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Books - विपत्ति निवारिणी गायत्री

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Language: HINDI
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गायत्री के चतुर्थ पद द्वारा आन्तरिक कायाकल्प

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गायत्री का चौथा पद (धियो यो नः प्रचोदयात्) अपनी आन्तरिक सद्बुद्धि को प्रेरित करने की शिक्षा देता है। हम अपनी कठिनाइयों एवं कष्टों को कारण बाहर ढूंढ़ते हैं और दूसरों पर दोषारोपण करते हैं। पर अधिकांश उलझन ऐसी होती हैं जो हमारी अपनी भूलों, कमियों, भ्रान्तियों एवं अयोग्यताओं के कारण होती हैं। यदि अपनी मनोभूमि परिमार्जित हो जाय तो संसार में अनेक दोष रहते हुए भी हम सुखपूर्वक जीवन-यापन कर सकते हैं।

सन्त इमर्सन कहा करते थे कि—यदि मुझे नरक में रखा जाय तो मैं वहां भी अपने लिए स्वर्ग का निर्माण कर लूंगा। वस्तुतः बात ऐसी ही हैं। यदि हम अपने भीतर पर्याप्त मात्रा में समझदारी और सद्गुण पैदा कर लें तो सहज ही अनेक कठिनाइयों से बच सकते हैं। दुनियां दर्पण के समान है जिसमें अपनी ही सूरत दिखलाई पड़ती है। जो व्यक्ति क्रोधी है उसे प्रतीत होगा कि सारी दुनियां उससे लड़ती-झगड़ती है, जो व्यक्ति झूठा है उसे सब लोग अविश्वासी दीखते हैं। जो स्वयं नीच है वह सारी दुनियां को नीच समझता है। जो निकम्मा और आलसी है उसे सर्वत्र बेकारी मालूम देती है। इसी प्रकार व्यभिचारी, लम्पट, मूर्ख, कंजूसी, गंवार, सनकी, पागल, भिखारी, चोर या मनोविकारों वाले लोग अपने गज से सबको नापते हैं और दूसरों को अपने जैसा बुरा मानकर उन पर दोषारोपण करते हैं। यदि इस समझदारी से अपनी भूल पहिचान लें और दूसरों के साथ नम्रता, मधुरता, सहनशीलता, उदारता एवं संजीदगी से काम लें तो अधिकांश झगड़े उत्पन्न ही न हों, यदि हों भी तो बड़ी आसानी से बात की बात में सुलझ जावें। पात्रता के अनुसार वस्तुऐं मिलती हैं। हम यदि अपनी योग्यताऐं बढ़ाते चलें तो संसार को हमारे लिए वे सभी वस्तुऐं देनी पड़ेंगी जिनके कि हम वस्तुतः अधिकारी हैं। संसार में बुरे आदमी हैं पर उनकी बुराई तभी सफल हो सकती है जब हम में भी कुछ दोष हो। यदि अपना रक्त पूर्ण शुद्ध हो तो विषैले रोग-कीटाणुओं से भी कुछ हानि नहीं हो सकती। इसी प्रकार यदि हम समझदारी और सद्भावना से काम लें न केवल स्वयं सुखी रहें बल्कि बुरे आदमियों की बुराई में भी बहुत हद तक सुधार कर सकते हैं।

जब हम दोषारोपण की दृष्टि से दुनियां को देखते हैं तो हर एक में ढेरों बुराइयां मालूम पड़ती हैं, लगता है कि सभी लोग अपने शत्रु हैं। पर जब दूसरे प्रकार सोचना आरम्भ करते हैं और किस किस से कब कब, कितना कितना उपकार हमारे ऊपर दिया है तो मालूम पड़ता है कि अपने ऊपर दूसरों की सेवा सहायता का इतना भार लदा हुआ है कि उससे सिर उठाना मुश्किल है। पत्नी में कोई एक दोष हो तो लोग उसकी सारी सेवाओं को धूल में मिलाकर केवल उसे पापों की पुतली ही समझने लगते हैं। माता-पिता कोई कटु बात कह दें तो उनकी सारी सेवाओं को भुलाकर लड़के उन पर आग बबूला हो जाते हैं। इसी प्रकार अन्य स्वजन सम्बन्धियों, मित्रों या सत्पुरुषों की एकाध बुराई को लोग बहुत बढ़ा चढ़ा कर अपने मन में दुर्भाव बढ़ाते रहते हैं और उनको अनेकों इच्छाओं को भुला देते हैं। जितना ध्यानपूर्वक हम दूसरों की बुराइयों को देखते रहते हैं, उनकी भूलों से दुखी होते हैं, उसकी अपेक्षा उतने ही ध्यान पूर्वक उनकी अच्छाइयों को देखें तो प्रतीत होगा कि चारों ओर से हमारे ऊपर प्रेम, वात्सल्य, सहयोग, सद्भाव एवं कृपा की वर्षा हो रही है।

किसी एक वस्तु का अभाव रहता है तो लोग ईश्वर को कोसते हैं पर उसकी उन अनन्त कृपाओं को नहीं गिनते जो पग-पग पर उपलब्ध होती रहती हैं। कोई आपत्ति आती है तो उसके दुख को तो देखते हैं पर यह नहीं देखते कि इसके कारण हमें कितनी बहुमूल्य नसीहत मिलेगी तथा प्रारब्ध का कितना बोझ हलका हो जायेगा। ईश्वर अत्यन्त दयालु है वह द्वेष वश या निष्ठुर होकर हमें कोई कष्ट नहीं देता वरन् जिस प्रकार हमारा अत्यन्त हित और दूरवर्ती लाभ देखता है वैसा ही आयोजन करता है भले ही वह कष्टप्रद एवं असुविधाजनक हो। अध्यापक के पीटने में, माता के धमकाने में, डॉक्टर के आपरेशन में, जिस प्रकार बालक का हित ही हित भरा होता है उसी प्रकार अनेक कष्टों के पीछे प्रभु की करुणापूर्ण कृपाऐं ही छिपी रहती हैं।

अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना मनुष्य का स्वाभाविक कर्तव्य है। इसलिए प्रत्येक अपराध से बचने के लिए और उत्तम स्थिति प्राप्त करने के लिए उसे उत्साह और परिश्रमपूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता भाग्य भरोसे बैठा रहता है तो कर्तव्य घात का दोषी बन कर अपनी ड्यूटी पूरी न करने के पाप का दंड पाता है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि पूरी समझदारी, योग्यता और तत्परता से अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए जी-जान से कोशिश करे। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि फल देना परमात्मा के हाथ में है। जो हम चाहते हैं प्रयत्न द्वारा वह अवश्य ही प्राप्त हो जाय, यह आवश्यक नहीं।

अनेक अज्ञात कारण ऐसे हैं जो सत्प्रयोजनों को भी निष्फल कर देते हैं और वैसी परिस्थिति में रहना पड़ता है जो कष्टकारक एवं असुविधाजनक होती हैं। ऐसी दशा में खिन्न होने की कोई बात नहीं। हमारे लिए यह प्रसन्नता की, सन्तोष की, गौरव की बात है कि शक्ति भर अपना कर्तव्य-पालन किया गया। मनुष्य के हाथ में केवल कर्तव्य-पालन ही है, फल ईश्वर के हाथ है। जो वस्तु अपने हाथ की नहीं उसके लिए चिन्तित या परेशान होने का कोई कारण नहीं। कई व्यक्ति काम को आरम्भ करते ही बड़ी उतावली से बड़े-बड़े मन के महल बनाने लगते हैं। जब वे सपने पूरे नहीं होते तो बेतरह रोते चिल्लाते हैं और निराश होकर आवश्यक प्रयत्न और कर्तव्य को भी छोड़ बैठते हैं। इस शेखचिल्ली प्रकृति के मनुष्य अपनी मर्यादा को भूल जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि हम अल्पज्ञ एवं अपूर्ण मनुष्य हैं हमारे हाथ में केवल कर्तव्य करना ही है, फल हमारे हाथ में नहीं है।

ईश्वर को अपनी मर्जी पर चलने के लिए हम विवश नहीं कर सकते वरन् उसकी मर्जी में प्रसन्न रहकर मानसिक सन्तोष को कायम रख सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बेसमझ बूझे, बिना आगा-पीछा सोचे यों ही अन्धाधुन्ध काम किये जांय, ऐसा तो कोई मूर्ख या पागल ही कार्य कर सकता है। दूरदर्शिता और समझदारी से लाभदायक योजना बनाना तो अपना कर्तव्य है पर इतना साहस सदा ही अपने में होना चाहिए कि असफलता में भी अपनी प्रसन्नता कायम रह सके।

गायत्री का चौथा पद यह शिक्षा देता है कि अपने भीतर से प्रेरणा ग्रहण करो, अपने ऊपर निर्भर रहो। बाहरी व्यक्तियों एवं वस्तुओं पर अपने सुख को निर्भर मत रखो। यह तो एक पराधीनता हुई यदि वस्तुयें और परिस्थितियां अनुकूल हुईं तब तो प्रसन्न रहे और यदि प्रतिकूल हो गईं तो रो रो कर सिर धुनने लगे। इसका अर्थ तो यह है कि हम गुलाम हैं। दूसरे मनुष्य हमारे दुख सुख के स्वामी हैं। बाहर की वस्तुओं और परिस्थितियों के इशारे पर हंसने रोने वाले पुतले मात्र अपने को सिद्ध करना आत्मा के महान गौरव के विरुद्ध है। गायत्री कहती है कि अपनी महानता को इस प्रकार तिरष्कृत मत करो। अपना दृष्टिकोण बदल देने मात्र से जादू की तरह दुखों के पर्वत को राई के समान हल्का किया जा सकता है और राई के बराबर सुख में नन्दन वन जैसा स्वर्गीय सुख उपलब्ध किया जा सकता है। जब हमारे दृष्टिकोण में पारस पत्थर जैसी क्षमता भरी हुई है तो उसी को क्यों न संभाला जाय? उसी का सदुपयोग क्यों न किया जाय? अपनी समझ, अकल, मान्यता, भावना, इच्छा, आकांक्षा, रुचि, दृष्टि एवं आन्तरिक स्थिति में थोड़ा सा हेर-फेर कर उतना सुख मिल सकता है जितना कि हर एक अच्छा के पूरा होते रहने का सुअवसर मिलते रहने पर भी प्राप्त होना सम्भव नहीं है।

कई सामाजिक प्रथाऐं और परम्पराऐं ऐसी हैं जो प्राचीन काल में उपयुक्त भले ही हो रही हों पर आज की परिस्थिति में उनकी उपयोगिता समाप्त हो गई है। ऐसी प्रथा और परम्पराओं के बन्धन में जकड़े रह कर कई व्यक्ति आत्म हनन करते रहते हैं और यह तलाश करते रहते हैं कि कोई ऐसा दैव योग उत्पन्न हो जाय जिससे कठिन एवं अनावश्यक सामाजिक बन्धनों का तनिक भी विरोध न करना पड़े और मनचाहा सौभाग्य प्राप्त हो जाय। इस टेड़े मार्ग की प्रतिक्षा में बैठे-बैठे जो लोग निराशा के गर्त में गिर रहे थे और अपनी विषम परिस्थिति पर आंसू बहाया करते थे उन्हें गायत्री का चौथा पद एक नई प्रेरणा से परिपूर्ण विवेक बुद्धि प्रदान करता है जिससे उत्साह और साहस पाकर अनावश्यक प्रतिबन्धों की साधक उपेक्षा कर देता है और अत्यन्त कठिन दिखाई पड़ने वाले मनोरथ को सहज ही प्राप्त कर लेता है।

आज अधिकांश लोग लकीर के फकीर हैं। वस्तु स्थिति को विवेकपूर्वक समझने का कष्ट उठाना उन्हें मंजूर नहीं। वे चाहते हैं कि कोई बर्बाद होता हो तो हो जाय पर अन्धी परम्पराऐं यथावत् कायम रहें। ऐसे लोगों की सम्पत्ति अन्धी भेड़ों के मिमियाने के बराबर भी महत्व नहीं रखती। ऐसे लोगों की निन्दा प्रशंसा दोनों ही उपेक्षणीय है। गायत्री अपने अनुयायी के मन में आवश्यक साहस देकर इतना मनोबल उत्पन्न कर देती है कि वह विवेक के अनुसार अपना पथ निर्धारित करे और मेंढकों के टर्राने से भयभीत न हो। आज इस प्रकार के कष्टों की कमी नहीं है जो सामाजिक कुप्रथाओं के प्रतिबन्धों के कारण लोगों को उठाने पड़ते हैं। यह अज्ञान अन्य सड़े गले बन्धन, साहसी और विवेकवान व्यक्ति द्वारा आसानी से भटक कर तोड़ दिये जाते हैं और उसकी पिसती हुई अन्तरात्मा पुनः विकसित होने लगती है।

कोई व्यक्ति अत्यन्त साधारण की बात पर बड़े उत्तेजित हो जाते हैं। छोटी-छोटी बातों को बहुत अधिक महत्व देते हैं और हर्ष, शोक, चिन्ता, भय, क्रोध, आवेश आदि उत्तेजनाओं के वशीभूत होकर ऐसे कार्य कर बैठते हैं जिन पर पीछे भारी पश्चाताप करना पड़ता है। डरपोक स्वभाव के आदमी बहुधा भविष्य में किसी विपत्ति या अनिष्ट की आशंका किया करते हैं उन्हें कोई न कोई डर लगा ही रहता है और छाती धड़कती रहती है कि कहीं ऐसा न हो जाय, कहीं वैसा न हो जाय। किसी से मामूली कहा-सुनी हो जाय तो उन्हें ऐसा लगता है मानों विश्व-युद्ध में फंस गये। कोई मामूली सा मुकदमा लग जाय तो ऐसा सोचते हैं मानो अब उन्हें कोल्हू में ही पेला जाने वाला हो। छोटी छोटी बातों पर उनके क्रोध का पारा आसमान पर चढ़ जाता है। आत्म-हत्या कर बैठना, घर छोड़कर भाग जाना, साधू बाबा जी का वेश बना लेना और न जाने क्या क्या ऊट पटांग कर बैठना उनके लिए साधारण सी बात होती है। ऐसे लोग थोड़ा साधन या वैभव पाकर बेहिसाब इतराते हैं और अभिमान के नशे में चूर हो जाते हैं। मामूली सी जिम्मेदारियां सिर पर हों तो ऐसे चिन्ता मग्न हो जाते हैं मानों शेष की तरह सारी पृथ्वी के बोझ को ही अपने ऊपर उठाये हुये हैं।

इस प्रकार की उत्तेजित मनोदशा आत्मिक अज्ञान का फल है। गायत्री का साधक अपनी आत्मिक महानता को भली प्रकार समझ लेता है और जानता है कि संसार में जो आये दिन रंग बिरंगी घटनायें घटित होती रहती हैं वे धूप छांह की तरह क्षण में बदलने वाली होती हैं। उनका महत्व बहुत कम है। इसलिए इन तुच्छ सी बातों को अनावश्यक महत्व क्यों दिया जाय? जीवन शान्ति, स्थिरता और हलके दृष्टिकोण से जीने की वस्तु हैं। इसे एक क्रीड़ा, कल्लोल, विनोद विकास ही समझना चाहिए। इस तत्वज्ञान को अपना कर वह अनावश्यक शोक, मोह, चिन्ता, भय और क्रोध-आवेश से बचा रहता है। शान्तिपूर्वक कर्तव्य-मार्ग में प्रवृत्त रहने से उसका मस्तिष्क स्वस्थ रहता है और अगणित मानसिक पीड़ाओं से उसे छुटकारा मिल जाता है। जो मानसिक शान्ति उसे विशाल फौज, राज-पाट, धन-भंडार मिलने पर भी नहीं मिल सकती थी वह जीवन को हलके दृष्टिकोण से जीने की नीति समझ में आ जाने पर सहज ही मिल जाती है। गायत्री का चौथा पद हमें आत्मज्ञान और आत्म-बल देता है जिसके कारण अन्तःकरण में उत्पन्न होने वाले कष्टों का विनाश बड़ी सरलतापूर्वक हो जाता है। असफलता और सफलता में उसे कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं मालूम देता। उसका ध्यान केवल कर्तव्य पर रहता है हानि लाभ या असफलता-सफलता पर नहीं।

अपने आन्तरिक क्षेत्र का, मनोभूमि का संशोधन करना, समस्या की जड़ अपने अन्दर खोजना, यही ‘आध्यात्म’ है। यही गायत्री के तृतीय चरण का संदेश है। इसे हृदयंगम करने वाली कभी भी, किसी भी स्थिति में दुखी एवं असन्तुष्ट नहीं रह सकता, उसे हर स्थिति में प्रसन्नतादायक अवसर ही दृष्टिगोचर होते हैं, वह हर घड़ी हंसता मुस्कराता है, आनन्दित और उल्लसित रहता है।

गायत्री की शिक्षा है कि हम हर घड़ी हर परिस्थिति में प्रसन्न रहें क्योंकि प्रसन्नता हमारी आध्यात्मिकता का प्रमुख लक्षण है। आत्मा आनन्दमयी है, उसकी बाह्य आवरण की दिनचर्या भी आनन्दमयी होनी चाहिए। हर घड़ी प्रसन्न रहने की आदत डालने के लिए हर गायत्री-प्रेमी को जी जान से कोशिश करनी चाहिए। मुंह फुलाये रहना, निराश, उदास और चिन्तित बैठे रहना किसी व्यक्ति की दीनता-हीनता का ही परिचायक हो सकता है। जिसे अपने स्वरूप का थोड़ा सा भी ज्ञान होगा वह अपनी महानता पर प्रभु की आनन्दमयी रचना को देखकर सदा हंसता-मुस्कराता ही रह सकता है।

गीता के अध्याय 2 श्लोक 65 में बताया गया है कि ‘प्रसन्न रहने से मनुष्य के सब दुखों का नाश होता है और बुद्धि की स्थिरता बढ़ती है, हंसोड़े आदमी बहुधा स्वस्थ और मोटे ताजे पाये जाते हैं। कारण यह है कि हंसने से नस नाड़ियों में खून का दौरा भली प्रकार होता है, मांस पेशियों में फुर्ती और चैतन्यता रहती है क्योंकि कंठ, श्वांस नाड़ियों, फेफड़ों और पेट का अच्छा व्यायाम होता रहता है। आंख, कान, नाक सभी पर ऐसा अवसर पड़ता है जिससे यह इन्द्रियां भली प्रकार काम करती रहती हैं। इसके विपरीत अप्रसन्न, निराशा दुखी, शोक ग्रस्त, क्रोधी, ईर्ष्यालु स्वभाव के मनुष्य अपने स्वास्थ्य को भट्टी में पड़ी हुई लकड़ी की तरह जलाते रहते हैं।

मन का, मस्तिष्क का नाश करने में अप्रसन्नता से बढ़कर और कोई घातक शत्रु नहीं। जिसका चित्त किसी न किसी कारण दुखी बना ही रहता है जो आशंका, भय, असफलता से चिन्तित रहता है, जिसे द्वेष, कुढ़न, शोक, आवेश, उद्वेग घेरे रहते हैं, जो अहंकार से गर्दन फुलाये रहता है, सीधे मुंह किसी से बात करना जिसे सुहाता नहीं ऐसे मिज़ाज आदमी अपनी मानसिक शक्तियों का सत्यानाश करते रहते हैं, ऐसे लोग अक्सर अनिद्रा, मधुमेह, बवासीर, कब्ज, जिगर बढ़ जाना, मुंह से बदबू आना, दांतों से मवाद आना, रक्त की कमी, दिल की धड़कन, मुंह में छाले, सनक, पागलपन जैसे रोगों से ग्रसित हो जाते हैं और कितनी ही इलाज करने पर भी जड़ से नहीं जाते। मानसिक अप्रसन्नता और उद्विग्नता के कारण रक्त के श्वेत कीटाणु अशक्त हो जाते हैं। फलस्वरूप शरीर को रोग निरोधक शक्ति में शिथिलता आ जाती है। हड्डियों के भीतर की मज्जा सूख जाती है, नसें सख्त पड़ जाने से पैरों में हड़फूटन होती रहती है। चिन्ता से रज वीर्य निस्तत्त्व हो जाते हैं। फलतः ऐसे लोगों को सुसन्तति से वंचित रहना पड़ता है।

प्रसन्न रहने से मानसिक शक्तियां बढ़ती हैं और बुद्धि बढ़ने से मनुष्य अनेक प्रकार की सफलताएं प्राप्त करता है। हंसता हुआ चेहरा एक प्रकार का खिलता हुआ फूल है जिसे देखकर दर्शक का मन अनायास ही उस ओर खिंच जाता है। कुरूप से कुरूप मनुष्य भी जब प्रसन्न मुद्रा में होता है तो अधिक सुन्दर, अधिक स्वस्थ एवं अधिक सुखी दिखाई देता है। हंसने वाले के अनेक मित्र बन जाते हैं। प्रसन्नता के मधु पान के लिए अनेक व्यक्ति उसके इर्द गिर्द जमा हो जाते हैं।

प्रसन्न मुख मुद्रा प्रमाणिकता की साक्षी देती है जो स्थिर चित्त है, सुखी है, सन्तुष्ट है वह प्रसन्न रहेगा अथवा यों कहिए कि जो प्रसन्न रहता है उसके पास चारों सम्पदाऐं होंगी। यह चारों सम्पदाऐं जिसके पास हैं वह निश्चय ही बुद्धिमान, गम्भीर, विश्वसनीय, साहसी, कुशल एवं सुयोग्य समझा जाता है। प्रसन्न रहना देखने में मामूली बात है पर उसके पीछे अनेक आशाजनक रहस्य छिपे हुए हैं। प्रसन्नता का हर जगह स्वागत होता है।

परमात्मा के इस पुनीत उद्यान में, संसार में विनोद की क्रीड़ा करने के लिए जिस आत्मा का अवतरण हुआ है उसे हर घड़ी प्रसन्न रहना चाहिए। काले-सफेद, भले-बुरे, प्रिय अप्रिय तथ्यों से भरा हुआ यह संसार कितना सुन्दर है इसे देखकर उसका हृदय कमल खिल जाता है। अच्छाइयों का मधुर स्पर्श करना और बुराइयों से लड़ना, यह उभय पक्षीय कार्यक्रम सामने रख कर मानों भगवान ने मीठे और तीखे षट्-रस व्यंजन हमारे जीवन काल में परोसे हैं। हानि-लाभ के विविध स्वादों का विविध प्रकार अनुभव करते हुए हमें उसी प्रकार आनन्दित रहना चाहिए जैसे स्वादिष्ट षट्रस भोजनों का आस्वादन करते हुए हम प्रसन्न होते हैं। सुख-दुख, अमीरी गरीबी, हानि-लाभ अपने अपने ढंग के व्यंजन हैं। यह सभी अपने ढंग से स्वादिष्ट हैं। एक से दूसरे का महत्व है। विरोध भाव न हो तो हर वस्तु नीरस हो जाय। दिन का महत्व रात के कारण होता है। यदि रात न हो तो दिन के आनन्द का अनुभव ही न हो, इसी प्रकार सुख का आनन्द तभी है जब दुख का अस्तित्व भी हो। दुख न हो तो जिन बातों को आज सुख समझा जाता है उनमें तनिक भी आनन्द एवं आकर्षण प्रतीत न होगा।

गायत्री के चौथे पद का संदेश यह है कि अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का हम बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करें। अच्छे से अच्छे भविष्य की आशा करें और बुरे से बुरे परिणाम का मुकाबला करने को तैयार रहें। यदि कठिनाइयों का अपने प्रयत्न को बढ़ाने की चुनौती मात्र समझा जाय, उनसे भयभीत न हुआ जाय तो निश्चय ही कोई अप्रिय परिस्थिति हमें दुखी नहीं कर सकती, अपनी प्रसन्नता में बाधक नहीं हो सकती। प्रसन्न रहना अपना स्वभाव बना लेने की सद्बुद्धि को अपना लिया जाय तो जरा जरा से तुच्छ कारणों से दुखी होने की कुबुद्धि से सहज ही छुटकारा मिल सकता है। जीवन खिलाड़ी की भावना से खेलने के लिए हैं। खिलाड़ी पूरे उत्साह से खेलते हैं पर जीत हार की विशेष परवा नहीं करते हैं। मंच पर पार्ट करने वाले नट अनेक प्रकार के अभिनय करते हैं पर स्वयं उनसे प्रभावित नहीं होते। इसी खिलाड़ी नट की भावना के साथ जीवन का खेल खेलना चाहिए। किसी भी घटना को, किसी भी परिस्थिति को बहुत अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। जो कष्ट या अभाव हमें बहुत परेशान करते हैं उन्हें यदि हलकी दृष्टि से देखें तो वे बहुत ही तुच्छ प्रतीत होते हैं। इन अभावों के होते हुए भी अनेकों से अपनी स्थिति बहुत अच्छी है, जितनी सुविधाऐं प्राप्त हैं उनकी तुलना में दुख तो नाम मात्र का है। ऐसी दशा में यदि हम चाहें तो अपनी सम्पन्नताओं और सुविधाओं पर प्रसन्न होकर छोटे मोटे अभावों की सहज ही उपेक्षा कर सकते हैं। आनन्द भीतर है। उसे बाहर की वस्तुओं में नहीं ढूंढ़ना चाहिए। वरन् भीतर से प्रेरित करना चाहिए। सद्बुद्धि रूपी प्रसन्नता हमारे अन्तर में छिपी पड़ी है उसे प्रेरित समुन्नत करते ही कष्टों की निशा समाप्त हो जाती है और आनन्द रूपी सूर्य की किरणें अपने चारों ओर बिखरी हुई दिखाई पड़ती हैं।
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