गायत्री के तृतीय पाद द्वारा सद्गुणों की वृद्धि
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गायत्री के तीसरे (भर्गो देवस्य धीमहि) में दिव्य गुणों को धारण करने के लिए कहा गया है। बहुमूल्य आभूषण, वाहन साधन आदि के द्वारा साधारण लोग अपने को गौरवान्वित समझते हैं, पर गायत्री उपासकों को अपनी शोभा, महिमा बढ़ाई एवं विशेषता सद्गुणों से सुसज्जित होने में समझना चाहिए।
धन से जीवनोपयोगी वस्तुऐं खरीदी जाती हैं। धन की उपयोगिता इतनी ही है कि उससे हमारी अन्न, वस्त्र आदि की आवश्यक वस्तुऐं खरीदी जा सकें। अन्न, वस्त्र आदि की आवश्यकताएं एक सीमा तक नहीं होती हैं और वे एक नियत मात्रा में धन-उपार्जन करने पर आसानी से पूरी हो सकती हैं। इन दिनों दुर्भाग्यवश महंगाई का कुचक्र चल पड़ा है जिससे साधारण जनता को दुर्भिक्ष जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। यदि कुचक्र सामयिक है। कुछ दिन पूर्व ऐसे दुर्दिन नहीं थे और आशा है कि आगे भी यह नहीं रहेंगे। साधारण परिस्थितियों के समय में एक स्वस्थ मनुष्य अपने परिवार की उचित आवश्यकताओं को पूरा करने लायक आसानी से कमा सकता है। फिर भी देखा जाता है कि लोग अधिक कमाने और जोड़ने की धुन में बेतरह लगे हुए हैं। जिसके पास अपनी आवश्यकताओं लायक पहले से काफी मौजूद हैं वे भी सब काम छोड़कर दिन रात अधिकाधिक धन कमाने में प्रवृत्त हैं, उनके समय का सारा भाग इसी उधेड़-बुन में लगा रहता है।
धन की शक्ति बड़ी सीमित है, उससे शरीर का निर्वाह करने वाले पदार्थ खरीदे जा सकते हैं, जिनकी वास्तविकता बहुत ही सीमित है। जमा किया अत्याधिक धन किसी के कुछ काम नहीं आता। सब जहां का तहां पड़ा रह जाता है। जिन उत्तराधिकारियों के लिए उसे जोड़ा जाता है वे उस मुफ्त के माल से बेरहम ऐयाशी करते हैं और उसे बारूद की तरह फूंक कर तमाशा देखते हैं। मुफ्त की मिली हुई पैतृक सम्पत्ति उत्तराधिकारियों का निकम्मा, आलसी, व्यसनी, फिजूलखर्च एवं दुर्गुणी बना देती है इसलिए सन्तान के लाभ के लिए जोड़ा गया धन वस्तुतः उनकी हानि ही करता है। कितने ही लड़के उस मुफ्त के माल पर बेतरह लड़ मरते हैं, मुकदमेबाजी में वह सारी बारूद बात की बात में फूंक जाती है। धनी व्यक्ति दूसरों की आंखों से सुखी दीखते हैं पर अपने आप में वे काफी चिन्तित और परेशान रहते हैं। धन कमाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया, हानि से बचने की चिन्ता, सुरक्षा आदि व्यवस्थाओं में इतनी जानकारी करनी पड़ती है कि वे लोग वस्तुतः गरीब एवं मजदूरों की अपेक्षा आन्तरिक दृष्टि से अधिक उद्विग्न रहते हैं। यह उद्विग्नता उनके शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक सन्तुलन को खा जाता है।
इन कठिनाइयों को जानते हुए भी लोग जैसे बने वैसे धन कमाने के लिए इतनी तत्परता के साथ जुते हुए हैं इसका कारण यह है कि ‘‘धन की प्रतिष्ठा होने’’ लगी है। जिसके पास धन है उसे बड़ा आदमी, महापुरुष, आदरणीय समझा जाने लगा है। पूर्व काल में जिसके पास ज्ञान, विद्या, चरित्र, त्याग आदि की दैवी संपदाएं थीं उसका सबसे अधिक आदर होता था। मध्य युग में पराक्रम, पुरुषार्थ, साहस, वीरता, शक्ति की प्रतिष्ठा रही। जो जितना शक्ति सम्पन्न होता था उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। आज धन की प्रतिष्ठा है। चाहे कोई मनुष्य मूर्ख, दुष्चरित्र, दुर्बल, कायर आदि कितनी अयोग्यताओं से घिरा हुआ हो पर यदि उसके पास पैसे हैं तो लोग उसके प्रति आदर प्रकट करेंगे, उसे मान देंगे, उसे अगुआ, नेता या पेंच मानेंगे, उसकी हां में हां मिलाने वाले अनेक लोग तैयार हो जायेंगे।
साधारण जनता अनुकरण करने के स्वभाव की होती है। जब देखा जाता है कि धनवान व्यक्ति सर्वत्र आदर पाते हैं। उनका गौरव, बड़प्पन और मान होता है। समान मनोभूमि के लोग भी बड़प्पन प्राप्त करने के लिए, प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए धनी बनने का प्रयत्न करते हैं। जिनके पास वस्तुतः धन नहीं है वे भी धनी बनने के आडम्बर बनाते हैं। विवाह शादियों के अवसर पर तो यह पाखण्ड हद दर्जे की मूर्खता तक पहुंच जाता है। बराती लोग ऐसे सजकर आते हैं, मानों इनमें से हरेक कुबेर का भाई बन्धु है। आतिशबाजी, गाजे-बाजे, रोशनी, सवारी, इत्र, पान, रुपये-पैसों की बखेर, शाही ज्यौनार आदि के द्वारा यह प्रकट करने की कोशिश की जाती है कि हम कितने बड़े अमीर हैं। दहेज की बड़ी-बड़ी रकमें और वधू के लिए चढ़ाये जाने वाले कीमती वस्त्राभूषण यही प्रकट करने के लिए होते हैं कि हम कितने बड़े अमीर हैं, हमारे पास आवश्यकताओं से अधिक कितना अधिक पैसा फालतू बचता है, जिसे आज हम इस तरह मुक्त हस्त से लुटाते हुए भी कोई कठिनाई अनुभव नहीं करते। विवाह के अवसर पर अपने को धनी प्रदर्शित करके यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हम कितने बड़े आदमी, कितने आदरणीय, कितने महान पुरुष, कितने यशस्वी हैं। ठीक भी है, जब मनुष्य की महानता धन पर केन्द्रित हो गई तो इस प्रकार के प्रदर्शनों द्वारा ही अपना धनीपन प्रकट करके अपने गौरव का झंडा गाढ़ा जा सकता है।
आत्मा वस्तुतः महान है। अतएव वह अपने को महान ही प्रकट करना चाहता है। हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा रहती है कि प्रतिष्ठित, आदरणीय एवं महान समझा जावे। वह देखता है कि आज वे ही लोग प्रतिष्ठित हैं जिनके पास धन है, तो उसका पक्ष धनी बनना हो जाता है। आज अधिकांश मनुष्यों का जीवन-लक्ष्य यही बना हुआ है। चूंकि न्यायपूर्वक, परिश्रम के साथ सन्मार्ग से उतना ही कमाया जा सकता है जो काम चलाने लायक हो। अधिक कमाने के लिए वे मार्ग अपनाने पड़ते हैं जो पापपूर्ण हैं। बड़े आदमी कानूनी लूटमार और शोषण करते हैं, छोटे आदमी गैर कानूनी छापा मारते हैं। जिसको जितना मौका मिलता है अपनी घात चलाता है। आज समाज में व्यापक रूप से जो अनैतिकता फैली हुई है उसका कारण यह धनी बनकर बड़े आदमी होने की हविस ही काम कर रही है।
हम देखते हैं एक आदमी दूसरे को खाये जा रहा है। एक दूसरे की आंतें निकाल लेने के लिए घात लगाए बैठा है। जिसका जैसा मतलब सिद्ध होता है वह वैसा ही प्रपंच बना लेता है। आपसी प्रेम और सद्भाव विदा हो रहे हैं और उनके स्थान पर स्वार्थ का पिशाच नंगा होकर नाच रहा है। बाप अपने बेटी बेटों को बेच रहा है। भाई का भाई जानी दुश्मन बना हुआ है। बुड्ढे मां-बाप को रोटी खिलाना बेटों के लिए असह्य बोझ बना हुआ है। निर्धन पति पत्नी को आंखों देखा नहीं सुहाता। बेटे की बहू यदि दहेज साथ नहीं लाई है, तो उसका परित्याग कर दिया जाता है। नौकर चोर-डाकुओं से मिलकर मालिक की जान लेने पर दांत लगाये बैठा है। मित्र बनकर कलेजा निकाल ले जाने वाले नर पिशाचों की कमी नहीं। निकट सम्बन्धियों की पारस्परिक मनोदशा जब यह है तब दूरवर्ती लोग धन के लिए दूसरों के साथ जो भी नीति बरतें, वह कम है। रिश्वतखोरी, चोरबाजारी, बेईमानी, मिलावट, धोखाधड़ी, ठगी आज व्यापक रूप में फैली हुई है। चोरी, डकैती करने का साहस तो किन्हीं-किन्हीं को ही होता है पर सभ्य तरीके से सभी लोग धन-उपार्जन के लिए सब कुछ कर रहे हैं। सतीत्व, धर्म, ईमान, मजहब, बुद्धि, विद्या, न्याय, कर्तव्य, वफादारी यहां तक कि जान तक पैसे के लिए बिक रही हैं।
पूर्व काल में जब विद्या, तप और चरित्र की प्रतिष्ठा थी उनके आधार पर मनुष्य का बड़प्पन आंका जाता था तो लोग इसके लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां करते थे। प्रह्लाद, विश्वामित्र, हरिश्चन्द्र, गौतम बुद्ध, अम्बपाली, मीरा, गोपीचन्द जैसे साधन सम्पन्न लोग अपने वैभव को लात मारकर तपश्चर्या का मार्ग अपनाते थे। जब विद्या की अपेक्षा शक्ति में बड़प्पन माना जाय तो अपनी शूरता का परिचय देने के लिए राजपूतों और राजपूतनियों ने वे कार्य कर दिखाये जिन्हें सुनकर सुनने वालों के कलेजे कांप उठते हैं। जान गंवा देना उनके लिए एक खेल हो गया था। प्रतिष्ठा के लिए मनुष्य बड़े से बड़ा खतरा उठाने को तत्पर हो सकता है। आज भी जब कि धन की प्रतिष्ठा बढ़ी है तो लोग धन के लिए बड़े से बड़ा खतरा मोल लेने को तैयार हैं। पर कठिनाई तो यह है कि लोग जैसे विद्या, तप, चरित्र, पुरुषार्थ आदि अपने आप में स्वयं उत्पन्न कर सकते हैं वैसे सोना, चांदी अपने आप में से अधिक मात्रा में उत्पन्न नहीं कर सकते, उसके लिए तो सुलभ मार्ग ‘अपहरण’ ही दिखाई पड़ता है, जिसके लिए लोग राजदंड का, ईश्वरीय दंड का, प्रत्याक्रमण का, निन्दा का खतरा खुशी-खुशी उठा लेते हैं और जैसे बने वैसे धनी बनने में जुट पड़ते हैं। इस मनोवृत्ति ने आज घर-घर में कलह, विरोध, क्लेश एवं दुर्भाग्य पैदा कर दिये हैं जिनसे अनेक प्रकार के दुखदायी अपराध हो रहे हैं। इस गति-विधि से सर्वत्र असन्तोष की अग्नि जल रही है और व्यापक रूप से लोगों के मन निराश, शुष्क, खिन्न, नीरस एवं दुखित हो रहे हैं।
धन की उपयोगिता है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। पर उसको मनुष्य की महानता का चिह्न समझना भारी भूल हैं। इस कुबुद्धि से ग्रसित होकर आज सारी मनुष्य जाति दुख पा रही है। भारतीय धर्मशास्त्रों में परिग्रह को सदा से हेय माना जाता रहा है। विद्या और बल के पश्चात धन को तीसरे दर्जे की घटिया शक्ति माना है, उस तीसरे दर्जे की चीज को जब पहले दर्जे का सम्मान दिया गया तो उसका दुष्परिणाम होना ही चाहिए।
गायत्री रूपी सद्बुद्धि द्वारा हम इस कुबुद्धि का परिमार्जन कर सकते हैं। तीसरे पद (भर्गो देवस्य धीमहि) की शिक्षा हमारे लिए यह है कि हम दिव्य शक्तियों को धारण करें, दिव्य गुणों को बढ़ावें, दैवी सम्पत्तियों का संचय करें, हम धन के आधार पर नहीं वरन् सद् विचारों और सत्कार्यों के आधार पर किसी का सम्मान करें, हम अपना बड़प्पन अपने सद्गुणों से तोलें और दूसरों को बड़ा तभी मानें जब उनमें उच्च आदर्श, श्रेष्ठ चरित्र और लोक-सेवा के तत्व समुचित मात्रा में देखें। हमें धनपतियों का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं। हमें उन्हें अपना नेता, पथ-प्रदर्शक एवं आदर्श मानें, जो गुणों की दृष्टि से, दैवी सम्पदाओं की दृष्टि से सुसम्पन्न हों। जब यह मान्यता बढ़ेगी और यह समझा जाना लगेगा कि धन की उपयोगिता शरीर-निर्वाह मात्र के लिए सीमित मर्यादा में ही है और उसका मनुष्य की प्रतिष्ठा से कोई सम्बन्ध नहीं है तो निश्चय है कि आज जो धन के पीछे पागल दौड़ लग रही है वह बन्द हो जायेगी और लोगों को ध्यान उस विचार एवं कार्यों की ओर मुड़ेगा जो वास्तव में प्रतिष्ठा के योग्य हैं।
किसी जमाने में गुलामों को रखना बड़प्पन का चिह्न रहा है। जिसके पास जितने अधिक गुलाम खरीदे हुए होते थे वह उतना ही बड़ा आदमी समझा जाता था, लेकिन पीछे जब लोगों ने देखा कि मनुष्य को मनुष्य के द्वारा गुलाम बनाकर अपने बन्धन में रखना एक पाप है तो उस प्रथा का लोप हो गया। जब गुलाम रखने वाला अमीर, लोगों की दृष्टि में घृणास्पद ठहराया गया तो उसे विवश होकर अपनी गतिविधि बदलनी पड़ी। इसी प्रकार एक जमाने में बहुत स्त्रियां रखना भी मनुष्य के लिए गौरव का चिह्न रहा है। जिसके पास जितनी अधिक स्त्रियां होती थीं वह उतना ही बड़ा आदमी माना जाता था। पीछे जब विवेक, बुद्धि द्वारा इस प्रथा का विरोध हुआ तो वह घृणित प्रथा नष्ट हो गई। जब राजा जनक और राजा दशरथ जैसे साधु राजाओं के धर में क्रमशः 100 और 300 रानियां थीं तब तामसी राजसी स्वभाव के सम्पन्न लोगों को घर में कितनी रानियां होंगी। राजा जरासंध के यहां 16 हजार रानियां थीं। ऐसे भूत काल के अनेक उदाहरण हैं। जब तक राजा रईसों के यहां इस प्रथा के चिह्न व शेष पाये जाते हैं पर चूंकि लोकमत इसके विरुद्ध है इसलिए यह बुराई अपने आप विदा होती चली जा रही है। गायत्री की शिक्षा का जब संसार में पुनः प्रकाश होगा तो निश्चय ही ‘धन के कारण प्रतिष्ठा’ के विरुद्ध प्रतिष्ठा के विरुद्ध भी ऐसे ही प्रचण्ड लोकमत तैयार होंगे। तब इस दिशा में पागल दौड़ लगाना रुक जायेगा। फलस्वरूप वे अगणित बुराइयां भी बंद हो जायेंगी जो आज ‘‘जैसे बने वैसे’’ धनी बन जाने की हविस ने पैदा कर दी हैं।
धन पदार्थ है, इसलिए साधन है। जितने भी पदार्थ संसार में हैं वे साधन हैं वे साधन हैं पदार्थ कभी साध्य नहीं हो सकते। धन के द्वारा शारीरिक आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं। शरीर को संजोया जा सकता है पर जीव की आन्तरिक उन्नति या तृप्ति उससे नहीं हो सकती। इसलिए धन कमाने की भांति ही सद्ज्ञान, सद्गुण एवं सद् विनोद को प्राप्त करने के लिए भी समय लगाया जाना चाहिए। जब धन ही लक्ष बन जाता है तो अन्य दिशाओं में मन नहीं लगता, समय का अधिकांश भाग उसी उधेड़-बुन में लगने के पश्चात अन्य प्रकार की उन्नतियों के लिए न इच्छा रहती है न शक्ति न सुविधा। इसलिए यह आवश्यक है कि धन को उतना ही महत्व दिया जाय जितना की वस्तुतः उसे मिलना चाहिए। कोई व्यक्ति अध्ययन का श्रम न करना चाहे तो करोड़ों रुपया खर्च कर देने पर भी वह विद्वान नहीं बन सकता। कोई व्यक्ति बिना अभ्यास किये प्रचुर धन व्यय करने पर भी संगीतज्ञ नहीं बन सकता। किसी का सच्चा प्रेम सहस्रों रुपयों में भी नहीं खरीदा जा सकता है। रुपयों का सवाल खर्च करने के बदले में भी स्वास्थ्य नहीं मिल सकता। इन सब बातों के लिए अपना समय और मनोयोग लगाना पड़ता है। मनोयोग और श्रम लगाने के लिये कोई मनुष्य तभी तैयार होगा जब धन की तुलना में उनका महत्व भी बहुत कम न आंका जाय। आज लोग धन को इतना महत्व देते हैं कि और कुछ कमाने में उन्हें आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती।
स्वाध्याय के लिए लोगों को फुरसत नहीं, व्यायाम के लिए अवकाश नहीं, भजन के लिए समय नहीं मिलता, लोक-सेवा के लिए छुटकारा नहीं, चित्त को प्रफुल्लित करने वाले संगीत, देशाटन, तैरना, सत्संग आदि के लिए टाइम नहीं। कारण एक ही है कि जिस कार्य को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया है उसकी तुलना में ये सब बातें इतनी तुच्छ, इतनी गौण समझी गई हैं कि उनकी ओर ध्यान करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। फुरसत उसी काम के लिए नहीं मिलती जो अनावश्यक और महत्वहीन समझा जाता है। जिस काम को हम आवश्यक समझते हैं उसे अन्य कर्मों की उपेक्षा करके भी सबसे पहले करते हैं। धन का आकर्षण जब अति प्रबल होता है तो जीवन को सुखी और समुन्नत करने का अवकाश नहीं मिल सकता। यदि जीवन की सर्वांगीण उन्नति करनी है तो यह तभी संभव हो सकेगा जब कि धन का आकर्षण कम किया जाय, उसे साध्य नहीं साधन मात्र माना जाय। विद्या प्राप्त करना स्वाध्याय को सम्भालना, अपनी विविध योग्यताएं और शक्तियां विकसित करना, शान्तिदायक विनोदों द्वारा आन्तरिक उल्लास को बढ़ाना, अपने स्वभाव का निर्माण करना, सामाजिक कर्तव्यों का पालन करना, परमार्थ कार्यों में समय देना, आत्म-चिन्तन करना भी हमारे लिए धन कमाने से कम महत्वपूर्ण न होना चाहिए। इन कार्यों के लिए भी उतना ही समय और मनोयोग लगना चाहिए जितना कि धन के लिए लगता है। पर यह संभव तभी है जब कि धन की अत्यधिक बढ़ी प्रतिष्ठा को घटा कर उतना ही रखा जाय जितना कि वास्तव में है।
गायत्री के तृतीय चरण का मानव जाति के लिए यह संदेश है कि वस्तुओं को उतना ही महत्व दिया जाय जितनी कि उनकी उपयोगिता है। प्रधान लक्ष गुणों और विशेषताओं की ओर होना चाहिए। विविध वस्तुओं के स्वामी बनने की कुबुद्धि छोड़ कर विविध सद्गुणों के अधिकारी बनने की योजना होनी चाहिए। धन को नहीं, गुणों को पूजा जाना चाहिए। जब इस प्रकार की मनोवृत्ति बनेगी तो वस्तुओं के संचय के लिए लोग पागल दौड़ लगाना और एक दूसरे को नोंच खाना छोड़ देंगे एवं सद्गुणों के द्वारा एक दूसरे की सेवा सहायता करते हुए, एक दूसरे के प्रति प्रेम, सौजन्यता, उदारता एवं आत्मीयता का व्यवहार करते हुए शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे।
गरीबी और अभावग्रस्त का दुख कुबेर का भण्डार मिल जाने पर भी नहीं छूट सकता, क्योंकि जितना मिलेगा उससे अधिक की तृष्णा उपजकर गरीबी और दीनता को ज्यों का त्यों कायम रखेगी। पर यदि हम धन की महत्ता को सीमित कर दें तो सीमित वस्तुऐं होने पर भी अमीरी का सन्तोष मिल सकता है। अनेक व्यक्ति सन्तान के लिए बड़े प्यासे से फिरते हैं। वे सोचते हैं कि सन्तान भी कोई सम्पत्ति है जिसके स्वामी बनकर वे वैभववान बनते हैं। यदि वे अपनी समझ को पलट कर यह सोचने लगें कि भारत की अंधाधुन्ध बढ़ी हुई आबादी के कारण जब कि अन्न के अभाव से लोग बेतरह परेशान हैं, नई सन्तान के लिए व्याकुल फिरना कितनी मूर्खता है। प्रभु सन्तान इसलिए देता है कि उसकी सेवा द्वारा हमारी त्याग-वृत्ति, सेवा-भावना, उदारता और कोमल भावनाओं का समुचित विकास होता रहे। आज तो हमारे समाज की इतनी बुरी दशा है कि कहीं भी हम अपनी उदारता, सेवा-भावना, त्याग-वृत्ति और वात्सल्य का परिचय दे सकते हैं। अपनी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी हमारा ही पुत्र हो यह आवश्यक नहीं। अनेक शुभ कार्य ऐसे हैं जिनके लिए अपनी कमाई को सुकृत के लिए वसीयत की जा सकती है। सन्तान न होने से स्वर्ग में अन्न जल न मिलने की बात उपहासास्पद है। इतने ऋषि, तपस्वी, ब्रह्मचारी सन्तान रहित मरते हैं। क्या वे सब परलोक में भूखे प्यासे ही रहते हैं। सन्तान न होने पर दुखी रहना भी औंधी अक्ल का एक नमूना है। गायत्री की सद्बुद्धि पाकर जब मनुष्य सोचता है कि प्रभु ने मुझ पर सन्तान का भार न लाद कर अन्य शुभ कर्मों के लिए अवकाश दिया है तो उसे अपने बारे में उससे अधिक आनन्द और सन्तोष होता है जितना किसी औंधी अक्ल के व्यक्ति को सन्तान पर सन्तानें उत्पन्न करते हुए नगाड़े बजते समय होता है।
गायत्री का तीसरा चरण हमारी आर्थिक कठिनाइयों को सुलझा देता है क्योंकि साधक की समझ में यह बात भली प्रकार आ जाती है कि धन केवल सांसारिक सुविधाएं दे सकता है, मनुष्य की आन्तरिक एवं वास्तविक सुख-शान्ति से उसका कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। ऐसा निश्चय हो जाने के पश्चात् वह धन को अनावश्यक महत्व देना छोड़कर गुणों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। तब उसे दिन-रात धन की हाय नहीं रहती। साधारण प्रयत्न के काम चलाऊ उपार्जन करके मितव्ययिता के साथ अपना गुजारा करता है और प्रसन्न रहता है। धन को जोड़ने की या अनावश्यक मात्रा में बढ़ने चलने की हविस में पड़कर मनुष्य अपने जीवन की अन्य दिशाओं का विकास करना भूल जाता है। सर्वतोमुखी उन्नति और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि किसी एक ही बात पर मस्तिष्क का सारा ध्यान एवं समय का सारा भाग न लगा दिया जाय। स्वास्थ्य, ज्ञान-वृद्धि, मनोरंजन, परमार्थ आदि के लिए भी धन की भांति ही इच्छा, बुद्धि, श्रम और समय को लगाया जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कुबुद्धि की कृपा से हम सर्वांगीण उन्नति का महत्व और धन-शक्ति की सीमित मर्यादा को भली प्रकार समझ लें।
कई व्यक्ति कन्याओं के विवाह के लिए दहेज देने की स्थिति न होने से दुखी रहते हैं। इस दुख में सामाजिक कुरीतियां, अनैतिकता, बेटे वालों की अनुदारता तो प्रधान कारण है ही, पर बेटी वाले भी अपने दृष्टिकोण में आवश्यक परिवर्तन करलें तो बहुत सी कठिनाइयों का हल सहज में ही हो सकता है। धनवानों के बेटे क्यों तलाश करें? लड़की के सुख का सम्बन्ध वर के अच्छे स्वभाव और सद्गुणों से है धन से नहीं। धनी घरों की बहुएं वस्त्राभूषणों से भले ही लदी रहें पर मानसिक दृष्टि से उन्हें उलझनें ही अधिक रहती हैं। निर्धन घर के होनहार लड़के आसानी से मिल सकते हैं फिर धनी लोगों की खुशामद करने और उनके लिए अपने बाल बच्चे बेच कर धन जुटाने की क्या आवश्यकता है? माता की कृपा से जिसे ऐसी सद्बुद्धि रहेगी वह धनी लड़के ढूंढ़ना छोड़कर गरीब और सद्गुणी लड़के ढूंढ़ता है और उपजातियों तक ही सीमित रहने की कट्टरता को शिथिल करके अपने वर्ण के अन्य परिवारों पर भी दृष्टि दौड़ाता है। ऐसी दशा में उसकी दहेज की चिन्ता का बहुत कुछ समाधान हो जाता है।
मकान खरीदने, जमीन जायदाद बढ़ाने, कारोबार में अधिक पूंजी डालने की अपनी-अपनी सहज स्थिति हो तो वैसा कर लेने में कुछ हर्ज नहीं। पर जिनके पास स्वल्प साधन हैं उन्हें बड़ी-बड़ी योजनाऐं और महत्वाकांक्षाएं बनाकर परेशान नहीं होना चाहिए। उन्नति करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है पर उन्नति क्रमबद्ध और शान्तिमय तरीके से होनी चाहिए। जो साधन, शक्ति और स्थिति की तुलना में बहुत बड़ी आकांक्षाएं ले बैठते हैं वे अकारण एक चिन्ता, व्यथा एवं दीनता अपने ऊपर लाद लेते हैं। सद्बुद्धि इस भूल को सुधार कर ‘‘वर्तमान काल में सर्वोत्तम प्रयत्न’’ करने के लिए प्रेरित करती है और आशा-तृष्णाओं के अनावश्यक जंजाल में बचा लेती है। वस्तुओं का अभाव अनुभव करना ही ‘दीनता’ है और वर्तमान स्थिति में प्रसन्न रहना ही अमीरी है। एक करोड़पति भी मानसिक दृष्टि से दीन, दरिद्री, गरीब, कंगाल हो सकता है और एक गरीब भी अपनी स्थिति में अमीरी का अनुभव कर सकता है। सर्वांगीण उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना अलग बात है और तृष्णा की कल्पनाओं में लार टपकाते रहना अलग वस्तु है। सद्बुद्धि यह है कि हम आज की स्थिति में पूर्ण सन्तुष्ट और प्रसन्न रहें तथा कल के लिए उत्साहपूर्ण अच्छे प्रयत्न करें।
गायत्री का प्रकाश जब हमारे मस्तिष्क में बढ़ता है तो दीनता, कंगाली, गरीबी, अभावग्रस्तता का घटना आरंभ हो जाता है और मनुष्य अपने को बे पैसे का अमीर और बे ताज का बादशाह अनुभव करने लगता है। उसे अपने कर्तव्य पर सन्तोष होता है। जितने साधन उपलब्ध हैं उन्हीं के अनुरूप योजना बनाकर वह सन्तोष का सरंजाम कर लेता है। बढ़िया कपड़े, जेवर, फैशन एवं विलासिता की सामग्रियों को वह बौद्धिक बचपन की प्रतीक मानकर उनको उपहासास्पद समझता है और सादगी की सात्विकता में अपने बड़प्पन का अनुभव करता है। वे लोग दूसरों को, दृष्टिदोष वालों को, गरीब दिखाई पड़ सकते हैं पर वस्तुतः वे इतने अमीर होते हैं कि बड़े-बड़े धनपति भी उनके लिए ईर्ष्या कर सकते हैं।
सद्बुद्धि हमारी अनेक गुत्थियों को सुलझा देती है अनेकों कष्टों की जड़ बात की बात में काट देती है। धन-सन्तान, के लिए दुखी रहने वाले व्यक्ति जब गायत्री के तीसरे चरण पर विचार करते हैं तो उनकी आंखें खुल जाती हैं, उन्हें अपनी भूल प्रतीत हो जाती है। तब वे सोचते हैं कि इन वस्तुओं का न होना या कम होना कुछ बुरा नहीं है। इस अभाव के कारण उन्हें अन्य दिशाओं में अपनी उन्नति करने के लिए पर्याप्त अवकाश और अवसर मिल सकता है। अनेक चिन्ताओं, बोझों और बुराइयों से वे बच जाते हैं। काम चलाऊ कमाई करने वाला व्यक्ति निश्चय ही उनकी अपेक्षा अधिक लाभ में रहता है जो ‘जैसे बने वैसे’ अन्धाधुन्ध कमाने में और अनेक वस्तुओं के स्वामी बनने की हविस में दिन-रात डूबे रहते हैं।
धन से जीवनोपयोगी वस्तुऐं खरीदी जाती हैं। धन की उपयोगिता इतनी ही है कि उससे हमारी अन्न, वस्त्र आदि की आवश्यक वस्तुऐं खरीदी जा सकें। अन्न, वस्त्र आदि की आवश्यकताएं एक सीमा तक नहीं होती हैं और वे एक नियत मात्रा में धन-उपार्जन करने पर आसानी से पूरी हो सकती हैं। इन दिनों दुर्भाग्यवश महंगाई का कुचक्र चल पड़ा है जिससे साधारण जनता को दुर्भिक्ष जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। यदि कुचक्र सामयिक है। कुछ दिन पूर्व ऐसे दुर्दिन नहीं थे और आशा है कि आगे भी यह नहीं रहेंगे। साधारण परिस्थितियों के समय में एक स्वस्थ मनुष्य अपने परिवार की उचित आवश्यकताओं को पूरा करने लायक आसानी से कमा सकता है। फिर भी देखा जाता है कि लोग अधिक कमाने और जोड़ने की धुन में बेतरह लगे हुए हैं। जिसके पास अपनी आवश्यकताओं लायक पहले से काफी मौजूद हैं वे भी सब काम छोड़कर दिन रात अधिकाधिक धन कमाने में प्रवृत्त हैं, उनके समय का सारा भाग इसी उधेड़-बुन में लगा रहता है।
धन की शक्ति बड़ी सीमित है, उससे शरीर का निर्वाह करने वाले पदार्थ खरीदे जा सकते हैं, जिनकी वास्तविकता बहुत ही सीमित है। जमा किया अत्याधिक धन किसी के कुछ काम नहीं आता। सब जहां का तहां पड़ा रह जाता है। जिन उत्तराधिकारियों के लिए उसे जोड़ा जाता है वे उस मुफ्त के माल से बेरहम ऐयाशी करते हैं और उसे बारूद की तरह फूंक कर तमाशा देखते हैं। मुफ्त की मिली हुई पैतृक सम्पत्ति उत्तराधिकारियों का निकम्मा, आलसी, व्यसनी, फिजूलखर्च एवं दुर्गुणी बना देती है इसलिए सन्तान के लाभ के लिए जोड़ा गया धन वस्तुतः उनकी हानि ही करता है। कितने ही लड़के उस मुफ्त के माल पर बेतरह लड़ मरते हैं, मुकदमेबाजी में वह सारी बारूद बात की बात में फूंक जाती है। धनी व्यक्ति दूसरों की आंखों से सुखी दीखते हैं पर अपने आप में वे काफी चिन्तित और परेशान रहते हैं। धन कमाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया, हानि से बचने की चिन्ता, सुरक्षा आदि व्यवस्थाओं में इतनी जानकारी करनी पड़ती है कि वे लोग वस्तुतः गरीब एवं मजदूरों की अपेक्षा आन्तरिक दृष्टि से अधिक उद्विग्न रहते हैं। यह उद्विग्नता उनके शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक सन्तुलन को खा जाता है।
इन कठिनाइयों को जानते हुए भी लोग जैसे बने वैसे धन कमाने के लिए इतनी तत्परता के साथ जुते हुए हैं इसका कारण यह है कि ‘‘धन की प्रतिष्ठा होने’’ लगी है। जिसके पास धन है उसे बड़ा आदमी, महापुरुष, आदरणीय समझा जाने लगा है। पूर्व काल में जिसके पास ज्ञान, विद्या, चरित्र, त्याग आदि की दैवी संपदाएं थीं उसका सबसे अधिक आदर होता था। मध्य युग में पराक्रम, पुरुषार्थ, साहस, वीरता, शक्ति की प्रतिष्ठा रही। जो जितना शक्ति सम्पन्न होता था उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। आज धन की प्रतिष्ठा है। चाहे कोई मनुष्य मूर्ख, दुष्चरित्र, दुर्बल, कायर आदि कितनी अयोग्यताओं से घिरा हुआ हो पर यदि उसके पास पैसे हैं तो लोग उसके प्रति आदर प्रकट करेंगे, उसे मान देंगे, उसे अगुआ, नेता या पेंच मानेंगे, उसकी हां में हां मिलाने वाले अनेक लोग तैयार हो जायेंगे।
साधारण जनता अनुकरण करने के स्वभाव की होती है। जब देखा जाता है कि धनवान व्यक्ति सर्वत्र आदर पाते हैं। उनका गौरव, बड़प्पन और मान होता है। समान मनोभूमि के लोग भी बड़प्पन प्राप्त करने के लिए, प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए धनी बनने का प्रयत्न करते हैं। जिनके पास वस्तुतः धन नहीं है वे भी धनी बनने के आडम्बर बनाते हैं। विवाह शादियों के अवसर पर तो यह पाखण्ड हद दर्जे की मूर्खता तक पहुंच जाता है। बराती लोग ऐसे सजकर आते हैं, मानों इनमें से हरेक कुबेर का भाई बन्धु है। आतिशबाजी, गाजे-बाजे, रोशनी, सवारी, इत्र, पान, रुपये-पैसों की बखेर, शाही ज्यौनार आदि के द्वारा यह प्रकट करने की कोशिश की जाती है कि हम कितने बड़े अमीर हैं। दहेज की बड़ी-बड़ी रकमें और वधू के लिए चढ़ाये जाने वाले कीमती वस्त्राभूषण यही प्रकट करने के लिए होते हैं कि हम कितने बड़े अमीर हैं, हमारे पास आवश्यकताओं से अधिक कितना अधिक पैसा फालतू बचता है, जिसे आज हम इस तरह मुक्त हस्त से लुटाते हुए भी कोई कठिनाई अनुभव नहीं करते। विवाह के अवसर पर अपने को धनी प्रदर्शित करके यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हम कितने बड़े आदमी, कितने आदरणीय, कितने महान पुरुष, कितने यशस्वी हैं। ठीक भी है, जब मनुष्य की महानता धन पर केन्द्रित हो गई तो इस प्रकार के प्रदर्शनों द्वारा ही अपना धनीपन प्रकट करके अपने गौरव का झंडा गाढ़ा जा सकता है।
आत्मा वस्तुतः महान है। अतएव वह अपने को महान ही प्रकट करना चाहता है। हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा रहती है कि प्रतिष्ठित, आदरणीय एवं महान समझा जावे। वह देखता है कि आज वे ही लोग प्रतिष्ठित हैं जिनके पास धन है, तो उसका पक्ष धनी बनना हो जाता है। आज अधिकांश मनुष्यों का जीवन-लक्ष्य यही बना हुआ है। चूंकि न्यायपूर्वक, परिश्रम के साथ सन्मार्ग से उतना ही कमाया जा सकता है जो काम चलाने लायक हो। अधिक कमाने के लिए वे मार्ग अपनाने पड़ते हैं जो पापपूर्ण हैं। बड़े आदमी कानूनी लूटमार और शोषण करते हैं, छोटे आदमी गैर कानूनी छापा मारते हैं। जिसको जितना मौका मिलता है अपनी घात चलाता है। आज समाज में व्यापक रूप से जो अनैतिकता फैली हुई है उसका कारण यह धनी बनकर बड़े आदमी होने की हविस ही काम कर रही है।
हम देखते हैं एक आदमी दूसरे को खाये जा रहा है। एक दूसरे की आंतें निकाल लेने के लिए घात लगाए बैठा है। जिसका जैसा मतलब सिद्ध होता है वह वैसा ही प्रपंच बना लेता है। आपसी प्रेम और सद्भाव विदा हो रहे हैं और उनके स्थान पर स्वार्थ का पिशाच नंगा होकर नाच रहा है। बाप अपने बेटी बेटों को बेच रहा है। भाई का भाई जानी दुश्मन बना हुआ है। बुड्ढे मां-बाप को रोटी खिलाना बेटों के लिए असह्य बोझ बना हुआ है। निर्धन पति पत्नी को आंखों देखा नहीं सुहाता। बेटे की बहू यदि दहेज साथ नहीं लाई है, तो उसका परित्याग कर दिया जाता है। नौकर चोर-डाकुओं से मिलकर मालिक की जान लेने पर दांत लगाये बैठा है। मित्र बनकर कलेजा निकाल ले जाने वाले नर पिशाचों की कमी नहीं। निकट सम्बन्धियों की पारस्परिक मनोदशा जब यह है तब दूरवर्ती लोग धन के लिए दूसरों के साथ जो भी नीति बरतें, वह कम है। रिश्वतखोरी, चोरबाजारी, बेईमानी, मिलावट, धोखाधड़ी, ठगी आज व्यापक रूप में फैली हुई है। चोरी, डकैती करने का साहस तो किन्हीं-किन्हीं को ही होता है पर सभ्य तरीके से सभी लोग धन-उपार्जन के लिए सब कुछ कर रहे हैं। सतीत्व, धर्म, ईमान, मजहब, बुद्धि, विद्या, न्याय, कर्तव्य, वफादारी यहां तक कि जान तक पैसे के लिए बिक रही हैं।
पूर्व काल में जब विद्या, तप और चरित्र की प्रतिष्ठा थी उनके आधार पर मनुष्य का बड़प्पन आंका जाता था तो लोग इसके लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां करते थे। प्रह्लाद, विश्वामित्र, हरिश्चन्द्र, गौतम बुद्ध, अम्बपाली, मीरा, गोपीचन्द जैसे साधन सम्पन्न लोग अपने वैभव को लात मारकर तपश्चर्या का मार्ग अपनाते थे। जब विद्या की अपेक्षा शक्ति में बड़प्पन माना जाय तो अपनी शूरता का परिचय देने के लिए राजपूतों और राजपूतनियों ने वे कार्य कर दिखाये जिन्हें सुनकर सुनने वालों के कलेजे कांप उठते हैं। जान गंवा देना उनके लिए एक खेल हो गया था। प्रतिष्ठा के लिए मनुष्य बड़े से बड़ा खतरा उठाने को तत्पर हो सकता है। आज भी जब कि धन की प्रतिष्ठा बढ़ी है तो लोग धन के लिए बड़े से बड़ा खतरा मोल लेने को तैयार हैं। पर कठिनाई तो यह है कि लोग जैसे विद्या, तप, चरित्र, पुरुषार्थ आदि अपने आप में स्वयं उत्पन्न कर सकते हैं वैसे सोना, चांदी अपने आप में से अधिक मात्रा में उत्पन्न नहीं कर सकते, उसके लिए तो सुलभ मार्ग ‘अपहरण’ ही दिखाई पड़ता है, जिसके लिए लोग राजदंड का, ईश्वरीय दंड का, प्रत्याक्रमण का, निन्दा का खतरा खुशी-खुशी उठा लेते हैं और जैसे बने वैसे धनी बनने में जुट पड़ते हैं। इस मनोवृत्ति ने आज घर-घर में कलह, विरोध, क्लेश एवं दुर्भाग्य पैदा कर दिये हैं जिनसे अनेक प्रकार के दुखदायी अपराध हो रहे हैं। इस गति-विधि से सर्वत्र असन्तोष की अग्नि जल रही है और व्यापक रूप से लोगों के मन निराश, शुष्क, खिन्न, नीरस एवं दुखित हो रहे हैं।
धन की उपयोगिता है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। पर उसको मनुष्य की महानता का चिह्न समझना भारी भूल हैं। इस कुबुद्धि से ग्रसित होकर आज सारी मनुष्य जाति दुख पा रही है। भारतीय धर्मशास्त्रों में परिग्रह को सदा से हेय माना जाता रहा है। विद्या और बल के पश्चात धन को तीसरे दर्जे की घटिया शक्ति माना है, उस तीसरे दर्जे की चीज को जब पहले दर्जे का सम्मान दिया गया तो उसका दुष्परिणाम होना ही चाहिए।
गायत्री रूपी सद्बुद्धि द्वारा हम इस कुबुद्धि का परिमार्जन कर सकते हैं। तीसरे पद (भर्गो देवस्य धीमहि) की शिक्षा हमारे लिए यह है कि हम दिव्य शक्तियों को धारण करें, दिव्य गुणों को बढ़ावें, दैवी सम्पत्तियों का संचय करें, हम धन के आधार पर नहीं वरन् सद् विचारों और सत्कार्यों के आधार पर किसी का सम्मान करें, हम अपना बड़प्पन अपने सद्गुणों से तोलें और दूसरों को बड़ा तभी मानें जब उनमें उच्च आदर्श, श्रेष्ठ चरित्र और लोक-सेवा के तत्व समुचित मात्रा में देखें। हमें धनपतियों का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं। हमें उन्हें अपना नेता, पथ-प्रदर्शक एवं आदर्श मानें, जो गुणों की दृष्टि से, दैवी सम्पदाओं की दृष्टि से सुसम्पन्न हों। जब यह मान्यता बढ़ेगी और यह समझा जाना लगेगा कि धन की उपयोगिता शरीर-निर्वाह मात्र के लिए सीमित मर्यादा में ही है और उसका मनुष्य की प्रतिष्ठा से कोई सम्बन्ध नहीं है तो निश्चय है कि आज जो धन के पीछे पागल दौड़ लग रही है वह बन्द हो जायेगी और लोगों को ध्यान उस विचार एवं कार्यों की ओर मुड़ेगा जो वास्तव में प्रतिष्ठा के योग्य हैं।
किसी जमाने में गुलामों को रखना बड़प्पन का चिह्न रहा है। जिसके पास जितने अधिक गुलाम खरीदे हुए होते थे वह उतना ही बड़ा आदमी समझा जाता था, लेकिन पीछे जब लोगों ने देखा कि मनुष्य को मनुष्य के द्वारा गुलाम बनाकर अपने बन्धन में रखना एक पाप है तो उस प्रथा का लोप हो गया। जब गुलाम रखने वाला अमीर, लोगों की दृष्टि में घृणास्पद ठहराया गया तो उसे विवश होकर अपनी गतिविधि बदलनी पड़ी। इसी प्रकार एक जमाने में बहुत स्त्रियां रखना भी मनुष्य के लिए गौरव का चिह्न रहा है। जिसके पास जितनी अधिक स्त्रियां होती थीं वह उतना ही बड़ा आदमी माना जाता था। पीछे जब विवेक, बुद्धि द्वारा इस प्रथा का विरोध हुआ तो वह घृणित प्रथा नष्ट हो गई। जब राजा जनक और राजा दशरथ जैसे साधु राजाओं के धर में क्रमशः 100 और 300 रानियां थीं तब तामसी राजसी स्वभाव के सम्पन्न लोगों को घर में कितनी रानियां होंगी। राजा जरासंध के यहां 16 हजार रानियां थीं। ऐसे भूत काल के अनेक उदाहरण हैं। जब तक राजा रईसों के यहां इस प्रथा के चिह्न व शेष पाये जाते हैं पर चूंकि लोकमत इसके विरुद्ध है इसलिए यह बुराई अपने आप विदा होती चली जा रही है। गायत्री की शिक्षा का जब संसार में पुनः प्रकाश होगा तो निश्चय ही ‘धन के कारण प्रतिष्ठा’ के विरुद्ध प्रतिष्ठा के विरुद्ध भी ऐसे ही प्रचण्ड लोकमत तैयार होंगे। तब इस दिशा में पागल दौड़ लगाना रुक जायेगा। फलस्वरूप वे अगणित बुराइयां भी बंद हो जायेंगी जो आज ‘‘जैसे बने वैसे’’ धनी बन जाने की हविस ने पैदा कर दी हैं।
धन पदार्थ है, इसलिए साधन है। जितने भी पदार्थ संसार में हैं वे साधन हैं वे साधन हैं पदार्थ कभी साध्य नहीं हो सकते। धन के द्वारा शारीरिक आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं। शरीर को संजोया जा सकता है पर जीव की आन्तरिक उन्नति या तृप्ति उससे नहीं हो सकती। इसलिए धन कमाने की भांति ही सद्ज्ञान, सद्गुण एवं सद् विनोद को प्राप्त करने के लिए भी समय लगाया जाना चाहिए। जब धन ही लक्ष बन जाता है तो अन्य दिशाओं में मन नहीं लगता, समय का अधिकांश भाग उसी उधेड़-बुन में लगने के पश्चात अन्य प्रकार की उन्नतियों के लिए न इच्छा रहती है न शक्ति न सुविधा। इसलिए यह आवश्यक है कि धन को उतना ही महत्व दिया जाय जितना की वस्तुतः उसे मिलना चाहिए। कोई व्यक्ति अध्ययन का श्रम न करना चाहे तो करोड़ों रुपया खर्च कर देने पर भी वह विद्वान नहीं बन सकता। कोई व्यक्ति बिना अभ्यास किये प्रचुर धन व्यय करने पर भी संगीतज्ञ नहीं बन सकता। किसी का सच्चा प्रेम सहस्रों रुपयों में भी नहीं खरीदा जा सकता है। रुपयों का सवाल खर्च करने के बदले में भी स्वास्थ्य नहीं मिल सकता। इन सब बातों के लिए अपना समय और मनोयोग लगाना पड़ता है। मनोयोग और श्रम लगाने के लिये कोई मनुष्य तभी तैयार होगा जब धन की तुलना में उनका महत्व भी बहुत कम न आंका जाय। आज लोग धन को इतना महत्व देते हैं कि और कुछ कमाने में उन्हें आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती।
स्वाध्याय के लिए लोगों को फुरसत नहीं, व्यायाम के लिए अवकाश नहीं, भजन के लिए समय नहीं मिलता, लोक-सेवा के लिए छुटकारा नहीं, चित्त को प्रफुल्लित करने वाले संगीत, देशाटन, तैरना, सत्संग आदि के लिए टाइम नहीं। कारण एक ही है कि जिस कार्य को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया है उसकी तुलना में ये सब बातें इतनी तुच्छ, इतनी गौण समझी गई हैं कि उनकी ओर ध्यान करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। फुरसत उसी काम के लिए नहीं मिलती जो अनावश्यक और महत्वहीन समझा जाता है। जिस काम को हम आवश्यक समझते हैं उसे अन्य कर्मों की उपेक्षा करके भी सबसे पहले करते हैं। धन का आकर्षण जब अति प्रबल होता है तो जीवन को सुखी और समुन्नत करने का अवकाश नहीं मिल सकता। यदि जीवन की सर्वांगीण उन्नति करनी है तो यह तभी संभव हो सकेगा जब कि धन का आकर्षण कम किया जाय, उसे साध्य नहीं साधन मात्र माना जाय। विद्या प्राप्त करना स्वाध्याय को सम्भालना, अपनी विविध योग्यताएं और शक्तियां विकसित करना, शान्तिदायक विनोदों द्वारा आन्तरिक उल्लास को बढ़ाना, अपने स्वभाव का निर्माण करना, सामाजिक कर्तव्यों का पालन करना, परमार्थ कार्यों में समय देना, आत्म-चिन्तन करना भी हमारे लिए धन कमाने से कम महत्वपूर्ण न होना चाहिए। इन कार्यों के लिए भी उतना ही समय और मनोयोग लगना चाहिए जितना कि धन के लिए लगता है। पर यह संभव तभी है जब कि धन की अत्यधिक बढ़ी प्रतिष्ठा को घटा कर उतना ही रखा जाय जितना कि वास्तव में है।
गायत्री के तृतीय चरण का मानव जाति के लिए यह संदेश है कि वस्तुओं को उतना ही महत्व दिया जाय जितनी कि उनकी उपयोगिता है। प्रधान लक्ष गुणों और विशेषताओं की ओर होना चाहिए। विविध वस्तुओं के स्वामी बनने की कुबुद्धि छोड़ कर विविध सद्गुणों के अधिकारी बनने की योजना होनी चाहिए। धन को नहीं, गुणों को पूजा जाना चाहिए। जब इस प्रकार की मनोवृत्ति बनेगी तो वस्तुओं के संचय के लिए लोग पागल दौड़ लगाना और एक दूसरे को नोंच खाना छोड़ देंगे एवं सद्गुणों के द्वारा एक दूसरे की सेवा सहायता करते हुए, एक दूसरे के प्रति प्रेम, सौजन्यता, उदारता एवं आत्मीयता का व्यवहार करते हुए शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे।
गरीबी और अभावग्रस्त का दुख कुबेर का भण्डार मिल जाने पर भी नहीं छूट सकता, क्योंकि जितना मिलेगा उससे अधिक की तृष्णा उपजकर गरीबी और दीनता को ज्यों का त्यों कायम रखेगी। पर यदि हम धन की महत्ता को सीमित कर दें तो सीमित वस्तुऐं होने पर भी अमीरी का सन्तोष मिल सकता है। अनेक व्यक्ति सन्तान के लिए बड़े प्यासे से फिरते हैं। वे सोचते हैं कि सन्तान भी कोई सम्पत्ति है जिसके स्वामी बनकर वे वैभववान बनते हैं। यदि वे अपनी समझ को पलट कर यह सोचने लगें कि भारत की अंधाधुन्ध बढ़ी हुई आबादी के कारण जब कि अन्न के अभाव से लोग बेतरह परेशान हैं, नई सन्तान के लिए व्याकुल फिरना कितनी मूर्खता है। प्रभु सन्तान इसलिए देता है कि उसकी सेवा द्वारा हमारी त्याग-वृत्ति, सेवा-भावना, उदारता और कोमल भावनाओं का समुचित विकास होता रहे। आज तो हमारे समाज की इतनी बुरी दशा है कि कहीं भी हम अपनी उदारता, सेवा-भावना, त्याग-वृत्ति और वात्सल्य का परिचय दे सकते हैं। अपनी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी हमारा ही पुत्र हो यह आवश्यक नहीं। अनेक शुभ कार्य ऐसे हैं जिनके लिए अपनी कमाई को सुकृत के लिए वसीयत की जा सकती है। सन्तान न होने से स्वर्ग में अन्न जल न मिलने की बात उपहासास्पद है। इतने ऋषि, तपस्वी, ब्रह्मचारी सन्तान रहित मरते हैं। क्या वे सब परलोक में भूखे प्यासे ही रहते हैं। सन्तान न होने पर दुखी रहना भी औंधी अक्ल का एक नमूना है। गायत्री की सद्बुद्धि पाकर जब मनुष्य सोचता है कि प्रभु ने मुझ पर सन्तान का भार न लाद कर अन्य शुभ कर्मों के लिए अवकाश दिया है तो उसे अपने बारे में उससे अधिक आनन्द और सन्तोष होता है जितना किसी औंधी अक्ल के व्यक्ति को सन्तान पर सन्तानें उत्पन्न करते हुए नगाड़े बजते समय होता है।
गायत्री का तीसरा चरण हमारी आर्थिक कठिनाइयों को सुलझा देता है क्योंकि साधक की समझ में यह बात भली प्रकार आ जाती है कि धन केवल सांसारिक सुविधाएं दे सकता है, मनुष्य की आन्तरिक एवं वास्तविक सुख-शान्ति से उसका कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। ऐसा निश्चय हो जाने के पश्चात् वह धन को अनावश्यक महत्व देना छोड़कर गुणों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। तब उसे दिन-रात धन की हाय नहीं रहती। साधारण प्रयत्न के काम चलाऊ उपार्जन करके मितव्ययिता के साथ अपना गुजारा करता है और प्रसन्न रहता है। धन को जोड़ने की या अनावश्यक मात्रा में बढ़ने चलने की हविस में पड़कर मनुष्य अपने जीवन की अन्य दिशाओं का विकास करना भूल जाता है। सर्वतोमुखी उन्नति और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि किसी एक ही बात पर मस्तिष्क का सारा ध्यान एवं समय का सारा भाग न लगा दिया जाय। स्वास्थ्य, ज्ञान-वृद्धि, मनोरंजन, परमार्थ आदि के लिए भी धन की भांति ही इच्छा, बुद्धि, श्रम और समय को लगाया जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कुबुद्धि की कृपा से हम सर्वांगीण उन्नति का महत्व और धन-शक्ति की सीमित मर्यादा को भली प्रकार समझ लें।
कई व्यक्ति कन्याओं के विवाह के लिए दहेज देने की स्थिति न होने से दुखी रहते हैं। इस दुख में सामाजिक कुरीतियां, अनैतिकता, बेटे वालों की अनुदारता तो प्रधान कारण है ही, पर बेटी वाले भी अपने दृष्टिकोण में आवश्यक परिवर्तन करलें तो बहुत सी कठिनाइयों का हल सहज में ही हो सकता है। धनवानों के बेटे क्यों तलाश करें? लड़की के सुख का सम्बन्ध वर के अच्छे स्वभाव और सद्गुणों से है धन से नहीं। धनी घरों की बहुएं वस्त्राभूषणों से भले ही लदी रहें पर मानसिक दृष्टि से उन्हें उलझनें ही अधिक रहती हैं। निर्धन घर के होनहार लड़के आसानी से मिल सकते हैं फिर धनी लोगों की खुशामद करने और उनके लिए अपने बाल बच्चे बेच कर धन जुटाने की क्या आवश्यकता है? माता की कृपा से जिसे ऐसी सद्बुद्धि रहेगी वह धनी लड़के ढूंढ़ना छोड़कर गरीब और सद्गुणी लड़के ढूंढ़ता है और उपजातियों तक ही सीमित रहने की कट्टरता को शिथिल करके अपने वर्ण के अन्य परिवारों पर भी दृष्टि दौड़ाता है। ऐसी दशा में उसकी दहेज की चिन्ता का बहुत कुछ समाधान हो जाता है।
मकान खरीदने, जमीन जायदाद बढ़ाने, कारोबार में अधिक पूंजी डालने की अपनी-अपनी सहज स्थिति हो तो वैसा कर लेने में कुछ हर्ज नहीं। पर जिनके पास स्वल्प साधन हैं उन्हें बड़ी-बड़ी योजनाऐं और महत्वाकांक्षाएं बनाकर परेशान नहीं होना चाहिए। उन्नति करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है पर उन्नति क्रमबद्ध और शान्तिमय तरीके से होनी चाहिए। जो साधन, शक्ति और स्थिति की तुलना में बहुत बड़ी आकांक्षाएं ले बैठते हैं वे अकारण एक चिन्ता, व्यथा एवं दीनता अपने ऊपर लाद लेते हैं। सद्बुद्धि इस भूल को सुधार कर ‘‘वर्तमान काल में सर्वोत्तम प्रयत्न’’ करने के लिए प्रेरित करती है और आशा-तृष्णाओं के अनावश्यक जंजाल में बचा लेती है। वस्तुओं का अभाव अनुभव करना ही ‘दीनता’ है और वर्तमान स्थिति में प्रसन्न रहना ही अमीरी है। एक करोड़पति भी मानसिक दृष्टि से दीन, दरिद्री, गरीब, कंगाल हो सकता है और एक गरीब भी अपनी स्थिति में अमीरी का अनुभव कर सकता है। सर्वांगीण उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना अलग बात है और तृष्णा की कल्पनाओं में लार टपकाते रहना अलग वस्तु है। सद्बुद्धि यह है कि हम आज की स्थिति में पूर्ण सन्तुष्ट और प्रसन्न रहें तथा कल के लिए उत्साहपूर्ण अच्छे प्रयत्न करें।
गायत्री का प्रकाश जब हमारे मस्तिष्क में बढ़ता है तो दीनता, कंगाली, गरीबी, अभावग्रस्तता का घटना आरंभ हो जाता है और मनुष्य अपने को बे पैसे का अमीर और बे ताज का बादशाह अनुभव करने लगता है। उसे अपने कर्तव्य पर सन्तोष होता है। जितने साधन उपलब्ध हैं उन्हीं के अनुरूप योजना बनाकर वह सन्तोष का सरंजाम कर लेता है। बढ़िया कपड़े, जेवर, फैशन एवं विलासिता की सामग्रियों को वह बौद्धिक बचपन की प्रतीक मानकर उनको उपहासास्पद समझता है और सादगी की सात्विकता में अपने बड़प्पन का अनुभव करता है। वे लोग दूसरों को, दृष्टिदोष वालों को, गरीब दिखाई पड़ सकते हैं पर वस्तुतः वे इतने अमीर होते हैं कि बड़े-बड़े धनपति भी उनके लिए ईर्ष्या कर सकते हैं।
सद्बुद्धि हमारी अनेक गुत्थियों को सुलझा देती है अनेकों कष्टों की जड़ बात की बात में काट देती है। धन-सन्तान, के लिए दुखी रहने वाले व्यक्ति जब गायत्री के तीसरे चरण पर विचार करते हैं तो उनकी आंखें खुल जाती हैं, उन्हें अपनी भूल प्रतीत हो जाती है। तब वे सोचते हैं कि इन वस्तुओं का न होना या कम होना कुछ बुरा नहीं है। इस अभाव के कारण उन्हें अन्य दिशाओं में अपनी उन्नति करने के लिए पर्याप्त अवकाश और अवसर मिल सकता है। अनेक चिन्ताओं, बोझों और बुराइयों से वे बच जाते हैं। काम चलाऊ कमाई करने वाला व्यक्ति निश्चय ही उनकी अपेक्षा अधिक लाभ में रहता है जो ‘जैसे बने वैसे’ अन्धाधुन्ध कमाने में और अनेक वस्तुओं के स्वामी बनने की हविस में दिन-रात डूबे रहते हैं।

