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Magazine - Year 1964 - Version 2

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सावधान—समर्थ गुरु रामदास

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बालक नारायण के विवाह की तैयारी पूरी हो चुकी। पुरोहित ने धर्म-कृत्य के नियमानुसार पुकारा—’सावधान’। किशोर नारायण की प्रसुप्त चेतना सचमुच सावधान हो गई। उसका जीवन लक्ष्य पराधीनता के बन्धनों में बँधी हुई मातृभूमि को मुक्त करना था, यदि स्वयं विवाह बन्धन में बँध जायगा तो सारी शक्ति उसी जंजाल में खर्च हो जायगी, फिर अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसके पास क्षमता बच ही कहाँ से रहेगी? प्रश्न महत्वपूर्ण था। निर्णय का अन्तिम क्षण सामने खड़ा था। असावधानी और सावधानी में से एक स्थिति को चुनना था। नारायण ने ‘सावधानी’ को चुना। पुरोहित क्या जानता था कि कर्मकाण्ड के साधारण विधान के प्रयोजन की पूर्ति के लिए उच्चारण किया गया ‘सावधान’ शब्द वर की अन्तरात्मा तक जा पहुँचेगा और उसे सचमुच ही सावधान कर देगा।

नारायण क्षण भर चुप रहा उसने साहस पूर्वक अपना अन्तिम निर्णय कर डाला। सिर पर रक्खा हुआ सेहरा-मण्डप में ही पटक कर वह भाग खड़ा हुआ। यह गया—वह गया—लोग ढूँढ़ते ही रह गये पर वह आँखों से ओझल हुआ सो हुआ।

आत्म-चिन्तन करता हुआ नारायण एक देवालय में निवास करने लगा। यवन शासन में फैले अनाचार को मिटाकर धर्म संस्थापना की भावना आँखों में से आँसू बन कर उमड़ रही थी। वह यही सोचने में लगा रहता कि आखिर करे तो क्या करे? जो सन्त-महात्मा उधर रहते थे वे संसार को माया और मिथ्या बताकर दुनिया को अपने भाग्य पर मरने के लिए छोड़ने और आनन्द से भजन करने का उपदेश देते। पर ऐसी स्वार्थपरता उन्हें कहाँ पसन्द आती। बहुत दिनों विचारशील मनीषियों के साथ वे परामर्श करते रहे, अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आत्मबल बढ़ाने के लिए साधना और तपस्या का जीवन बिताते हुए उन्हें जन-कल्याण के लिए प्रबल प्रयत्नों में संलग्न होना चाहिये। लक्ष्य स्थिर होते ही उन्होंने संन्यास ले लिया क्योंकि लोक-सेवा में निरत परमार्थी लोगों के लिए वही जीवनक्रम उपयुक्त पड़ता है। जब उनका नाम नारायण से बदल कर रामदास हो गया।

उन दिनों अत्याचारी शासन की नृशंसता से जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। न्याय का नाम निशान न था। शासक जो चाहते वही प्रजा को मानना पड़ता। बहू-बेटियों का शील तक आँखों के आगे लुटते हुए देखना पड़ता। हिन्दू धर्म और संस्कृति को बुरी तरह कुचला जा रहा था। जनता हताश होकर प्रतिरोध की शक्ति खोती चली जा रही थी, देश के सामने जीवन-मरण की समस्या उत्पन्न हो रही थी। ऐसे समय में रामदास को साधना उपासना किस प्रकार की होनी चाहिये यह निर्णय करते देर न लगी। जब कि दूसरे संत, महात्माजन जीवन की दुर्दशा की ओर से आँख बन्द करके भजन, ध्यान में अपनी मुक्ति का प्रयोजन पूर्ण करने के लालच में लगे थे, रामदास ने दूसरा मार्ग चुना। अपनी आत्मा को अधिकाधिक बल सम्पन्न बनाने वाली तपश्चर्या करते हुए अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जनता में साहस भरते हुए गाँव-गाँव घूमने लगे।

अभी पूरे बीस वर्ष के भी वे न हो पाये थे कि उन्होंने सारा महाराष्ट्र छान डाला और ऐसे युवकों का संगठन आरम्भ कर दिया जिनमें उनकी ही तरह देश धर्म के लिए दर्द था। यों हतोत्साह वातावरण में शौर्य और त्याग का साहस भी मन्द पड़ जाता है और लोग कायरता, भीरुता एवं दीनता से ग्रस्त होकर किसी प्रकार जीवित रहने में ही अपनी भलाई मानने लगते हैं। फिर भी मानवता के मूल गुण पूर्णतया कभी भी नष्ट नहीं होते। उस गये गुजरे जमाने में भी ऐसे भावनाशील नवयुवक मौजूद थे जो देश−धर्म के उद्धार के लिए कष्ट उठाने और त्याग करने का साहस कर सके। स्वामी रामदास ऐसे ही रत्नों को परखने और उन्हें संगठित करने के लिए महाराष्ट्र का कोना-कोना छानते रहे और अन्त में उनकी झोली तेजस्वी नर-रत्नों से भर ही गई।

नव-जीवन का प्राण फूँकने वाले इस तेजस्वी महापुरुष को लोग समर्थ गुरु की सम्भावनास्पद उपाधि के साथ विभूषित करने लगे। उन्हें समर्थ गुरु रामदास कहा जाने लगा। अनेक प्रतिभाशील युवक उनके साथ रहते और धर्म की रक्षा करने की योजनाएं बनाते। इन्हीं में एक मराठा युवक शिवाजी भी थे। समर्थ गुरु ने उनकी नस-नस में उत्साह भर दिया और वे योजनाबद्ध रूप से अत्याचारी शासकों के विरुद्ध अपने साथियों के साथ संघर्ष करने लगे। छत्रपति शिवाजी ने हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिये उन भयावह परिस्थितियों में जो कुछ किया उसका मार्मिक शब्दों में उल्लेख करते हुए महाकवि भूषण ने कहा है—”शिवाजी न होते तो सुन्नत होती सब की।” ऐसे सहस्रों प्रख्यात और अप्रख्यात युवाओं का निर्माण समर्थ रामदास के सत्संगों द्वारा ही संभव हुआ।

उन्होंने सारे महाराष्ट्र में लगभग 800 मठ स्थापित किये, जिनमें उन धर्म-सैनिकों के निवास, एवं निर्वाह की व्यवस्था रहती। वहाँ भजन कीर्तन, पूजा, प्रवचन की व्यवस्था रहती, साथ ही मठों में रहने वाले टोलियाँ बना कर गाँवों में निकल जाते और भजन गाकर देश, धर्म, संस्कृति एवं समाज के प्रति जनता की कर्तव्य भावना जागृत करते। महाराष्ट्र की एक झोंपड़ी भी ऐसी न बची जिनमें इन 800 मठों में रहने वाले धर्म सैनिक नव युग का सन्देश सुनाने के लिए पहुँचे न हों। इस प्रकार उन्होंने उस बड़े प्रान्त को बड़े उत्तम ढंग से संगठित कर लिया। धीरे-धीरे महाराष्ट्र से बाहर भी यह प्रवाह फैला और अन्य प्रान्तों में भी लगभग चार-सौ ऐसे ही मठ स्थापित हो गये। आचार्य केशव नायक राव आदि कर्मठ विद्वान उनके साथ थे। इस मण्डली का निश्चित मत था कि जब तक जनता संगठित और अनुशासित न हो जायगी, अत्याचारों भरी पराधीनता से मुक्ति न मिलेगी। वे संगठन को जातीय जीवन का प्राण समझते और उसे एक धर्मानुष्ठान की तरह पूरा करने में संलग्न रहते।

समर्थ गुरु रामदास ने ‘दासबोध’ नामक एक मार्मिक काव्य-ग्रन्थ लिखा है, जिसमें 2741 छन्द चरण हैं। मानव-जीवन के प्रत्येक पहलू पर जितना सार गर्भित विवेचन इस ग्रंथ में हुआ है उतना भारतीय भाषाओं के और किसी काव्य ग्रंथ में नहीं हुआ। महाराष्ट्र में घर-घर में ‘दासबोध’ मिलेगा और उसके छन्द शिक्षित-अशिक्षित सभी की जिह्वा पर नाच रहे होंगे। कहते हैं कि इसके अतिरिक्त समर्थ ने लगभग 30 हजार अन्य कवितायें भी लिखी हैं जिनमें से कम ही इस समय उपलब्ध होती हैं।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सन् 1847 से पूर्व और उसके पश्चात् जो लड़ाई लड़ी गई है वह स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। इतना ओज और शौर्य, साहस और प्राण जन-मानस में भर देने का बहुत कुछ श्रेय समर्थ गुरु रामदास को है। ये युग-पुरुष थे, सच्चे महात्मा, सच्चे योगी थे। उनकी सचाई ने उन्हें सच्ची तपस्या करने की प्रेरणा दी। उपासना के द्वारा आत्मबल बढ़ाते हुए उसका लाभ जनता-जनार्दन के चरणों में, विश्व-मानव शोभायमान बनने में, अर्पण कर देना यही तो त्याग का सच्चा मर्म है। आध्यात्म की बकवास करने वाले यों गली कूचों के मक्खी मच्छरों की तरह हर जगह भरे पड़े हैं धर्म और ज्ञान की दुकानें भी हर बाजार में खुली पड़ी हैं पर जो अपने उज्ज्वल चरित्र और विवेकयुक्त विचारणा से जन-जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये मर मिटें ऐसे आध्यात्मिक पुरुषों का प्रायः अभाव ही रहता है। समर्थ गुरु रामदास उसी अभाव की पूर्ति करने आये थे। भारत-माता के बन्धन काटने में इस महान् योगी का योगदान अनन्त काल तक भुलाया न जा सकेगा। पुरोहित ने विवाह के अवसर पर उन्हें सावधान किया था, वे जीवन भर भारतीय जनता को सावधान करते रहे। और यह सावधानी ही परिष्कृत होकर आज राजनैतिक स्वाधीनता के रूप में हमें मिली है। आगे के कर्तव्यों के लिए सावधान रहने पर ही उसका सदुपयोग हो सकना सम्भव है।

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