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Books - विपत्ति निवारिणी गायत्री

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Language: HINDI
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विपत्ति में भी भगवान की दया

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भगवान जिसे अपनी शरण में लेते हैं, जिसे बन्धन मुक्त करना चाहते हैं, उसके अनिवार्य कर्म भोगों को जल्दी जल्दी भुगतवा कर उसे ऐसा ऋण मुक्त बना देते हैं कि भविष्य के लिए कोई बन्धन शेष न रहे और भक्त को फिर जन्म मरण के चक्र में न पड़ना पड़े। एक ओर विपत्ति द्वारा प्रारब्ध-भोग समाप्त हो जाते हैं दूसरी ओर उसकी आन्तरिक पवित्रता इतनी बढ़ती है इन उभय पक्षीय लाभों से वह बड़ी तीव्र गति से परम लक्ष की ओर प्रगति करता है। तपस्वी लोग कष्टों को प्रयत्न पूर्वक अपने ऊपर आमंत्रित करते हैं ताकि उनकी लक्ष यात्रा शीघ्र पूरी हो जाय।

साधारणतः अनेक सद्गुणों के विकास के लिए भगवान समय समय पर अनेक कटु अनुभव कराते हैं। बच्चे की मृत्यु होने पर उसके शोक में ‘वात्सल्य’ का हृदय गत पर सात्विक तत्व उमड़ता है जिसके कारण वह अन्य बालकों पर अधिक प्रेम करना सीखता है। देखा गया है कि जिसकी पहली पत्नी गुजर जाती है वह अपनी दूसरी पत्नी से अधिक सद् व्यवहार करता है क्योंकि एक पत्नि खोने के कारण जो भावोद्रोक मन में हुआ उसके कारण दाम्पत्य कर्तव्य का उसे ज्ञान हुआ है और अपने प्रथम दाम्पत्य की अपेक्षा दूसरे जीवन में अधिक सफल सिद्ध होता है। एक वियोग उन्हें उस खोई हुई वस्तु के महत्व को भली प्रकार हृदयगत ही करा देता है। धन खोकर मनुष्य यह सीखता है कि धन का सदुपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। रोगी हो जाने पर आदमी यह जान पाता है कि संयम, आहार विहार का महत्व है। गाली देने पर जिसका मुंह पीट जाता है, उसको यह अकल आती है कि गाली देना बुरी बात है। जिसको अत्याचार सहना पड़ा है वही जानता है कि दूसरों पर यदि जुल्म करूं तो उन्हें कितना कष्ट होगा। जब हम आपत्ति ग्रस्त होकर दूसरों की सहायता के लिए हाथ पसारते हैं और दीन नेत्रों से दूसरों की ओर ताकते हैं तब यह पता चलता है कि दूसरे दुखियों की सहायता हमारे लिए भी हमारे लिए भी कितना आवश्यक कर्तव्य है।

कई मूर्ख यह कह बैठते हैं कि जब विपत्ति ईश्वरीय कृपा है तो उसे दूर करने के लिए कोई प्रयत्न क्यों करें? यह तो ऐसी ही बात है जैसी कि कोई विद्यार्थी यह कहे कि ‘‘मास्टर साहब का मारना भी जब हित के लिए है तो रोज खूब पिटना चाहिए, इस पिटते रहने से ही हमारा कल्याण हो जायेगा।’’ ऐसे मूर्ख नहीं जानते की मास्टर चाहता है कि विद्यार्थी अधिक सावधानी, अधिक परिश्रमशीलता को अपनावे। इन्हीं उद्देश्य के लिए वह मारपीट का कठोर कार्य हाथ में लेता है। जो विद्यार्थी मास्टर के मारने का प्रयोजन न समझ कर, उसकी इच्छा और प्रेरणा को न समझकर, उलटा यह समझ बैठे कि पिटते रहने से ही मैं विद्वान हो जाऊंगा, पढ़ने में परिश्रम क्यों करूं? ऐसी औंधी समझ का छात्र को किन शब्दों में क्या कहा जाय? इसी प्रकार जो व्यक्ति दुखों को ईश्वरीय कृपा समझ कर उनके प्रतिकार का प्रयत्न नहीं करते वे प्रभु के सारे प्रयत्न को ही व्यर्थ कर देते हैं। जब गायत्री माता सद्बुद्धि के रूप में साधक के हृदय कमल पर अवस्थित होती है तो अज्ञान अन्य अधिकांश दुख, दरिद्र तो मनोभूमि में से अपने आप पलायन कर जाते हैं तथा अनेक प्रकार की सुख सम्पत्तियों का द्वार स्वयं ही खुल जाता है।
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विपत्ति निवारिणी गायत्री
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