खेती में श्रम करता रहता है। घर से अन्न ले जाकर उसमें बीज बो देता है। अदूरदर्शिता की दृष्टि से देखा जाय तो उसका यह सब कार्य बेवकूफी से भरा हुआ प्रतीत होगा। रोज रोज कठिन परिश्रम करना और शाम को खाली हाथ वापिस लौट आना, साथ ही घर में रखा हुआ अन्न भी मिट्टी में बखेर आना, कोई समझदारी की बात नहीं मालूम होती। पर दूरदर्शी किसान यह जानता है कि मेरा परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जा सकता। इसका समुचित परिणाम मुझे मिलकर रहेगा। वह मिलता भी है। समयानुसार खेती पकती है और किसान का घर धन धान्य से पूरा कर देती है, उसका परिश्रम सफल हो जाता है।
किसान जैसी दूरदृष्टि को अपनाकर हम भी अपने जीवन को सुख-शान्ति की राशि से भर सकते हैं। विद्यार्थी जानता है कि मुझे आगामी जीवन में सफलता और प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है तो आरम्भ में कठिन परिश्रम पूर्वक विद्याध्ययन करना पड़ेगा। विद्याध्ययन के समय, उसका समय, श्रम और पैसा सभी लगता है, तत्काल उसे कुछ लाभ नहीं होता वरन् हानि ही रहती है परन्तु यह निश्चित है कि इस हानि की आगे चलकर ब्याज समेत भरपाई हो जाती है। विद्यार्थी और किसान का दृष्टिकोण अपनाकर जो लोग आशाजनक भविष्य के लिए आज कठिनाई उठाने को तैयार हैं, उन्हें गायत्री का सच्चा आज्ञाकारी पुत्र कहा जा सकता है। माता अपने आज्ञाकारी बालकों को दुलारने में कमी नहीं रखती, पर अवज्ञाकारी को दुत्कारने में उसे संकोच नहीं होता।
ब्रह्मचारी संचय पूर्वक वीर्य-रक्षा करता है। उस समय उसे अपना मन मारना पड़ता है। दूसरे उच्छृंखल युवक कामुकता की इन्द्रिय लिप्सा में अपना शरीर निचोड़ते हैं। आरंभ में वह उच्छृंखल लड़के अपने आपको बड़ा चतुर समझते हैं और ब्रह्मचारी को मूर्ख मानते हैं। पर कुछ दिन बाद जब कि उनका शरीर खोखला होकर अनेक रोगों का घर बन जाता है और उधर वह ब्रह्मचारी दिन-दिन स्वस्थ, सुदृढ़, बलवान और सुन्दर बनता जाता है तब तुम्हें पता चलता है कि वस्तुतः कौन मूर्ख और कौन बुद्धिमान था। जीभ के चटोरेपन में वशीभूत होकर जो लोग चटपटे, मसालेदार और मीठे जायकेदार पदार्थ दिन भर चाटते रहते हैं वे आरंभ में उसी संयमी पुरुष को मूर्ख कह सकते हैं जो स्वाद के लिए नहीं वरन् शरीर पोषण के लिए औषधि रूपी आहार लेता है। औषधि में स्वाद कौन देखता है, उसके गुण ही देखे जाते हैं। यही बात आहार के सम्बन्ध में होनी चाहिए शरीर की आवश्यकता पूर्ण करने वाला आहार उतनी मात्रा में, उस समय लिया जाना चाहिये जब कि पेट को जितनी मात्रा में आवश्यकता हो। जीभ के स्वाद के मारे असमय, अनावश्यक, अनुचित मात्रा में जो लोग भोजन करते हैं वे अपनी पाचन-शक्ति से हाथ धो बैठते हैं। पेट खराब होने से आवश्यक मात्रा में शुद्ध रक्त नहीं बन पाता, फलतः अनेक प्रकार के रोग सामने आ खड़े होते हैं। परन्तु जिसने जीभ पर काबू रखा है, तात्कालिक स्वाद लोलुपता को ठुकरा कर भविष्य के स्थिर स्वास्थ्य का ध्यान रखा है, वह निरोग दीर्घ जीवन का आनन्द लेता है।
आज ‘निकट दृष्टि’ की बीमारी बुरी तरह फैली हुई है। लोग आज का, अभी का, इसी समय का, लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि जल्दी की हविस में जो अनुचित कार्य प्रणाली अपनाई जा रही है उसका परिणाम कल क्या होगा। जैसे बने वैसे, जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी, जितना अधिक प्राप्त किया जा सके उतना अधिक धन प्राप्त करने के लालच में अन्धा होकर मनुष्य बुरे बुरे काम करता है। चोरी, डकैती, लूट, ठगी, धोखाधड़ी की सारी योजनाऐं इसी मनोभावना से बनती हैं। जिसके नेत्रों में ‘दूर दृष्टि’ का रोग होता है उसे पास की चीजें तो साफ दिखाई पड़ती हैं पर दूर की वस्तुयें दिखाई नहीं पड़ती। इसी प्रकार का बौद्धिक रोग ‘अदूरदर्शिता’ है। इससे ग्रसित रोगी तात्कालिक लाभ को देखता है। उसे यह नहीं सूझ पड़ता कि उसका परिणाम आगे चलकर क्या होगा। इसके कारण मनुष्य चिरस्थायी, सुस्थिर, प्रतिष्ठा-युक्त, शान्तिदायी बड़े लाभ से वंचित हो जाता है।
चोर मनोवृत्ति के धोखेबाज व्यापारी सस्ती, खराब, नकली वस्तुऐं लोगों को उलटा सीधा समझा कर भेड़ देते है तात्कालिक लाभ उठा लेने पर बड़े प्रसन्न होते हैं। परन्तु उनसे एक बार जो व्यवहार कर लेता है वह सदा के लिए उनका विरोधी हो जाता है। ऐसी दशा में उनका व्यापार चमक नहीं पाता। इसके विपरीत जो लोग अच्छी, असली वस्तुओं का व्यापार प्रमाणिकता के आधार पर करते हैं, आरम्भ में उनकी दुकान कम चलती है पर अन्त में अपनी प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता के आधार पर वे मालामाल हो जाते हैं। वेस्ट एण्ड वाच कम्पनी की घड़ियां और फोर्ड मोटरें यद्यपि महंगी होती हैं तो भी अपनी प्रामाणिकता के कारण वे खूब बिकती हैं और उनके मालिक मालामाल हो गये हैं। इसके विपरीत ऐसे अनेक चोर व्यापारी हैं जो सस्ती और खराब चीजें अनुचित रीति से ग्राहक को भेड़ने में बड़े चतुर हैं परन्तु से सदा कंगाल ही रहते हैं। उनको कभी स्थिर प्रतिष्ठा या सम्पत्ति प्राप्त नहीं हो सकती। अदूरदर्शी लोग अपने को चतुर समझते हैं, तत्कालिक लाभ कमाने में अपनी बड़ी सफलता समझते हैं पर समय बतला देता है कि उनकी वह चतुरता और सफलता कितनी पोली, कितनी अवास्तविक और कितनी अस्थिर है।
‘लोभ’ की शास्त्रों में निन्दा की गई है। वह निन्दा न्यायोचित रीति से परिश्रमपूर्वक कमाने और मितव्ययिता पूर्वक सत्कार्यों के लिए बचाने की नहीं है। उसके लिए तो कहा गया है कि ‘‘सौ हाथों से कमा और हजार हाथों से दान कर।’’ लोभ वह है जिसमें ललचाकर अनुचित रीति से धन, भोग या यश का अपहरण किया जाता है। लोभ को पाप का मूल बताया गया है। तात्कालिक प्रलोभन के आकर्षण में अन्धे होकर घुस पड़ना और भविष्य के दुष्परिणाम को भूल जाना इसी का नाम लोभ है। इस लोभ की मनोवृत्ति से प्रेरित होकर ही लोग नाना प्रकार के दुष्कर्म करते हैं और अन्त में जब उन दुष्कर्मों का दुखदायी परिणाम सामने उपस्थित हो जाता है तो उसकी दारुण वेदनाओं से चीत्कार करते हैं।
यदि जीभ और ज्ञानेंद्रिय पर काबू रखा जाय, इनको चटोरी न बनाया जाय तो यह निश्चित है कि शरीर को बीमारियों का दुख न भोगना पड़ेगा और न अकाल में काल का चबेना बनना पड़ेगा। यदि इन इन्द्रियों को बेलगाम छोड़ दिया गया है तो किसी भी अन्य प्रयत्न से शरीर को स्वस्थ और दीर्घजीवी नहीं बनाया जा सकता। यदि लोभ के वशीभूत होकर आज अनुचित रीति से धन कमाते रहने का कार्यक्रम बना हुआ है तो निश्चित है कि कल यह सम्पदा तो ओस के मोतियों की तरह झड़ जायेगी पर पापों का इतना बड़ा बोझ सिर पर लदा छोड़ जायेगी कि इसे ढोते ढोते अनेक जन्मों तक दुख भोगना पड़ेगा। व्यभिचार के मनोविनोद में फंसकर जिन्होंने ‘आतशाक’ खरीदी है वे जानते हैं कि उनने कितना कम मजा लूटा और उसके बदले में कितना बड़ा संकट मोल लिया।
मनुष्य-जीवन जैसी सुरदुर्लभ सम्पदा को पाकर लोग तांबे पीतल या सोने चांदी के टुकड़े जमा करने में चिपटे हुये हैं और उस बाल-क्रीड़ा की पूर्ति के लिए उचित अनुचित का भी विचार नहीं करते, ऐसे लोग अपने को चतुर कहते हैं तो कहें, किसी दूरदर्शी की दृष्टि में वे परले सिरे के मूर्ख ही हैं। इन्द्रिय-भोगों को आनन्द तब है जब उन्हें अपनी मर्जी के अनुसार चलाया जाय। जब इन्द्रियों के वश में स्वयं हो गये, वे हमें बन्दर की तरह नचाने लगीं तो उसमें क्या आनन्द रह गया? आनन्द की वस्तु लोभ नहीं हो सकता। जीवन उन्हीं विचारों, गुणों और कार्यों को अपनाने के लिए है जो आत्मा के महान् गौरव के अनुकूल हैं, जिनके लिए उन्हें मनुष्य शरीर मिला है।
क्षणिक सुख बड़े आकर्षक, मोहक एवं ललचाने वाले होते हैं। मन्द दृष्टि वाला व्यक्ति उनमें लुभा जाता है और आटे के लोभ में जान देने वाली मछली तथा दाने के लोभ में जाल में फंसने वाले पक्षी की तरह दुख भोगते हैं। इस प्रलोभन की माया से गायत्री हमें सावधान करती है और सिखाती है— पुत्र! तुम शरीर नहीं आत्मा हो। लोभ और भोग के लालच में पड़कर आत्म-कल्याण का मार्ग कुंठित मत करो। अपना स्थायी लाभ देखे, अपने स्थिर स्वार्थ को देखो और छोटे-छोटे प्रलोभनों को उन पर निछावर कर दो। इन्द्रिय-भोग क्षण भर रहते हैं पर उनकी हानि देर तक ठहरती है। धनी बनने की खुशी थोड़ी देर रहती है पर अनीति का धन जो बुराइयां सिखा जाता है और भविष्य के लिए जो कांटे बो जाता है उसका दुष्परिणाम देर तक ठहरता है। अदूरदर्शी लोग अनेक प्रकार के व्यसनों में फंस जाते हैं। शौक-मौज में नशेबाजी आदि की कुटेवें सीख लेते हैं और पीछे उनके द्वारा तबाह होते रहते हैं। शरीर को सजाने में, सांसारिक आकर्षणों के माया मोह में जीवन बीत जाता है और जब सत्य का समय आता है तब दुख होता है कि ऐसी अमूल्य सम्पत्ति को हर प्रकार गंवा दिया गया। भविष्य को उत्तम बनाना तो दूर, पापों का नारकीय त्रास आगे के लिए जमा कर लिया गया। आरम्भ में कोई भूल मालूम नहीं पड़ती पर जब अन्त में आंखें खुलती हैं तो हाथ मलकर पछताना ही शेष रह जाता है।
अदूरदर्शी लोग थोड़ी सी बात पर उत्तेजित हो जाते हैं और न करने योग्य कार्य कर बैठते हैं। यदि वे भविष्य के दुष्परिणाम का विचार कर लिया करें तो आवेश में जो उपद्रव किये जाते हैं वे न हों। शेखीखोरी के प्रदर्शन में, वाहवाही लूटने में, दूसरों के बढ़ावे में आकर कई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से बाहर पैर फैला देते हैं और पीछे पछताते हैं। गायत्री पर जिसकी श्रद्धा है, वह माता की दूसरी आज्ञा को मानकर दूरदर्शी बनता है। वह दुर्व्यसनों को अपना प्राण-घातक शत्रु समझ कर उनके परिणामों के लिए तुरन्त कटिबद्ध हो जाता है। वह नशेबाजों की आदत का विरोधी बन जाता है। अपने में कोई ऐसी लत पड़ गयी हो तो उसे साहस पूर्वक छोड़ता है और दूसरों को उससे सावधान करता है। कामेन्द्रिय और स्वादेन्द्रिय को काबू में करके उन्हें विचार और बुद्धिमत्ता पूर्वक प्रयोग करता है। देर तक ब्रह्मचर्य रखना और नियत समय पर सात्विक आहार करना उसकी नीति बन जाती है। उपवास की सहायता लेकर वह इन्द्रियों पर काबू करता है। समय का एक एक क्षण काम में आवे, एक क्षण भी निरर्थक व्यतीत न हो, इसका ध्यान रखकर वह अपना व्यस्त कार्यक्रम बनाता है। परिश्रम उसे प्राणप्रिय होता है, अपने हाथ से काम करते हुए उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। बिना काम के क्षण भी उससे कहां बैठा जाता। यह माता की द्वितीय चरण प्राप्त होने का प्रत्यक्ष चिह्न है। जिसका झुकाव इन गुणों की ओर न हो, वह गायत्री उपासक नहीं कहा जा सकता। माता का द्वितीय चरण पकड़ने का अर्थ इन गुणों को हृदयंगम करना है।
व्यसन, आलस्य और असंयम से जो बचता है वह अस्वस्थता के दुख को नहीं भोगता। पिछला कोई रोग बना होता तो वह शीघ्र ही दूर हो जायेगा या हलका पड़ जायेगा। संयमी पुरुषों की जीवन-शक्ति व्यर्थ नष्ट होती इसलिए वे दीर्घजीवी होते हैं। आलस्य छूट जाने से इन्द्रियां अन्तिम समय तक काम करती रहती हैं। स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ धन-उपार्जन, सुसन्तति, शत्रुओं से प्रतिरक्षा, सौन्दर्य की स्थिरता, मनोविनोद की स्थिति आदि सुख अत्यन्त दृढ़ता पूर्वक जुड़े हैं। बीमार आदमी को इस सबसे वंचित रहना पड़ता है परंतु पुरुष अनायास ही अनेक दिशाओं में उन्नति करते और आनन्द भोगते हैं। अस्वास्थ्य जन्य विपत्तियों को, विपत्ति निवारिणी गायत्री का द्वितीय चरण बात ही बात में दूर कर देता है।
जैसे माता उंगली के इशारे से बालक को चन्द्रमा दिखाती है, वैसे ही गायत्री अपने द्वितीय चरण की शिक्षा द्वारा हमें बनाती है कि—‘‘पुत्र! दूर तक देखो, अपनी दृष्टि लम्बी फेंको, मृत्यु की घड़ी को निकट समझकर उसके लिए समुचित तैयारी करो, इसी क्षण की लिप्साओं में इतने बेखबर न हो जाओ कि भविष्य का कुछ ध्यान न रहे। किसान और विद्यार्थी से शिक्षा लो, वे भविष्य-निर्माण के लिए आज तप करते हैं तुम भी अपने दूरवर्ती भविष्य को आनन्दमय बनाने के लिए आज के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करो।’’
माता की इस शिक्षा को मान कर यदि हम दूरदर्शी बनने का प्रयत्न करें तो निश्चय ही हम उन बाल-क्रीड़ाओं को छोड़ देंगे जो आरंभ में बड़ी लुभावनी मालूम पड़ती हैं पर अन्त में दुखों के पर्वत पटक देती हैं। अदूरदर्शिता की मूर्खता से बचा कर गायत्री का दूसरा चरण हमें उस स्थिति तक ले पहुंचता है जिसमें जीव अपने जन्म जात अधिकार आनन्द का शान्त चित्त से आस्वादन करता है।

